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Full text of "Jaintatvy Kaleika Vikash"

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प्रस्तावना | 


जिस भफार अव्यिक व्याक्ि को श्यादार, निद्रा भय, मधुन श्रौर परिमर य श्राश्ला लगी रहती 
दं श्रौर उनकी सोज के लिए दत्तचित्त होकर क्रियाशचों मे प्रदत्त क) जाती ह । दीक उस प्रकार 
दशन पिपय मे भी खोज फी श्ररत्ति होनी चाहिए । यावत्‌काल पर्यन्त दाशनिकः विषय भं 
खोज नदा की जाती तावत्कालपयेन्त श्रात्मा स्वानुभव से भी वंचित ह रहता दै । ईस स्थान 
प्र दशन नाम सिद्धान्त तथा विश्वास का है। जव तक किसी सिद्धान्त पर ष्ट विश्वास नरी 
दोता तवतक श्रात्मा अभीष्ट कियाध्ो फ सिद्धि मे फलाभूत नर्द! होता । 
श्रय यहा यद्‌ भरस्न उपस्थित होता दै कि, किस स्थाने (सिद्धात ) प्र दृढ विश्वास किया 
जाए, क्योकि, इस समय श्यनेक दर्शन द्टटिगोचर दो रे ट । इस प्ररन के उत्तर भं कदा ज 
सकता टै फि, यदपि वर्तमान काल में पूर्वंकालवत्‌ ्ननेक दशनो कौ खष्टि उन्न रो गैटैवा 
दो रद ईै, तयापि सव दशनो का समवतार दो दशन के ्न्तथेत है जाता दै । से, श्रा्तिक 
दन रौर नास्तिक दर्शन ! 
यदि दस स्थन परे शका उ्पन्न की जाए कि, नास्तिक मत के द्रीन क्यों रहते दो 
तव इस शंका के समाधान में कदय नाता र दरैन शब्द का श्रथ है विश्वस (रढता) सो निस 
श्मत्माका भिथ्याविश्वास है अथात्‌ जो शात्मा पदार्थो के स्वरूप को यथार्थं ट्टे से नहीं देखता 
६, उसीका नाम नास्तिक दशन ३, क्योकि, नास्तिक दशन अत्मा के श्रस्तित्वभाव को नरह मानता 
है सो जव श्यात्मा का श्रस्तित्वभाव ही नदी तो फिर भला पुराय श्रौर पाप किसके तथा 
उसके फल भोगनेरूप नरक, तिर्यक्‌ , मनुष्य श्रै(र देव योनि कय 2 श्रत एव निष्कर्ष यद्‌ 
निकला कि नास्तिक मत का मुख्य सिद्धान्त रेदलौकिक सुखो का श्नुभव करना हौ दै । 
यपि इस मत विषय बहुत छुच्ं लिखा जा सकता द तथापि प्रस्तावना म इस विषयमे 
श्रधिक लिखना समुचित प्रतीत नही होता ) सो यह मत श्चाधे पुरुषो के लिय त्याज्य है, क्योकि, 
यह मत युक्ति बाधित शौर प्रमाणशूल्य है । अतएव श्रास्िकमत सवधा उपदेय है, इस 
लिय श्रास्तिक मतके श्राध्रित दोना श्राय पुरुप! का परमोदेश्य दै । स्स्योकि, श्रास्तिक मत 
का सुख्योदेत्य अनुकमतपपूर्ैक निर्वो आपि करना दै । 
यदि इस स्थान पर यह शंका उत्पन्न की जाए कि, श्राक्तिक किसे कते हे! तव इस 
शका के उत्तर मे कहा जाता है कि, जो पदाथा के श्स्तित्वभाव को मानता रै तथा यो किये 
कि, जो पदाय अपने दन्य गुण श्रौर पयौय म श्रस्तित्व रखते दै, उनको उसी प्ररार माना 
जाए वा उनको उसी प्रकार से मानने वाला श्रास्तिक कटलात। है । 
व्याकरण शस्त मे अस्तिक शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार से कथन का गई है, से के-- 
दैष्टिकास्तिकनास्तिकाः (शाकरायन व्याकरणं प्र. ३ पा २ सू० ६१) दैष्टिकादयस्तदस्थेति 
षष्टं ठणन्ता निपात्यन्ते 1 दिष्टा भमाणानुपातिनी मत्तिरस्य दिष्टं दैव ्रमाणमिव मातिरस्थेति 
दै्टिक । स्ति परलोक पुरय प्रापमिति च मातिरस्येत्यास्तिक । एव नास्तीति नास्तिक । 


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६ समर्पण । | 
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भूषित स्वर्गीय शरीध्रीश्री स्वामी गणयपाते राय 9 

जी महाराज 1 
(५ आपकी महतीषृपासे इस दासको 
@ जेन धर्मं की प्राप्ति हुई ह, आपने ही इस 
| दास को जेन का अभ्यास कराया था । (| 
| अतः आप के सदुुणो मे मुग्ध होता हुमा ‰ 
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॥ श्रीमद्‌ गणावच्छेदकं वा स्थव्रिरेपदवि- | 
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१ ओर आप के अपार उपकारं का स्मरण 
५ | कमलो मं सादर समपण करता हू । 

उपाध्याय जेनसुनि श्राम्‌ । 
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हिव लाला रघु्रीरसिद जेन 


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रायसा 


धन्यवाद्‌। 


ज्ञेन तत्व कलिका विकास के प्रकाशन का कुल व्यय श्रपमान्‌ राय 
सादिव लाला रघुबीर सिद जी ने भदान किया दै जिसके लिये दम समस्त जेन 
जाति कीश््रोर से उनक्रा हार्दिक धन्यवाद करते टै । श्रापक्रा जन्म २३ 
जनवरी सन्‌ देन को हुश्चा था। च्नाप पक सखुप्रसिद्ध खानदान कानूनगोयां 
कस्वा हांसती के दे । श्रपक्रे पिता लाला शेरसि जी दासी के प्रसिद्ध माल- 
गुजार थ शौर वहुन समय म्युनिसिपल कमेटी हांसी के उपप्रधान ( वायस 
ग्रीडंट ) स्दे। श्राप पक श्रच्छे जेलदार गिने जाते थे श्रापके पितामह 
(दादा) ला० रणजीत संद जी भी चिरकाल तक कस्टम डिपारमट भ शच्च 
च्छं पदौ पर नियक्त स्टे। 

पिले दरवार ताजपोशी के समय श्राप देदली मँ नायव तदसीलदार थ 
ओर तत्पश्चात्‌ श्रम्बाले मे बहत द्विनौ तक्र श्राप 5४0 र्दे । श्रस्बाला 
दिगम्बर जेन सभाक श्राप प्रधान भी रहे । वहां पर श्रापको जेनधमै वा 
स्वधर्मा भाश्यो की सेवाका श्नच्छा श्रवसर मिला । श्राप हर एक की 
उन्नति का विशेष ध्यान रखते थे । श्रापकी योग्यता का लन्य रखकर 
गवभमट ने श्रापको शिमला के निकटवर्ती श्रकीं स्यासत का मेनेजर 
चनाक्र भेजा । प्रजा के दिता श्रापने बहा शननेक काय किए रौर श्रच्छी 
प्रशंसा पराप्त की । तत्पश्चात्‌ गचर्नमेट ने आपको नालागद्‌ सियासत का चङ्गीर 
चनाकरः भजा । वदां के शासन को दढता के साथ न्याय पूयैक चलाकर प्रजाको 
सन्तुष्ट किया शरोर रियासत की माली हालत के! च्छा चनाया। जनता के 
दित के लिये श्रापने नालागढ्‌ मै चहुत सारे कार्य किष । श्रौर उनके लाभके 
लिप वड्ी बड़ी इमारते वनवाई । जेनधम के मुख्य सिद्धान्त “र्हिसाः का 
श्राप सदेव खुचार रूप से पालन करवाते थ । जेनियों के सथ प्रधान सखंच- 
न्ससी पवै के रार दिनो मे आ्रापने साजाक्लासरेउक्त सियासत मे शिकार खेलना 
श्रौर मांस भक्तणादि करना तथा कसावखाना चरौरह सव वन्द्‌ करा दिप्थे। 
श्रापकरे काय स्र सन्तुष्ट होकर सन्‌ १६२४ मे सरकार ने श्मापको राय साद्िव 
के खाडशेल ( पदवी ) स विभूषित किया । । 

तत्पश्चात्‌ भिरयुमरी, रोदतक, मियांवाली व लुधियनेमे श्राप श्फ़सर 
माल र्ट । जव श्राप ज्ुधियनि मे थे तव श्रापको श्रीश्री १००८ गरणादच्छ- 


श्री 


श 
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पिषयानुक्रमणिका 





प्रथमा कलिका 


चिपय पृषएठसख्या 


मङ्लाचस्णं १ 
सथक्षात्मा चिकालदर्णी होताटहै ३ 
तीधद्भुर गोत्र वांधने के वीस योल ८ 
चोतीसख श्रतिशार्यो काव्णन र्ट 
पतीस वचनातिशयों का वरीन २६ 
टार दोषो का चरन ३० 
र्ट मदाभातिदायौ का वरुन ३६ 
भगवान के वार गुणौ का वणन ३७ 
4 
ताया 
धमेदेव का वरन पूर्वक श्राचाये 
के छुततीसर गुणे का वणेन 
सात नयो की व्याख्या 
पट्‌ दशनो का चरन 
्राचार्य के छरत्तीस गुणे की समाप्ति ८ 
छ्राचार्य की श्राठ सपदार्पेः सूर 
पाठ युक्तं तथा उपाध्याय के 
पच्यस गुणे का वर्णन 
वार्ह श्रगो की व्याख्या ९१२ 
साधु के सत्ताईस गुणे मे से सोलद 
शुरो का चरणन १२६३ 


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७३ | 
८५ | खाथुके सव्रहवें (१७)गुख से लेकर 


विपय पृष्सख्या 


भगवान के पर्व्वास नामो की 
व्याख्या २६ 

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जेनमत की श्रास्तिकता का वरन ४९ 


सिद्ध परमात्मा का वरन ४३ 

चोचीस तीथद्करो का सविस्तर 
वरान ५२ 

तीथङ्से के नगर माता पिताश्रा- 
दिके कोक ५६ 
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कालका 

छद श्ावश्यको का वरन १३३ 

श्रादार के ४२ वयालीस दोपोका 
वरेन १३४ 


छुव्वीस गुणौ तक का यशन १३७ 
साधके वासं परीपहो का वर्णन १४० 


| साधु के सत्तारईसवे गुण का वरन १४३ 
८६ | साघु कि लब्धिर्पेआदि का वरन १४४ 


सतर (१७) भेद सयम का वरान १४६ 
दस यति-धर्मो का वरन १५१ 


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जिस महात्मा के चिन्न का दशेन करे पाठक जन पने हृदय तथा नेत्रो फो पविश्न 
कर रहे है उनका शुभ नाम है धी १०० संणावच्ेदक वा स्थपिरपद्‌-विभूपित 
श्रीमद्‌ गणपतिरायजी महाराज । धापका जन्म स्यालकोट जिला के श्चन्तर्मेत पसरूर नामक 
श्र मे भ्रीविक्रमाच्द १६०६ भाद्रपद कृष्णा ठृतीया मे गलवार के द्दिन निपेखियः गोघ्रीय 
(कास्यपगोच्रन्तगैत) लाल गुरदास मह्न शीमाल की ध्ेपत्नी श्रीमती गोयौ की कुसि 
से हुश्चा था भापके निह्ालचन्द १ ्ालचन्द्र २ पाल्लामल्ल ३ पंजुमल पार भ्राता ये मौर 
नि्ालदेवी 9 पाली देवी २ रोर तोती देवो ३ ये तीन भगिनियां धीं 1 शापका शशव 
काल बडे ही भानन्दुपूवेक व्यतीत हुश्ा सोर युवास्या पराप्त होने पर नूनार माम मे 
वि सेवद्‌ १६२४ मे ्रापका विवादं संस्कार खा । भाप सराफ की दुकान करने 


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च्यपने नानाके धर पसरूर मे ष्टी रते थे ! यह घौर धन्य कतिपय ग॒हस्थ वैराग्य भाव 
को .धारणं कर शपते जीवन के पचिनच्र नाने के लिये धार्मिक जीवन ष्यतीत फरने 
लगे,! फिर परस्पर के ससग से सव का ट वराग्य भाव यरत्ता चला.गया | जय सव 
ने यही क्रिया धारण कर्ली तच सवको श्ाक्ता भिज गद । 


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ऊंट्भ्वियः से शान्ता प्राक ्टोते दी प्रसन्नता पूर्वक सयके सव दीक्षा के लिए शहर 
से चल पडे, उन दिर्नोमभ्चीश्ची श्री १००८ श्याचा्यं वर्यं श्री पूरय ध्रमररसिह जी महा- 
राज अश्रतसर भँ चिराजमानये | श्री दूलञोराय जी २ श्री शिवद्याल जी रे श्री सोदन- 
लालजी र श्री गणपत्तिराग जी ४ ये व्यार वरागी पुरूप धी पूय प्रमरसिष्ट जी महाराज 
के चरण फमर्जो म उपस्थित होगएु । तय श्री पूज्य ( धराचायं ) महाराजने वारो को 
श्रपने मूल्य उपदेश द्वारा भौर मी वैराग्य भावे टद किया ] सांसरिक पदार्थो की 
श्रनित्यता दिखलाई । जव उग्र चारो महापुरुषो का चैराग्य भाव उच्च कोटि पर पहु 
गया तव श्री पूज्य मष्टाराजने उरु चारा महापुरूपे। को १६३३ माभैशीष शुक्रा € 
्न्द्रवार के दिन बड़े समारोह के साय दी्चित किया ¶ उन दिना म श्री पूज्य मोतीराम 
जी महाराज नाल्ागद्‌ म विराजमान थे] तव भी पूञ्यं अ्रमरसिह जी महाराज ने श्री 
गणपतिराय जीं महाराज को श्री पूय सोतीराम जी महाराज की निश्राय कर दिया । 
तय श्रापने उसी दिन से अपना पवित्र सम्रय षान धीर ध्यान मे लगाना ्रारम्भ किया। 
जव घ्याप भरी पूज्य मोत्तीराम जी महाराज के चरणे म उपस्थित हुए तव श्राप , साघु 
क्रिया द्वौर श्रुताध्ययन विशेष रूप से करने लगे 1 विशेष ध्यान ध्चापका सायुकषिया श्रौर 
चैयाद्ष्य वा गुरु भक्नि पर था जिस कारण शीश्र ष्टी गच्छवा श्री संघमे घाप सुप्रसिद्ध 
होगप्‌ 1 भ्राप की सोम्याकृति, नम्रता, साघुभक्रि भव्येक य्यक्रि केमनको सुग्ध करती 
थी । दीद्भित्ता धरोर खमयानुसार वततव ये दोनो वातत घाप की शनुपम थी! तरपश्चात्‌ 
श्राप्रने निश्नललिखित अनुसारं चाततुमास किये जसे कि-- 
१९३४ करा चतुमांस ध्चापने श्री पूञ्य मोतीराम जी े साथ श्म्बाला जिले.के अन्तर्गत 

खरड़ शहर मे क्या } - - 

१६३५ का ष्वतुमांस श्रापने बहुत से केत्रो म विचर कर स्यालकोट मे किया । 
१६३६ का चतुमास श्चापने श्री पूज्य महाराज के साथ जम्बू शहर मे किया । 
१६३७ का चतुमास परसरूर शहर म क्या) 
१६३ का यतुमौस लुधियाना शदर मे किया । 


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५--सम्बत्‌ १६३८ मै भोमदाचायै थी १०८२८ पूर्य भ्रमरत्ति्‌ जी म्ाराजका 
अश्तसर मं स्वगव ह दृयायात्व भी स्थने १६३९ मे मलिरकोदला म भरो मोतोराम जो 


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ददी ।उससमयथीश्ची श्री १००२ स्वामी लाज्ञचन्द् जी मष्टाराज भी परियाले मेष 
रवेराजमान ये ! शाप भावाय पद्‌ देने फे पश्चाव्‌ धम्याल्ा प्रर सादोरा की भोर 
विष्ठार कर गवे । फिर श्राप सारीरा, श्रम्बाला, परिया, नाभा, मलेरफोटला, 
रामदेफोट, फीरोज्ञ भुर, कसूर, लादौर ते इए गुजरावाले मे पधार गपु | वां पर 
रावलर्पिटी वाले भ्रायर्को की श्रव्यन्त विकि शोज से फिर भापने रावलपिंडी की श्रोर 
विषटार कर दिया + मा मे वज्ञीरायाद, वुं जाट, जेष्म, रोहतास, कल्लर, म धमौपदेश 
देते हुए भाप रावखपिडी मे विराजमान होगये । १६५८ का खलुमीस यापने पने सुनि- 
परिवार के साथ रावलर्पिदी शष्टरमे ष्टी किया इस चतुमांस मे धर्॑प्रचार बहुत षी 
दुध्रा । इसके प्रनन्तर श्राप धनुक्रम से धमेभरषार करते हुए स्यालकोट मे पधार 
सषु ! बं पर भी स्यन्त धर्म॑प्रचर होने लगा, वषं के श्रावकवर्म ने घापको चातु- 
मास विपयक वित्त्ति की । फिर भ्नापश्री जी ने भ्रावकव्म का प्रत्यन्त भाप्रद देख. 
कर उनकी विदवक्ति को स्वीकार कर १६६० का चतुमास स्यालकोट का मान कतिया । 
चीच का शेप काल ्रतसर, जम्बू श्रादि रेत मेँ धर्मभरचार करफे १६६० का षघलतुमौस 
स्यालकोट म धरापने किया 1 चतुसांस म बहुत से धर्मकायं दए । घतुमाौस के पराद्‌ 
श्राप ध्मृतसर सारे । वहां पर श्री पृञपर सोहनलाल जी महाराज वा मारवाड़ी साघु 
श्री देवीलाल जी महाराज चा अन्य साघु वा ध्रार्थिकाये भी एकत्र हुए थे । उन दिर्नो 
मे गष्ठुमे वहुत सी उपाधि भी वितीणं हुई थी, 1 उसी समय श्मापको “गणावच्चै- 
टक" घा “स्थविर” पद से विभूपित करिया गया या | दसके पीठ श्चापने वषास 
विहार कर दिया । किंतु सापको श्वास रोग॒( दमा ) भ्रादुभूत होगया जिस कारख 
चहुत दूर विष्टार करने मे बाधा उरपन्न एग 1 तय घ्मापने १६६१ का चतु्मांस एरीद्‌- 
कोट शहर मे कर दिया । 

१६६२ का चतुमौस ध्रापने पटियाल्ञेमे किया । 

९१६६३ का श्म्वाला शार मे किया । त्तव भ्राप्के साथ चतुमास से पृषे मारवाड़ी साघु 

भी कितना काल विचरते रषे । 


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१६६४ का चतुमांख भमापने रोपड श्र मे किया ! एस षखतु्मीस मे जेनेतर लोगो को 
धमै का बहुत सा जाम पहुंचा | नागरिक लोग श्चापकी सेवा मं दत्तचित्त होफर धमं 
का ज्ञाभ विशेष उरुने लग गये ! किंतु रवासरोग (द्मा) फा फट प्रफार से प्रतिकार 
सकषेये जाने पर भं वष्ट शन्त न हुभा । तएव श्रापको कद नगरो के लोग ह्थिरषास रहने 
की विक्तसि फरने लगे, कितु श्रापने उनकी विक्षसि को स्वीकृत नदीं क्रिया । अपने 
श्रारमचक्त से दिष्रते ही रहे । कड वार भ्रपको मागसेवाम्मामो मे श्वासरोग का 
धवल वेग (दौरा) होगया, जिस कारण आपकी रिप्य मेडली फो घसत को टोली 


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शयो कर गिर जायगा ? ॥ 
यरुषप--यं भी गिर जाया करता है । 
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, त्तव श्री मष््ाराज वा धन्य साघु उठ कर श्रन्यत्र गये | तव उस पुरुप ने का 
फि--श्नाप शीघ्रता न कर, पहले श्चपना उपकरण उरल्ल, फिर यह एर गिरेगा । तव 
साधुध्रो ने शान्तिपूैक उपकरण उखाकर न्य स्थान पर रख दिये च्रौर श्राप शान्ति- 
पूर्वक चैट गये । द्रतना कष्ट कर वह पुरुप ्रदश्य होगया, श्वौर उसी समय उस वृत्त 
छी महती (बड़ी) शाखा जो उस पुल पर फली हु थी भकस्मात्‌ गिरी, जिससे 
घुल का मामं ष्टी घद्‌ होगया } शाखा के गिरते ( ट्टते ) समय तना भयेकर शब्द्‌ 
हृश्रा किजो श्चरवकढगे दशैन करके सराय की श्रोरजा रदा था, उनको भी सुना 
पडा तवव लोग हुत ष्टी शीध श्रीमहाराज के दैन के लिये फिर उक्ती स्थान 
पर गप । दशैन करके बहुत ही श्वानदित इुए । जव न्हेनि उङ्क वृत्तान्त को सुना तव 
उनके है का पारावार न रहा फिर वे धन्य २ करते श्चौर श्रापकी स्तुति करते हपु पुन. 
धापिस् चले गये ! # 


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एकं समय श्राप नाभा से विष्टर कर पदिाले की रोर जा रदे थे, तव श्राप 
को एक जगल मे चीता (शेर की श्रारृति का सक पशु) मिला, राप उस को देखकर 
निर्मीक खड टो गए । तब वह्‌ च्राप को देखकर शगन्ति-पूवैक घाप केपाससे युज॒र कर 
जगल की श्रोर ही चला गया । यह सव प्राप के सयम शरोर शान्ति का ही माहात्म्य 
था क्योक्रि-प्रस्येक प्राणी के साथ ध्रपको निर्वेरता थी, उसी का यह्‌ मादास्म्य 
था ।-निवेरताके ही कारणं हिंसक जीव भी श्चापके भ्रति नि्वेरताकाष्टरी परिचय देते 
ये ! श्रम्वाल्त के चतुमास का बृत्तान्त हे कि-एक समय वपा होने के पश्चात्‌ मध्याह 
काल म श्र से बटूत दूरी पर श्राप सुनियो के साथ हिर गए । जव श्राप भरपनी 
नैल्यिक श्िया्नो से निदत्त होकर शर की श्चोर पधार रहेये, तव मामे ्ाप.को 
साप मिला। वह भी खापके साथ ही साथ चलने लगा) इस प्रकार भापकरे साथ 
चलता था, जिस भकार भ्राप का रिष्यवरौ श्चाप.के साथ गमन करता था। जव श्राप 
मा परिवर्तन करने लगे, तच श्रापने फरमया फ-रेत न दो इसे कोरर मार डले । 
इतना वाक्य राप के सुख से सुनते ष्टी बह सांप श्रापके देखते ही देखते एक ठ मे 
भविष्ट होगया । परचात्‌ श्नाप श्वर भ पार गदु । मरह सव शान्ति, काही सादात्स्य 
थाकरिजो हसक जीव भी च्रापके साथ भद्रता कादी परसिवियदेतेये । फीरोजषुर 
हरमे भी पेसी ही एक घटना, हुई भीं । जन श्राप नैत्यिकं क्रिया्ो.से निघरृत्त = 


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मथुरा दास जी मोगानिवासी की सम्मस्यज्ुसार श्वाप श्रीको साघु वख की डोली , वना | 
कर मोगा मदीमेल्लेगए] डाक्टर साहव ने बडे भ्रमसे भ्रापकी शरांस काप्रत्तिकार क्रिया | 
श्रापश्रीजी की दोर्नो धांखो से मोतिया निकाला गया | भ्रापकी दशि ठीक हग, 
फिर ध्यापक्नी जी को उसी प्रकार साघु वख की टोली्मेयेखाकरलुष्यानाम ष्टी | 
श्याएु | धापश्री जी के लुध्याना मे विराजने से नगरनिधासी प्राय, ्रव्येक जन को ॥ 
भर्षन्नता थी } जिस प्रकार अन संघ ध्ापकी भष्टि में दत्तचित्त था उसी प्रकार जेनेतर ॥ 
लोग भी श्रापकी भक्ति करके रपे जपिन को सफ़ल मानते ये] श्राप काप्रेमभाव प्रत्येक | 
जनके साथ था | दसी कारण पभ्रस्येक धन्यमतावन्ञम्वी भी ्चापको पूज्य दि से देखता 
था प्यौर दर्शन करके चपने श्राप फो कृतत्य सम ता था | यष्ट प्रापे सत्योपदेश | 
काटी फलद जो लुध्याना मं (ज्ेनकल्या पाठरालाः नाम की संस्था भली प्रकार से 
चलरष्टी है । श्रनुमान सवा दोसौ २२५ कन्याएं शिका पारदी ह । इस पाव्णाला मे सां- £ 
सारिकि रिक्ता के प्रतिर कन्या को धाक 1 शिता भी भली प्रकारसेदी जारष्टी ह। 
पन्जाव प्रान्तं मे, स्थानकवासती सँनसमाज मेँ यष एक टी पाटशाला है | दस फा सुपर- 
वन्ध भ्रौर नियमपूर्वकं संचालन टस के कर्मचारी भली भ्रकार से कर रहे दै । भरापके 
चच्चन मँ प्क एसी जौ कक शकि थी, जो भ्व्येक जन को हितशिष्ता ्रदान करती थी। 
श्राप के मधुर वाक्य स्वर्पाघर श्रौर गभीरा दते थे । सदैवकाल श्चाप श्रास्मविचार 
तथा मौनचि से समय विशेष व्यतीत करते ये । श्चापष्टी प्रत्येक वाती शिद्ा प्रद्‌ थी! 
कालगति वडी विचित्र हे | यष्ट किसी का ध्यान नष्टौ करती कियद धमौत्मा हे यापा. 
पिष्ट । यष्टी गति स्वामी जी के साथ हुदै | १६८८ ग्येष्ट कृष्ण २५. शुक्रवार ॐ दिन 
स्वामी जीने पाक्तिक त किया। 

वरृद्धावस्था के कारण धरापकोखेदतोरषा ष्टी करता था, किन्तु पारने के दिन शनि- 
चार को ध्रापको वमन शरोर विरेचन लग गए, जिस से धराप श्यत्यन्त निर्बल होगए, तव 
सायकाल श्राप ने न्य साधुश्ों से कहा कि सुभे अनन करादो, उस समय साधुं 
ने शाप को सागारी धनशन करा दिया । उस्र समय श्चापने श्रालोचना द्वारा भली 
भ्रकार श्यात्मविश्युद्धि की प्रोर सब जीवो के प्रति अन्त.करण से उमापन किया । 
रविवार के दिन श्रापने भ्नोपध को ्ठोड़ कर फिर सागारी धरनशनं कर दिया । रविवार 
को १२ वजे के पश्चात्‌ चाप की दशा चिताजनक्‌ होगदह । सायकाल फिर श्रापने चार 
श्राहार का व्याग करादेया । सोमवार प्रात काल जव डाक्टर श्चौर वैद्य नेश्यापको देखा 
तो निश्चय हुमा किव दशा विशेष चिताजनक होगदरै है, तब श्नापको निरागार 
यावन्नीव पन्त अनशन कराया गया । श्राप शन्तिसेकटेष्ुएु ये, श्चौर प्राप के 
॥ पास साधुव्े घा श्रावकवमे चेडा हुध्रा था जो धापको सूत्रपाठ सुना रहे थे । जव 


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नमोत्थुणं समणस्स भगवय्यो महावीरस्स । 
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से केरष्ेणं भते ? प्व बुच्यई्‌ देवाधिदेवा देवाधिद्रेवा ! गोयमा ! जे मे 
श्यरिदेना भगवतो उप्पन्ननार्दंसणधरा तीयपङ्प्पन्न मणागया जाणया रहा 
जिखा केवली सव्वरणू सन्वद्रिसी स्र तर्णं जाव देवाधिदेवा २॥ 
भगवती सूत्रतः १२-उद्‌श ६। 
ंधयारे तमे घोरे विहन्ति पाणिणो बहू । 
को कर्स्यर्‌ उज्जोयं सव्यलोयम्मि पाणिणं ॥ 
उग्गग्रो धिमलो भार्‌ सव्वल्लोय पभकरो । 
सो करिस्सर उज्जोयं सव्वलोयम्मि पाणिं ॥ 
भारूय इ इ के वृत्ते केसीगोयममव्ववी । 
केसिमेवं बुव॑तं तु गोयमो इणएमन्ववी ॥ 
उग्गो खीण्ससारो सव्वन्न्‌ जिणभक्खरो । 
सो करिस्सड उञ्जोयं सव्व लोयम्मि पाणिं ॥ 
उत्तराध्ययन सृत्र-परष्ययन २३ 
भवाश्र--ध्ीगोतम स्वामी शी भगवान्‌ महावीर स्वामी खे विनय 
पूर्यक परश्च करते है किं हे भगवन्‌ ! देवाधिदेव किस कारण सेके जतेदै 
दस प्रश्च के उत्तर मे श्रीभगवान्‌ पतिपादन करते है कि-टे गोतम !जो 
यद्‌ श््न्त भगवन्त उत्पन्न क्ञान दशैन के घरने चाले दै श्रतीत काल श्रोर 
चर्तमान तथा भविष्यत्‌ काल के जानने वाले है अरहन्त राग्ेप क जीतने वाले 
सपू करान के धरने वले जो सर्वज्ञ चरर सर्यदशा दश्री कारण से उन्दे 
देवाधिदेव कटा जाता दै । तथा केशी कुमार रमण श्री गोतम गणधरस परश्च 
पृते है कि-दे गोतम ! इस भयैकरः घोर अ्रधकारः मे वहत से प्राणी ठहर र्दे 
है से कौन सर्यल्लक म उक्त प्रणिया को उयोत करेगा ? 
दस के प्रतिवचन म गोतम स्वामी कने लगे किदे भगवन्‌ ! उद्य 
द्या निर्मल सय सवलोकमे पकाश करने वाला सो सर्वलोक मे उक्त 
रकार कै ध्राणियो को उदेत करेगा । 
दस भ्रदेलिका रूप रश्च को स्प्ट करते हुए फिर श्वीकिशी कुमार मख 





(३ ) 


चे सर्वं श्रीभगवान्‌ के लान स बाहिर नदीं श्रपितुचे तीनों कालके पर्यायोंको 
दस्तामलकचत्‌ जानते श्रीरः देखते है । 
यदि पेसे कदा जाप कि--" सर्वज्ञ" शब्द्‌ तो मानना य॒क्िसगत सिद्ध दोता 
हे किन्तु चिकाल्चत्ता मानना युक्िसंगत नदीं है कयोकि-िकालयेत्ता मानने 
मे दो श्रापत्तियां उपस्थित दोजाती द ! जैसे कि-णक तो यद्‌ है कि-जव कोर 
यस्तु उत्पन्न रही नदीं दुई तो भला फिर उसका देखना चा जानना किस पकार 
सिद्ध दो सकता है ? हितीय जव सर्वन्न दी मान लिया तव पिर उस को चिकाल- 
चेत्ता मानना परस्पर विरोध रखता ह ऋ्योकि-सर्यक्ष को पक रसमय का कषान 
होता है वद छान परिवर्चनशील नीं दोता किन्तु चिकालवेत्ता का क्षान परि- 
चर्तनशौल मानना पदहेगा जेसे-पदाश परिवर्तनशील है श्नोरवे स्षण २ मे नूतन 
चा पुरातन पयीर्यो के धारण करने वले है सो जव पदार्थोकी इस प्रकार की 
स्थिति हे तव छ्लान भी उसी कार का मानना पडेगा क्योकि-श्षान पदाथ का 
दी दोता द श्रतए्व सर्यक्ष के साथ चिकालचेत्ता शब्द्‌ का विशेषण लगाना 
युक्तिसंगत सिद्ध नदीं द्योता हे । 
इस भका का समाधान इस पकार से किया जाता दे कि-जेसे “नीलो- 
त्पल'" शब्द्‌ मे "नीलः शब्द “उत्पल ' शब्द का विशेषण माना जाता है तथा 
“सम्यगृज्ञान शब्दम सान शब्दका सम्यय्‌ शब्द्‌ विशेषण माना गया है ठीक तद्त्‌ 
सरयन्त शब्द का धिकालवेत्ता शब्द विशेषण रूप दै इस लिये इसमे कोई भी 
पत्ति उपस्थित नदीं दोती है क्थोंकि-सर्वज्ञ प्रथु काक्ञानतो सर्वं कालम 
पक ही रसमय दोता है किन्तु जिस व्यक्ति की श्रपेत्ता से वद क्षान मे उस व्यक्ति 
की दृशा को जानते श्रौर देखते दै उसकी शयपेत्ता से दी उन्दैे तरिकालदशीं 
कहा जाता है जेस कि-व्याकरण शाख मे कालद्रव्य एक दोने पर भी उस फे 
दशो लकासें दास भूत भविष्यत्‌ श्रोर वतमान रूप तीन विभाग कयि गण्‌ द । 
इस म कोई भी सदेद नदीं दै किं-जो व्यक्घि जिस समय जिसदेश में 
विद्यमान दोता दहै उखका तो चह वर्तमान काल दी होता दे परन्तु उस व्यक्ति 
को भूत कालम दोनेवाले जीव भविप्यत्‌ काल म रखते दं श्रौर भविष्यत्‌ काल 
म दने वालि जीव उस को भूत काल म रखेगे ! परेच काल द्व्य तीनों विभागो 
मै पक रसमय दोता है सो जिस धकार काल द्वव्य एक दोने पर व्याक्षियों 
ची पेत्ता तीन विभागों मे किया गया है ठीक उसी भकार सर्वज्ञ भ्रभु 
के क्ञानविपय भे भी जानना चादि च्रथोत्‌ क्षान मे किसी धकार सभी 
विसवाद नदीं रो सकता किन्तु जिस भकार चह तान्मे पदाथ के 
स्वरूप को देखते है वे पदां उसी भकार दोतते रते है 1 
जो यह शका उत्पादन की गद थी कि-जो चस्तं अभी तक हरै नर्दीं । 


( ५) 


^ १८५ 


"मे कम्मे श्रय जवि" त्ति श्नेन योरपि भत्यत्ततामाद केवलित्वादर्त , 
“श्रस्भोवगमियाष् "त्ति श्रारृतत्वाद्‌भ्युपगमः-प्रनस्याप्रतिपत्तितो बह्मचरय- 
भूमिशयनकशनञ्चनाद्ीनामङ्गीकारस्तेन निता शाभ्युपगमिकीतया “वेय 
स्स" त्ति भविप्यरकालनिर्देशः भविप्यत्‌ पदार्थो विशिष्क्षानवतामेव क्षेयः 
प्रतीतो वर्तमानश्च पुनरजभवदरेणान्यस्यापि श्रेयः सभवत्तीति न्नापनाथः '“उव- 
कफमियाप्” त्ति उपक्रम्यते ऽनेनेत्युपक्रमः--कमेवेदनेपायस्तच्रभवाए शछौपक्रमि- 
की--स्वयमुदसष्योदीर्एाकस्णन वेोदयसुपनीतस्य कर्मणे.ऽनुभवस्तया 
आ्ओपक्रमिकया वेदनय! चेदयिप्यनि, तथाच रहा कम्मे' ति यथाक्म--वद्धमा- 
नतिकमेण “श्रा निगरणेः ति निकर्णाना--नियतानां देशकाला्दौनां कर्णानां- 
विपरिणएमहेतूनामनतिक्रमेख यथायथा तत्कमे भगवता टृ तथा तथा बिपरि- 
स्यतीति, इति शब्दो चाक्याथसमाप्ताविति ॥ 


इस पाट का यद साररोश है कि-्राभिगवान्‌ श्रपने प्रानमे यह 
अली घकार से जानते श्योर देखते है कि-यह जीव वाद्िर के निमि दाय 
कमे चेदेगा श्रौर यह जीव स्वयं उदय होने योग्य कर्मो की उदीरणा करनेसे 
कमो का श्रसुभव करेगा कारण कि-कर्म दो भ्रकारसे वरन किये गप है जैसे 
कि-पक तो पदेश कर्म श्नोर दितीय श्चुभाग कर्मसो जो पदेश्च कमदोतिटैवे 
श्रात्म पदेशौ के साथ क्तीर नीरयत्‌ श्रोत भोतरूप टोकर ण्क रूपस् रहते दै 
चद ते श्रवश्यमेव भोगने मे श्राते है किन्तु जो श्लुभाग कर्म हैं वे श्रनुभव 
करने मे श्रा भी सकते है नही भी श्रासकते जेसे-मिथ्यात्व के स्षयोपशमकाल 
मे श्रद्ुभाग कमे सि फल नदी श्रनुभव किया जता श्रपितु देशव कर्म श्रवश्य- 
मेव भोगने मे श्राते है सो जिस प्रकार श्रात्म थ्देशो दारा कर्मो का वंध हो चुका 
हे फिर जिस देशव कालादिमे उन कर्मौके रस का श्रजुभव करना है वा जिस 
खकार से जिस निमित्त से कर्मो के फल भे।गने है सो जिस प्रकार अदन्‌ भगवान्‌ 
ने श्रपनेक्षानमे देखा हे वह उसी प्रकार परिणत होवेगा श्रथौव्‌ तीनों कालके 
भाव जिस प्रकार ज्ञान मे देखे गप दैवे भाव उसी भकार दोते रदेगे क्योकि-- 
केवल ज्ञान विशद्‌ कषान होता हसो ख स्टू पाठ से सर्वज्ञ पथु को चरिकाल- 
दर्णा युक्घिपूवंक सिद्ध किया गया दै । अरतप्व तिकालद्शीं शब्द किसी 
सुक पदाथ की येत्ता से ही कथन किया गया है ञसे-यह श्रमुक जीव 
श्मसुक देश काल मे श्रुक कर्मो के फल का श्रयुभव करेगा किन्तु श्री भगवान्‌ 
का केवलक्षान तीनो काल मे प्क रसमय रहता है । यदि पसे कडा जाए कि- 
ज्ञानात्मा रूप सर्वज्ञ धभरु जव तीनो काल के भावो को हस्तामलकवत्‌ अघ- 
लोकन कस्ते हेतो फिर जीव की स्वतेत्रता जाती रही रौर पुरूपार्थं करना 
भी व्यथैदही सिद्ध दोगा क्योकि-जो ्रभिगवान्‌ ने क्षान मे देखा इुश्मादे 


( ७ ) 


मेव भोगने ह  श्रतएव उन कमो के फलद्देश के समय दोनो नयो का वल- 
म्बन करना चादिये । जसे कि-जव श्रथ॒ुभ कम उदय म श्राजापं तव निश्चय के 
सवलम्बन से चित्तमे शांति उत्पन्न करनी चाहिये 1 प्रौर व्यवहार नय के 
छ्माधित दोकर शुभ कमो की श्चरोर प्रवृत्ति करनी चादि तथा कमस्षय करने 
के लियि चेष्टे करनी चादि । 
सर्धशष मामा का शानसय स्थानों पर व्याप्त दो रदा दै श्रथोत्‌ 
चे ्रपनेक्ञान डारा तीन काल के भावों को यथावत्‌ दस्तामलकवन्‌ देखते दै 
दल बात पर पूरौ विश्वास रखकर निरृष्ट कर्मो से वचना चादिए । क्योकि-लोक- 
व्यवहार म देखा जाता हे कि-यावन्माच श्रथ॒ुभ कम हे उनको धायः लोग गुप्त 
द्धी रखने की चेटा कस्ते ` श्चौर अपने छन्तःकरण मे यह भाव भी उत्पन्न 
करतेदैकि दमारी-श्रनुचित क्रिया को को देख नले तथा जान नल 
यदि अनुचित क्रियार्प करते समय कोर छन्य च्यक्ठि श्रकस्मात्‌ उस स्थान 
परश्राभी जावे तवये श्रचुचित किये करने वाले ग्यक्चि उस स्थान स 
भाग निरूलते दै श्रथीत्‌ वे श्रठचितक्रियर्णे गु दी करने की इच्छा रखते है । 
इसी न्याय से जव र्दन प्रभु वा सिद्ध भगवान्‌ श्यपने क्षान डारा तीनो 
काल के भावों को जानते शरीर देखते है तो फिर किसी स्थान पर भी, श्यजुचित 
क्रियर्पे न करनी चादि । 
वास्तव मे-सर्धज्ञास्मा के मानेन का यही मुख्य पयोजन दै जव उसको 
मानते हु भी श्रञुचित परघत्ति की जा रदी है तो फिर इस सर सिद्ध हु कि-नाम- 
मात्र स दी उसको सर्वज्ञ घ्नौर सर्वदशं{ माना गया हे पर्व अन्तःकरण अु- 
चित क्रियां की चोरी सुका इश्माहे। 
विचार करने क चात दै जव चमै-चनजुच् क इतना भय माना जाता हे 
तो फिर सर्यल्लात्मा का अन्तःकरण म भय क्यों नदीं माना जाता ¡ श्रतप्व 
सिद्ध दश्रा कि-च्यैन्‌ वा सिद्ध भगवान्‌ का ज्ञान सवै स्थानों को यथावत्‌ 
भावस देख स्हा है दस चातको ठीक मान कर पाप कमो सरे निचृत्ति 
करः लेनी चादिष्‌ ' क्योकि-सदूयैवत्‌ जान ढारा प्रकाश करने वले सर्वजन धरमु 
डी है उन्ही के सत्योपदेश ारा भव्यात्मा अपना कल्याण कर सकते है ! 
अतएव उन्दी के उपदेश दवारा भव्य प्राणियों को सुमा मे स्थापन करना 
चादि जिसस कि-वे मोक्षसाधन के पात्र वने । इतना दी नदीं किन्तु नेक 
मात्मा को भी खुमागं मे ल्े। 
छव घश्च यह उपस्थित होताः है कि-किन २ क्रिया्मों दारा अर्हन्‌ पद्‌ 
च्म मापि द्यो सकती दै । इस के उत्तर मे कटा जा सकता दै कि-श्ास्नो मे उङ्क 
पद्की परासि के लिये वीस स्थान वंन कयि गए डे अथीत्‌ वीस अकार क्पे. 


५ ६ ) 


सर्यलोकालोक को हस्तामलकवत्‌ देख रहे ह जिनको ्रात्मिक नेत सुख 
की प्रसिदटोर्टीदहे इसी कारणस वे श्रात्मिकः खख म निम्न है यदि तीनों 
कालके देवो के सुख के समूह को पक्त्र किया जापः तो वह खुख मोक्ला- 
त्माक सुख के सन्मुख शनतये भाग माच भी नरीं टे क्योंकि-सांसारिकर 
खुख पुद्टल-जन्य हैः श्रौर मोच्त का सुख श्रारिमिक सख हे सो जव पौद्लिक 
सुख कौ मोक्तके खुखके साथ तुलनाकी जाती है तच वद्‌ सुख उस खुख 
के सामने छनेतय भाग माच भी प्रतीत नदी होता जेसे-द्रो वालक श्रपनी 
कत्ता मे परीन्ना देकर चले श्माए श्रौर चे दोनों श्रपनी परीत्ताके फलकी 
प्रतीक्ता किये जास्टेट) एक समय की वात टै कि-उनदोनें वालकोँर्मेसे 
एक वालक शति स्वादिषएटश्चौर मन को प्रसन्न करने वाला खुन्दर भोजन कर रहा 
है, श्रौर दुसरा वालक उसके पास यैठा दुश्रा दै परंच भोजन करने वाला वालक्र 
्रपने खुन्दर भोजन मे श्यानन्दं मानता दुश्रा श्रपने सदचर क्रा उपहास भी 
करता जाता दे । इस प्रकार की क्रिया करत समय दोनों के फलादेश के पत 
उसी समय श्रागप परन्तु जो वालक भोजन म नन्द्‌ मान रहा था उसके पत्र 
म यदल्िखा हुञ्चा था कि-तुम इस वा्विक परीक्ता मे श्रव की वार उत्तीरीता 
पराप्त न करसे सो शोक दै इत्यादि । किन्तु द्वितीय पत्र मे यह लिखा इुश्राथा 
कि-दे प्रियवर ! श्रापको कोटिश्चः धन्यवाद दै श्मापको शुभ समाचार दिया जाता 
दै कि-च्राप ्रपनी कन्ताम परथर्माक म उत्तीर होगपः द इत्यादि । जव पदि पत्रक 
लख को भोजन करने वाले वालक ने पठा बह भोजन के श्रानन्द्‌ को सर्वथा भूल कर 
शोक दशा को प्राप्त हो गया इतना दी नर्द किन्तु अपसल्य के कारणो. को दंढने 
लग गया 1 जव दुसरे वालक ने छपने पत्र को पढ़ा वह श्रानन्दर की सीमा को भी 
उक्ञघन करेन लगा। अव हम पोद्धलिकर खुखवा क्षान के सुख की तुलना करसक्रते 
है कि-दोनों का परस्पर किंतना अन्तर दै, सो सिद्धाव्मा च्चातिपिकं सुख मे निम 
दै सो सिद्ध भरसुके गुणो मे श्युराग करने से तथा गुणोत्कीत्तन करने से जीव 
ती्थंकर्‌ नाम की उपार्जना कर लेता हे । 

२ परचचन--श्रोभगवत्‌ के उपदेशों काजो सग्रह है उसीका नाम 
भरवचन हे सो उस प्रवचन की भङ्कि करना अथीत्‌ ज्ञान का सत्कार करना जो 
नास्तिक आमा सवेज्ञोक्क उपदेश की श्राश्यातनापे करेन वाले है उनको 
दित-शित्ताश्रों दासय शिक्षित करना जिससे वे श्राशातना फिर न कर सक तथः 
जिनवाणी के सदैव गुणोत्कीत्तन करते रहना, जैसे किदे श्राय ! यही परमाथ 
हे, शप याचन्मा्न ससारी कार्यं हे चे श्ननर्था के टी उत्पादन करने चलि ह, रतः 
भ्रवचन प्रभावना करने से श्रात्मा उक्त क्म की उपजना कर लेता दै । 

8 गुरू-सत्योपदेा श्रीभगवत्‌ के प्रतिपादन किये हप धर्मे के च्रलुक्रूल 


{ ९ ) 


क्म फी उपार्जना करलेता हे, षयोंकि-जव मति पानादि मे पुनः २ उपयोग 
दिया जायगा तव पदार्थौ का यथावत्‌ स्वरूप जाना जायगा जिस का परिणाम 
यह दोगा कि श्यात्मा ्षान-समाधिमे निमग्न हो जायगा । समाधि काफल 
उङ् लिखित स्वाभाविक दोता दी हे, श्रत्व खी-भङक-राज्य-देश-विकथादि 
छोड कर सद्रैव काल प्लान म ही उपयोग लगाना चादिष्टः पयोकि-जो आरस्मा 
क्षान मे उपयोग लगाने वाले दोते है उनके श्रघान का क्षय होनेसेसाथरी 
क्लेशो काभीच्तयदो जताहै, जसे-वायु के होने पर्दी जलम बुद्बुद 
के उत्पन्न दोन की सम्भावना की जा सकती हे दीक तदत्‌ क्लेश के च्य दोने 
से वित्तसमाधि सदा के लिये स्थिरता पकड जाती है सो चित्त समाधिके 
यि पुनः २ कषान मे उपयोग देना चादि तथा समाधिकेदी मादात्म्य से 
उङ्क क्म की उपार्जना की जा सकती दै । 
£ दशैन-सखस्यक्त्व का धारण करना, कयोकि-याचत्काल सम्यक्त्व की 
भत्ति नदीं होती तावत्काल संसारके दूटने का उपाय भी नहीं कियाजाता 
सम्यक्त्व का श्रथ पदराथों के स्वरूप को ठीक २ जानना दी है तथा देव गुरुष्टौर 
धमै पर पूरी निश्चय करना मिथ्यात्व सम्बन्धी क्रियाश्रों से पीके हटजाना 
इतना टी नदीं किन्तु सम्यगूदशैन द्रा श्रनक श्रात्माश्रों को संसार पथ से विमुक्त 
कर मोत्त पथ मे लगददिना तथा यावत्काल-पर्थन्त खस्यक्त्व धारण नदीं 
किया जायगा तचत्क्लपथैन्त पराणी सखार च ऋ केः वन्धन से पृथक्‌ नरींहो 
सकता जसे एक शरक विना यावन्मा्न चिदु दोते है वे शल्य दी कद जाते है टीक 
उसी प्रकार सम्यक्त्व के विना याचन्माच क्रिया-कलाप हे चद मोन्ञ-पथकेलियि 
शल्य रूप है 1 श्रतप्व सिद्ध दुश्ा कि सम्यक्त्व का धारण करना ावश्यकीय 
हे यदि पक सुदुत्ते मार भी सम्यक्त्व का श्रात्म-प्रदेशों के साथ स्पशे रोजाप् तव 
श्मात्मा उक्ता सर देशोनश्मद्धपुद्धल पराव्तं करके मोक्त पासकता दै । 
चा याचन्माच श्रात्मा सुक्क दप है वे सय इसी के मादात्म्य का फल दहै! 
सो सम्यक्त्व के शुद्ध पालने से श्रात्मा तीथकर नाम गो की उपार्यना कर 
लेता है । 

१० वचिनय--मति श्लान १ श्च॒तन्नान २ अवधिज्ञान २ भनःपयेवक्षान ७ 
श्नीर केवल क्ञान ५ इन पाचों क्लानों की विनय भक्ति करना तथा गुरु शमादि की 
चिनय करना श्चौर अहन्तादि की श्राशातना न करना कारण कि-विनय करेन से 
श्रात्म विशुद्धि होती ह श्नौर रहेकार के भावों का च्य दो जाता हे जव प्रहंकार 
भाव जाता रहा तव आत्मा समधिक मारी मे लग जाता दहै तथा ^“ विनय "” 
शब्द्‌ क्तेव्य परायणता का भी चाची है जिसने नतो को धारण किया हु दै 
उन बतो ( नियमों ) को निर्तिचार पालन करना वास्तव मे उसी कानाम 


( १३ ) 


चमी श्चि उत्पादन कर लेता है श्रतपण्व शीलतो को निरतिचार ही पालना 
यादिप । 

१३ क्षणलव-्तण श्रौर लव यह दोनों शब्द काल क वाचक है, सो स्षणलव 
म संवेगभावना ध्यानासेवन के द्वारा भी उक्त कम वाधा जासकता ह । इसका 
सा्यांश यह है कि-त्षण २ म स्वेगभाव धारण करना चादिये तथा श्ननित्यादि 
भावनाश्रौं द्वारा श्रपता समय व्यतीत करना चादिप। इतना दी नदीं किन्तु 
धर्मध्यान वा शुक्लध्यान दारा पूर्वोपाजत कर्मो फी निर्जय कर देनी 
चादिये । कारण क्रि-पुरातन कर्मों के क्षय करने के यदी पूर्वोक्त उत्तम मार्ग 
दे! सो दन्दीं के सेवन से श्रपना पविच समय व्यतीत करना चादिये,सो 
जव श्मात्मा मे स्वगभाव उत्पन्न दो जायगा तव नित्यादि भावनापं श्रौर 
शभ ध्यान सहजम दी प्राप्त किये जा सकते है । श्रत्व यदि क्षणलव शुभ 
क्रियाश्रों द्वस व्यतीत किए जायेगे तव त्षयोपश्म-भाव द्वारा ती्रकरः 
नाम गोत्र कर्म केवन्धकी प्राप्ति दो जाती है। वस कथनसे यह भी 
सिद्ध दए विना नदीं रह सकता कि-समय व्यथै न खोना चादिये श्रपितु 
धर्मक्रियाश्रो द्धाय समय सफल करना चादिये । जसे वैतनिक पुरुप का समय 
चेतन के साथ च्द्धि पाता रहता है, ठीक तद्वत्‌ धर्मी पुरुप का समय धर्म करियाग्रों 
डारा सफल दो जाता हे । 

१४ तपः- जिस प्रकार अभि श्राद्ध दधन वां शुष्क इधन को भस्म कर 
देती हे ठीक उसी धकार यावन्माच कर्मं कथि हप है, वे सर्वं तपकम दासा 
च्य किये जा सकते है । अतष्व भत्येक भारी को तप कर्मके श्राधित होना 
चादि, श्नोर फिर इसी तप क्रिया से स्रनेक भकार की च्मामौपधि नामक ऋद्धिपं 
उत्पन्न दो जाती है, श्रीर श्ात्मा का तेज विशाल दो जाता है वा आरत्म-तेज 
दासा जीव सर्य श्रौर सर्वद्तीं वन जाता दै, श्रतपव तप करना छत्याव- 
थ्यकीय दै। तथा वहत से शारीरिक रोग भी तप कमे से उपशान्त दो जति टै, जव 
श्मात्मा नीरोगावस्था मे होता है, तव समाधि श्रादि की कियाप भी सुखपूरव॑क 
साधन कीजा सकती है तथा श्ननेक पकारः के भयकर कं से तपकम द्वारा 
जीच रत्ता पाति है। सो वाद्य न्नर च्राभ्यन्तर दोनों पकार के तप-कर्म द्वारा उक्त 
क्स का निवन्ध क्रिया जा सकता है, सो यथाशक्ति तपकम करने का स्रवश्यमेव 
अभ्यास करना चाहिए । 

१५ त्याग-दान-क्रियाञ्यों स उक्त कमे का निबन्धन किया जा सकता है सो 
यति श्रादि को उचित दान देने से उक्त कम करने का निवन्धन करना चाहिए । 
यद्यपि-दान के अनेक भकार से भद्‌ बरीन किंणए गण है, तथापि सव से चद्‌ कर 
शतविद्या का दान माना जाता दै ' क्योकि- नौर दानोंसेतो रेदललोकिक वा 


( १५) 


को समाधि मे मानने लग जाता है, किन्तु यदि चियार पूर्वक देखा जाय तो यद 
समाधि त्षणस्थायी सिद्ध दोती हे पयोंकि-द्वितीय क्षण मे उस व्यद्ि की फिर 
चरी दशा दो जाती है रीकडसी प्रकार पदार्थौ के विषय मे भी जानना चादहिप। 
जसे कि-जव श्रभीषट पद्‌ की उपलभ्धि हो जाती है तव उस समय वह पने 
श्यामा को समाधि मे मानने सग जातः है श्रौर जव फिर उसकी इच्छा उत्पन्न 
दो जाती है तव फिर उसके पास जो वियमान पदाथ है वह उसके श्रात्माको 
समाधि-प्रदान करने समथ नदीं रदता । 

द्मतप्व द्रव्य समाधि क्षणस्थायी कथन की गई टै द्वितीय भाव- 
समाधि दै जो तीन प्रकार से पत्तिपाद्‌न की गई हे । जैसे कि क्षनसमाधि, दन 
समाधि प्रौर चारिजसमाधिसो क्षनसमाधि उसका नामदैजो ज्ञानम श्रात्मा 
को निमग्न कर देत दे। क्योकि जिस समय कषान मे पदाथ का यथावत्‌ अभव 
किया जाता है, तव श्ात्मा म एक प्रकार का श्रलोकिक श्रानन्द्र उत्पन्न दो जाता 
दै । सो वह श्यानन्द का समय समाधिरूप दी कदा जाता है । इसी पकार दशन- 
विपय म भी जानना चाहिए । क्योकि-जव पदार्थो के जाननेमे वा जिनवारीभ 
ढ़ विश्वास किया जाता है, तव शेकादिं के उत्पन्न न दने से चित्त मे सदैव 
समाधि वनी रहती दै । यदि उस को कोई देव विशेप भी धर्मक्तियाद्योसेवा 
धर्मसिद्धान्त सरे विचलित करना चाहे तो उसका आत्मा इस ्रकार-खढ्‌ द्योता 
है, जसे किं सुमेरु पर्वत हे । श्रथीत्‌ उसका श्ात्मा धमे पथ से विचलितो दी नदीं 
सकता हे । ठतीय च(रितिसमाधि उस्र का नाम है जो श्चताचुसार क्रियां करनी 
है तथा शुरू च्रादि की यथावत्‌ श्चान्ञा पालन कस्नी है । जव स्थविरादिकी 
यथावत्‌ रान्ना पालन की जाती है, तव श्रपने चित्त तथा स्थविरादि के चित्त को 
स्वाति दोन स श्ात्मा मै समाधि की उत्पत्ति दो जाती दै, रतप्व भावसमाधि 
उत्पन्न करके उक्र नाम गोचकम की उपाञना कर लेनी चाहिए, क्यो कि-जव 
श्रात्मा म कलेशादि के भाव उत्पन्न हो जति है तव श्मात्मा मै समाधि की उत्पत्ति 
दोने लग जाती है, जिस के माहात्म्य स श्रशयुभ प्ररुतियो का चेध पडता जाता है 
फिर उसका श्रोतिम परिणाम दुःखप्रदं दोता है । 

६८ ्रपूचल्लान्रदण-शपूवज्ञान के प्रदण से भी उङ्क कमं का निवेधन 
कियाजा सकता है-दइस शक का तात्पथे यद है कति देयक्षेय-छरौर उपादेय के यथावत्‌ 
स्वरूप को जो जानता है, उसी का नाम पूरय क्ञान यण है तथा उक्त श्ेकों को 
हदय मे टीक स्थापन करक्षे फिर स्वसमय शरीर परसमय के सिद्धान्तो का 
अवलोकन करना है उस समय यथाथ क्ञान के घाष्ठ होने पर जो आत्मा मै एक 
भकार का घ्रलौकिक नन्द रस उत्पन्न होता है वद अकथनीय होता है तथा 
नूलन २ ज्ञान के सीखने का भ्यास निरंतर करते रना उसी का नाम पूर 


अ. 


पवित्र फरसने के लिये चे करने लग जाती हे। इसी वास्ते स्यूम लिखा हेक्षि- 
श्रुत की ्ररघना कश्ने से धरान ध्रौर केण दोनों का ही नाश हो जाता हैः क्यो 
कि-ङ्तेश का दोना श्रक्ञानता का ही माहात्म्य टै, जव श्क्ञान नष हो गया तव 
रेण साथ ही जाता रहा । अतप्व सिद्ध दुश्रा कि-श्चतभक्षि डाय उक्षः कम 
के वन्धन सर नेक श्रात्माश्चों का कटयाख॒ करके भासी मोत्त-गमन कर लेता 
हे । 

२० भवचन प्रभावना--श्ताख की परभावना करने स उक्त प्रकार का कमै- 
चंधन पिया जए सकता रै, पर॑च शास्प्रभावना यथाशङ्ि सत्पथ के उपदेश 
करनेसे दी दो सकती दहै। पयोकिं-जव भव्य श्रात्माश्रों को पुन पुनः शाख 
पटाया वा सुनाया जाता दै, तव वे भव्यात्मा शास मे कथन कयि हुए सत्य 
पदाथः का पने शद्ध हदय म श्नदुभव करत द अर्थात्‌ नुत्ता करते द; 
शरोर उनके हदय म उस शख की प्रभावना चैट जाती द । श्रतपएव श्यालस्य वा 
प्रमाद को छोड कर केवल भव्यात्माश्मो को शस्र-विदित उपदेश सुनाकर 
प्रचचनप्रभावना करनी चादिप 1 यह वात अननिवाथ मानी जाखकती हे, कि-जो 
यात श्पने हदय मे निए्वय कर वैठादै जावे; यावन्मात्र उसका फल होता दै 
तावन्माच् किसी श्न्य वलवान्‌ के देश के द्धाय कार्यं कयि जाने पर 
नदीं दो सकता । जैसि-एक दिसक पुरुप दिंसा के फल को टीक सममः कर 
दिसा-कम का परित्याग करता ह, श्रौर एक पुरूप सेवत्सरी श्मादि पर्वा मे 
राजाज्ञा द्वारा उक्र कम से निचृत होता है ) उन मे यावन्मा्र फल स्वयं हिसा 
के फल को जान कर त्यागने वाले को उपलन्ध दो सकता हे तावन्मात्र फल 
जो राजाज्ञा दारा कुं समय के लियि हिसा सरे निवृत्त दोता दै, उस 
व्यद्धि को नदीं दो सकता । कारण कि- उसका ्रस्तःकरण स्वयं निदत्त नदीं 
है । श्रत. शासो दारा इर पक पदाथ का फलाफल जान कर उससे 
निवृत्ति रूरनी चिप । सो इस प्रकारका योध शखर खनने सेदी प्राप्तो 
सकता है, इसी लिये शाखो का पठनपाठन ्रावश्यकीय प्रतिपादन किया गया 
हे । सच्ची भ्रभावना सी भकार से हो सकती हे ! यद्यपि च्राधुनिक समयमे 
शछ्नेक धकार खे प्रभावन करे की प्रथाए पचलित डो रदी है, तथापि चे 
भमावनापः प्रभावना का जैसा फल दोना चादिण था उस प्रकार का फल देने 
मे समथ सिद्ध होती द 1 भवचनप्रभावना जिस प्रकार दो सके, श्नौर जिस के 
मादरम्य सर जीच मोक्त साधन के अधिकारी चन जाव, उस प्रथावनाके द्वारा 
जीव तीर्थकर नाम गोच की उपाजंना करके पतिर नेक भव्यात्मार््रो को मोत्ताधि- 
कारी यना कर भोक्त को षाप्च हो जातां दै ! जव जीवउक् कारणों से दीश्- 
कर नाम गोत्र कमे का निवन्धन कर लेतादे तव वद स्वगीदि मे जाकर 


८ 


रुधिर शरीर मांस गो-दुग्ध के समान श्वेतव्स का होता हे ! ययपि रुधिर 
का वरन पायः ग दी कथन करिया गया है, परन्तु उनके श्रतिशय के मादात्म्य 
स रुधिर वा मांस श्वेत वण का दोजाता दे । यदि पेसे कठा जाय कि--यह पर 
ति.विरुद्ध नियम किस प्रकार दो सकता दै ? इसका समाधान यद किया जाता 
है कि--यद प्रकृति-विरुद्ध नियम नदीं है, किन्तु यद प्क पुरयकर्म का उत्छृ्ट 
फलदेग्त हे । फ्योकि-पुद्ल पांचवे मे परिणत होता रदता दै 1 जेसे जन्त्यागार मे 
शुक वा मयूर यवेतवरी के देखे जाते टे किन्तु धायः मयूर नील चरके दोते 
है तथा उनकी पिच्छ श्रनेक प्रकार के वणौ से विधित दोती दै, श्रौर ( तोते ) 
भायः दरे चण के होते दै, परन्तु जव मयूर वा शुक वतव के देखनेम अचति 
तव उनमे पूर्वोक्त वते नदीं पाई जातीं, तो क्या इन जीवों को श्ररृति-विरुदध 
माना जायगा ? नदीं । इसी पकार महापुए्योदय सरे वा प्रकाशमय श्रात्मा दने 
ने तीर्थकर प्रभु के शरीर का रुधिर प्रौर मांस श्वेत भभा का धारण करने वाला 
होता दै । क्योकि-पुद्रल द्रव्य ्ननन्त पयश्च का धारण करने वाला होता दै । 
तथा कुच २ व्यक्तियों में दुग्ध विषयमे भी चिवाद्‌ चलता रहता है। उनका 
कथन हे कि-शरीरजदोने से दुग्धभी पक पकार कारुधिरदी दै, सो यदह पक्त 
नाडयो के पृथक्‌ २ दोने से ्रमान्य है, श्रत्व सिद्ध टुश्माकि श्रीतीर्थरर देव 
के शरीर का रुधिर च्रौर मांस श्वेत चरी बाला दी होता है । साथ दी इसमे यद्‌ भी 
जानना उचित है कि-यदह कथन सपिन्त द, श्रौर पुरय कम की एक विलक्तता 
दिखलाई गई हे । 


४ पउयुप्यलगधिए उस्सासनिस्सासे। 


जिस प्रकार खगेधमय द्रव्यो का तथा नीलोत्पल कमल का खुगंध होता 
है, उसी भकार का खुगेध उच्छवास शरीर निश्वास द्वारा श्री भगवान्‌ के वायु से 
प्राता है अ्थौत्‌ श्रीभगवान्‌ का उच्छवास नीलोत्पल कमलवत्‌ तथा सुगन्ध मय 
दरव्यं के समान दोता है! इस का कारण यह है कि-उनके परयोदय से उनके 
शरीर का वायु भायः दुर्गन्धमय नदीं होता । यद्‌ उपमालेकार से कथन किया 
गया ह । यदि पसे कदय जाय कि-जव उनका शयीर श्ल के श्राघधार पर ठहरा 
पादै, तो पिर उश्वास वा निश्वास उङ्क भकार से किस भकार शुद्धो 
सकता है ? इस के उत्तर मे कटा जाता हे कि-परायः तेजस शरीर के मन्दं पड 
जाने से उच्छवास शरोर निश्वास मे विषति विशेष हो जाती है; उस से उन 
का तेजस शरीर मेदता का धारण करने वाला नदीं दोता दहै, तथा समाधिस्थ 
परात्मा परकाशमय हो जने से उसके शम पृद्धल शुभ भाव के धारण करने 
चाले हो जाते दे1 


( २१ ) 
चलती हे, जो श्रीभगवान्‌ कौ सर्वन्नता को सूचित करने वाली हे । 

११ जत्थ जत्थ वियणं रहता भगवता चिहंति घा निस्ीयति वा 
तत्थ तत्थ वियणं तक्णदेव (जक्खदिवा) संच पत्त पुप्फ पल्लव समाउलो 
सद्त्तो सञ्छयो सपंटो सयडागो श्रसोगवर पायवे अभिसंजायई्‌ ॥ 

जिस २ स्थान पर श्रीभगवान्‌ खडे दते है वा चैठतेहै उसी २ स्थान पर 
तत्तण दी पतर श्रोर पुष्पों से सेच्चुनन शरोर श्रकुर युद तथा चुर रौर ध्वजा वा 
धेख श्रथवा पताका संयु पधान-प्रशोक नामी चत्त उत्पन्न दो जाता दै चर्थात्‌ 
फल पुष्पों से युक तथा यावन्मात्र पधान चन्तं की लच्मी दोती दै उस लचमी 
से यु दुघ ध्वजा वा धा श्नौर पताका-संयुङक श्रशोक नाम वाला दृक्तभी 
उत्पन्न ष्टो जाता दै. जिससर श्रीभगवान्‌ के ऊपर या हो जाती दै! यद 
सखव श्तिशय क्म-त्तय दोन से दी उत्पन्न दो सकती दै ! कारण कि-जो 
तीधकर नाम गोच क्म वांधा श्रा दोताहे; उसके भोगने के लिये उङ्क 
क्रियापं स्वाभाविक दो जाती दै । यदह सव धातिप क्म के च्य करनेकारी 
माहात्म्य दै । 

१२ ईसि पिष्टस्रो मउडद्वाणंमि तेयर्मडलं अभिसंजायर्‌ धकारे वियणं । 
दस दिसाञ्रो पमासेद्‌ । 

पृष्ट के पिछले भाग मे पक तेजोमेडल होता दै, जो दसो दिशाघ्नों म 
विस्ठत हप श्रधकारः का नाश करता है अथात्‌ उस्र प्रभास मंडल के दारा 
श्री भगवान्‌ के समीप सदेव काल उद्योत र्ता है । यदह एक प्रकार की श्चात्म- 
शष्धिका दी माहात्म्य है, जिसके कारणस श्चधकार का स्था नाशो 
जाता) 

१३ बहुसमरमणि्जे भूमिभागे । 

जदां पर श्री भगवान विचरते है वद भूमि भाग श्यत्यन्त सम श्रौर 
रमसीय दो जाता दै । भूमि भाग की विपमतः दूरः दो जाती है. उसका सौदर्य 
ल्यन्त्य वद्‌ जाता ह । 

१४ - अहोसिरा कंटया जायन्ति ( भवति ) । 

श्नोर कंटक अधोसिर दो जाते है अथात्‌ यदिमा मेकंटकभोषडे 
दोतोचेभी श्रधोशिर हो जति है । जिस कारण सेवे पथे चलने वालोंको 
अपने तीच्ण स्वभाव से पीडित करने मे समथे नदीं रहते । 

१५-- उ उः विवरीया सुहफासा भवंति । 

छतु के विपरीत होने पर भी सुखकारी स्पश रदता है अथीत्‌ ऋतु 


बहम पर प्रगट हो जति ई} 
२९१ पञच्चादहरथौ पिय हिययगमरषीओरो जोयणणीहार्यीसरो । 


श्रीभगवान्‌ का व्याख्यान करतत समय दय मे गमनीय शरीरः प्रति 
सधुर पक योजन प्रमाण स्वर ( वारौ ) दोता दे श्रथात्‌ श्री भगवानका स्वर 
प्क योजन परमाण दोता दे, निस से श्रोता्ों को उस स्वर द्वारा सुख पूर्वैक 
लान हो जाता है। 
२२ भगवचणं अद्मागर्हीएे भास्ताए धम्ममाइक्खई । 
श्रीभगवान्‌ श्रदमागधी भाया मे ध्म कथा करते है । पारत \ सस्कत 
२ शौरसेनी ३ मागधी 8 पैशाची घनौर श्रप्चरादे यहपट्‌ भापापे है, इनमे जो 
“ रसोर्लसोमागभ्याम्‌'' इत्यादि सूत मागधी भां 1 के वरीन कसनेमें श्रतिहे। 
उन लक्तणों स युक च्नोर ्राकृतादि से युक अद्धेमागधी नाम वाली भापामे 
श्रीभगवान्‌ धम-कथा करत दै 
२३ सावियशं अद्धमाग् मासा मापिज्जमाणौ तेसि सव्वेि 
आरिय मणास्यिाशणं दुष्पए-चरप्पय-मिय-पञ्च-पक्ि सरीसिवाणं अप्पणोहिय 
सिवसुहयभासत्ताए परिणम्‌ । 
वह श्रद्धमागधी भापा भापरणकी इई उन सवै श्राय नार्य द्विपद 
( मञुप्य ) चतुष्पद्‌ ( गवादयः ) मग ( श्टची के पथु ) पशु ( माम्य के पु) 
पत्ती शरीर सांप इन की श्रात्मीय भाषा मे परिणत (तवदील) दो जाती है तथा 
चह श्रद्ध॑मागघी भापा श्रभ्युदधय करने चाली मोत्त सुख को देने चा्ती श्रौर 
श्रानन्द को देने चाली होती दे) जिस प्रकार मेधका जल एक रसमय रोने 
पर भी भिन्न २ घकार के चृक्तो के फलों मे भिन्न २ पकार सर परिणत दो जाता 
&ै ठीक उसी प्रकार शदैमगधी भापाके विषयमे मी जनमा चादिपः ! इससे 
यदह भी सिद्ध किया गया है कि-श्रीभगवान्‌ के श्रतिशय के मादात्म्य से 
श्राय श्ननाये पश्य॒ पत्ती दि श्री भगवान्‌ के सत्योपदेश से लाभ उडठातेथे। 
तथा इस सर यद भी ध्वनि निकल श्राती दै कि-पत्येक धाणी को उनकी भाषा 
मे दी शक्ता का परवन्ध करना चादहिप; जिस सेवे शीघ्रतास योध पासके 
२४ पुव्वबद्धवेरा वियणं देषासुरनागसुवण्णजक्खरक्खसकिंनर 
किंपुरिसगरुल्धन्धमहोरगा अरहच्मोपायमूलते पसतचित्तमाणएसा धम्म नि- 
सार्म॑ति 
श्रीभगवान्‌ के समीप वैडे हुए देव, श्रसुर, नाग, खवर, यत्त ,याक्तस, 
किंनर, क्रिपुरुष, गरुड, गंधव मदोरग इत्यादि देव गण पूवैचद्ध वैर होने पर भी 


(.-3-4 


कान दोना श्रथात्‌ राजाकौश्मोरसे परजा कोकिसी प्रकार से भी भय 
नदीं होता । 
३० परचक्कं न भव्‌इ्‌ । 
परराजा की च्रोर से भी कोई उपद्रव नहीं दोता। कयो कि-जिस समय 
स्वकीय शरीर परकीय सजाश्रों की ्रोरसे किसी उपद्रव दोनेकी श्चारंका 
नदी छोती- उस समय भजा प्रसन्नता पूर्वक अपनी चृद्धि की श्रोर सक सकती हे। 
इतना दी नटीं किन्तु स्वेच्खायुसार वृद्धि कर सकती है । ५ 
२१ अड्वुषठि न भई । 
जिस देण मे श्री भगवान्‌ विचस्ते हे उस देश मं हानिकारक चषि नदीं 
दोती, क्योकि श्रतिवृ्ि टोने से जन धन श्रोर कुलो का भी त्तय हो जाता दे । 
लोक शति कष्ट म पडजाते दँ । जनता पराणो की रत्ताके लिये भी व्याकुल दो 
उञ्तीदरै। सो श्रौमगयान्‌ के पुएयोदय से देशमे प्रतिवि दोती ही नहीं! 
३२ श्रणाबुदि न भव्‌ । 
्रनाचृषि भी नदीं होती ! क्योकि-जिसख प्रकार श्रतिव्र्टि से जनता को 
कट सहन करने पडते हे, ठीक उसी प्रकार चप के श्भावसिभोवेदी कष्ट 
उपस्थित दो जाते ह । जिससे जन धन श्रौर ल-स्तय दोने की सम्भावना की 
जा सकती है । स्रतय्व श्रीभगवान्‌ के श्रतिशशय के माहात्म्य से छनाबृिमी 
नदीं योती । अपितु धान्यो के वद्धि करने वाली भमार पूर्वक दी चरि दोती दै । 
२३२ दुभिक्खं न भवई । 
दुभिक्त नदीं होता । क्योकि-दुष्काल के पड़ जाने से नेक प्रकार की 
चिपत्तियों का जनता को सामना करना पड़ता है जिससे विद्या, ब॒द्धि तथा वल 
ध्रमौदि की गति ये सव मद्‌ पड़जाते है, श्रौर सदैव काल भूख के सन करने 
से प्राणो के रटने का भी सशय रता है, श्नौर यावन्माच दानियां तथा उपद्रव 
उपस्थित होते है, उनका सुख्य कारण दुभत्त दी दोता है तथा दुरिक्त के कारण 
धसं की गति अति मन्द पड़ जाती दै] 
३४ पुव्डुप्पण्णाधियणं उप्पाईया वादी खिषप्पमिव उसर्स॑ति । 
पृथे -उत्पन्न ज्वरादि योग चा उ्याधियों तथा निट सूचक उत्पातो के 
दास जो प्रजा को श्रश्लान्ति के उत्पन्न होने ॐ ल्तण दीखते दहै, वे सवश्ची 
भगवान्‌ के श्रतिशय के सादात्म्य से उपशम दोजाति दै अर्थात्‌ देश मे सर्वथा 
शान्ति विराजमान रहती ह 1 इसमे कतिपय अतिशय जन्म से दी दोते है, घौर 
कतिपय दीच्ता के पश्चात्‌ केवल क्षान दोने पर प्रगट होते है, तथा कतिपय 
छतिशय भव-रत्यय श्नौर कतिपय देवरुत मानि जाते हैः पर॑च सव 


न 


की श्राप्तता का घातक टरो जाता है । तप्व सवद प्रभु के वाक्य पू्ापर 
विरोध के प्रकट करने वाले नदीं होते, किन्तु स्याद्वाद सिद्धान्त कै भरकट करने चाले 
होते दै श्र्थात्‌ सापेच्तिक वाक्य होते हे । जैसे पक व्यक्ठि को उसके पिताकी श्रपेत्ता 
पुत्र भी कद सक्ते है, श्रौर उसके पुत्र की शपेत्ता पिता भी क 
खकते ह 

१० शित्वं--श्रभिप्रेत सिद्धान्तो की शिता का सूचक वाक्य श्र्थात्‌ 
जिस पत्त को स्वीकार किया दुश्चा है उस सिद्धान्त फी योग्यता का सूचक 
चाक्यदोता ह । 

१९ श्रसदिग्धत्वम्‌--्रोता जनों के श्दिद को दुर करने चाला वाक्यदोता 
है तथा श्रोताजनों को किसी प्रकार सर भी भी भगवत्‌ फी वाणी मे सशय उत्पन्न 
नदीं दो सकता वा वाणी श्रम युङ् नदीं रोती कि-दन्दोने क्या भतिपाद्न किया 
है ? अतप्व स्वेद रदित वाक्य दोता दै। 

१२ श्रपदहतान्योत्तरत्यम्‌-वाणी मे किसी के दपण का प्रकाश नदीं 
पाया जाता श्र्थात्‌ वाणी मे किसी की निन्दा नहीं होती श्रपितु देय-केय- 
श्मौर उपददिय रूप विपयों का दी वसन होता हे । नतु किसी की निन्दाफा। 

१२ हदयग्राहित्वम्‌-श्रोताश्रो के दयो को भिय लगने वाले वाक्य 
दते है । दसी कारण चे प्रसक्ता पूर्वक श्रीभगवान्‌ की वाणी का श्मसतपान 
करते है। 

१९ देशकालाव्यतीतत्वम्‌--देश काल के शअयुसार वाक्य दोता हे श्र्थात्‌ 
रस्ताबोचितता उस वाक्य मे पाई जाती दे 1 क्योंकि-जो वाक्य देश काल की 
सीमा को उरलघन नदीं करता, वह श्रवश्य हदय प्रादी रोजाता है । 

१५ तत्त्वादुरूपत्वम्‌-जिस पदाथ फे वर्णन का पारस्भ किया दुश्रादै, 
उसी कथन की पुष्टि करने चाले श्रागे के वाक्य होते ह । जसे-श्र्दिसा का 
रकरण चला दुश्रा है, तो यावन्मात्र वाक्य करे जार्वेग, चे सव अर्िसा फे 
सम्बन्धे गे । न किर्दिसा सम्बन्धी । 

१६ श्रभ्रकीरौप्रखतत्वम्‌- जिस प्रकरण की व्याख्या की जारदी ह, 
उसके शरतिरिकर श्रग्रस्तुत चिपय का फिर उसमे वणेन नदीं दोता शर्थात्‌ 
स्वपन्त को छोडकर भरस्तुत प्रकरण फा वरेन करना पनी योग्यता सिद्ध 
करना दै । सो भभु के वाक्य म इख प्रकार श्रषस्तुत यिपय का प्रकरण नितांत 

( विलकुल ) नदीं दोता । न अति सम्बन्ध रदित विस्तार ही दोता हे । 

१७ शअन्यो.ऽन्यपगदीतत्वम्‌- परस्पर पदों की सप्पेद्तता रती हे । श्यां 
कि-यदि परस्पर पदों की सपेद्तता न रटे तो उस चाक्य से भीष्ट सिदि 
षी उपलब्धि नदीं टो सकती, तप्य पद्‌ परस्पर सपिता रखने वाले 


( २६ ) 


की लो श्रीभगवान्‌ की प्रतिपादन की गरईदै। 

२६ विभ्रपविन्नेपकिलकिञ्चितादिविमुङ्घसम्‌--वद चाद्य मनोदोप के 
दोपोसेभी रहित दोताङडै। जैते-वक्ताके मन्म रात्ता, श्रौर चित्तका 
वित्तेप रोप भयादि के भाव तथा प्रत्यनासङ्कता इत्यादि मन के दोपोंस्र चद 
चाक्य रदित दोता ठै) क्थोकि- यदि उक्त मन के दोषों के साथ चाद्य 
उच्चारण क्िया-जायगा तो वद वाक्य श्रात्त वाक्य नदीं कटा जा सकता ! नाद्धं 
उस चाक्य से यशाथतासे पदाथों कावोधदो सक्ता दै। 

३० शने कजात्तिसथ्चयाददिचिवत्वम्‌--चस्तु का स्वरूप विचिचतासे 
चरन किया हश्रा उस वाच्य से सिद लोता दै! कयोंकि-श्रीभगवान्‌ जिस 
पदां का वर्णन करते दै, उस पदार्थं का वरीन नय शरोर भमाण॒ दारा वशन वि 
जानि पर श्रनेक प्रकार की विचिचता उस वाक्यम पाई जाती दे। 

३९ आ्राहितचिगेपत्यम्‌--वचनान्तर की शपेत्ता से दौकिनता ( हित 
शिक्त का समुदाय ) चिशपता से दोती है अथौत्‌ श्रीभगवान्‌ का परम पवित्र 
चाक्य प्राणी मातर के हित का प्रकाशक होता । 

३२ साकारत्वम्‌-विच्छिन्नवणं पद वाक्य टोने से उस चाक्यमे ्राकारता 
पादै जाती ह श्रथ साकारः वाक्य सैद्रयै का धारण करने वाल्ला होता दै । 

३३ सत्वपरिग्रदीतव्वम्‌--साहसर भाव से युङ्क श्रत्‌ निर्भयता का 
सूचक वाक्य दोता हे। 

२४ श्रपरिखेदितत्वम्‌--ध्ीभगवान्‌ अनंत चल दोने से धर्म कथा करते 
हप खेद नदी पाति, क्योकि-पोडश प्रहर पय॑न्त देशना करने पर भी श्रीभगवान्‌ 
परिश्रम को पाक्त नहीं होते तप्य धमे कथा करते हप उनको खेद्‌ कदापि नदीं 
होता । 

२५ श्रव्युच्छदित्वम्‌-यावत्काल पर्यन्त विवक्षित र्था कौ सम्यग्‌ धरकारसे 
सिद्धि न ठो जाप, ताचत्काल पयेन्त श्ननवच्छिन्न वचन ग्रमेय होता है श्रथोत्‌ 
श्रीभगवान्‌ जिस पदाथ का वरन करने लगते है, उस की सिद्धि सर्य-नय श्रौर 
मसो डाय सर्वं भकार से योग्यता पूदैक कर देते है! सो यह सव अतिशय 
चार मूलातिशयो मे दी श्चन्त भूत हो जाती है, जसे किं-ज्ञानातिशय ९ पूजातिशय 
२ चागतिशय २ श्नौर श्रपायापगमातिशय ४ श्िन्नु ये सव अतिशय उसी समय 
प्राप्त होती दै जव कि- क्षनाचरणीय कमै ९ दशेनाचरणीय कर्मर मोहनी कम 

३ शीर अन्तराय कम ये चारों घातिक संज्ञक कमस्य दोजाते है, इन्दीं के 
चतय दो जाति से श्नन्तज्ञान २ श्रनेतदशेन २ त्तायिकसम्यक्त्वभव 3 श्रौ 
श्र्नत चल चीयै प्रकट हो जाता है । तथा इन्दीं कमो के क्षय टोजाने से श्रीभग- 
चान्‌. छष्ठादश दोप से रहित कै जते है 1 जेसे कि-- , , . | 


2. 


फामलेते दी नदीं! इसके समाधान मे कदा जाता दै कि-क्या उक्रचेष्टाश्रों फे 
करने स दी लाभ लिया जा सकता है ? जैसे-किसी व्यक्ति को त्यन्तलदमी की 
म्राप्तिद्ो गर तो फिर क्या मदिरा-पान, मांस-भत्तण, वेश्या सग, दत कर्म 
इच्यादि कर्व्यो के करन से दी उस्र मिली हुई लदमी का लाभ लिया जा सकता 
है! नदीं । इसी रकार श्रीभगवान्‌ के जव श्तसय क्म का त्षय दोता दै त्व 
उछ पांचों प्रुतिथों के क्षय दोन से श्रत्मिकः पाचों शङ्धियां उत्पन्न हो जाती है; 
परन्तु वे शक्छियां मोहनीय कमे केत्तय दो जनि से किसी भरकारसरेभी विकार 
को पापस्त नदीं दो सकतीं । जैख-लोगों का माना हुश्ा ईश्वर सर्वव्यापकं 
चेश्यादिके ्रगोर्पागों मेरहने पर्भी विकार को पाक्त नदी दोता तथा 
शनत शक्ति दोने परभी विपये श्चनत शङ्का उपयोग नदीं करता । यदि 
इसमे पएेसे कटा जाय कि-जव चद श्रनन्त शि युश तथा स्वैव्यापक दै 
तो फिर विषय क्यो महीं करता तथा जय लोग पिपयादिक रर्व्यो मे प्वरत्त दोते 
है, तव॒ वह उसी स्थान मे व्यापक होता दै, श्रौर इस रत्य को भली पक्रार 
सेदेखताभी दहै तो फिर उखेदेखने सेश्रौर उस मे व्यापक दोने से क्या लाम 
हुमा १ इन सव प्रश्नो का यदी उत्तर वन पदेगा किं-ई्वर स्वं शक्तिमान्‌ होने 
पर भी विकारी नदीं दै ठीक उसी प्रकार श्रन्तराय कम के सवथा क्षयदो जाने 
पर भी श्रीभगवान्‌ मोदनीय क्म के च्य दोजाने से सदैव काल विकासे भाव 
मे रहते दै, परन्तु श्नन्तराय कमै के त्षय दोजानि के कारण से उने नन्त शक्ति का 
गट रोजाना स्वाभाविकरता से माना जा सकता दै तथां यदि उन श्चक्षियों का 
व्यवहत होना स्वीकार किया जायगा तो उनमें अनेक प्रकार के श्रन्य दोपोंका 
भी सद्धाव मानना पडेगा । जिससे उन पर नेक दोषों का समृ एकच दो जाने 

सरे उनको निर्विकार स्वीकार करने म संकुचित भाव रखना पड़ेगा 1 अतपव 
ीभगवान्‌ श्रनन्त शक्तियों के परकर दोजाने पर भी निर्विकार श्रवस्था मै सदैव 

काल रते है । 

£ श्रीभगवान्‌ दास्य रूप दोप से भी रदित दते है योकि-चार कारणों 

से हास्य उत्पन्न द्योता है । जैसे कि-हास्य पूरक वात करने से ९ हंसतेको देखने 
से २ हास्य-कारी वात के सुनने से ३ श्नौरः हास्य उत्पन्न करने वाली वातकी 
स्खरति करने से ४ सो दास्य के उत्पन्न दोजने से सवंक्चता का अभाव अवश्य 
मानना पडेगा । कयोकि-दास्य अपूयै वातं के कारण से उत्पन्न होता है,जव वे 

खरयैक्न श्रौर सर्वदर्शी हे तच उनके कषान मे अपव कौनसी वात द्यो सकती दै 

अतः वीतराग पमु हास्य रूप दोप सरे भी रदित सेते है । 

७ रति-- पदार्थं पर रतिभाव उत्पन्न करना । यदह भी पक मोहनीय कर्म 

का मुख्य कार है । श्चो श्रीभयवान्‌ पदार्था पर भ्रीतिभाव रखना इस दोष से 


( ३३ ) 


जा रदे हे, श्नीर उसी मं जीव निमय दो र्दे हे । सो यावत्काल सम्यक्त्व रूपी सूय फा 
हदय मे प्रकाश नदीं होता तावत्‌काल पयैन्त मिथ्यात्व रूपी तिमिर नन्दी 
सकता ! सो भगवान्‌ उ दोप सरे भी रदित है! क्योकिं-दरन मोहनीय फमै के 
ल्य दोजाने से मिथ्यात्व फी सर्वं परङूतियां प्षय दोजाती हँ । 

९४ श्रघ्नान--सम्यग्‌ षान दोने से श्रक्रान उनका नष्ट हो गया है-जसे 
सूय के उद्य होते ही श्रन्धकार भाग जाता दै ठीक तद्त्‌ जय केवलक्षान 
प्रकट होता टै तव उसी समय श्रक्लानरूपी तिमिर भाग जाता दै । सो भगवान्‌ 
मोदवयभाव से रदित होते हः श्नीर सर्वक प्रर सर्वदरशीं पद के धारण करने चाले 
होते दै 1 प्रतः उनमें श्ल्लानभाव का लेश भी नहीं दोता। 

१५ निद्रा--श्रीमगचान्‌ निद्रागत भी नदीं टोते क्योकि-निद्राका श्राना 
दयीनावरणीय कर्म के कारण दोता दै, सो वट्‌ क्म पिले दी क्षय किया जाता दै 
जवनिद्धा का कारण दी नट दोगया तो फिर निद्रारूप कायं की भासि किस 
रकार हो सके ? क्योकि-जो सर्वक्ञ धमु होने हैँ वे क्ानावरणीय, दशैनावरणीय, 
मोदनीय श्रौर शन्तराय कर्म से रदित दोतते है श्रतपएव वे सदैव काल जाग्रता- 
वस्था दी रदते है. तथा यदि रेखे कदा जाय कि~निद्रा का मुख्य देतु श्राहारादि 
क्रियापः हे इसलिये जेसा-गरिष्ठादि श्चादार किया जाता है उसी प्रकारनिद्राका 
श्राविश योता हे । सो यद युक्ति संगत नदीं है, क्योकि-निद्रा का श्ाना दश्वना- 
चरणीय क्म का उदय हे श्रौर श्चुधा का लगना यद वेदनीय क्म॑का उद्यै 
सो केवली भगवान्‌ के वेदनीय कम का तो उदय रहता हे परन्तु दशैनाचरणीय क्म 
उनका स्था त्तय होता दै।सो जव निद्राका कारणीभूत कर्मदी नषटदोगयातो 
फिर श्राहारादि द्वारा निद्रादि कायो की कर्पना करना यह कथन युक्ति संगत 
नर्द दे तात्पर्यं यह कि-श्रीमगवान्‌ निद्रा के दोपसे रहित है । 

१६ श्विरति--श्रीभगवान्‌ चिरति युक्क दोते है श्र्थात्‌ चे श्रप्रत्याख्यानी 
नटीं है किन्तु प्रत्यास्यानी है श्रपमत्त संयत पद्‌ के धारण करने वले द) 

१७ राग--राग रूप दोप से भी श्रीभगवान्‌ रदित दते है क्योकि-जव 
पदार्थो परः राग भाच चना रहा तव खुख की स्ति श्रौर उस पोद्गलिक सुख के 
लिये फिर नाना पकार के परिश्रम क्रिये जते है जव पुरुपाथ मे ्रसफलता 
दीख पडती है तव चित्त उदासीन दृत्ति म भरवेश कि विना नदीं रह सकता । सो 
जिख श्रात्मा की उक्घ चत्ति दो जाए, फिर उस ्ात्मा को सर्वज्ञ स्वीकार करना 

नितान्त भूल भरी वात सिद्ध दोती दै, रतः श्रीभगवान्‌ राग रूपी दोपसेमी 
रदित द । न्यथा जव स्क प्रथु भी राग युङ्क स्वीकार किये जार्यैगे तच श्स्मदादि 
व्यक्तियों भ प्रोर उनमें िग्तेपता दी क्या रदी ? तथा यावन्माच संसार मे अरुत्य 
कहै; रागी पुरूष उन सव को कर डालता है! जव श्ररूत्य कार्य म सामी 


( २ ) 


दयो जाता दे । फयोकि-जैसे फोर व्यक्ति जच दीपक के द्वारा प्रकाश करने की इच्छा 
ग्यतां दै तो उसको उस भरकाश के सद्कारी कतिपय श्न्य पदार्था के पक 
करने म धयलन करना पडता हे । इतना किण जने पर भी चट दीपक का काश 
सादि सान्त पद्‌ बाला होतादे,वा हस्व वा दीधै तथा श्रटप वा महत्‌ भकाशका 
करने वाला दोता दे, परन्तु सूय को पकाशके लिये किसी भी सकरी पदार्थौ 
कीं श्रावर्यकता नदीं पडती षै श्रौर नांदी वह प्रकाश द्रव्याधिक नय की 
श्पेत्ता से खादि सान्त पद को धारण करने वाला होता है । नां दी वद भरकाश अलप 
चा मरत्‌. हस्व वा दीधे होता हेः किन्तु एक रसमय ददोता है, टीक उसी प्रकार 
जो रागादि द्वारा जीवों की रत्ताकी जाती टै, वद तो द्रीपकके प्रकाश के तुल्य 
रोती दै; परन्तु जो वीतराग भाव सरे जीवों की स्त्ताद्टोती है, वह सूरयके 
प्रकाश फे तुल्य प्क रसमय दोती दै । क्योकि-श्रीवीतराग धयु तो प्कद्रिय जीव 
सर लेकर पचेन्दिय जीवोंके लियि सामान्यतया रन्ता का उपदेशा करते दै, 
परन्तु रागी श्रात्मा श्पने स्वाथ को मुख्य लेकर र्ता करन, मे कटिवद्ध 
होते हे ! श्रतपव श्रीभगवान्‌ का र्ना करना स्वाभाविक शुर दोता है, इस ल्व 
चे कमो का वधन नदीं करते. ्रपितु उद्घ क्रियाश्रों से नामादि कमं की भर्तियां 
षय हो जाती हे । यदि पेखा कदा जाय कि-जव उनका र्ता करना स्वाभा- 
चिक गुदे, तो फिरचे श्रव जगत्‌ वासी दुःखित जीवों की चरपनी शक्ति द्ारा 
र्ता क्यों नहीं करते ? इस शंका का समाधान यह है कि-चे तो शास्ों दारा 
प्राणी मात्र की सदैव रक्ता करते रहते दै । यावन्मात्र ्र्दिंसा का सिद्धान्तं है वह सच 
पाणी मात्र की सत्ता कर रहा है, श्रौर उक्त सिद्धान्त के प्रकाशक धरी रहन देव दी 
है । श्रतएव चे सदैव उपकार करते रहते है, तथा जो धरीभगवान्‌ ने कर्मो के 
फल श्रतिपादन किय दै, यदी उनका परमोपकार दै । क्योकि उन कमो के फलों को 
खुनकर नेक श्रात्मा श्रपना कल्याण कर सकती है, श्रौर कर रही द 
यद सिद्धान्त चिद्धानों दाय माना गया दै कि-जेन ध्म के संदेश सर दी जगत्‌ 
श्णान्ति की स्थापना दो सकती दै । यद्यपि चन्यं भतावलम्विर्यो ने भी दया का कु 
प्रचार किया दे, परन्तु जिस भकार सूच्म दण्ट से जेन धमे ने दयाका प्रचारः किया 
हे उस प्रकार वादियों ने दया के स्वरूप को कभी खना भी नरी तथा जेन घम ने 
पकेन्द्रिय जीवों से लेकर पचेन्द्रिय जीवों तक सम भावस दया का उपदेश 
किया हे ! वादियों ने उस स्वरूप को समभ्ा भी नदी । सौ धर्म-पचार दारा 
श्रीभगवान्‌ ने श्चनन्त भाणि्यों पर उपकार करिया है श्नौर इसी उपकार से भव्य 
प्राणी श्रपना कल्याण कयि जा रे ह सो श्रीभगवान्‌ श्रपने पवि उपदेश द्वारा 
सदैव उपकार कसते रते ई 1 श्रीभगवान्‌ ऊपर २९ श्यतिशय ३५ वचना- 
्तिशय शरोर १८ श्रष्ठाद्श दोषों से रहित , ते हए सख्य १२ दादश गुरो के 


{ ३७ ) 


लाभ उरते हैः क्योकि-जव श्रीभगवान्‌ के श्रायमन का पता उक्र वाद्धैच 
द्वारा लग जाता है तव शरनेक भव्य पराणी श्रीभगवान्‌ की वाणी के दास 
पना कल्याण कस्ते है । 

= श्रातप्--देवते श्राकाशमे ख्डे हुए श्रीभगवत्‌ के शिर पर तीन 
छन करते है । जिस से भव्य भारियों को यद सूचित किया जाता है कि- 
श्रीभगवान्‌ चेलोक्य के स्वामी है । 

यह श्चा प्रातिदायं श्रीभगवान्‌ के पुण्योदय से भरकर दोते है शरीर 
श्लानातिशय ९ पूजातिशय २ चागतिश्य २ तथा श्रपायागमातिशय ४ यदह चारों 
श्रतिशय मिला कर श्रीभगघान्‌ फे मुख्यतया द्वादश गुण दते है तथा अनंत. 
क्ञान, १ श्रनतदश्षन, २ अनत चारि, ३ श्रौर श्नंत वलवीर्य ४ यद चारों 
शुण मिला कर श्रीभगवान्‌ के मुख्यतया द्वादश गुण दोते है, दसं पृथ्वी 
मेडतत मे श्रीभगवान्‌ श्रपने पवित्र उपदेशों दाय प्राणी माका कट्याण करते 
रटत है, शरीर जिन के अनंत गुण होने से धर्नेत नाम फटे जा सकते हे; तथा 
जिनसदस्मादि स्तोत्रं मे श्रीभगवान्‌ के १००० नाम वरन कयि गण हे। 
भव्य पराणी श्रीभगवान्‌ के छरनेक शुभ नामों से श्रपना कल्याण कर 
सकते है, शौर चे शुभ नाम श्राध्यात्मिक भकाशक लिये एक मुख्य साधन 
वन जाति है । जसे `“ जिन ध्यान ” करते दुष फिर वरी-चिप्यय के करनेसि 
"निज ध्यान › दो जाता दै, ठीक उसी भकार भरत्येक नाम श्राध्यात्मिक भकार 
के लियि कार्यं साधको जाता है । जव उन नासोंके कारण श्राध्यात्मिक 
पकाश दीक दो गया, तव व्यवहार की शरपेक्ता से उनका किया हुञ्मा पकाश दरी 
कटा जाता है । जैसे चचुरद्धिय के होने पर भी वस्तु के देखने के लिये काश 
सहकारी कारण किसी श्रपेत्ता से माना जा सकता दै, ठीक उसी पकार 
श्रीभगवान्‌ के गुणानुचाद के कारण से जो भकाश दश्मा है, वद निमित्त कारण 
होने से उन्दी का उपकारः माना जा सकता है ! क्योकि-यह वात स्वाभाविकः 
सिद्ध है कि-जिस आत्मा का जिस पकार का “ध्यय दोगा पायः उस श्रात्मा 
म फिर उसी पकार के गुण परगट दोने लग जति हे। जैसे कि-किसी विपयी 
आत्मा का “ध्येय '' पक युवती दोती है, तो फिर बह विषयी श्रात्मा उस "ध्येय 
के मादात्म्य से विपय वासना मे उत्कट भाव रखने लग जाता है । इतनारी 
नदीं किन्तु फिर वह श्रपनी इच्छा पूर्तिं करने के लिये नाना प्रकार की 
योग्य श्मीर श्रयोग्य क्रियादयो मै पुत्ति करने लग जाता दै. ठीक उसी अकार 
जिस आत्मा का ^ ध्येय › वीतराग प्रथु दते है उस श्मात्मा के त्राम- 
पदेशो से राग श्रौ देष के भाव हट कर समता भावं मे श्माने लग जाते डै। 
््योकि-फिर वह आत्मा वीतराग पदं के प्राप्त करने की वें करने लग 


५. 


६ अदन - पु. चतुस्त्िदतिशयान्‌ रुरेनद्रादिरूतां पूजां वा श्र्हति 
इति श्र्दन्‌ सुगद्धिपादः सन्निगशतुस्तुत्य इति शप्रत्ययः श्ररिदननात्‌ रजो हननात्‌ 
रदस्याभावाच्चेति परपोद्ररादित्वात्‌. श्रहन्‌ "--श्रदूमुत रूप रादि चौतीस 
श्तिशयों के योग्य दोने से शरीर सुरेन्द्र निर्मित पूजा के योग्य टोनेसे 
तीर्थकर फा नाम श्रदैन्‌ दै मुगद्धिपादि जैनेन्द्र व्याकरण के सूत्र से यद श्रन्‌ 
शब्द सिद्ध होता है ! श्रव दुसरी रीति से भी थदैन्‌ शब्द का श्रथ दिखलाते 
हे । जैसे फि-श्र्ट करम रूप चैरियों के दनने से श्रौर इस जगत्‌ म उन के क्षान 
फेश्रगि छु भी गुप्त नहीं रहने से उस दै्वर परमात्मा तीर्थकर का नाम 
अदन्‌ है । 

२ जिनः-पु. जयति रागदधेपमोदादिशत्रन्‌ इति जिनः+--राग देप मदामोद 
श्रादि शुचो को जीतने से उस परमात्मा कानामजिनदै। 

३ पारगतः-पु. संसारस्य भरयोजनजातस्य पारं कोऽथः छत प्रगम्‌ इति 
पारगतः"--संसार सुद्र के पार जनि से श्रौर सव भयोजनों का श्रन्त करने 
से उस परमात्मा का नाम पारगत दै। 

४ “ च्रिकालवित्‌-पु. चीन. कालान्‌ वेत्ति दति तिकालवित्‌ '"-भूत्‌, 
भविष्य, वर्तमान, इन तीन कालों मे टोने चले पदार्थो का जानने वाला होने 
से उस दश्वर परमात्मा का नाम चिकालवित्‌ है । 
~ ˆ ५ ्तीणाटकमौ-पु. कीणानि श्रौ क्षानावरणीयादीनि कमणि यस्य 
इति त्षीणाणएकमी- जिसके श्लानावरणीयादि अष्ट क्म प्षीणए टोगये हे उस 
परमात्मा का नाम त्ीण्टकम है । 

& परमेष्ठी-पु. परमे पदे तिष्ठति इति परमेष्ठी परमात्‌ तिकिदिति इनि 
त्यये भीरूानादित्वात्‌ पत्वं सप्तम्या श्रलुक्‌ च,-परम उक्कृष्ट कषान दैन 
चारित्र म स्थित ्टने से श्वर परमात्मा का नाम परमेष्ठीहै 

७ श्रधीश्वरः-पु. जगतामधीषटे इत्येव शीलोऽधीश्वरः स्थेशभासपिसख- 
कसोचर च्‌ ” इतिवरचू--जगस्जनों को श्रश्चय भूत होने से उस परमात्मा का 
नाम श्रधीश्वर हे। 

शम्भुः-पु. शं शाश्वतं खं भावयति इति शम्भुः शसस्वयेविभ्रोदुवो 
द्ररिति द्रः--सनातन खुख के समुदाय मे होने से ईश्वर परमात्मा का नाम 
श्णम्भु हे । 

६ स्वयंभूः-पु. स्वयं शरात्मना तथा भव्यत्वादिसामथ्ी-परिपाकात्‌ नतु 
परोपदेशात्‌ भवति इति स्वयेशूः--श्रपनी भनव्यत्व की, स्थिति पूरे दोनेसे 
स्वयमेव उरपन्न होता है । इसलिये उख ईश्वर परमात्मा का नाम स्वयंभू है । 

१० भगवान्‌-पु भग. कोऽथः जगदैश्वर्य ज्ञाने वा अस्ति रस्य इति भगवान्‌" 


( ४१९ ) 


२१ देवाधिदेवः-पु. देवानामप्यधिदेवो द्वेवाधिदेवः-देवताघ्रो का भी 
देव होने से श्वर का नाम देवाधिदेव दे । 

१२ वोधिद्रः-पु. बोधि. जिनधणीतधमेप्रास्तिस्तां ददाति इति वोधिदःः 
जिनप्रसीत शुद्ध धमसूप बोधि वीजका देनेवाला दोन सेर्श्वर का नाम 
चोधिद दे। 

२२ पुरूपोत्तमः-पु. पुरुषाणं उत्तमः पुरुपोत्तमः-पुरपों के वीच सर्वोत्तम- 
ताको धारण कर्ने वाला दोने से दंश्वर का नाम पुखुपोत्तम दे ! 

२४ यीनरागः-पु. बीतो गतो सागोऽस्मात्‌ इति चीतरागः-श्ंगनादि के यग 
से रदित दोने के कारण परमात्मा का नाम वीतराग दै। 

२४ श्राप्तः 1 पु. जीवानां दितो पदरेशदादत्वात्‌ श्राप इव श्राप्तः--जीवों 
के प्रति हितोपदेश करेन वाला दोने सेश्वर कानाम श्राप्त है, इस प्रकार 
श्रीश्मैन्‌ देच के साश्रक प्रनेक नाम भव्य जनों के पाठ के लिये कथन किए गप 
दै तथा इन नामों के द्वारा श्रात्म-विकाश करने केलिये भक्त जनों को परम 
सदायता प्राप्त हो जाती हे । जिस प्रकार जीवन्मुक्त श्रीञ्हैन्‌ देवों का वरन 
किया गया दै, उसी पकार सिद्ध परमात्मा भी देव पद मे गमित है । क्योकि- 

सिद्ध परमात्मा श्रजर, श्रमर, पारंगत, सिद्ध, बुद्ध, मुक, लानस्वरूप, सर्वक 
शरीर सर्वदशीं दे, वे लानात्मा ढारया सर्य-व्यापक दो र्दे दहे । यद्यपि द्रव्यासमा 
उनका लोकाग्र भाग मे स्थित दे, परन्तु ल्लानास्मा, दशैनात्मा श्रौर उपयोगात्मा 
द्वारा वे लोकालोक मे व्यापक दे अतः सर्य पदाथ उनकेक्लान्मे व्याप्यो 
रटे दै। वे शनत गुणों के धारी है केवल अर्हन्‌ देव शरीर्धारी होते है परन्तु 
सिद्ध भगवान्‌ ्रशरीरी है । यदि पसे कटा जाय कि-सिद्ध परमात्मा नौर अईन 
देवों मे जव उक्त गुणे की साम्यता दै तो फिर उनको अर्हन्‌ देवों से प्रथक्‌ 
क्यो स्वीकार किया गया है ? इस के उत्तर मे कदा जातादै कि-अरईन देव तो 
श्षानावरणीय १, दरनावरणीय २, मोदनीय २, च्नीर ४ शरन्तराय इन चार कमं 
से सुक्क टोकर केवल क्ञान श्नौरं केवल दशन अथौत्‌ सयैक्ञ श्रौर सर्वदर्शी होते दै. 
परन्तु सिद्ध भगवान्‌ ज्ञानावरणीय ९, दशनावरणीय २, वेदनीय ३, मोहनीय ४, 
आयुष्य ५, नामकम द, गोत्र कम ७ शरोर श्न्तराय कमे =, उछ अयो कर्मो से 
रहित होते दै। चे सदा निजानेद मे निम्न रहते दै । योगी जन जव श्रेतिम भेणी 
पर पहुःचते है, तव उन्दी को ध्येय वना कर पने आत्मा कौ शुद्धि करते द । 
कारण कि-अरूपी आत्मा श्रपने कषान ढारा दी रूपी पदाथों को देख वा जान 
सकता द ! श्रतण्व सिद्ध श्रात्मा परम खख की राधि हे 1 

अश्च-दमने तो यह सुना दुखा है कि-ज्ेन मत मे जो चोचीस तीथकर 
देव हण दै, ही जनों के ईश्वर परमात्मा हे} इन के सरतिरिक्त कोई भी ईश्वर 


( ४३ ) 


दस लिये जीव श्रौर श्रजीव यद दोनों पदाथ भी नादिं ्रनन्त है । 

प्रक्ष हे भगवम्‌ ! प्या पिले भवसिद्धिक ( मोक्त जने वाते) 
जीव है या श्रभवसिदिक ( मो्त गमन के अयोग्य ) जीव दै? 

उत्तरे रोद ! भवसिद्धिक शरीर श्रभवसिदधिक ये दोनों प्रकारके 
जीव भी श्चनादि काल से चलते श्चाते है; कारणकि भव्य श्नोर छ्रभव्य ये स्वाभा- 
चिक भाव वात दे, परन्तु चिभाव परिणाम वाले नदीं हे । 

प्रक्ष-टे भगवन. ! क्या पटिते सिद्धि है या श्रसिष्धि ? 

उत्तर-दे रोद ! रृचिम दने से सक्छ श्रीर श्रसुकिये भी श्ननादि दहे । 

प्रश्च- हे भगवन्‌ } पटले सिद्धात्मापे है, या श्रसिद्दात्माएे श्रथौत्‌ 
पित सिद्ध परमात्मा है या संसारी श्चात्मापः द 

उत्तर -दे रोद ! सिद्ध ्नौर ससारी श्यात्माषः ये दोनों दी श्चनादि भाव 
से चले ्रारदे है; श्नतः इनको पूर्य या पश्चात्‌ भावी कदापि नदीं कदा जा 
सकता 1 सो जव जेन मत संसार श्चौर मोक्ञ पद्‌ को अनादि स्वीकार करता दहै 
तव यह्‌ किख भरसार कदा जासकतः है कि~उक्क चोवीख तीर्थकर दी जैन के 
परमाम, दे भ्रन्य कोई भी जेन मत म सिद्ध ( ईश्वर ) नदीं माना गयादहे। द्यं 
ज्ञेन मत यद श्रवश्य मानता टै कि-- 

रागत्तेण साईया अपञ्जवसियाविय पुहुत्तेण अणाईया शपज्जव- 


सिया विय। 
उत्तराध्ययन सूत्र श्र. ३६ गाथा-६६ 


श्र्थ--पक सिद्ध की पेक्ता मोक्त पद्‌ सादि श्रनन्त कदा जाता हे श्रौर 
वहतो की श्पेक्ता श्रनादि श्चनन्त दै श्र्थ॑त्‌ जव दम किसी प्क मोत्त गत 
जीव की पक्ता विचार करते दैः तव दमको मोक्त-विषयं सादि श्ननन्त पद्‌ 
मानना पड़ता दै । कारण किं-जिस काल मे चह श्रसुक व्यक्ि मोच्त को प्ाप्तटुश्रा 
उख काल की रपेक्ता उसकी श्चादि तो है परन्तु पुनराचृत्ति योने से उसे फिर 
मनन्त का जाता हे, परंच जव सिद्ध पदं को देखते हे श्र्थात्‌ बडुत सरे सिद्धो 
वि श्रयेक्ता से जव विचार किया जाता है तच सिद्ध पदं श्चनादि नन्त माना 
जता है ! कारण कि-जिख पकार संसार नादि है उसी प्रकार सिद्ध पद भी 
श्रनादि है तथा अनन्त सिद्ध दोन से राणां की शपेच्ता किसी नय के मत से एक 
सिद्ध भी कटा जासकता ह क्योकि--मेदं भाव नदीं टोता । 
** जत्थ एगो सिद्धो तत्थ अरणन्त खय भववियुवको ” इत्यादि । 
श्रथ-जदां पर पक सिद्ध दै वहां पर नेत सिद्ध विराजमान दै । जिस 
प्रकार पक पुरुप के न्तगेत नाना प्रकार की भाषां निवास करती द जेसे 


{ ५५ ) 


की श्रयेच्ता से ३९ गुर उन भे विभापतया दोते दै । ्रार॑मा तानस्वरूप श्रः 
श्मनन्त गुण का समुदाय रूप है. परन्तु कम उपाधि भेद से चे गुण उसके आ्रावरण 
युक्द्ोस्देदै. जै किख भ्रकाशरूप दोन पर भी वादलों के भरयोग से 
श्ावरणीय हो जाता रै, ठीक तदत्‌ श्मात्म-पकाश की भी यही दरादे, जववे 
श्रावरण दर रो जाते है तच गुण रूप समुदाय कट दो जाता दै, जिस कारणसे 
फिर उसे सिद्ध, बुद्ध, श्रजर, च्रमर, सर्वेत श्रौर सर्वदर्शी श्मनेत शक्ति -सेपन्न 
इत्यादि शुभ नामों से कीन किया जाता दै! सो वे गुण निन्ल धकार से वशेन 
कि गर्‌ ह. जसे कि-भानावरणीय कस की पांच प्ररतियां है चे सव सिद्ध पर- 
मारमा के क्षय सूप हे यथा श्राभिनिवोधिकक्षान के र< भद्‌ है; सो उन पर जो क्म. 
परमायुश्मों का श्रावरण श्राया ह्या दोता है, बद सिद्ध परमात्मा के त्य रूप 
हे । १ श्रतज्लान के १४ भेद्‌ टै उनका एवस्ण भी चतय हे २। अवधि ज्ानके ६ 
लद हे, उनका श्रावस्ण भी क्षय रूप है ३। मन पयैवक्षान के २ भेद 
डे उन ङे भी श्राचर्ण क्षय सूपदी है 2 । केवलक्षन का केवल 
प्क ही भेद्‌ हे, उस का भी श्रावरण स्तय दो गया हे ५। जव क्षानावरणीय कर्म 
की पाचों ्रुतियो के श्राचरण दुर दो गए तव उस जीव को स्क कटा 
जाता है। फिर दृशनावर्णीय कमे की ६ प्ररूतियां है 1 उन के च्रावर्णों के ्तय दो 
जाने से जीच सर्द चन जाता है । जसे कि-चचुदश्ैन का जो यावरण है बह 
भी सिद्ध परमात्मा के क्षय दै ६! चचचुवजित श्रोत्रेन्दियादि इन्द्रियों पे 
श्रावरण्‌ हे वे भी च्तय ह । इसलिये ्रचलुदश्वन भी उन कानिर्मल है ७।अवधि- 
दशन का जो श्रावरण है, वह भी निमूल दो गया द ८ । फिर केवलदशेन का 
श्रावरण भी स्था जाता रहा है € । स्युख पूरवैक शयन करना इस भकार की 
निद्रा मी जाती र्दी है १० । सुख पूर्वक शयन करने के पश्चात्‌ फिर दुःख पूवैक 
जात्रत श्नवस्था मे श्राना वर्‌ दशा भी जाती र्दी है ११ । वेडे वैडे दी निद्वागत हो 
जाना इस प्रकार की भी दशा उन की नदीं दै ९२ तथा जस भकार प्रायः वहत 
सा पशुवग चलता हुच्ा निद्रागत दो जाता है, वह दशा भी सिद्ध परमात्मा की 
नदीं टै ९३। वा अत्यन्त धोर निद्रा जिस के परवल उद्य से वादेव का 
श्मदवल उस दशा मे पराप्त दो जावे तथा त्यन्त भयानक दशा जीव की निद्रा की 
दशा मे दी दो जवि वह दशा भी सिद्ध परमात्मा की नदीं है १४। सो इस काय के 
न रोने से उद्वे सर्दी कदा जाता दहै, कारण कि-वद सवंथा जाप्रतावस्था मे 
ही दोते हे जिस भकार स किसीभी दशामे श्रधकार देने वाला नदीं माना 
जा सकता, ठीक तद्धत्‌ प्स परमात्मा भी सवै काल मे सवैक्ञ रौर सवेद 
रहता हे! जव वेदनीय क्म की दोनों धरङूतियां क्षय दो गड तव सिद्ध परमात्मा 
श्मक्तय सुख के अयुभव करने ,वाले के जाते टै । क्योकि-वेदनीय कमे 


( ४६ ) 


सन्मुख दीपक श्यादि पदार्थो का प्रकाश तुलना करने मं समथ नदीं होता, उसी 
धकार सिद्धा के सुख के सामन श्रन्य खुख चुद्र प्रतीत होति रै, तथा जिस 
प्रकार पक पूर्वं रश्व के धारण करने से जो श्रानन्द श्रनुभव दोने लगता 
उस प्रकार का श्रानन्द खाद्य पदाथा मे नदीं देखा जाता । श्रतः सिद्ध भगवान्‌ 
प्रनत खों के घनी कथन किप गप दै। सिद्ध पद फी प्रापि के लिये थत्येक प्राणी 
को प्रयत्नशील दोना चादिपए, जिस से श्रात्मा क्म-कलंक से रहित सिद्ध 
पद की भराक्नि कर सक्र! शअरतण्व सिद्ध-स्तुति श्चोर सिद्ध-भक्छि श्रवश्यमेव 
फररनी चाहिए । 
यश्च-सिद्ध स्तुति करेन से क्या लाभ दोता दहे? 
उत्तर--उनके पवित्र गुणों म श्रज्ुराग उत्पन्न दोता द । 
प्रश्रयं म श्रुराग करने से क्या फल दोता दे ? | 
उत्तर--गुणायुराग करन से निज श्रात्मा भी उन्दी गुणों के ग्रहण करने 
के योग्य दो जाती है, जिस से श्रात्म~कस्याण होता दँ । 
प्रश्च-क्या सिद्ध परमात्मा की स्तुति करन सेवे प्रसन्न दो जति है 
उत्तर--सिद्ध परमात्मा वीतराग पद के धारण करने वालि रै, चद सर्वश्च 
श्मोर सर्वदर्शी तथा निज गुणमे निम्न दोने से सदा सुख स्वरूप हे । रतः 
चद किसी पर प्रसन्न शरीर छरश्रसन्न कमी नदीं दोते 1 उनकी स्तुति च्रौर गुणो 
श्मनुराग करने से श्रवगु दुरः टोकर श्रात्मीय गुणो का भकाश होता है । 
मश्च - स्तुति करन से चित्त-णुद्धि किस प्रकार हो सकती है ? 
उन्तर--जव उनके गुणों मे श्रचुराग किया जायगा, तव चित्त की प्रसन्न- 
त! श्रवश्यमेव दो जायगी, जिस प्रकार वस्तु का स्वभाव दोन से मनादि- 
पद्‌ सर्पादि के विप उतास्ने मँ समर्थता रखते है तथा जिस पकार चिन्तामणि 
रतन इच्छुक की इच्छापूति करने मे सायक होता है, ठीक उसी भकार सिद्ध 
परमास्मा की स्तुति भी श्रात्मा मे शान्ति का सचरार करेन वाली दोती दै । 
ग्रश्र-सिद्ध परमात्मा फी स्तुति करने से जव मात्मा मे शान्तिक 
संचार द्ये गया तव क्या श्चात्मा सिद्ध पस्मात्मा को रपना ध्येय वना 
सकता टे? 
उत्तर--सिद्ध परमात्मा जिख श्रात्मा काष्येय रूप हो जायगा चह 
श्यामा भी सिद्ध पद की पाक्षि के योग्य अवश्यमेव दो जायगा । 
प्रस्-सिद्धं भगवान्‌ कमी भक्ति करने से किसर शख की परासि 
होतीदहेट 
उत्तर--परमात्मा की भक्ति करेन से पूवैसंचित कम क्षयो जति, 
श्नौर बहुमान से गुण प्रकट दोतते दै, फिर फर्म रूपी शतु भक्कि दाय दग्ध 


1 


उन्तग--जिस पौद्वलिक पदार्थं की जिस को इच्छा दो उसके मिल जाने 
सही उस घ्ात्माको क्षण भर के ल्यि समाधिश्या सकती है । परंच 
चह समाधि त्तण॒ स्थायी दोन से त्याज्य है श्रत्व दउव्यसमाधि की निचत्ति 
करने के लिये ही भघान प्रौरवर पददिये गण हे, जिस से यद स्वतः 
हीसिद्ध द्यो जाता है कि-जो परम घान की समाधि दहै, उसी कीदी 
सुभे प्रासिदो। 
्रश्ष--जव सिद्ध परमात्मा से श्रारोग्य वोधिलाभ श्चौर सवसे वदृ 
कर लान की समाधि की परार्थनाकी जातीदे., तो क्या यद निदानकम 
नदीं दे? 
उत्तर--इन पवित्र भावनाश्चों को निदान कमे नर्द का जाता, कारण 
कियद प्रार्थना वा भावना कर्मवन्धन का कारणा नीं है, श्रत्तपव यह निदान- 
कर्म नहीं है, कर्मवन्धन के कारण-मिथ्यात्व. श्रविरत, कपाय, दु्टयोग, चा 
प्रमादादि प्रतिपादन कयि गण द! उक्त भावनाम्‌ उङ्क कारणे के नददोनिसर 
इसे निदान करम नदीं कहा जाता । 
पश्च--यद्धि निदानकम नदींदेतो क्याइस प्रकारके पाठ करनेसे 
श्रारोग्यादि पदार्थौ की प्रापि दो सकती है? 
उत्तर--सिद्ध परमात्मा तो वीतराग पद्‌ मे स्थित दोनेसे रागश्चौर 
देप से रहित दहै श्रतः वे तो फल दाता हो दी न्दी सक्त । तथा यदि प्रार्थना 
डाय दी वह शुभ क्म के फल दे सकते टै तो फिर कर्मो का फल क्या हुश्रा ? 
छ्तप्व उक्त प्रार्थना से चित्त थुद्धिदोती टै श्नीर श्रसत्यास्रपा भापाका 
वाक्य दटोनेसे ही उक्त पाट युक्ति सगत माना जाता है। 
प्रश्ञ--क्या पार्थना कस्ने से परमात्मा फल न देगा ? 
उत्तर--परमात्मा सर्वक श्नौर सर्वदशीं होने से फल-प्दाता नदीं है; 
श्रत्व वर फलप्रदाता न्दी माना जाता । 
प्रश्च-तो फिर प्रार्थना करनसे दी क्यालाभदे? 
उत्तर--चित्त की शुद्धि, ्रासितिकता तथा अपने जीवन को पवित्र श्रौर 
पुरूपाथीं वनाना एवं धार्मिक वल उत्पादन करना, जिस से अपना कल्याण करते 
हट श्न्य श्रनेक भव्यात्माश्रो का कल्याख दो । 
प्रश्च--जव सिद्ध परमात्मा की भक्ति की जाती है तवं क्या उस समय 
जीव को समाधि की पा्िदो जातीदहैट 
उत्तर--हां । उस श्रात्मा को भक्ति रस मे निमय होने सेउनके गुरेम 
श्मत्यन्त श्रचुराग होता हे । उस श्रनुरागके कारण दी चह जीव भक्धिरसमें 


- पदाथा का समभाव द्वारा एकत्व ह जाना, उसे द्रव्य समायि कहते ह । 


( ५२ ) 


करते हे । श्रपने जीवन को भी व्य॒त्सर्जन फर देते है, परन्तु परोपकार के मार्ग 
से वे किंचित्‌ मात्र भी विचलित नदीं दोने पाते, श्रतप्व वे दी देव कदला सकते 
हे। छ्रनादि काल से पांच भारत वर्प ध्रीर पांच पेरवर्च वर्षक्े्ोंमेदो कारका 
काल चक्र चरस रा दै, उरसष्पिणी काल शरोर अवसप्पिसीकाल । प्रत्येक काल 
दशत कोटाकोरि सागसेपम प्रमाण का होता है, तथा पत्येक काल के दधुः भाग 
दोते है, सो दोनों कालों के भिलने से २० कोराकोटि सगपेपम प्रमारुका 
एक कालचक्र होता है । विशेष केवल इतना दी है कि-उत्सष्पिणी कालम 
प्रिय पदार्थौ का प्रादुभौव श्नौर च्रप्निय पदार्थो काशने २ हास दोता जाता, 
छन्त मे जीवों को पौद्धलिक खुख की पूर्शतया प्रि दो जाती है। 

दरस से विपरीत भाव श्रवसप्पिणी कालका माना गयादहै, जिसमे 
पुद्धल सम्बन्धी खख का हास्त होता दुद्रा शनैः २जीव परम दुःखमयी 
्रवस्थामे दो जते दे! इस प्रकार दस लोक मे काल चक्रोंका चक्र लगा 
रहता है ! नादि नियम के श्रदुक्रूल प्रत्येक काल चक्र म २४ तीर्थकर देव 
९२ चक्रवती नच चलद्रेव नव वासदेव श्रौर नव दी प्रतिवाखुदेव ये महापुरुष 
उत्पन्न द्रा करत हे । स्थानाङ्ग सूत्र मे तीन भ्रकार के उत्तम पुरूपों का 
विवरण किया गया दहै । जेसे कि-धर्मोत्तिम पुरुप १ भोगोत्तम पुरुप २ 
प्नीर कर्मोत्तम पुरुप ३! सो धर्मोत्तम पुरुप तो श्रीच्र्ैन देव ोते है, जो 
ध्यार्मिक क्रियाश्रों को प्रतिपादन करके सदैव काल जीवों का कल्याण करत रहते 
हे । भोगोत्तम पुरुप चक्रवर्ती दोते है, जिनके समान पोद्धलिक खख के 
श्रुभव करने वाली श्न्य व्यक्छियां उस समय नदीं दोतीं । कर्मोत्तिम पुरुष 
राञ्य धर्म के नानाधरकार के नियमों के निमाता दोतते है, वे वादेव की पदवी 
को धारण करके फिर साम, दाम, मेद श्रौर दण्ड इस भकार की नीति की 
स्थापना करके राञ्य-धभे को प्क सूम वां धते है । श्रद्धे भारत वर्प मे उनका 
पकः दु्रमय राज्य द्योता दै, क्योकि -यावत्काल पर्यन्त एक दुचमय राज्य नदीं 
दोता, तावत्काल पर्यन्त प्रजा खुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने के लिये 
परसमर्थता रखती है । श्रतपएव वासुेवों को कर्मोत्तम पुरुप माना गया दै । 

इस काल के पृथ जो उत्सप्पिणी काल ्यतीत दोदुका दै, उसमे निम्न 
लिखिताद्चसार २४ तीर्थकर देव इण्ट दै- उनके शुभ नाम ये दै । केवलज्ञानी १, 
निर्वासी २, सागर २, मदायश ४, विमल ५, सर्वालुभूति ६, श्रीधर ७, दत्तती्थ॑रूत्‌ 
८, दामोदर €, सुतेजाः १०, स्वामी १९, युनिखुनत १२) खुमति १३, शिवगति 
१४, श्स्ताग २५, निमीश्वर १६, छरनिल १७, यशोधर १८, ताथ १६, जिनेश्वर 
२० शुद्धमति २९१ शिवकर २२ स्यन्दन २३ श्रौर संभरति २७: परच जो च्रागामी 
काल म श्रनेवाली उतस्सप्पिणी मे भी २४ तीधंकर देव होगे, उनके शुभ नाम 


¢ 4&-) 


उसी समय सरे माता की बुद्धि खनि्चित दोगई धी. शत श्रीभगवान्‌ का 
नाम सुमति हध्या । निष्पदरतामप्नाए़न्य पद्मस्येव प्रभाऽस्यपद्यप्रन यद्वा पद्मशयेन दे ददे 
मातुर्देवतया परित दति, पद्यवर्णश्च भगवानिति वा पद्मप्रभ. विपय-चासना स्पी कीचड़ 
सर रहित रौर पदमक समान पभा जिसकी उसीका नाम पद्मप्रम दे । 
तथा पद्मशाय्या म शयन करने का दद्द उत्पन्न दो गया था वह देवता द्धास 
पूर कियागया तथा पद्मकमल के समान जिनके शरीर कावरथा इसीसे 
श्रीभगवान्‌ का नाम पद्यघ्रभ टश्च भाभनो पास्वावश्य चपाश्चं यदा गर्भस्थे भगवति जनन्यपि 
सुपाश्वाभूदति सुपां शोभनीय दोनों तरप दै जिन के वह खपाश्व दे श्रथवा 
जव श्रीभगवान्‌ गर्भम थे, तव उसी समयसि माताके दोनों तरफ शोभनीय 
दो गप थे रतः श्रीभगवान्‌ का नाम खुपाश्व हुश्रा । चन्द्रस्येव प्रभा ज्योत्स्ना सौम्य- 
लेग्यावेगिपेऽस्य चन्दर्मम तथा गस्य टव्या चन्द्रपनदेहदोऽभूदिति चन्दरभ" चन््रमाके 
समन है सौम्यलेश्या जिन को वदी चद्रधभ दै त्था जव श्रीभगवान्‌ गर्भमे 
श्राएथे तव माताको चन्द्रपान करने का दोदद्‌ उस्पन्न हश्राशथा। श्रतप्व 
श्रीभगवान्‌ का नाम चन्द्रप्रभं इश्ा । शोभने विधिविधानमस्य सुविविरयद्ा गर्भ॑स्य भगवति 
जनन्यस्प्येवमिति चुविभि खुन्दर दे विधि विधान जिस कावद विधि तथा जवश्री 
भगवान्‌ गर्म मे थ तव माता श्रव्यन्त खुन्दर चिधि विधान करेन वाली दो गई थी, 
श्रत. श्रीभगवान्‌ का नाम सखुविधि रका गया । सग्ल्सत्वमत।पहरणात श्ोतल तथा 
गर्भस्ये भगवति पितुः पूर्वौत्पन्नाचकिन्स्यपित्तदाहो जननीररस्पशौदुपशान्तं इति शीतल 
सक्रल जीवों का सन्ताप दर्ने से शीतल तथा जव श्रीभगवान्‌ गम मे स्थित 
थे, तव श्रीभगवान्‌ के पिता को पित्तदाह कायेग था,जो वै्योंडासभी 
शान्तन दो सका था, तव श्रौभगवन्‌ की माताने राजाके शरीर को स्पश 
किया, तव सेस शन्त दो गया । इख प्रकार गभेस्थ जीव का माहात्म्य जएन कर 
श्रीभगवान्‌ का नाम शीतल रक्खा गया है । प्रेयासावसावस्य भरेयास पुपोदरादित्वात्‌ 
यथा गभ्येऽमिन्‌ केनाप्यनाकान्तपूषेदेवताधिष्टितशग्या जनन्याकान्तेति श्रेयो जातमिति श्रेयास । 
सर्वं जगत्‌-वासी जीवों के हित करने से श्रीभगवान्‌ का नाम भ्रेयांस तथा जव 
श्रीभगवान्‌ गभावास मे थ, तव श्री भगवत्‌ के पिता के घरमे एक देवाधिषठित 
स्एय्या थी. उस पर कोई भी चै नदीं खकता था यदि चैटता धातो उसको श्रसखम(- 
धि उत्पन्नहो जाती थो. किन्तु ग्भ के प्रभाव से रानी जी को उस शय्या पर शयन 
कर्ने का दोदद्‌ उत्पन्न दुख, तच वद उख शय्या पर शयन कर गई । तच देवताने 
कोई भी उपसग नदी क्रिया रतः श्रयांस नाम स्थापित इुञ्मा 1 वसुपूज्यद्पतेरय 
चासुपूज्यः यद्वा मर्भस्थेऽस्मिन्‌ वस हिररुय्‌ तेन वासवो राजऊुल पूजितवानिति वसवो देवविशेपास्तेपा 
पूज्यो ब चसुपूज्य प्रह्यि वायुपूज्य. जो दैवतो दवाय पूजनीय है वही चास्ुपूज्य हे तथा 
चसखुपूञ्य राजा का जो पुत्र हे, उसी का नाम वासुपूज्य है तथा जव थीभगवान्‌ य 


( ५७ ) 


मिति सुनि" “मनेस्देतो चस्य वा ।उणा० ६ १२) एति इ प्रत्यये उषन्त्यस्थेोत्वं शोभनानि ृत्तान्य- 
स्य सुव्रत मुनिश्यास नुनरतथ सुनिसु्रत तथा गर्भस्थे जननी सुनिवत्‌ मुरता जातेति सुनिमुप्रत 
तीन काल मे जो जगत्‌ को मानता है उसी का नाम सुनि देतथा खुन्दर हे 
चत जिखके,सो दोनों पदों फे एक करने से मुनिसुव्रत शब्द वन गया 
तथा जव श्रीभगवान्‌ गर्भावासमे ये तव भगवन्त की म।ता मुनि के समान 
खन्दर जत चाली दो गई थी दसी कारण से ्रीभगवान्‌ का नाम सखुचत रक्ला 
गया । परीपहीपसर्गदिनामनात्‌ नमस्तु वा ( उणा-६ १३ ) इति विफ्पनेपेन्त्येकारभाव 
पत्ते नमि. यट गर्भस्थे भगवति परचक्नपै. श्चपि प्रणतिः कृतेति नमि । परीपदादि धरि. 
यों को नमन करने से नमि तथा जव श्रीभगवान्‌ गभौवासमेथे तव वैरी साजे 
भी श्माकर श्रीभगवान्‌ के पिता को नमस्कार करने लग गये इसी कारण से 
नमिनाथ नाम सस्कार किया गया } धचक्रस्य नेमिवन्नेमि. नेमौती.नन्तोऽपि दृश्यते यथा 
बन्दे सुत्रतनेमिनौ इति । धर्म चक्र की धारा के समान वह नेमि दै तथा जवश्ची 
भगवान्‌ गभीवास मे थे तव माता ने श्ररिषएटरत्नमय नेमि (चक्र धारा) 
श्राकाश म उत्पन्न दुर देखी इसी लिये रिनेमिनाथ नाम सस्कार किया 
गयां तथा च प्रारङूतपारः- गम्भगए तस्स मायाए रिष्सयणामउ मदति मरालउनेमि 
उप्पयमाणो सुमिरो दिबेत्ति तेण से रि नेभित्ति नाम क्यंति" श्रथ प्राग्‌ लिखा गयादहे 
स्पणति ज्ञानेन सर्वभावानिति पारश्र. तथा गर्भस्थे जनन्या निशि शयनीयस्थयाऽन्धकारि सर्पो 
ट्ट इति गभीयुमावेऽयम्‌ इति मत्वा पश्यतीतिनिरुक्तात्‌ पार्॑पार्शरोऽस्य वैयगरस्यकरो यक्तस्त- 
स्य नाय पाश्चनाय भीमेोभीमसेन इति न्यायाद्‌ वापाश्च सर्यभवों कोजो क्षानसे 
जानता है उसे दी पाश्वं कदटते है, सो यह लक्षण तो सर्वं तीशकरो मे संघरित 
होता है, पर॑च जव श्रीभगवान्‌ गभाीवास मँ थे तव श्रीभगवान्‌ की माताने 
मपनी शय्या पर वैट श्रधकार म जाते हुए सूय को देख लिया; तव माताने 
विचार किया यहं सच गम का प्रभाव है तथां पाश्च नाम वाला यत्त श्रीभगवान्‌ 
की त्यन्त भद्कि करता था इसी कारण पाश्वंन्थ नाम द्रा । विशेषेख 
दस्यति प्रस्यति कमीणीति वरः चिशेपतया जो कमो को परते हैँ इसी कारण उन्द 
चीरं कदा जाता है तथा मदा उपसर्ग के सहन करेन से श्रीभगवान्‌ का नाम 
श्रीश्रमण भगवान्‌ महावीर प्रसिद्ध इुश्रा । इस प्रकारः वत्तेमान श्रवसप्पिणी 
काल मे मोत्त को भाप हप २ चतुर्विशति तीर्थकरों के व्युत्पत्ति युदक नामो- 
त्कीर्चन कथन किय गए हैँ 1 श्रव जिन २ तीधकरों के श्रपरनामभीदहैउनका 
विवरण किया जाता है । जैसे कि- छषभो बरपम चृपभ का लक्षण 
होने से ऋपम देव को चृपभदेव ( नाथ ) कते दै 1 भयान्‌ भयास, सकल 
सुवन मे श्रशस्यतम दोने से श्रेयांस को ` श्रेयान्‌ ” कते है । स्यादनन्त 
जिदनन्तः ्ननन्त कमो के श्रशों को जीतने से अथवा नन्त क्षानादिकेदोनेसे 


"== ~~~ 


























, प्री्- खेच 
पभदेच | नगरी | वदी < 


सर्- | चपभ | दे युरेम |फा च [इच्चाकुः 


प्रलित-| श्रयो-| माघ | जित 






नाथ | ध्या | थु. | शच ५५१ 
सभव-|श्राव- | मदा ~| जिता- दश्च काये | ,; 
नाश | स्ती |शु.६४| रि १ 
| 
छमभिन-| श्रयो माघ | संवर- | सिद्धा-। कपि पौव | + 
दन | ध्या | शु. | राजा | भ १२ 
न्य्‌ [~ 
खुमति- श्रयो- |वेशाख | मेध- | मेगला| कोच चच | + 
नाथ | ध्या | गु. र| राजा ` पत्ती | छ- ६ शु १६ 
४ [५ [4 , 
पद्मप्ु | कोश | कात | श्री धर | सुखी- | पद्म- यैव | , 
म्वी- |च. १२ | राजा | "मा | च. शु १५ 
ठ 
सुपाश्च | वारा ज्ये्ट | प्रतिष्ट | पृथ्वी [स्वस्ति वाराण-|फाव | +, 
नाथ | सी | थु १२| राजा | माता [कलक्तण्‌ थ. ९३| सी | ६ 





कित > चन्द्रपु 
पौप [मदासे- ` न्दरं | पाप च.| चन्द्रपु।फलव | ,, 


प्रभ | पुरी | घ.१२ [नरजा 


_ खविधि| काकदी| खग |खुग्रीव 
नाथ | नगरी | च. ५| राजा 


शीतल | भद्िल | माघ |दद्रथ | नंदा |भीवत्स[माघ व मदिल| पौष | +, 
नाथ | पुर | व.१२| गजा 

। । सिद | फ. | विषु 
- नाथ | पुरी | च १२| राजा | मातां । लक्तण |च. ९३। पुरी । चदे 


ष 1 


( ६९ ) 


प्रव नीचे धरी भगवन्तो की निवार तिथियां वरन की जाती है यथाः- 


तीर्थकर देव 

योक्रपभदेव जी 

+, ्मजितनाथ जी 
१, संभवनाथ जी 
„ अभिनन्दन जी 
१४ खमतिनाथ जी 
१ पद्म प्रभु स्वामी 
„ खुपार्वनाथ जी 
» चन्द्रभमुजी 

+, सयुविधिनाथ जी 
+ शीतलनाथ जी 
\ श्रयांसनाथजी 
» चासुपूज्य स्वामी 
», विमलनाथ जी 
„› छनंतनाथ जी 
„, धमनाथ जी 

+ शान्ति नाथनजी 
+ कुथुनाथ जी 

» छमरनाथ जी 

+ मद्लिनाथ जी 
+) मुनिखुब्त स्वामी 
+ नमिनाथ जी 


+ प्रिष्रनमि नाथ जी 


+ पाश्वनाथ जी 


„ महाचीर स्वामी जी 


निर्वणकाल 

माघ रृप्णा १३ 
चेत्र शुक्का ५ 
चेच शङ्का ५ 
वैश्ताख शुङ्घा ८ 
चेच शुङ्ा ६ 
सागशी्षं रप्णा ११ 
फाटगुन रप्णा ७ 
भाद्रपद्‌ रष्णा ७ 
भाद्रपद शुङ्का ६ 
चैशाख छृष्णा २ 
श्रावण कृष्णा 
सआ्रापाट्‌ शुङ्का १४ 
आपाढ्‌ कृष्णा ७ 
चे शुङ्घा ५ 
ज्येष्टशुज्ञा ५ 
ज्येष्टरूप्णा १३ 
वैशाख रृप्णा १ 
मागैशीर्ष शङ्का ९० 
फार्गुन शङ्का १२ 
ज्येष्ठकृष्णा ६ 
चैशाखरूप्णा १० 
्मापाद्‌ शुङ्का = 
रावणं शङ्खाय 
कात्तिक ष्णा १५ 


सो तीश्षकरों के ग्भ, जन्म, दीक्ता, केवलक्षान प्रौर निर्याण ये पांचों 
ही कल्याण भव्य भ्राणियों के लिये उपादेय दै, श्नौर उक तिथियों मे धमे-भ्यान 
चिशेप करना चादि क्योकि- जव देव का पणेतया स्वरूप जान लिया गया 
तव आरात्म-णुद्धि के लिये देव की उपासना तथा देव को ध्येयः स्वरूप मे 


रख कर आरत्म-विशुद्धि श्रवश्यमेव करनी चादिप } 





11 इति श्री जेनतत्तवकरलिक्राविकामे देवस्वरूपवर्णन नाम प्रथमा कतिका समाप्ता ॥ 


( देर ) 


से धरम की पापि दो सकती द । क्योकि-जच धार्मिक शास्रे को खुमता दी नदीं 
तो भला फिर धार्मिक विषयों पर विचार किंस प्रकार कर सकता रै ? श्रतपए्व 
धार्मिक विपयों को यदि विधार पूवैक श्रवण किया जाय तव ्रात्मा को सद्‌- 
विचारों से धर्म की प्राप्ति दयो सकती दै । जिस प्रकार ज्ञान घ्रौर क्रिया से मोत्त 
अतिपादन किया गया दै, ठीक उसी प्रकारः श्रवण श्नौर मनन सेभी धमीदि 
पदार्थौ की प्राति दो जाती दै । यदि पेसे का जाय कि-वहुत से श्रात्माश्नों ने 
भावनाश्रों ारा ही श्रपना कल्याण कर लिया दै, इस लिये शाख श्रचण की 
क्या श्रावश्यकता है ? इसके उत्तर मे कदा जाता है कि-भावना श्रव॒ किये दप 
दी पदार्थौ की होगी क््योँकि-जव तक उसने भथम कल्याणकारी वा प्ापमय 
मागे को खना दी नदीं तव तक कटयाण॒कारी मै मे गमन करना श्नौर पापकारी 
मार्यं स निचरृत्त होना यह भावना दोदी नदीं सकती । रतः सिद्ध हुश्रा कि- 
जिन श्रत्माघ्नों ने पत्र कफिसी धार्मिक विषयों को धव कियाहुश्नादहै,वे 
उनकी श्रलुपरे्ता पूर्वक विचार करते इए श्रपने उदेश्य की पूर्ति मे सफल 
दो जाते दै । 

धर्म का श्रव॒ प्रायः धर्मदो के मुखस दीहो सकतादै, इस लिये 

दस स्थान पर श्राचा्यं उपध्याय श्नौर साधु ये तीनों धर्मे देव है । इन के विपय 
मे कते है। श्री तीर्थकर देवों क प्रतिपादन किये इुप्ट तत्वों के दिखलाने वाल, 
तथा उन के पद्‌ को सुशोभित कर्ने वाल, गण के नायक, सम्यग्‌ प्रकार से गण्‌ 
ची रक्ता करने वाले, गण मे किसी प्रकार की शिथिलता श्रा गई दो तो उसको 
सम्यग्‌ धकार स दूर करने वाले, इतना ही नदीं किन्तु मधुर वाक्यों से चतुर्विध 
श्रीसेध को सखुशित्तित करन वाले, गच्छवासी साघु चगे चा श्राय वरै की सम्यग्‌ 
धकार सरे रक्ता करने वाले श्री जिन-शासन के शगार स्तभरूप, जिस भकार 
पत्यक भारी को अपनी दोनों ्राखों का श्राघार दोता दै, उसी प्रकार सघमे 
स्राघार सूप, वाद्‌ लच्धि-सम्पन्न नाना ध्रकार के सूदम क्ञान के धारण करने बाल 
श्मलौकिक लच्मी के धारण करने चाले, इस धकार के गुणों से विभूपितभ्री 
प्राचा महाराज के शाखो मे ३६ गुण कथन कयि गणए दै । जो उन गुणों स युक्त 
दोते दै, वे दी श्राचा्यं पद्‌ के योग्य प्रतिपादन कि गपदै, सो वे गुण निम्न 
लिखिताञुसार हे जैसे कि- 

१ देश--श्नाय देश मे उत्पन्न होने वाला यद्यपि ध्म पत्त म देश कलादि 
की विशेष को$ श्चावश्यकता नदीं है, तथापि भायः श्राय देश मे उत्पन्न दोन 
वाला जीव खलभ-वोधि वा गांभीर्यादि गुणों स सहज मे दी विभूषित द्यो सकता 
दे. तथा परम्परागत श्रार्यता आत्मविकास् मे एक मात्र कारण वन जाती दै 
जैसे क्रि-भारतवं मे ३२ सदख देश प्रतिपादन कयि गण है, परन्तु उन मे 


( &५ ) 


जाति युद्ध होनी चाहिए । 

 रूपवान्‌--शरीरारूति रीक होने पर दी मदाप्राभाविक पुरुष हो 
सकता दे । फयोकि-शरीर फी लच्मी दूते के मन को शरफुरिलत करने वाली 
रोती दैः जसे श्री केशीकुमार रमणक रूप को देख कर प्रदेशी राजा, श्रौर 
धरोश्मनाथी सुनिकेरूप को देख कर राजा भधेणिफ आश्चर्यमय शो गए । 
इतना री नदीं किन्तु उनके मुखस वाणी को खुन कर ध्म पथ्मेश्चा गए। 
इस लिये श्चाचायै महाराज का शरीर श्रवश्यमव खुडोल श्रोर खुन्दर होना 
चादिप लिख से वादी च्रौर प्रतिवादी जन को विस्मय दोश्रौरवे धर्म पथमे 
शीघ्र श्रा सके । 

५ टढसदहनन-जिस पकार शरीरारूति की त्यन्त श्राचश्यकता दै, 
उसी धकार सहनन टद्‌ दोना चाहिए ! क्योकि-याचत्काल पर्यन्त शरीर की 
समता ठीक नदीं है, तावत्काल पर्यन्त भली प्रकार अध्ययन श्रौर अध्याप- 
नादि क्रियां टीक नीं हो सक्ती । अरतपव गच्छाधिपति के करणीय 
क्रियाश्च के लिये ददढ्संहनन की त्यन्त श्राचश्यकता दै तथा उक्त गुण के 
चिना शीत चा उष्णादिं परीपद भौ भली पकार सदन नदीं कयि जा 
सकते ! रतप श्रावायै मे उक्त गुर स्रवश्य दोन चादिषं । 

६ धतिसपन्न-साथ दी श्राचाय म धेयं गुण परतया दोना चादिए । 
प्योकि-जव मन का साहस ठीक दोगा तच गच्छुका भार भलो रकार वह 
उठा लग, कोर प्रति वाल साधुश्रों का भी निवौह कर स्केगे. क्योकि-जव 
गच्छाधिपत्ति न्याय मार्ग म स्थित टोकर न्याय करने मे उदयत होता है, तव 
उस फो पत्ती श्रौर प्रतिपत्तियो के नाना रकार के शब्द सुनने पडते है । सो 
यदि वे उक्त गुण युक्त होगे तो उन शब्दो को सम्यक्छतया सहन करके न्याय मार्म 
से विचलित नदीं होगे । यदि उन म धेयैगुण स्वल्पतर दोगा, तव लाभ के 
स्थान पर प्रायः दानि दोगी । कारण कि-क्तरिक चित्त वाला आत्मा किसी कार्यं 
केभी सिद्ध करने मे समथ नदीं दो सकता 1 यदयपि यदह गुण प्रत्येक व्यक्ति मे 
होना चादिए, परन्तु जो गच्छाधिपति दों उन्हे तो यदह गुण ्रवश्यमेव 

धारण करना चादिष्ट 1 

७ नाशसी-शशन पानादि वा सुद्र वसरादि की आरसा ( प्राणश ) 
भ करे, ्योकि-जिस स्थान पर लोभ संक्ला विशेष होती दै बदां पर मोत्त- 
माम म विश्च उपस्थित हयो जाता हे, तथा जव गणी लोभ के वश हो जायगा, तव 
न्य भिन्लुञ्र को सन्मार्ग मे लाना कठिन दो जायया 1 यद नियम की चात है 
कि-जो राप भली पकार खुशिित दोगा चदी अन्य व्यज्य को खुशित्तित 

कर सकेगा । श्रतप्व अनाशेस गुण अचां मे अवश्यमेव होना चाहिए ! 


( ६७ ) 


किये जासके, उसी का नाम “ स््विरपरिपारि '' कट्या जाता है तथा 
चरणकरणाजयोग के सिद्धान्त तो त्राचाय के श्रस्खलित भाव सरे कर्ठस्थ होने 
चाहिय, कारण कि-गच्छु शमी सारणा श्रौर वार्णादि क्रियापं प्रायः इसी 
स्रयुयोग के सिद्धान्तो पर श्रवलस्वित दोती हे. तथा व्यवदारसत्र, चृहत्करपसूच, 
दशाध्रतस्कघम्यू्न तथा नशीथस्ू् इत्यादि करिया-विश्ुद्धि के खञं का 
स्मभ्यास श्चाचार्यं को श्रस्खल्ित भाव से दोना चादिप । जो श्चतक्षान स्थिर 
परिपाटि से ग्रदण किया जाता है, वह इस जन्म प्रौर परलोक मे भी 
कल्याण करने वाला दोता दे । 

१६ ग्ररीतवाक््य--आाचा्यं के मुख से इस प्रकार के वचन निकलने 
खादहिप कि-जो सच भव्य प्रारियों को उपादेय ( मनन करने योग्य ) सँ, क्यो- 
कि-जो वचन पक्षपात रदित श्रौर भव्य जीवों का कल्याणकारी दोता हे, चद 
सात्तर लोक म श्वस्य मानने योग्य हो जाता हे । शतप्व गणि का वाक्य राग 
द्वेपसे रहित तथा सत्पथ का परदश्तेक दोना चादि । 

१२ जितपरिपत्‌-श्राचाय सभा के समक्त न्याय पूर्वक श्रौर सत्य 
कथन करने चलि हों । क्योंकि-जव परिपद्‌ मे श्क्तोभ चित्त दोकर चैेगे तव 
प्रत्येक विषय पर शांत चित्त से ददा पोह कर सक्रेगे, किन्तु जव चित्त म 
युक्क दोगा, तव निरैय तो दूर रदा स्वसिद्धान्त से भी स्खलित दो जाने 
की सम्भावना दै, अतप्व शांतचित्त, न्यायपद्ती, वहुश्चत, समयक्ञ, पुरुप दी 
“जितपरिपद्‌”' के गुण वाला हो सकता हे । 

१३ जितनिद्रः-- निद्रा के जीतने वाला दो ! कारणकि-श्रालस्य युक्त वा 
रभमाण से निद्रा लेने वाला पुरुप पूव क्षान के ग्रहण से चेचित दी रखता 
है इस के रतिरिक्र ओ पू्ैपर्ति क्षान होता है, वह भी विस्त होने लग 
जाता हैः क्योकि-सदेव निद्रा मे रहने वाला जव अपने शरीर की भली भकार 
र्ता नदीं कर सकता तो कषान की र्ता या करेगा ? जव चह क्ञानकी स्त्षा 
से शल्य चित्त हो गया तो फिर वह गच्छुकोरत्तामे किस प्रकार उयते 
सकता दै ? इसलिये “जितनिद्र" ्चश्यमेव दोना चादिष्ट 1 

१४ मध्यस्थ-संसार पक्त मे चहुत से ्रात्मा राग देष के वशीभूत 
होकर न्याय के स्थान पर अन्याय कर चेरते है, इसी कारण चे सत्पथ क्रा 
्रवलम्बन नदीं कर सकते, अतएव आचार्यं पत्यक पदाथ को माध्यस्थ भाव 
से देखने चाला दो, ऋ्योकि-जव समभाव से दर प्क पदार्थं पर विचार किया 
जायगा, तव उस का निष्कर्ष शीघ्र उपलब्ध दो जायगा, इस लिये मध्यस्थता 
का गुण अवश्यमेव धारण करना चादिण, जिस के दारा राग देप न्यून होकर 
श्रात्म विकाश्च प्रकर दो । 


(५ ६९ ) 


उस से नेक भव्यात्माश्नो फो श्रपना कल्याण करने का सौभाग्य प्राप्तो 
जाता है | जिस प्रकार मदाराज परदेशी के किये दुष पश्चोंका समाधान भी केशी- 
कमार रमण ने युक्कि पूर्वक क्रिया है श्रौर उन प्रश्नोत्तरे को देख कर जीव- 
तत्व की परम श्रास्तिकता सिद्ध दो जाती दे, एवं बद्ध नोर सुक्क का भी भली 
भाति कषान दो जाता है! व्याख्यापरश्षि मे नि््रन्थी पुत्र रादि रमणे 
परश्चोत्तर को पट्‌ कर ' श्ासन्नलब्धप्रतिभ „ का शीघ्र पता लग नाता है। 
श्रतप्व सिद्ध दुरा क्रि-श्राचाय मे यह गुण श्रवश्य दोना चाहिए, जिसके 
द्वारा सघ-र्ता रौर श्रीधरमण भगवान्‌ महावीर स्वामी के प्रतिपादन कयि 
दष सत्य सिद्धान्त का श्रतीच प्रचार दो, जिस स भव्य श्रात्माएं श्रपना कल्याण 
करने मे समथ दो सके । 

१६ नानाविघदेशमभापाक्ञ-श्राचाय महाराज को नाना प्रकार के 
देशों की भापाश्रों का भी क्नाता दोना चादि, ताकि वह मत्येक देशमे जाकर 
चदीं की भाषा म भगवदुक्तं ध्म का परचार भली भांति कर सके । 

२० क्षानाचास्युक्क-क्लान के श्राचरण से युक्त अथोत्‌ मति, त, 
श्मवधि, मन.प्यैव, श्नौर केवल यथासेभव इन पाचों क्षानों से सयुक्त दोना 
चाष्टिए, ताकि प्रान की ्राराधना दहो सके श्रौर भव्य आत्मप छताध्ययन मे 
लग सके । उदात्त श्रतुदत्त रौर स्वरित, इत्यादि घोप स्वरों की शुद्धता पूर्यक 
क्षान-बृद्धिकी चे करता रदे. क्योकि-स्वाध्याय करने से ज्ञानावरणीय कर्म 
्तयदटो जाता हे । 

२९ द॒शनाचारयुक्--दयैन के ्राचार से युक्त श्रथोत्‌ सम्यक्त्व मे पूर- 
तया दढता तथा देव ुरुश्रौर धम मे सर्वथा प्रीति तथा जीवादि का यथाश ज्ञान 
हो जानि से दशनाचार की शुद्धि कदी जाती है । जीवादि का यथाथ क्षान दोन 
पर उख मे फिरः शङ्कादि न करनी चाहिए तभी ञ्रात्मा दृशेनाचार से युक्त 
दो सकता है, क्योकि-शङ्कादिके दो जाने से फिर दश्वनाचार की शुद्धि नदीं 

रट सकती 1 जव तक दढता मे किसी भी पकार का सन्देह उत्पन्न नदीं होता तव 
तक दृशनाचार की विशुद्धि की सव क्रिया की जा सकती है । यदि यहां यद्‌ 
शङ्गा की जाय कि-जव चृता दी फल भरेषठ है तव अत्येक भाखी स्वमत 
कीदरदृता मे निपुरो र्हा है तो च्या उनको दशंनाचारयुक्त कहा जा 
सकता दै ? इस शका का समाधान इस रकार दै कि-जव पदाथों का यथाश 
ज्ञान हो गया है तव उस यथाथक्षान द्ारादेखे इषः पदार्थो मे यथाथ दही 
निश्चय दहै, उसी को सम्यग्‌ दशन कदा जाता है1 किन्तु जव अयथार्थ 
ज्ञान दोगा तो उस मे श्रतदूरूप दी निश्चय दोगा उसको मिथ्याद्श्त॑न कटा 
जाता ह । श्रत्तप्व सिद्धान्त यद्‌ निकला कि-यथाथै निश्चय फा नाम सस्यम्‌ 


( ७९ ) 


२४ वीयाचार- मन बचन शरोर काय केः वीर्यं से युक दोना चाहिए 
श्रथात्‌ मनम सदैव काल शुभ ध्यानश्नौर शुभ संकट्प ही दोन चाहिपं, 
कारण कि-जव मन मे सत्य संकटप श्रौर कुशल विचार उत्पन्न दोते रहते हे 
तव मन सम्यग्‌ ज्ञान, दर्शनघ्रौर चारिकी श्चोरदी सुका रता डे, अन्य 
श्रात्माश्रों पर श्रथुभ विचार उत्पन्न नदीं दो सकता । शतः जव मनम शुम 
संकर्प उत्पन्न दोग तव ध्रायः श्रशुम चाक्य का भी प्रयोग नहीं दोता, श्रपितु 
भित श्रौर मधुर वाक्यदयीसख से निकलना है । जव मन श्नौर वाणी की भली 
रकार विद्धि दो जाती दै. तव कायिक श्यथुभ व्यापार पायः निरोध किया 
जा सकता दै । छतः श्राचार्य के तीनों योग सदैव काल शुभ वसने चादिपः। वल- 
ची्य तीन भ्रकार से प्रतिपादन किया गया ह । जसे कि-पंडितवलवी्यं १ वाल- 
चलवीयं २ श्रौर वालपंडित-वलवीयं उ । जिन-घ्नाज्ञा के ्रयुसार जो यावन्मा्न 
क्रिया कलाप किया जाता है, उसी का नाम पडितवलवीयं है. भ्रौर याचन्मा्न 
मिश्यात्ववल से क्रिया कलाप किया जाता है वह सव वालवीयं होता दै 
कारण कि-वालवीयं के ढारा कर्मक्षय नीं होते, वदिकि` कमो का समुदाय 
विशेषतया एरु दो जाता है। इसी कारण उसे वालवीर्य कदा जाता है! जव 
श्यात्मा सम्यगदर््न श्नौर सम्यगूज्ञान से युक्त होता है किन्तु साथ दी वद देश- 
चति ( श्रावक ) ध्म का पालन करने वालाभीदटोजयितो उस की क्रियाको 
चालपंडितयीर्यं कहते है, कारण कि-याचन्मा्र संबरमाय मे करिया करता है, वद 
पंडितवलवी्य, छ्रौर यावन्मा्र वह संसारी दशाम क्रियाएं करता दे, बद 
चालवीर्य, सो दोनों के एकल करने से वालपंडितवीयै कदलाता हे । अतएव 
प्राचार्य पंडित घीयीचार से युक्र दो, जिस से सध की रक्ता प्नौर कमै परङूतियों 
का च्य टोतारहे। 

जव पंडितवलवीयै द्वारा शिक्ता पद्धति की जायगी, तव हुत से 
अन्य रात्मापं संसार चक्र से ति शीघ्र पार होने के उद्योग मे लग 
जपम । 

२६ श्ाहरणनिपुण-अआदरण दष्टान्त का नाम हैः सो न्याय शाख के ्यु- 
सार जव किसी विवादास्पद विषय की व्याख्या करने का समय उपलन्ध दो जावे 
तो श्मन्वय श्नौर व्यतिरेक द्न्तों दारा उख विषय के स्फुर करने मे परिथिम 
करे । कारण कि-यावत्काल युक्ति यक्त दान्तो से उस विषय को स्फुट न किया 
जायगा, तावत्काल्ल पर्यन्त वह विप्य श्रस्खलित भाव मे नदीं चा सकेगा, नौर 

नाद्धी श्रोतागण को उस स कुं लाभ दोगा ! तएव विपय के अनुसार रटन्तं 
दोना चादिष्ट 1 जैसे फि- किसी ने कटा कि -'“ पाप दु खाय भवति जह्मदत्तवत्‌ »* 
थौत्‌ पाप दुभ्ख के लिये दोता है, जिस प्रकार बरह्यदत्त को हव्या, इख 


( ७३ ) 


वद्धमान स्तुम" सर्वनयनद्यणीवागमम्‌ । 
सक्चेपतरतदुन्नोतनयभेदानुवादत. 1 
टीका- नीयन्ते धाप्यन्ते सदेशाद्गीकारेरेतराशौदासीन्येन वस्तु- 
चोधमागौ येस्ते नया नैगमादयः सवे च ते नयाश्च सर्यनयास्त पव नयः 
सरितस्तासामशवस्समुद्रस्तत्तट्य श्रागमे चवाक्पथो यस्य स तथा ते वद्धैमाने 
चरमजिनवरं चयं स्तुमः स्तुतिचिपयीकुमेः फुतः कस्मात्‌ तदटुप्नीतनयभेदानु- 
घादतः तत्तस्य भीवद्धमानस्य उत्प्रावल्येन नीत। वचनरूपेण प्राप्ता ये नयानां 
भेदविशपास्तपामसुवादतः कथितस्येव यत्कथनं तदनुवादस्तस्मादुवादतः 
कुर्मः, दति शपः । कथ ? स्तिपतो.ऽखपविस्तरत इति ॥ १॥ 
भावाशथ--श्रनेत धमौत्मक चस्तुरश्रोमं सेकसी पक विशि ध्म को 
लेकर न्य घमा की शरोर उदासीन भाव रखते हुपए जो पदार्थ का चरन करना 
हे, उसी का नाम नय ह । वे नैगमादि सर्य नय ही नदियों के तुल्य है, उन नदी 
तल्य नयो के समुद्ध वल्य श्चागम ( वचनमार्म ) जिनका है उन चरम ती 
कर महाचीर भगवान्‌ को स्तुति का चिपय कस्ते ईहै--श्रथीत्‌ उनके स्तुति 
फरते है । किख प्रकार स्तुति कर्ते दै? सो दी दिखलात हे--उस वर्धमान 
स्वामी के चचन रूप को पराप्त दए जो नय के भेद्‌-उन के श्रलुवाद्‌ से-श्र्थात्‌ 
कथन किए को पुनः कथन कर्ने स ही उन की स्तुति करते द । 
नैगमः सम्रहश्चैव व्यवदारजुसून्चकौ 
शब्द समभिरूडैवभूतौ चेति नया स्ता ॥२॥ 
सीका--नेगमेति । न पको गमे विकटपो यस्य स नगमः पएथर्‌ पथक्‌ 
सामान्यविशेपयोग्रदणात्‌ ॥ १९॥ सग्रह्णाति विशेषान्‌ सामान्यतया सत्तायां 
चरोडीकरोति यः स संग्रहः ॥ २॥ वि विश्चिपतयैव सामान्यमवदरति मन्यते यो- 
ऽसो व्यवदारः ॥३॥ ऋजु वसेमानमेव सूचयति वस्तुतया विकरपयति यः स 
ऋजुसूजको न्दे व्यवहार ञ्ुखूत्रकौ ॥४॥ काललिगचचने्वाचकेन शब्देन 
सभे तुर्यं पयीयभेदेऽपि प्कमेव वाच्यं मन्यमानः शब्दो नय ॥५ा से सम्यक्‌ 
पकारेण यथापयौयेरारूदम्थं तथेव भिन्नवाच्यं मन्यमानः समभिरूढो नयः 
॥६॥ भूतं शब्दोऽच वुल्यवाची प्वं यथा वाचके शब्दे यो व्युत्पत्तिरूपो चिद 
मानो.ऽथा.ऽस्ति तथाभूततत्त॒ल्या$थैक्रियाकारिणमेव वस्तु वस्तुवन्मन्यमान 
पचे भूतो नयो इन्द्धे द्विवयनमित्यसुना अकारेण दे विभो ! त्वया नया स्पृताः 
स्वागमे कथिता इति शेपः ॥२॥ 
भा०्-श्नेक प्रकार सर सामान्य श्चौर विशेष ग्रहण करने से 
नेगम कडा जाता दै ॥९॥ विश्चेप पदार्थों को जो सामान्यतया अ्रहण कस्लेना 
है, उसी का नाम संग्रहनय दे ॥२॥ जो सामान्य को विशेषतया म्रद करना है 


( ७५ ) 


कार स देखा जाता है, दीक उसी प्रकार विरेोप रूप धर्म को छोड कर जीवा- 
दि तत्वों को सामान्यतया एक रूप खदेखा जाता दे, परंच उक्त शत १०० धटो 
को जय जन प्रथक्‌ २ भावस ग्रहण कर्ते दे, तव वे श्चपने २ स्वीकार कयि 
दप घट को पृथक्‌ २ रूप सर देखते दै । जसे कि-यद हमारा घट पीतचर बाला 
दे तथा यद्‌ इस का धट रृप्ण रंग वाला दै श्र्थात्‌ सुदाय मे मेदक 
ल्तण॒ द्वारा चे मूटृता को प्राप्त नदीं दोते, यदी श्राप का परम उपकारद्े, जो 
पदार्थो का यथाश स्वरूप चरन फिया द! 
नेगम मन्यते यस्तु तदेतदुभयात्मकम्‌ 
निर्विष न सामान्य विशेषोऽपि न तदधिना ॥५॥ 
तदेत दुङ्घपूर्वो नेगमो नैगमनामा नय उभयात्मकं यस्तु मन्यते उभौ 
दधौ सामान्यविशेषौ श्चयवौ श्रात्मा स्वरूपं यस्य॒ वस्तुनस्तदुभयात्मकं 
तत्तादगूरूपं वस्तु पदाथ मन्यते स्वीकरोति । ऊुतस्त्यदाज्ञायां निविरोपं सामान्यं 
न निगेतो दूरीभूतो विरेपो विपणो पययो वा यस्य॒ तन्निविशेपमीदग्रूपं 
सामान्य न विद्यते तद्धिना सामान्यं विशेयं ॑वा द्वेव्यं चिना रहितो विशषो न 
वियत.ऽत उभया्मकं गृह्णाति । यदि सम्यग्रण्िरयमितिचेन्न-अय हि दव्य 
पयोयं च दयमपि सामान्यचिशेषयुश् मन्यते, ततो नायं सम्यगृटष्टि- 
रित्यशः ॥५॥ 
भा०्-जनेगम नय पदां के दोनों धर्म मानता है अर्थात्‌ पदाथ 
सामान्यधर्म श्रौर विशिपधम दोनो धमो के धारण करने वाला होता दहे, 
परन्तु सामान्य धर्म स विशेष धम प्रथक्‌ नदीं दो सकता श्रौर नादी विशेप- 
धर्मे सामान्यधम स प्रथक्‌ टो सकता । तप्य नैगमनय के मत से 
स्य पदाथ उक्त दोनों धमो के धारण करन वाले देखे जति है, किन्तु द्वव्य 
श्नोर पयीय रूप क्रियाश्रयो को सम्यगृदषि सामान्य श्रौर विशेष रूप धमो से 
युक्क मानता ह 1 तात्पर्यं यह है कि-द्वव्य पयार्यं युक्क तो दोता दी दै, अ्रतपएव 
सवे द्रव्य सामान्य श्रौर विशेष रूप धमो से युक्त अतिपाद्‌न किंया गया है ! 
श्व सग्रह नय का विपय करते द । 
सग्रहा मन्यते वस्तु सामान्यात्मकमेव हि 
सामान्गव्यतिरिक्तोऽस्ति न विशेष" खपुष्पवत्‌ ॥६॥ 
सग्रहः-सग्रह नामा नयस्तु सामान्य द्रव्यसत्तामा् जातिमाचे चा य- 
त्तत्‌ सामान्ये त्देवात्मा स्वरूप यस्य तत्तथा तद्धस्तु एव वस्तुतया मन्यते 
कस्माद्धि यस्मात्‌ सामान्यव्यतिरिक्रः सामान्यात्‌ पथक्‌भूतो विशपो नास्ति 
न विद्यते तद्धिना विंशषपः खपुप्पवद्‌ शआाकाशक्कखुमतुस्योऽस्तीति न वोप- 
देशतो वसते तस्मात्‌ ॥६॥ । 


( ७७ ) 


एथग्‌भूतं सामान्यमसद्‌ नास्ति खरविपाणवत्‌ रासभग्धङ्गवत्‌ तर्द 
विश्चिपमात्र एव पदाथः ॥ ८ ॥ 

भा० व्यवहारनय चिशेपात्मकरूप पर्यायस्वरूप वचस्तु को स्वीकार 
करता दै, उसका यदह भी मन्तव्य है कि-विशेप से भिन्न सामान्यप- 
दाथे खर के विपाशं (सींग) के समान असद्‌ दोता है । 


मय वह श्रपने सिद्धान्त को दन्त द्वारा सिद्ध करता दै- 
वनस्पतिं मृदाणेति प्रो गृह्ाति कोऽपिकिम्‌ 
विना विदान्नाम्रा्दीस्तनिनर्थकमेव तत्‌ ॥६॥ 


पनमेवोदादरति- यदा केनचिद्धक्ता क्चिदादिष्टः भो }! चवं 
चनस्पति गृद्ारेति थोके कथिते सति फ कोऽपि निम्वाम्रादीन्‌ विशेषान्‌ 
चिना गरह्लाति न कोऽपि गृह्णाति तत्तस्मात्‌ कारणाद्‌ ग्रदणाभावात्तत्लामान्यं 
निरथकं निष्फलमेवेति ॥ ६ ॥ 


मा०-जैसे क्सीने का किदे रायै ¦ पुत्र ! चनस्पति लाश्रो, 
तो क्त्या श्राग्र चा निम्वादिके नाम लियि विना वह किसी फल विशेष को 
ला सकता है ? कदापि नर्ही, तव सिद्ध हुम कि-विेप के विना श्रद्‌ 
पिये सामान्यभाव निथैक दी दोता है । श्रव उक्र ही विषय मे फिर 
कहते है- 

व्रणपिर्डपादेषदिके सेकप्रयोजने 
उपेषे विशयः स्यात्‌ सामान्ये नहि कर्िचित्‌ ॥ ९० ॥ 

रीका-तथा च बरणपिरडीवणं मदुष्यादीनां शरीरे प्रहारादिजात- 
चतं तस्मै पिरि पेकादिकरणं तथा पादलेपः पादलेपकर्णं तयोर्दन्दे 
श्रादिपदाच्चचुरजनादिके लोकानां जनानां भरयोजने कायं तर्मन्‌ विशेषै- 
पयौयिरुपयोगः साधने स्याद्धवति सामान्ये सक्तामात्रे सति कर्हिचित्‌ 
कदाचिदपि न कार्यसिद्धिभवतीत्यतो घिगेष एव वस्तु ॥ १० ॥ 

भा०-मञष्यादि के शरीर म प्रहारादि फे लग जने सरे पटटिकादि 
करना तथा पादलेप करना आदि शब्द्‌ से चद्ुरेजनादि करना इत्यादि भ्रयो- 
जनों के उपस्थित दो जाने पर च्शिपभावसखे दी कायै सिद्ध दो स्केगा। 
अथीत्‌ जिस रोग के लिये जिस प्रौपघ का प्रयोग किया जाता है उस्र श्रौपध 
कानामनल्ेनेसे दी वद श्रौपधि परप्षद्ो स्करेगी । केवल चोपधि दीदेदो 
इतने ही कथन माच से काम नदीं चलगा । प्रतः सिद्ध इुश्रा कि विशेष दी 
कायै साधक दो सकता दै । नतु सामान्य पदाथ । 

खच व्यवहार नयके पति ऋजुखूज नय कता है- 


( ७& ) 


रीका--श्रयसरजुसूचनय एप्वनन्तरं वच्यमाणेषु चर्तु नित्तेपेख पकं 
भावनित्तेपमव वास्तवं मन्यते, नामस्थापनाद्रव्यासि न मन्यते, तेषां 
परकीयत्वादरुत्पन्नविनष्त्वाच्च, त्र नाम वक्तुरूदलापरूपं वा गोपालदार- 
कादि गतामिन्द्राभिधाने परकीये स्थापना चि्रपटादिरूपा परकीया द्रव्यं 
पुनभाविभावस्य कारणो तच्चासुत्पन्ने भूतभावस्य कारणे तु चिनषए्म्‌ 
पएवम्रतनाः शब्दादयसख्रयो नया भावनिक्तेपमेव स्वीकु्न्तीत्यथः॥ १२ ॥ 


भा--यदह ऋजुसूजनय नाम स्थापना दव्य प्रौर भाव इन चारों 
नित्िपों मे से कवल भाव नित्तिप को दी स्वीकार करता दै क्योकि--उसका 
यद मन्तव्य है कि--परकीय वस्तु श्यलुत्पन्न श्रौर पिन रूप है, श्रतः वह्‌ 
कप्य साधक नरी रो सकती । गोपालदारकादि मे इन्द्रादि का नाम 
स्थापन किया हुश्रा कार्यं साधक नदींदटोता है। इसी प्रकार चिव पटादि 
रूप भी परकीय पयध्यों के सिद्ध करने म श्रसमथ देखे जते दै। जेसे-किसी 
नेकिसीका चित्र किसी वस्तु पर श्रकित करदिथा, तव वद चित्र उस 
व्यक्घि की क्रियाञ्नो के करने मे समथ दै । केवल वद देखने रूप ही है । 
तएव इस नय का मन्तन्य यदी निकलता है । भाव निक्ेप टी जो वक्तमान 
काल मे विद्यमान दै वदी भीष काय की सिद्धि करने मे समर्थता रखता 
हे । नतु भ्रथम तीन नित्तेप कार्यं साधक दो सक्ते है । इसी भरकार अगल 
तीन नय भावनित्तेप को दी स्वीकार करते है । तथा च 
अर्थ शब्द नयोऽनेके पयीयेरेकमेव च 
मन्यते कुम्भरुरुशघरप्यिकाधेवाचका ॥ ९४ ॥। 
रीका-शब्दनामा नयः शब्द पुंल्ी-नपुसकादयष्भिधायकोल्लाप 
स्तरप्रधानो नयः शब्दनयः सर शनकैः शब्द्पययेसङ्कोऽपि र्थं वाच्य 
पदाथमेकमेव मन्यते, कुत. ? हि यस्मात्‌ कुम्भः कलशो धटः प्ते शब्दाः 
सवेदशिभेर्जनैरेकस्य धघटाख्यपदाथस्य चाचकाः _ कथितास्ततः सिद्ध- 
मनेकै पययैरङ्तोऽप्याभि धेय एक पवेत्यथः-- ॥ १४॥ 
भा०-शब्दनय पुरिलग सनी नपुसकलिग आदि नेक प्रकार 
के शब्दो के श्रथ को जानकर जो अर्थौ को परधानं रखता है, उसी का नाम 
स्थे है । जेस कि-कुंम कलश घट यदह सव भिन्न शब्द्‌ दोने पर भी धर शब्द 
के प्रश्चके ही बोधक है. अतप्व श्रनेक पयोयों के श्व्द्‌ नेक दोनेपर भी 
सअथेनय श्रथ ( अभिधेय) को दही मुख्य रख कर एक ही मानता हे } 
नते समभिरुढोऽथ भिन्नपयौयनेदत्‌ 


भिन्नाय कुमररुरटाघटपयद्विवत्‌ 3 १५ ॥ 


( ८१९ ) 


पक ही पयोयका वाची जो शब्द्‌ है; वही एक शब्द्‌ उसं श्रभिधेय का 
वाची दे, पयोकि-विदयमान भाव दी (भ्रव) निश्चय से श्रात्मीय कायं के करने 
चाला देखा जाता हे । अतएव तद्रप चरी वस्तुदे, न्य न्हींतथाशास मे 
स्वा्थक्रियाकारी चस्तु मानागया दै । इस कारिका का सारांश केवल इतना ही 
दे कि-प्वभूत नय केवल स्वाधक्रियाकारी वस्तु को दी वस्तु मानता रै, 
न्य को नदीं श्र्थात्‌ जो श्रपने गुण म पूरी द घदी वस्तु हे, यदी इस नय का 
तात्पर्य हे 
यदि काथेमङु्वणोऽपैप्यते तत्तया स चत्‌ । 
तदा पटेऽपि न घटस्यपदेषः (मिष्यते ॥ १८॥ 
चरत्तिः--यदि स पदा्धस्तदा तस्मिन्‌ काल्ञे का्यमकुर्वाणो पि स्वाध- 
क्रियामकुवेन्नपि चत्‌ तत्तया वस्तुतया दप्यते श्रभ्युपगम्यते भवता तार्देपटेऽपि 
श्ररव्यपदेशो घरशब्दवाच्यता कथं नेप्यते कस्मन्नच्छविपयीक्रियते । किम- 
चापसधः यथा स्वाथैक्रियामकुर्वाणो धटो घटत्वव्यपदेशमभाय्‌ भवति तथा 
घरक्रियाऽभाववान्‌ पटोऽपि घटो भवतु स्वकार्थकारणाभावस्योभयन्नापि 
समानत्वादित्यथैः ॥ १८ ॥ 
शमथ-यदि वद पदाथ उस काल में काय न करता ुश्या भी च्र्थात्‌ स्वाध 
क्रिया न करने पर भी उस वस्तु को वस्तुतया मानता है श्र्थीत्‌ चस्तु के 
भाव को स्वीकृत किया जातादैतोषिर पर मे भी धर शब्द की वाच्यता 
क्यो नदीं स्वीकार की जाती १ तथा क्यों उछ पदार्थं को इच्छा विपयक 
नदीं किया जाता इस प्रकार मानने मे उक्त पदाथ ने क्या श्रपराध किया 
दे ? क्यो कि-जिस प्रकार स्वाथ क्रिया न करने परभी धर घरत्व के व्यपदेश 
का भागी वनता है उसी प्रकारघट क्रियाका श्रभाव वला पट भी घर 
दोजावे कारण कि स्वकार्यं के श्मभावद्ोने सरे दोनोंको दी समानदोने से 
पत्तसमसिद्ध दो जाना है इस कारिका का सारांश इतना दी है किं-जव 
ध्रट स्वक्रिया के नकसेन पर भी घटत्व का भागी वन जातादहै तो फिर 
चरक्रिया के अभाव वाला पर भी स्वक्रियाके भावके सम दोने से घट 
दो जाना चादहिप। कारण कि-- 
यथेत्तरविश्ुदा स्यनके सप्ता प्यमी तथा | 
एकैक स्यच्छुतं `भदस्तत' सप्तरशताछमी ॥ ९६॥ 
चृत्तिः--ञ्मी सात्तादुक्तपृ्वीः सप्तापि सक्चसस्याका शपि समुच्याथै- । 
नया यथोत्तरविश॒द्धा यथा २ उत्तरया उपयुपरि वत्तन्ते तथा २ विशुद्धा 
ये.ऽन्ते यथोत्तरविशद्धाः स्यभवन्ति । तथा पकैकः एकश्च एकच एकैको 
नयः शतं शतप्रमारं भदः प्रकारतः स्याद्धवति । ततो श्रमी नयाः सप्त इति सख्या- 


८ 


श्रव सूत्रकार उपसंहार करते हण श्री भगवान्‌ की स्तुति इस प्रकारसे 
ररते ट | 
सवे नया श्रपि बिरोचभूते मिथस्ते 1 
सभूय साघु समयं भगवन्‌. भजन्ते ॥ 
भूषा इव प्रतिमया भूवि स्रभोम- 
पाटग्बुज प्रधनयुष्किपराजितः द्वार्‌ ॥२२॥ 
चृतति -हे भगवन्‌ ! दे श्री वद्धमान स्वामिन. } मिथ परस्परंविरोध- 
श्रृतो.ऽपे विरोधो विरुद्धाऽभिभरायस्तं विरति धास्यन्ति ये ते तथा विधा सर्व 
समस्ता रपि नयाः सम्भूय एकीभूय साधु समीचीने खुन्दर ते तव समयं 
सिद्धान्तं भजन्ते सचन्ते, कं के इव शुचि अरधनयुक्धिपराजिता सुचि पृथ्व्यां 
धनाय युद्धाय युक्षि भ्रबलपुरयवललेनापूवैसेन्यरचना तया पराजिताः 
पराजयं प्रा्ताः प्रतिभटा विपक्तजेतारो भूपा द्राक्शीघं सवा परिपूर्णपद्खण्ड- 
भूमी भोग्या यस्य स सार्वभोमश्चक्रवतीं तस्य पदाम्बुज चरणकमलमिवे- 
त्यथैः ॥२२॥ 


अथ-दे श्रीभगवान्‌ बद्धमानस्वामिन्‌ ! जिस भकार परस्पर विरोध रखने 
चाले राजा लोग सम्राट्‌ चक्रवत्तीं के चरण कमलो को सवन करत हँ उसी भरकार 
यद सातो नय परस्पर वियोध धारण करोत हपट भी जव श्राप के पवित्र शासन 
को पकीभूत दोकर सेवन करत है तव यह सातो नय शान्त भाव धारण 
करत्तेत है क्योकि-श्रापकी वाणी स्यात्‌ शब्द” परस्पर क विरोध को मिरनि 
बाली है शरतपव जिस प्रकार विरोध छोड कर राजागण चक्रवर्ती ऊ 
चरणकमलों की सेवा करते दै उसी भकार सातो नय श्राप के शासन क्री 
सवा करत ह ्र्थात्‌ सातो नयों का समू्रूप श्रापका मुख्य सिद्धान्त दै । 
दत्थ नयाथकयच कुसुमजिनन्दुीरोऽच्वित" सविनयं विनयमिधेन । 
श्रीदरीपबन्द्रयेरे विजयादिदेवसूी शितुरविंजयसिह गुरोश्चतुध्ये ॥२२॥ 
नयकरणिका समाप्ता ॥ 


वरत्ति.-द्थ पूौक्तप्रकोरण नयानामर्थो नयाथौः सोऽस्ति येषां तानि 
नयाथैक्रानि, नयाथकानि च तानि वचांसि चेति तान्येव कुखुमानि पुप्प- 
चन्द तैनयार्थकवच कुखमेः, जिनश्चाखौ इन्दुश्च जिनिन्दुजिनचन्द्रो चीरो वर्धमान- 
स्वामी चिन्यन सदितो यथास्यात्‌ तथा सविनय भूत्वा विनयाभिधेन विनय- 
विजयेतिनामकेन मया.ऽर्चित पूजित कुचर कस्मै । धिया युङ्घे दीपास्यवन्द्रवंरे 
जलधितरवकिं नगर श्रेष्ठे यस्य॒ नाच्चि विजयपदमादौ वत्तत्त स तथा विजय- 
देव सरिस्तस्य सूरीशितु शिष्यो विजयो यो मदूय॒रुस्तस्य तष्यै सन्तु- 


( ८५ ) 


दै परन्तु पर गुण की स्ता श्रसत्रूप है इसी ध्रकारः पत्येक पदायै सत्‌ 
श्नौर शरसव्‌ दन दोनों धर्मो के धारण करेन वाला दोता दै जिस धकार प्यक 
पुरुप पिता रौर पुत्र दोनों धर्मो को धारण करलता है ययपि यद दोनो ध्म 
परस्पर वियोध्यी भाव को उत्पादन करने वाल है तथापि सपे्तिकि टदोन से 
दोन सत्‌रूप मनि जासकते है क्योकि वद पुरूप श्रपने पिता की शयपेक्ता से 
पुच्रत्व भाव को पाक्त दै श्चीर श्रपने पुत्र की पेत्ता से उसमे पितृत्व भाव 
भी उदया हुघ्रा है इसी भकार अत्यक पदाथ स्वगुण मे सत्रूप प्रौर परगुणए मे 
छ्रसत्‌ सूप से माना जासकता है तथा छनकान्त वाद्‌ मे जिस प्रकार सम्यम्‌ 
कषान. सम्यगृदशन ्चौर सम्यक चरि का वरन किया गया है उसका उसी 
भकार परिचय होना चादिपः ! इसी का नाम स्वसमयवित्‌ दे । 

३२ पर समयवित्‌--पर समय का भी वेत्ता होना चादिप, अर्थौत्‌ 
ज्ञनमत के इलाचा याचन्माच श्रस्यमत दै, उनका भी भक्ती भांति बोघ दोना चादिए, 
कारण कि-जवतक उस कां श्रात्मा परमत से परिचित नदीं दुश्रा, तवतक 
चद्‌ स्वमत्त मे भी पृरेतया दृढता धारण नदीं कर खकता त्त स्वमत मे दढता 
तव॒दहीदो सक्ती है जव कि परमतका भली भति वोध प्राप्त 
क्रिया जाए । श्रीसिदस्न दिवाकरे लिखा टै कि-जावदया चयणपहा 
तावद्या चेव इति नयवाया तावतश्चैव परसमयाः १ इस कथन 
कायट सा्ंश दै, किः यावन्मात्र वचन के मा है, तावन्मात्र दी नयवाक्य हे, 
सो यावन्माच नयवाक्य दै, तावन्माज् ही परसमय है, श्र्थात्‌ तावन्मात्र दी 
परस्रमय के वाक्य दै । श्रतप्व पर समय से ्रवश्यमेव परिचित दोना 
चादिष्ट । एवं क्रियावादी ९ श्चक्रियावादी २ श्रक्ानवादी २ शौर विनयवादीए 
इन मतौकाभी वोघ दोना चादहिप । क्रियावादी के मत मे जीवं कीश्रस्ति 
मानी जाती है, क्योकि-कताकीचे्टाकादीनाम क्रिया दहैसो कत्त सिद्ध 
होने पर दी क्रियाकीसिद्धिकीजा सकती है) तणए्वक्रियावादीके मतमे 
जीव की रस्ति मानी जाती दै परन्तु इस मत के १८४ मेद है उनमभेदोंमे 
जीय की रस्ति करई पकार से घर्सन की गई ह, जेखे कि-किखीने जीवकी 
श्रस्ति कालाधीन स्वीकार कय है, चौर किसीने ईश्वराधीन दी मानली है, 
श्रस्तु, परन्तु जीव चि अस्ति श्रव्य स्वीकार की दै डितीय श्क्रियावाद है 
उसका मन्तव्य है कि-जीव की श्रस्ति नदीं है जव जीवकी दी स्ति नदीहे 
तो फिर क्रिया की श्रस्तिउसके मतमे किस धकार दयो सक्ती है अतएव 

यह श्चक्रियाचाद्‌ नास्तिकवाद्‌ है प्रथीत्‌ इसका दूसरानाम नास्तिकवाद्‌ भी 
डे ठतीय श्रक्लान वादी दे वद इस भ्रकार स श्रपने मत का वर्णन कररटा हे कि- 
आत्मा मे श्न्ञानता दी श्रेयस्कर है क्योक्रि-यावन्मात्र जगत्‌ मे सङ्करा उत्पन्न 


( < ) 


भिक २ प्रकार स मानते है जैसे कि कोई २तो पट्‌ दर्शन दस प्रकार से मानता 
हैकि पूर्वमीमांसा १ श्रौर उत्तरमीमांसा २ नियेश्वर सांख्य ३ श्रौर 
सेश्वरसांख्यधपोडश पदाथ के मानने चाला नैयायिक श्नौर सप्त पदाथ के मानन 
चाला नैयायिक ६ इस प्रकार स दशन पट्‌ दोते है ' कोई इस प्रकार स मानता 
हे कि-चोद्ध मत की चार शाखापं ह जैसे कि-सीचान्तिक ९ वैभापिक २ योगा- 
चार ३ श्रौर माध्यमिक ४जैन ५ श्रौर लोकायतिक ६ दस भकार पट्‌ दशन 
दोतते दै तथा पर्वोक्तं रौर यद पर्‌ दशन मिल कर सर्वं दीन द्वादश दोते है । 
श्रपितु कोई रतो यह भी कहता है कि-मीमांसक १ सांख्य २ नैयायिक ३ वोद्ध 
४ ज्ञेन ५ रौर चावीक्‌ ६ दख प्रकार पट्‌ द्श्षेन दोते दै । पर च प्रहृत निवघ- 
कार ने तो-पोद्ध, नैयायिक, सांख्य, जैन, वेशेपिफ शरोर जे मिनीय-इस भ- 
कार पददशन प्रतिपादन क्रिये है, फिन्तु- -सवं दशेन संग्रह श्नौर सय शिरो- 
मणि श्रादि निवधों मै तो श्ननेक दशन कथन कयि गण ह श्रथांत्‌ यह नियम 
नीं देखा जाता कि केवल दशन इतने दी दोते है । इसी यास्ते श्राचा्य के 
ल्लियि"“परसमयवित्‌" शव्द लिखा गया है कि-वह जनमत के अतिरि 
परमतके शाखो का भी भलीप्रकार सर परिचत दो. जैसे करि-पददशैनों स 
चादहिर इसा श्रौर मुसलमान श्रादि श्रनेक प्रकार के मत पचलित हो रहे ह! 
उनके सिद्धान्तोको भी जानना चादहिएतथा सदम व॒ाद्धेसे छन्वेपण करना चादि 
श्रत्व यावन्मात्र परमत के सिद्धान्त दो या उनके सिद्धान्तो की शाखां वन 
गर दो सव का भलीभांति वोध दोना चादिए 1 पद्‌ दशनो के चिपय्‌ मे इसलिए 
नदीं लिखा गया दै, कि- इन दशैनों की पुस्तक कतिपय भाषाओ मे मुद्रित से 
खुकी है श्रत्व पाठकगण उन पुस्तको से वा स्ूथगडाङ्ग-खूच, स्याद्वाद मेजरी 
श्रादि जेनय्रथों से उक्षदशनों के सिद्धांतों का भली भांति वोध कर सक्ते हे । 
इस स्थान पर तो केवल इतना दी विपथ है कि घ्राचार्य को उक मतोके सिद्धान्तो 
का भी जानकार दोना चाहिए । 

३२ गाभीय्यै-दस गुण मे प्राचार्य की गभीरता सिद्ध की गई हे, क्योकि 
जिसमे गांभीययै गुण होता है, उसी मे अन्य गुणभी श्राधित होजते है, 
वदी श्राचाच श्रन्य व्याक्घियों की श्रालोचनादि को खनने के योग्य दोता है वदी 
छाया अन्य शआ्रात्माकी शुद्धि करन की योग्यता रखता दै जो उस 
प्रायाश्चत्ती का दोप खनकर किसी च्रौर के रागे प्रकाश नदीं करता यदी उसकी 
गभीरता है । कारण कि-जव वह स्वयं गभीर दोगा तभी वद क्षो को सहन 
करता श्चा अन्य श्रात्माश्रों को घम पथ मे स्थापन कर सक्रेगा, श्रौरः श्राप 
भी पविन्न गुणो का श्चाधयीभूत वन जायगा । श्रतएव चाय को देप कुद्धि सर 
क्सीका मम पकाशित न करना चषि 


(द) 


सुय म आउरस तें भगवया एवमक्खायं इह खलु धरहि भगवतें 
्रहविहा गणि संपया पण्णत्ता ॥ 
श्र्थ-हे श्रायुप्न्‌ शिप्य ! मेने उसश्ची भगवान्‌ को दस प्रकार 
प्रतिपादन कस्ते दुष्ट सुना दैफि इस जिनशासन मे स्थविर भगवतं 
ने राट प्रकार की गरि ( श्रा चार्यं ) सपत्‌ प्रतिपादन कपी द! 
उक्त चन को सुनकर शिप्यने ध्रश्च किया । प्रव दस विपय मे सूत्रकार 
कते है । 
कयरा खलु अटविहा गणिसपया पण्णत्ता । 
श्रथ--यिप्य ने परश्च किया किदे भगवन्‌ ! कोनसी श्रा प्रकार की गरि 
सप्‌ पतिपादन की गर दे? 
शिप्यके पर्न का शुरू उत्तर देते है । श्रव सूचकार इस विपय मे कहते हे 1 
इमा खलु अरटविहा गशिसंपया परुणत्ता तंजदा- 
श्रश्र-गुरु कते है कि हे शिष्य } श्रार प्रकारकी गरिस्षपत्‌ इस प्रकार 
प्रतिपादन की गई हे जेते भि- 
मव सञ्चकार श्रार संपत्‌ के नाम विपय मे कहते ह । 
द्रायार संपया १ सुय संपया २ सरीर संपया ३ वयण संपया ४ 
वायणा संपया ५ मई सपया ६ पय्रोग सपया ७ संगाह परिणाम 
अटठमा [८ 
रथ-श्राचार सपत्‌ १ श्तस्रपत्‌ २ शरीर सत्‌ ३ वचन सपत्‌ 8 वाचना 
सपत्‌ ५ मति संपत्‌ ६ प्रयोग सेपत्‌ ७ श्रौर संग्रह परिज्ञा ॥८ 
च सूत्रकार अराचार सेपत्‌ के विपय मै कहते दै । 
सरकिंतं आयार सपया १ आयार सपया चउव्विहा पण्णत्ता तनदा- 
संजम धुवजोग सत्ते यावि भवड्‌ १ असप्पगादहिऽप्पा २ अआशिययवत्ती ३ 
युढि सीलियावि भव ७ । सेते आयार सपया । 
्रथे- शिप्यने प्रश्च किया कि-े भगवन्‌ ! च्राचार संपत्‌ किसे कते है ? 
इसके उत्तर म गुरु कने लगे कि-दे शिष्य! श्राचार सपत्‌ चार प्रकार की चीन 
की ग ह जेस कि-सयम मे निश्चल योग ॒युङ्क दोवे १ शाचा्य की ्रात्मा 
समभिमानरदित होवे २ श्ननियतविदारी दोवे ३ चचलता सरे रदित चद्धों 
जैसा स्वभाव दोवे यदी च्राचार सपत्‌ के भद्‌ दै । सारोश-प्रथम सेपत्‌ सदा- 
चारदीदै।जो श्चात्मा ्राचार सर पतित द्यो गया है वह ्रास्मिकगुणोसेभी 


( ६१ ) 


उच्चारण का समय श्राजवि तच उदात्त १ श्रनुदात्त २ श्रौर स्वरित २ ्न तीन 
घोषं स्र युक्त श्रीर परम विशुद्ध श्रत को उच्चारण करे श्रपितु यावन्मात्र 
शरुत उच्चारण के दोप ह उनको स्थैथा छोड़कर केवल विशुद्ध घोपसे दी श्रत 
उख्चारण करे । 
श्रत सेपत्‌ के पश्चात्‌ व सूत्रकारवृतीय शरीर सपत्‌ विपय कते हे । 

सेफितं सरीर सेपया ? सरीर संपया चउव्विहा पणणत्ता तजहा। श्रारोह परि- 
रणाय संपण्णेयापि मवई १ अ्रणोत्तए सरीरो २ भिर सषयणे ३ बहु 
पडिपुन्निदिएयावि भवई ४ सेतं सरीर संपया ॥ 


छरथ-शिप्यने प्रथन किया किदे भगवन्‌ ! शीर संपत्‌ किसे कते दै 
शुख्न उत्तर मे कटा किदे शिष्य ! शरीर संपत्‌ चार प्रकार से प्रतिपादन की 
गर है ज्ेसेकि-शरीर दीधे ध्रौर विस्तार युक्त दो १ निभल श्रौर सुदराकार 
शरीरो २ शरीर कासरगठटन वलयुक्त दो ३ स्यं प्रकार स पचेद्धिय वलयुक्त 
चा प्रतिपूण दों ४ यदी शरीर संपत्‌ दै । 

सरौश-द्धितीय सपत्‌ करे पश्चात्‌ शिष्य ने तीय सपत्‌ के विपयमे भ्रश्न 
किया कि-े भगवन्‌ ! शरीर संपत्‌ किंसि कते ह ? इस पर्न के उत्तर मे गुरने 
परत्तिपादन किया कि-दे शिष्य ! शरीर का सुदराकार दोना यदी शरीर की 
सपत्‌ है किन्तु वह सपत्‌ चार प्रकार वरन की गर हैज्ञेसे कि-शरीर 
दी छ्रोर चिस्तीर होना चादहिपए जो ब्तमान समय मे सोदर्यं धारण करसके । 
साथी सभामे चेटा दुखा शरीर कांति को धारण करने वाला दो ्रपितु लज्जा 
युक्तभीनदो अथीत्‌ शरीर खुदराकार दो । उत्तना ही नदीं किन्तु शरीर का 
सहनन स्थिर दोना चादिए क्योकि -जिसके शरीर की श्रस्थिपं दढ होगी उस 
के शरीर का संटनन भी वलयुक्तदी होता है । साथी पंचेद्धिय परतिपूण होवे । 
किसी इद्धियमे भी किसी पकार की त्ति न हो जैसे किं -चज्ञुश्मों मे निवेलता, 
श्तेद्धिय मे निलता वा शरीर सगो के कारण विकृत दोगया टो इत्यादि 
कारण शरीर संपत्‌ के विधातक दौ जति दहै अतप्व पाचों इंद्रिय भतिपूश 
शरोर वलयुक्त दोनी चादि क्योकि शरीर सेपत्‌ का प्रतिवादी पर परम भभाव 
पड़ जाता है वथा धमे कथादि के समय शरीरसपत्‌ के द्वारा धम का महत्व 
वद जाता दे ॥४॥ 

शरीर सप्‌ के पश्चात्‌ श्च सूत्रकार चतुथे वचनसंपत्‌ के विषय मे 


१ 
1 


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कहत 


[1 # 


( ६३ ) 


दियुण युक पठन कराना चादिएट २ यावन्माच् श्रथ का निर्वाह कर सङरे ताच- 
न्मात्र ही योग्यतलुसार ्रथवाचना देनी चाददिप ४ यदी वाचना सपत्‌ के 
भददै। 
सररोशए-श्िप्य ने प्रश्च किया दे भगवन्‌ ! चाचना सपत्‌ किसे कते है ? 
इसके उत्तर मे गुरु ने पतिपादन किया कि दे शिष्य ! जिस प्रकार शिष्य को 
सूच चा श्रथ का वोध टदोखके उसी भरकार पठन व्यवस्था की जाए उसी का 
नाम वाचना सपत्‌ है परन्तु इस सपत्‌ के चार भेद दै जैसे कि-शिप्य की 
योग्यता देखकर दी उस को सू के पठन की ज्ञा देनी चाहिप जसे कियद 
शिष्य इस के योग्य है अत इसको यदी सू पढाना चादिएट १ योग्यता देखकर 
दी वाचना देनी चादिष्ट जेसकि-यद शिष्य इतनी वाचना खखपूर्वक संभाल 
सकता है २ फिर योग्यता देखकर दी संहिता १ पद्‌ २ पदाथ २ पदविग्रह ४ 
स्ता ५ श्नौर समगधानादि ६ विपय परिध्रम करना चादिए ३ तथा यावन्माच 
चह श्रधका निर्वह्‌ कर सके तावन्माच दी उसे रथे प्रदान करना चादिए ४ 
कारण कि योग्यता पूर्वक पाय्य व्यवस्था फी इुदैदोतो रिष्यके हद्यमे श्रथ 
समधिगत दो जाता दै यदि योग्यता विना वाचना दीजायगी तो सूर की श्राशा- 
तना [अविनय] दोगी श्यौर पठन करने वलि के चित्त को विक्तेप उत्पन्न हो 
जायगा । 
पांचवीं वाचना सपत्‌ के पश्चात्‌ श्रव चटी मतिसपत्‌ के विपय मे सूत्रकार 
कदत दै :-- 
से किंते मई संपया ? मई संपया चउाब्वहा पण्णएत्ता तंजदा-उग्गह 
सह्‌ संपया १ ईहामईरपया २ अवायम्‌ई्‌ सपया ३ धारणामई संपया ४ ॥ 
्थ-शिष्यने पन कियाकि-देभगवन्‌ ! मति संपत्‌ क्रिसे कहते है ?इस पशन 
के उत्तर म गुरु ने कटा किं हे शिण्य ! मति संपत्‌ चार प्रकार से भतिपादन 
की गई है जेते कि-श्मवग्रहमति १९ ईटामति २ अवायमति ३ भ्नौर 
घारणामति £ । 
सायाश--सामान्य श्रववोधका नाम श्रवय्मरहमति है र्थौत्‌ पदार्थौ का 
सामान्य प्रकार सेजो वोध होता है उसे अ्रवग्रहमति कते है परन्तु 
सामान्य वौधमे जो फिर विचार उत्पन्न दोता दै उस चिचार स्रजो विशिष्ट 
चोधकी प्राप्ति दोती है उसीका नाम ₹दामति है फिर ईदामति सर जो पदाथौं 
का भाव प्रवगत दोता है उसी का नाम अवायमति दै । श्रवगत होने के पश्चात्‌ 
जो फिर उस श्ानकी धारणा कीजाती दै उसी का नाम ॒धारणामति है । पूर्य 


1/1 


( ६4 ) 


ष 
पुनःशिप्य ने भश्च किया कि दे भगवन्‌ ! धारणामति किसे कते है १ गुरुने 
उत्तर मे प्रतिपादन फिया करि दे शिष्य ! धारणामति के भी छः भदे वरन किए 
गप हे जसे कि पकी वार वहुत स प्रश्नौ को धारण करले । वहुत प्रकार से 
भश्चों के भावों को धारस्ण कसले २ पुरातन क्षान (पराचीन) को धारण करे ३ नय 
च्रोर भंग तथा सप्तभगी श्रादिके भावों को धारण कर। परन्तु सूत्र वा 
रिप्यादि के निश्राय (श्राश्रय) विना प्रान को धारण करे ५ फिर विना सन्देह 
नान को धारण करे च्रथांत्‌ संशय रदित षान की धारणां करे६्सो श्सीको 
धारणामति सपत्‌ कते दै । 
सायश्--जो सत्र म मदिसपत्‌के मुख्य चार भेद्‌ कयि गष थे अव रिष्यने 
चार भदो के उत्तर भेदो के विषय धरश्च किया है किदे भगवम्‌ ! श्रवयहमति के 
करितने भेद क्वि गये ह ? इस के उत्तर मे गुरु ने कथन करिया कि-दे श्षिपष्य! 
अवग्रद मति के छ भदे प्रतिपादन किये गये ह जसेकि- जव ही किसीने कोई 
भश्च किया उसी समय उसके भावोकरो जान लेना यह श्मवत्रदमति का प्रथम भेद्‌ 
दे इसी करार श्रागे मी जान लेना चादिप जेसेकि-एक ही. वार वहुत से रश्च 
कर दिये उनको एक दी वार सुनकर श्रवगत कर लना २ किन्तु छरपनी वुद्धि मे 
उन भश्चों को भिन्न २ भकार से दी स्थापन करना र्थात्‌ विस्परत न होने देना ३ 
पितु टढृतापूर्वक उन प्रश्नों को धारण करना जिससे वे स्खलित रूपसे 
वने रै ४ फिर किसी की सहायता विना उन प्रश्नो को धारण करना ज्ञेसे-रेसे 
न दो क्रि-दे शिष्य ! त ने इसको स्मरति रखना वा पन्न सचिकादि मे स्यति रूप 
लिख लेना तथा किसी अथ के देखने की जिज्ञासा भगट करना ५ साथी जिस 
भश्चको स्वाति किया दै उसमे किसी धकार से भी सेशय न होवे जैसे कि उसने 
श्या कदा था? क्या यदह धावा कु श्रोर भी पृ्धा था? इसभ्रकार के सशय न 
दोने चादिं ६ यदी श्रवनग्रहमति संपत्‌ के पट्‌ भद्‌ ठे । परन्तु धारणामाति सपत्‌ 
के पद्‌ भद्‌ निम्न भकार वार्त ह जैसेकि एक वार खुनकर वहत ष्टी धारण कर 
लेवे १९ चा बहुत प्रकार स धारण केर २ जिस चात को इए चिरकाल दोगया हो 
उसे भी सूति पथ मे रखे कारण कि-पुरातन बातों के आआधारपर दी नूतन 
ननेयमों की खृण्टि रची जास्तकती है पुरातन वाते दी नूतन कियाय के करने मे 
सदायक होती है जेसेकि-असुक समय यद वात इस प्रकार की गई थी देतथा 
जो ज्ञान डदधैरदो जेस्तेकि-भेग नय निक्तेपादि, उस कषान को भी धारण कर 
रक्खे क्योकि भेग्देका शान भरत्यक व्यक्ति सदज से ही धारण नहीं कर 
सकता श्रतप्व॒श्राचाय को अवश्यमेव उक्त प्रकारके क्ञान को स्छ्रतिमे 
रखना चाहिए ॥४॥ । 


( &७ ) 


ही कोलादल करना चाहती है, यदि दशक उपदासादि केलिणदही एकन हु 
हों तो केवल किसी समय स्खलित भावादि को देखकर उपहास दी करना 
न्रादते द तएव परिपत्‌ भावो को देख कर दी वाद मे श्रवत्ति करनी चादिषए ॥ 
क्ते को देखकर ही वाद्‌ करना चादिए ऋ्योकि-यदि त्तचाधिपति धर्म 
काद्धेपी है वा उस्र समय उस क्तेन मजो माननीय पुरूप है वद्‌ नाथं हे 
स्रथवा धर्म चर्चा के उदेद्य को नदीं जानता, पव उसको सभापति वनने की 
सभावना दो तथा निर्णय उसके दाथ मे दो इत्यादि सर्य भावों को देखकर 
दी वादके लिषएः प्रचृत्ति करनी चादिए ।३। पट्‌ द्रव्योंमे से किस दव्य विपय 
चाद्‌ करना है, उस विपय मे मेरा सत्व टे या नदीं इसका श्ञुभव करके तथा द्रव्य 
न्नेत्र काल श्नौर भावरूप पदार्थो के स्वरूप को जानकर दी वाद्‌ करना चारिण 
जेखक्रि दरव्यस् धर्म अधर्मं प्रकाश काल पुद्गल श्नोर जीव यदकैद्रव्य दर 
ज्षच सि उष्य १ श्रधो२श्नौर तिथद्ट्‌ यद तीन लोक है २ काल स-भूत 
भविप्यत्‌ श्रौर वसमान यह तीनों काल द २ भाव से-अौदयिक २ थोपशमिक > 
त्तायिक २ लयोपशमिक ८ पारिणामिक ५ च्रौर सन्निपात ६यद भाव द 
त्या सात नय पत्यक श्रजुमान उपमान भौर श्रागम यह चार परमाण नाम 
स्थापना द्रष्य श्रौर भाव यदी चासें निक्तेप वा निय पत्त वा व्यवहार प्न 
सामान्य भाव वा विशेष भाव कारण श्रौर कार्य इस प्रकार शरनेक शास्रोक्क भावों 
को जानकर छरौर अपनी शक्त को देखकर ही वाद्‌ चविपय म उदयत होना चादिण 
क्योकि इस प्रकार करने स किसी प्रकार की भी क्ति दोने की सभावना नहीं हे 
अपितु धर्मप्रभावना तो अवश्यमेव होजायगी इसी का नाम प्रयोगमतिस्तपत्‌ है 
मव सूत्रकार प्रयोगमति के पश्चात्‌ सग्रहपरि्ा नमक शाटीं संपत्‌ विपरय 


कते हः-- 
सेकं संग्गह परिणा नाम संपया १ सेग्गहपरिणा नामं सपया चउचव्विहा 
पण्णत्ता तंजदा-वासा सख्त पाडलेदित्ता भवड्‌; वहुजण पाउगत्ताए १ 
बहुजण पाउगत्ताए पाडिहारेय पीढ फलग सेज्जा संथारय उगिरिदित्ताभवइर 
कोलणं कालं समाणइत्ता भवह ३ आदागुरू सपूणत्ता भवई ४ सेत संग्गह- 
परिणा नामं संपया ॥ ८ ॥ 
अथै--शिष्यने पर्न क्रिया प्रि-दे भगवन्‌ ! सग्रहपरिज्ञा नामक संपत्‌ 
कसि कदत है ? तव गुरने उत्तरम प्रतिपादन किया किं-दे शिप्य ! सय्द 
परिक्ला नामक सपत्‌ क चार भेद है जेसकि-श्राचायै बहुत स भिज्ञ के 
लिए वपीकाल म उस्ने के ल्लिए क्तो को प्रतिलखन करोनवाला दो १ 


( ६९ ) 


टो जाने से श्माचाय फिर गच्छ की सारणा चारणा क्रियार्पे [खुखपूधक कर 
सकेगा २ फिर च्रटेकार भाव को छोड़ कर दीक्ता गुरु वा श्वेत गुर तथा दी्ता 
मे वड़ा उनकी विनय भा करेन वाला दो जसे कि-जव उन का पधार्णा दोवे 
तव उनक्रो परति इए देखरूर भ्युव्थानादि सम्यग्‌ रीत्तिसे करना चाहिए 
फिर श्राहार वा श्रौपधि तथा उनकी इच्छानुसार उपाधि श्रादि के द्धाय 
उनक्रा सत्क्रार करना चाहिए । सारांश इस का इतनादी हे कि-श्रहकार भाव 
सरे सयैथा रहित रों। 


गुख्श्रों की विधिपूर्वक पयुपासना करनी चाहिये यदि पेसे कदा जाप 
कि-गुरु पंचम साधु पदमे हे श्नौर रिप्य वतीय आचाय पद्मे हे तो फिर वद 
ठतीय पदवाला पचम पद्की पर्युपासना किंस प्रकार करसकता दै ? इसका 
समाधान यह दै कि-जेनमत का मुख्य चिनयधभर दै अरतप्व सिद्धान्त मे 
लिखा हे फि-जहादि छ्रग्गि जलं नमसे । नाणहुद् मच पयाभिसित्तं पएवायस्यि 
उवचिद्ुदज्जा शररत नाणोचगश्रोविसतो ( दृशवेकालिक सूच० श्र. ६ उदेश १ 
गाथा १९) 

प्रथ--जिस प्रकार श्रभग्निहोन्ी बाद्वण॒ श्राग्नि को नमस्कार करता है 
तथा नाना प्रकार श्राहुति, भ्रौर मत्र पदों सरे्ग्नि को श्रभिसिक्त करता 
हे उसी धकार शिष्य श्राचा्यं ( गुर ) की श्रनेत जानक्रे उत्पन्न दोजाने 
पर भी भक्ति नौर विनय करे तथा जिसथरकार शरानदोत्रीपुरुप सदेव श्माभ्न 
करे ही पास रहता है उसी प्रकार शिप्य गुरुकुलवासी र्दे, तथा जिस प्रकार 
राज्य अवस्था के मिलजानि पर फिर चह राजकुमार अपने मातापिता कीं 
विनय करता है ठीक उसीप्रकार श्राचाय पदके मिलजाने पर दीक्ताच्रद्धों की 
पथुपासना करता रहे क्योंकि-श्राचायै पद केवल गच्छवासी साधु-श्नौर 
साध्वियों की तथा श्रावक चां ्राविका्रों की रक्ता करनेके लियिदी दोतादै 
परन्तु विनय भक्ति के व्यवच्चिन्न करने के लिये नदीं क्योकि-ाचा्यका 
कर्व्य दै कि श्रपनी पवि श्माक्ला द्वारा सघसेवा करता र्दे प्रौर विनय 
धस को कदापि न छोड इसीलिये सू मे परतिपादन किया है कि 
प्राचार्य॑गुरु पयुपासना करता रदे क्योकि आज्ञा भदान करना कुच श्नोर चात 
हे गुरु भविति करना कुं श्रौर वात है सो यदी सय्महपारिल्ञा नामक संपत्‌ का 
चतु भद्‌ है इस भ्रकार अठ धकार की संपत्‌ का वर्णन क्य जनि पर ध्रव 
चार प्रकार की चिनय प्रतिपत्ति विपय सूकर प्रतिपादन करत है जिस 
करा श्रादिम सूत्र निम्न प्रकार सर है :-- 


स्रायरि्नो चतेवासीएमाए चउन्विहाए विरएयपडिवर्तीएविणइत्ता 


( ६०१ ) 


जसकि चायं श्राप श॒द्धाचरण धारण करे रौर श्रपने शिष्य को संयम समा- 
चारी का रीकः २ बोध करि यथा-पेचश्रवाद्धिरमणे पचद्धियनिग्रहः कपायजयः 
दंड्यविरतश्च सेयम. सप्तदश विधः ॥ ९ ॥ श्रथीत्‌ दिंसा,श्सत्य, चोरी, मेथुन 
प्रौर परिग्रह इन पाचों ्राथवों की विरति करना च्रौर श्रोतेन्द्रिय चचुरिन्दिय 
्र्द्धिय रसेन्द्रिय तथा स्पर्थेन्धिय इनक्रा निग्रह करना फिर क्रोध, मान, माया 
श्नार लोभ का जीतना तथा मन वचन पौर काया का वश मे करना यद सर्व 
६७ धकार के सयम के भेद हे । श्ाचा्यै स्वये इन भद्‌ पर आचरण करता दुश्या 
फिर इनका पृण बोध अपने शिप्य को कवे । दसी भकार ९२ भकार के तप 
कभेदोकोभी श्रपने शिप्य को सिखलाता दुद्ा श्राप भी यथाशक्ति तप 
धारसुकरे तथाजो व्यक्ति तपकरनेसरे दिचकिचति हों उन को तपका 
मादार्म्य दिखलाकर तप म उत्साहित करे। सों म तपके १२ वारह भद्‌ वसन 
किप गष है जैसे फि-श्रनशन २ उनोदयी २ भित्ताचरी २ रसपरित्याग ४ काय- 
केश ५ श्नौर प्रतिसलीनता £ प्रायर्चित्त ७ विनय = वैयावरत्य £ स्वाध्याय १० 
ध्यान १९ श्नौर कायोत्स १२ इनका सचिस्तर स्वरूप श्चौपपातिकादि सन्नो 
स जानना चाद्ये) सो च्राचा्यं श्तिप्यको उक्त तपोके विधि चिधानादि स परिचित 
करप 1 तप समाचार के पश्चात्‌ फिर श्राचायं गण समाचारी कारशिप्यको 
बोध कराए जेस कि-गण के उपाधिधारियो के क्यार करसव्य दै तथा अस्य 
गण्‌ के साथ किस पकार वर्तव करना चाहिए किसर भरकार श्न्य गणक साथ 
चेदनादिका संभोग जोड़ना चादिष्ट श्रौर किसर प्रकार न्यगण स प्रथक्‌ दो 
जाना चाहिपए बा स्वगण मे जो सुनिथों के कई कुल दोते है उनके साथ किख 
प्रकार वषाव करना चादहिएवा जो स्वगण मे क्रियाकांड की शिथिलता आगर 
हो उसे किस भकार दूर करना चादिपण अथवा श्यपनेदी गण मे जोसाधु 
भत्युपेत्तणादि मे शिथिल होजाच तो उनको किस प्रकार सावधान करना चाहिप। 
इखी भकार स्वगण मे जो वाल दुधैल ग्लानादि युक्त साधु है उनकी किस 
करार वैयावृत्य (सवा ) करनी चादिष्ट इख भकार की गण सामाचारी को 
राच्यं आप धारण करता ह्या अर्पने शिप्य को यथाविधि शित्तित करे 
जव गण्‌ समाचारी का पूर बोध दोजावे तो फिर एकाकि विहार मतिमा 
की समाचायी का शिष्य को ज्ञान कराए क्योकि गणसे पथक्‌ टोकर ही एकल्ल- 
विहार प्रतिमाका ग्रहण हो सकता है वा साधु की १२ प्रतिमा [घतिलाच्मो] के 
धारण करन की यथाचिध विधि काशिष्य को चोध कराण । इतनादीं नदीं किन्त 
उक्त समाचारी को आप धारण करे श्रौर श्रपन शिष्यो को धारण कराए, कारण 
कि सू्ोक्त विधि सर यदि एकट्लविहार प्रतिमा धारणा कीजाए तो परमनि्ज- 
राका कारण दोता है श्रतए्व श्राचा्य स्व रकार से एकल्ल विहार परतिमा 


( १०३ ) 


यर विद्या्थीकी श्चात्माका हित दो उसी रकार वाचना देनी चादिप श्र्थात्‌ 
योग्यता देखकर ही सू्नका श्रथदान करना चादि क्योकि-जिस प्रकार 
भिदी के कच्चे (श्राम) घट (घद) म जल डालने से घट जौर जल दोनोंका 
विध्वंस दोजाता है दीक उसी प्रकार श्रयोग्य व्यक्चिको योग्यता चिना पठन 
कराने से उस व्यक्ति श्रीर क्षान दोनों का विनाश दो जाता दै इसलिए जिस 
भकार उस विया्थीं काश्चन द्वारा दित दो सके वदी कम ग्रहण करना उचित 
है। इस कथन का सारांश यदह टै कि-परन इस लिए कराया जाता है कि- 
कषान की प्राप्ति दो श्रौर चित्त की समाधि (शांति) उत्पन्न कीजाए) जव 
योग्यता सर पठन कराया गया तव उक्त दोनों कायो की सफलता पूरण॑तया 
नदीं दो सकती श्रत्व दित वाचना द्वारा अपना रौर शिष्य कारित करना 
चादिष्ट जव दहितचाचना की समाप्ति दो जवि तव पिर चौथी निशेपवाचना 
द्धाय सय प्रकार सर शका समाधान करना चाहिए तथा भारब्धसत्र की समासि 
के पश्चात्‌ दी न्य सूत्रका प्रारभ करना चादिए श्रथवा परमाण नित्तेप नय 
श्मीर सक्तभगादि के ढासा सूत्रके भावों को जानना चादिए क्योकि-यावन्मात् 
अश्च ह उनके समाधान सथ निशेप वाचना ारा किष जाते है श्रतः निशेप- 
वाचना श्रवश्यमेव पठन करानी चाहिए । इस भकार ध्चतविनय के के जाने के 
पश्चात्‌ व सूत्रकार चि्तेपणा विनय विपय कते टैः-- 
सेरकित बिखेवणा विणए ? विखेवणा विणय चउब्विहे पणत्ता तंजदा- 
दिह धम्म दिह पुव्यगत्ताए विणसत्ता मवई १ दैट्पुव्वगं साहम्मिय- 
ताए विणएत्ता भव २ चुय धम्माउ धम्मे ठावदत्ता भवर्‌ २ तस्सेव 
धम्मस्स दिया सुहाए खमराए निसेस्साए अखगामियत्ताए अभ्युटटेत्ता भव- 


9, 


इ॥४॥ सेत पिखवणा भथवई्‌ ॥ 

श्रथ-(्वश्च) दे भगवन्‌ ! विक्तेपणा विनय क्रिस कहते है ? (उत्तर) दे शिष्य ! 
चि्षेपणा विनयके चार भेद भतिपादन किष गए है जैसे कि-जिन शआ्रत्माञ्मोने 
पद्दिल्त सम्यक्सवरूप घम का श्रञुभव नदी किया उन आत्माश्मोको सम्य- 
क्त्वरूप घय मे स्थापन करना चादि १ जिन्दोने सम्यक्त्वरूप धमे पाप्तकर 
ल्िया है उन जीवों को साधम्य॑तामे स्थापन्‌ करना चादि र जो ध्म से पतित 
दते दों उन्दे धर्म मेस्थिर करना चादिण २ प्नौर सदेवकाल श्रुत श्रौर चासि 
धभ का मत्व दिखलाना चादिप जैसे कि-दे भग्यजीवो ! श्चुत श्रौर चारित्र 
धम हितकारी ह, खुखकारी है, समथ है, मोक्तके लिये सुख्य साधन है, जन्म 
२ मे साथ चलनेवाला दै । अतएव इसको अवश्यमेव धारण करना 
चाहिए ॥४॥ 


{( १५५ ) 


शथ--( पर्न ) दोप निधीतना विनय किसे कदते है ?( उत्तर )दे 
क्षिप्य ! द्रोप निधौतना चिनय के चार मेद्‌ प्रतिपादन करिए गण ह ज्ञेसे कि- 
क्रोधीकेफोधको दूर करना चादिष ६ दुष्टकीदुष्रताको दूर करना चादिपर 
कांक्तित पुरुप की श्राकांक्ता पूरी करनी चाहिए ३ फोधादि सर रदित शुद्ध श्नौर 
पविच्र श्चत्मा वनानी चादिए श्र्थीत्‌ खधरिदितात्मा दोना चादिण इसी का 
नाम दोपनि्धीतना विनय हे ॥ 
सारश--शिप्य ने परश्न करिया कि-दे भगवन्‌ ! दोप निर्धीतना विनेय 

फिसे कते हे श्नौर इस के कितने भद दहे? इस परए्न के उत्तरम गुरु कदने 
लगे कि_हे शिप्य ! दोप निघौतना विनय उसीकानाम हैजिसखकेद्धारा 
श्ात्मा से दोषों को निकाल वादिर किया जाप्ट इसके मुख्य चार भद द जेस 
कि-जिनको कोध करने करा विश्षेप स्वभाव पड़ गया हो उनको कोधका 
कटुफल दिखलाकर तथा खदु श्नौर भिय भापण द्वारा फोधको दूर करदेना 
चदिए ्रथीत्‌ जिस करार उनका क्रोध दूर दो सके उसी उपाय से उनका 
कोध दूर कर देना चादिष। जिस भकार विप भी युकरतियों सेश्नौपधीके रूप 
को धारण करता श्रा श्श्तरूप दो जाता दै ठीक उसी प्रकार क्रोधरूपी 

विपक्रो शाखीय रित्ताश्रों द्वारा शांत करना चादिप तथा जिस प्रकार दावा- 

नल को महा मेघ श्रपनी धारा द्वारा शान्त कर देता दै टीक उसी प्रकार 
ग्ाखीय उपदेशों दारा कोध को शान्त करदेना चाहिए १ इसी प्रकार जो 

व्यक्ति क्रोध-मान, माया श्रौर लोभद्धारा दुता को धारण कयि हुषो उस 

की भी शाखीय रित्ताओं छारा देता दूर कर देनी चादिणए 1 इसका तात्पर्यं 

यह्‌ दहै कि-जिस व्यक्ति को दुता धारण करने का स्वभाव पड़ गया दो उस्र 

के स्वभाव को शान्तं भावों से वा शित्ताघ्रों दाराशीक करना चादिएर। इसी 

पकार सयम निर्वाह के लिए जिसको जिस वस्तु की ्राकात्ता दो उसकी 

्ाक्रत्ता पूरी कर देनी चाहिए । न्न. पानी. वख. पा वा पुस्तक की श्राकांक्ति 

द्मथवा विहारादि की श्राकांक्तञा सो जिस भकार की सयम विपयक्र कांक्षा 

हो उखकी पूर्त्तं मे चरावर खहयोय देना चाद्दिपए तथा यदि किसीके मनमे 

प्रवचन के चिपय शेका ष्टो तो उसकी शंका का समाधान भल्ली प्रकारसरे कर 

देना चादिष्ट क्योकि शाख मे लिखा हे कि-शोकायुक्त मात्मा को कभी भी 

समाधिकी पराति नदीं दो सकती. अतप्व शका श्रव्यमेव छदन करनी 

चाददिपए ! शका रदित होकर फिर चह श्रात्मा शासखरोक्त क्रियाश्नों मे निमग्न दोता 

द्व्या कोघ. मान, माया च्रौर लोभरूप श्चतरंग दोपों सरे विमुक्त दोकर सुभ 

िष्टितात्मा हो जाता द अर्थात्‌ उसका ्रात्मा सकल दोपों स रदित होकर 

शुद्ध श्नौर पवि होजाता है 1 इसीका नाम दोपनिधौतना विनय है ॥ 


( १०७ ) 


उपकरण को उःंपन्न करना ह श्रौर उसके मुख्य चार भद्‌ हजेसे कि--जो 
उपकरण पने गच्छुमे नहो उसको उत्पन्न करना १ सयम के निर्वाद के 
लिपट जिन पदाथ की श्रावशयकता रती है उसे उपकरण कते है । जसे 
कि-वस्व, पाच, पुस्तकादि जो वसखरादि पने गच्छमे नद उन्द्‌ गच्छ 
चासी साधुश्रौके लिये उत्पन्न करने चादिं । 
उक्त फार्यं प्राचार्य स्वयं करे किन्तु यदि श्राचार्य श्रान्तद्ोगया हो चा उसकी 
स्वाध्यायादि क्रियाश्र मे विध्न पडता दो तो शिष्य स्वयं गच्वासी साधु्रोके 
लिय श्रयुत्पन्न उपकरण को उत्पादन करे १ जो प्राचीन ( पुराना) उपकरण 
दो उसे सरद्तिति रखना चादिप यदि उपकरण जीण टो तो उसे गुप्त रखना 
न्रादिए क्योकि पुराणा चा जीणे उपकरण सरत्तित किया ट्श्रा फेर पहि 
रने म श्रासकता हे क्योकि जीणंदि उपकरण सोप हुप वपौकालादि के समय 
प्रयोग मे श्रासकते दै २ जिस साधु के पास श्रटप उपकरण दों उसको पपन 
निश्राय का उपकरण देदेवे जिसंसर उसका श्रात्मा स्थिर टोजावे कारण कि 
खरश्चित होनेसे दी गच्छुका महत्व वद्‌ जाता है न्नौर पसे खयोग्य चाचा के 
गच्छ म निवास करेत हप साधु श्रपना कट्या कर सक्तं दहै २ जय कभी 
चस्ादि उपकरण के विभाग करने का समय उपस्थित हो तव यथायोग्य उप- 
करण द्वेना चादि । वड़ो बड़ के योग्य श्रौरछोटे को उसके योग्य उपकरण 
देना उचित द ॥ इखी का नाम उपकरण उत्पादन विनय दहै ॥ अव सूत्रकार 
इसके ्रनन्तर सहायता विनय विषय कदते दः-- । 
सेर्वितं साहिल्लया ? साहिल्लया चराच्विहा पण्णत्ता तंजहा-अरणलोम- 
वद्‌ सीहतेयायि मवइई १ अरणुलोमकाय किरियत्ता २ पडिरूबकाय 
संफासणया ३ सवत्थेसु अपाडिलोया ४ सेत साहिल्लया ॥ 
छ्रधै-(धन) सहायता चिनय किख कहते है ? ( उत्तर ) सहायता विनय के 
चार भेद ह जैसकि-श्यु क्ल वचन चोलना वा बुलाना चादिए १ अचुदरूल 
काय दास अन्य व्यषितयों की सेवा करनी चादिपः२ जिस पकारः प्रस्य 
व्यक्चियो को श्रपने डारा खख पहचसक्रे उसी प्रकार उनको यथाविधि खुख 
पड्चाना चादि २ सथ काथ करते इए ऋजुता धारण करनी चादि अथात्‌ 
मिथ्याभिनिवेश न करना चाहिए ॥४॥ सो इसे ही सदायता विनय कदत दे । 
सासंश्--शिण्य ने ध्न करिया कि- हे भगवन्‌ ! सहायताविनय किसे 
कदत द श्नौर उसक्रे कितनेभद ह ? इस के उत्तर मे गुरु कदने लग फि-दे ल्ति- 
प्य ! छन्य भ्राशियों को खुख पटुचाना नौर उनके दुःख की निच्त्ति करना उस- 


(ज ( 


का नाम सहायताविनय दे! इस विनय के चार भद्‌ दै जैसकि-प्रत्यक भारी 


( ६०६ ) 


अर्थात्‌ तिरस्कार वा उपालंभादि द्वारा उनको सुशिक्षित करना २जो 
व्यक ्राचा्यीदि के यथाथ गुणों का गान कस्ते द उनका धन्यवाद चा उनक 
सद्गुणो का प्रकाश करना ३ जो मदाव्यक्घि श्रात्मिक गुं मे पूरी है उनकी 
सवा करना क्योकि उनकी सेवा सर आत्मिक गु की पाति टो जाती दै! इस 
पकार वरीसज्वलनत। का. वणन करत हुए श्रव स्कार भारधत्यवतारणता 
विनय के चिपय मे कहते दै.- । 
सेकिंतं भारपचोरूहणया १ भारपच्चोरूहणया चडउव्विहा पण्णत्ता 
तजहा--अरसंगहीयं परिजण संगहित्ता भवह १ सेई ्रायारगोयरगाहि- 
त्ता भवई्‌ २ साहम्मियस्सागेलायमाणस्स अहाथामं वेयावचे अभ्युष्टित्ताभवड 
३ साहम्मियाणं अहिकरणंसि उप्पण्णं स तत्थ अरणिस्सितो वसिएवसितो 
अरप्पक्खग्गाही सज्कत्थ भावभूए स्ववहारमाणे तस्साहिकरणस्सखामण- 
विड समणयाए सयासामियं यभ्थुटेत्ता भवई करंतुसाहम्म्यिा यरप्पसदया अप्य 
भभा ्प्पकलहा अप्प कसाया अप्पतुम॑तुमा संजम बहुला संवर बहुला 
समाहि बहुला अष्पमत्ता सैजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणणं एवंचयं 
विहरेज्जा 1 ४॥ सेत भारपच्चोरूदणया एस खलुसा थरेहिं मगरे 
ग्हविहा गणिसपया पण्णत्ता ्िवेमि योत्थिया दसा समत्ता। 
श्र्थ-- (परश्च) हे भगवन्‌ } भारपरलयवतारणताविनय किसे करते ह ? 
(उत्तर) दे शिष्य ! यदि ्राचाय गच्छं केभारको शिप्यके सपु कर देउसका 
नाम भारपत्यवतारणता विनय दै । उसके चार भद्‌ प्रतिपादन किष गए 
जेस कि - शरसगरहीत को सण्दीत करना १ शिष्य को ञ्राचार गोचार सिखाना 
२ ग्लानिक स्वधर्म की यथाशक्ति वैयाृस्य करना ३ सधर्मक व्यक्तयो मे 
केश उत्पन्न दोजाने पर नित्त होकर माध्यस्थ भाव धारण करके सम्थग्‌- 
धकार स श्चुतव्यवहार को भ्रयोग मे लाकर क्लेश को शान्त करेन के लिए 
सदेवक्राल उद्यत रहना ताकि ष्ण के स्थान पर समाधि उपारस्थत दो ४। 
फिर श्रपरमत्त होकर संयम ओर तपके द्वारा श्रपनी अ्रत्माकी भावना 
चिन्तन करता श्रा विचरे । इस धकार उक्त विनय का पालन करना भार- 
परत्यवतारणता विनय का जाता ह । 
सारषए--शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन्‌ !} भार यत्यचतार्णता विनय 
किसे करते है श्रौर उसक्रे फितने भेद प्रतिपादन क्षिय गए दै ? इसके 
उत्तर मे गुर ने प्रतिपादन करिया किदे शिष्य ! जिस प्रकार राजा अपने 


( ९९१९ ) 


है जैसेकि आट संप्दोके चार २ भेद, स्वै भेद पकच कसेने से 
३२ टुप्श्नौर चार अकार फी विनय प्रतिपत्ति के मिलान से ३६ गुख दोजते 
दै परन्तु मन्तव्य यद दै कि~च्राचायै समग्र गुणो से संयुक्त दो ताकि 
रण॒ की सम्यग्‌तया सत्ता कर सके क्योकि गुणों मे पक स्वा- 
भाविक शक्ति दोती दै जो श्रन्य व्यक्तियों को स्वयमेव श्राकर्पित करलेती हे 1 
जिसप्रकार गच्छमे श्राचार्यं मुख्य माना जाता है दीक उसी प्रकार द्वितीय 
श्कपरः उपाध्याय का नाम है । गच्छ के मुनियोको सुयोग्य वनाना नथा 
योग्यतापू्यैक उनको श्चताध्ययन कराना यदी उपाध्याय का मुख्य प्रयोजन ह । 
च्योकि--श्वतपुरुपके १९ एकाद्शांग श्रौर १४ पूं अवयवांग दै । उपाध्याय उन 
श्रगों वा पूरवौको श्राप पे श्नौर परोपकारके लिये श्नन्य योग्य व्यक्धियो को 
पदप । यदी सुस्य २५ गुण उपाध्याय जी के है ! इखका सूल कारण यह है 
कि~-स्थानांग सूज के दवितीय स्थानमे लिखा है कि-अनादि ससार 
चक्र से पार होने के लिप श्री भगवान्‌ ने दो भागे वतलाप है भर्थात्‌ 
दो स्थानो से जीव श्रनादि सेखार चक्र खे पार दोजाते है जैसेकि-- 
“विलाप चव चरिते चव"' विद्या श्रौर चारि से ! इस कथनका सारांश यद्‌ है कि- 
जवतक सद्‌ चा श्राध्यात्मिक विद्या सम्यगूतया उपलन्ध नहीं दोती तवतक 
धार्मिक विपयों मे भी परतया निपुणता नदीं मिल सकती 1 धार्मिक विपर्यो 
मे निपुणता न होने पर फिर श्चात्मा श्मीर कर्मौका जो परस्पर त्ीरनीरवत्‌ 
सम्बन्ध दोरदा है उखका बोध किंस पकार दोसकता दे । यदि कम श्नौर श्रात्मा 
के चिपय मे छ्नभिक्षता है तो फिर उनके प्रथक्‌ २ करने के लिपट यत्न किस 
प्रकार किया जायगा ? अतएव प्रथम श्चतविद्या के अध्ययन करने की अत्यन्त 
श्मावश्यकता है । जव श्चुताध्ययन भटी प्रकार से होगया तो फिर उसश्चत से 
निश्चित किये इए कर्मके सम्बन्ध को श्यात्मा सर पृथक्‌ करने की श्रावश्यकता 
प्रतीत होने लगती है सो जो करिया आरामा सर कमो को पथक्‌ करने के लिये 
धारण की जाती दहै, उन्दी का नाम चारित्र है! ्सीलिए शास्जकारने पिले ही 
यदह प्रतिपादन करदिया है कि- चिद्या चौर चारेज से आत्मा ्ननादि ससार 
चक्रसे पार दोजाते दै । इख शुत के रध्ययन कराने के लिये उपाध्याय पद्‌ 
नियुक्त किया गया दै 1 लि 

उपाध्याय जी के २५ गुण कथन किए गए हे जेसांके-११९ अगशास्ञ 
श्नौर चतुदश ९४ पूर्वं 1 एवं शचतक्ञान के २" सख्य शास्यो को राप पठे श्रौर 
अन्य योग्य व्य्कियो को पडावे जिससे श्तज्ञान द्धाय अनेक भव्य पाणियों का 
कल्याण दोखके । श्च भव्य जीचों के प्रतिवोध के तिये पटल श्गशशास्नो कां 
किचित्‌ परिचय दिया जाता है 1 


( १६३ ) 


२ सूजकृताह्न सूत्र - इस सूत्र के दो श्तस्फन्ध हे ! परथमश्रुतके १६ 
प्भ्ययन हे । दितीय श्रुतस्कंधके सात श्रध्ययन हे--श्नौर ३३ इस सूत्रे 
उदेशतदे ।इसम इख लोक शरीर श्रलोक् की सूचना है । इतनादी नदीं किन्तु 
जनमत के स्याद्दाद्‌ मतानुसार जीव वा शछ्यजीव की बड़ी विस्तार सर व्याख्या 
कीगहेदे। साथी परमतकेममि हुप अनेक मतोका दिग्दशंन कराया 
गया दे । एवै उन मतो मे जो चुखिये हे उनका भी दिग्दीन कराया गया है । श्रन्त 
भे निचा प्राप्ति के लिये पडत पुरुषाथ करना चाहिए, इस विपय का विपद्‌ 
उपदशश क्रिया गया दे । ३६ सहस्र (३६००० ) इस स्न के पद्‌ है 
इस सूत्र का उपांग राजग्रश्नीय ख हे । इस सूचम महाराज प्रदी के मने 
हए नारितक मत का स्वरूप कथन किया गया हे ध्रौर साथ दी भगवान्‌ श्री 
पाद्वनाथ जी के रिप्यावुशिप्य श्री केशीकुमार श्रमण के सथ जो महाराज 
पदशी के नास्तिकमत सम्बन्धी प्रश्रोत्तर दप दैवे भी दिखलाएट गणएहे। 
तदनन्तर महाराज परदेशी ने जव शआ्स्तिकमत अह॒ कर लिया च्रौर 
फिर सम्यमतया श्रचक ध्म का पालन किया उसका फलदेरा भी 
भली प्रकार सर दिखलाया गया है । जेनमत वा परमतके स्वरूप को 
जानने के लि सुमु जनों कै हितार्थं यह सूत्र त्यन्त उपयोगी है ! 

२ स्थानाङ् सूत्र-दइस सूच मे पदाथा के भावोंका दिग्द्श्ैन कराया गया हे 1 
एक स्थान स लकर दश स्थानतक प्रत्यक पदार्थं के सख्रूप को पतिपादम किया 
गया है। साथ दी सामान्य वा विशेप तथा पत्त परतिपत्त पदार्थो का स्वरूप 
दिखलाया गया है । ससार म यावन्मात्र पदाथ हे चे परतिपक्ती पदाथौके होने 
स दी प्रपनी सत्यता सिद्ध करत है यथा-यदि जीव पदाथे है तव उसी का 
प्रतिपक्त अजीव पदाथ भी दे! श्रजीव पदाथ के मान्न पर्दी जीव पदाथ 
की सिद्धि की जासकेमी, जिस भरकार किखीने कदा कि-यर वडा विद्धान्‌ दहे, 
पेखा तभी कदा जायगा जव कहनेवाल्को मूर्खोका भी वोध होगा। 
इसी भकार जव किसीने का कि श्रमुक पुरुष वड़ा धनी है तव विचार- 
णीय विषय यहद कि धनी तभी कदा जासकेगा जव कदने वाल को निर्धन 
काभी कान दोगा । इसी क्रमसे प्रत्येक पदाथ पक्त प्रर प्रतिपक्त के 
कारण अपनी सत्यता रखता दै जेखेकि-जीव-अजीव, लोक-प्रलोक 
पुरय-पाप, आध्रव-संवर वेदना-निजेरा, वंध-मोत्त, तथा रस-स्थावर 
क्तद्ध॒श्नौर ससार, इत्यादि कमस दश स्थानोंतक पदाथ का इस 
सूच्मे वरन कियागयादे साथी स्वमत, . परमत, चट, नदी हदादि 
का वडी विचित्र रचना सर विवेचन किया गयाहे । रूस सून ` का केवल 


[व 


पक दी श्रुतस्कन्ध है श्नोर द्व श्रध्ययन दै किन्तु इसके उद्धेश २९ दह । 


(4. 


उत्तरम श्री भगवान्‌ ने प्रतिपादन किया, ज्य॑ती } चहुत से श्रात्मा वलवान्‌ 
प्रोर वटुत से परात्मा निवल दी रच्च होते है! इस प्रकार कदे जान के पश्चात्‌ 
फिर जयंती ने शका उतपन्न की किदे भगवन्‌ ! यद्‌ वान किस प्रकार सिद्ध 
टोसकती है ? इस के समाधान मे थी भगवान्‌ ने फिर पतिपादन क्रिया एकि दे 
जयंती ! न्थाय पक्ती वा न्याय करने चाले जो धर्मरूप श्रात्मापे है चे वलवान्‌ ही 
श्रच्छ दोते है क्योंकि-उनङ़ वलयुक् दोने से पाप कर्म निल दोजायगा {जिस 
स्र वहत सर पारियों को छख प्राप्त दो सकेगा । जव अधमास्माच्मो का चल वद्‌ 
जायगा तव पाप कर्म टी वदता रहम । रतदव धमता लोग वलवान्‌ श्नच्छे 

होते दै च्रौर इसके प्रतिकूल पापात्मा निर्वल दी श्रच्छ दोते है कयोकि-उनके 
निर्बल होने से पापकम भी निवल रोजायगा 1 इस भकार पत्यक प्रश्नोत्तर सरदट- 

तया मतिपादन किया गयाहै 1 इस सूतके २८८०००पद्‌ दै । मत्येक पदमे प्रश्चोत्तर 

भरे दए है । पायः सध प्रकार के प्रश्नों के उत्तर री वीर भगवान्‌ के सुखार्विद्‌ 

से निकले दुः दे \ इसलिये प्रस्थकः प्रश्नोत्तर श््तिमिक शति का उदो चक दै शौर 

श्रलैकार से युक्त दै । फिर इसी सूत्र का उपांग सूयपरनसि है । जिस मे सूर्य 

की गति श्रादि का वरन है इसे ज्योतिपका शास्व माना जाता दै । अतप्व व्या- 

स्याक्न्िखत्र योग्यतापू्क प्रत्येक भारी को पठन करना चादिप ॥ 

६ क्षाताधर्मकथांगसू्--इस स्मे क्ञातए-दांतादि के ढास धर्मकथा 
का वरन किया गयादै। इससूकेदो श्त स्कंघदह | प्रथमश्चुतके १६ श्अध्याय 
हे । प्रत्येक श्रध्ययन रिता सभरा दुश्मा दे! सादी प्यक अध्ययन का 
उपनय ठीक प्रकार सर प्रतिपादन किया गया है जेसेकि-्री भगवान्‌ महावीर 
स्वामी स श्रीगोतम स्वामी जी ने प्रश्न किया कि-दे भगवन्‌ ! जीव लघु ^ इल- 
का) प्रौर गुरु( भारी) किंस प्रकार होता है ? इसके उत्तर मे श्री भगवान्‌ 
ने प्रतिपादन किया किदे गौतम ! पापकर्मौ के करते स जीव भारी दहो जाता 
हे फिर उन्दी पापकम से निचरत्त दो जाने से जीव दलका होजाता है । जिस 
भकार अलांवू ( तूवा ) म्द शरोर रज्जु के वधनोंसरे भारी दोकर 
जलम इव जाता है परंतु जव उस तुचे के वैधन दूटं जाप तव वह निर्च॑घन 
होकर जल के ऊपर ्राजाता है दीक इसी पकारः हिसा, श्रसत्य, चोरी, मेथुन 
श्मौर परिग्रह, क्रोध, मान, माया भ्नौर लोभ, राग तथा द्वेष, केप, घ्राभ्या- 
ख्यान ( कलक ) परपरिवाद्‌ ( निदा ) पिश्चनता ( चुगली >) रति श्नौर अरति, 
माया, खषा कौर मिथ्यादशीनशस्य इन पाप कमो के करने से जीच भारी टोजाता दै! 
जव उक्त पापकम सर निचत्ति दो जाती है तव जीव तूचकचत्‌ मुक्तवधन 
होकर निवाणपदकी धा्ि कस्लेता है । इस प्रकार श्रथम टत स्क्धमे १६ 

घार्भिक टण्ान्त वरन कयि गणदे। 


ऋ. 5) 


केयलक्षान का प्राणश्च न कर सके फिन्तु निवीरपद्‌ की प्राक्षि कर ली जैसेकि- 
श्री गजसुकुमार आदि महर्पिं दुष दे । इस प्रकार के मदार्पियो के जीवन चरित 
इस खत्म प्रेय गप इस सूज का केवल पङ दी श्चुतस्रन्ध दहै श्रौर श्रा 
वश दै । २३०४००० इस के पदो की सस्या है श्रौर निस्यावङी सूत्र इसका 
उपांग है । रस उपांग म मदाराजा कराशिक श्रौर चेटक राजा के से्राम का वरीन 
दै। साथ दही नवमद्ली जात्ति के नौ राजे श्रौर नवलच्छी जाति के महार्जे 
सवं ६८ गणराजों क{ भी वरन करिया गया हे । 
श्राजकट जो लोग नृतन से नूतन सां्राभिक श्राविष्कारों को देखकर 
श्राश्च्यं प्रकट करते दे । उक्त सूच का श्रभ्ययन करन से उनको यह्‌ भली भ्रकार 
स विधित दो जायगा फि-पटिले समय मे भी यदह भारतवर्ष भ्येक शेरप- 
कला मे चढ़ा चदा श्रा था क्योंकि-उक्त सूत्र मे एक रथमूशल सच्राम का 
चरन करते हुप कथन किया गया है क्रि महाराजा काशिकं ने एक यन्न देसा 
तय्यार फिया था कि-जो र्थाकार धा परन्तु उसमे श्रश्वादि कु भी नदीं लगे 
हप थ । जव वद शु की सेना मे छोड़ दिया गया वह अपने श्राप लाखों पुरुषों 
का सदार करता हुश्राचासेंश्रोर परिश्रमण करता था। इसी पकार वज्रशिला कंटकः 
स्राम काभी वणन किया गया दै । कदलोग कते हे कि-भारतवप म पदिले 
लिपिनदींथी। दस सूच के श्रध्ययन करने से यदह वात भी निमूल सिद्ध दोजाती दै । 
६ श्रु चरोपपातिकदशङ्गसूत्र- इस सृतम जो व्यक्षिं तप संयम के 
वल से पिजय, वैजयन्त, जयन्त, श्रपराजत श्रौर सवीथसिद्ध नामक पांच 
श्दुत्तरविमानों मे उत्पन्न हु दहै उनके नगर, राज्य, माता पिता, वनसा 
का वरन किया गया रै । तथा जिस भकार उन श्रात्माच्चों ने परम समाधिरूप 
तपकम धारण किया उस तपक्रभैकाभी दिग्द्शंन कराया गया । ज्ञेते 
काकंदी नगरी के रने वाले धन्नाकुमपर जीके तप का विवरण दै जो पछ 
भव धारख कर मोत्त गमन करैमे। उस जन्म के भव काभी वंन क्रिया 
गया इ जैसेकि-अआ्यकुलादि मे जन्म धारण, फिर महासुनियों की सगति 
डारा धर्म्रा्ि, दी्ता्रहण शौर श्चुताध्ययन तथा तपोकर्मं स्ते केवलक्तान, 
श्रत निरवाणपद की धासि का वरीन किया गयादै। इस सत्र का एक श्त- 
स्कन्ध-श्नौर तीन व है । ४६ लक्त राट हजार इसके पदो की सख्या है । इसका 
उपांग कटपवत्तसिका सचदं॥ 
१०-प्रश्चव्याकसण सृत्र-दस सूच मे पृष्ट श्रौर श्रपृष्ट सेकडो भश्चो का 
तथा शनक भकार कयै चमत्कारिक चिदाश्रों का दिग्दिशैन था ज्ञेसेकि-मन पञ्च 
विया तथा देवताश्रों के साथ वादं करने की विधि, श्रगु परश्चादि विदयाश्रोंका 
भी वशीन था परन्तु श्राजकल उक्त सू मे केवल पांच शआ्राश्रव, जेसे-दिसा, 


( ६१९६ ) 


ह जैसेकि- संकलित १ व्यवकलित २ गुणकार ३ भागकार ४ वर्म ५ घन £ 
चभमूल ७ घनमूल ८ श्रघसमच्छेदकरणं ९ समच्छेदमीलन १० भिन्नगुसाकार 
६९ भिन्नभागकार १२ भिन्नविचार १२ भिन्न घन १७ भिन्नवर्मसूल १५ भिन्नधन- 
मूल १६ इन सन्नो के छारा फिर ७ पकार के परिक्रमों का विस्तारकर दश्वा. 
दांग के ग्रथममेद्‌ की समासि कीः दै । 
दष्िवादांग का द्वितीय भेद खू्रूप दै--इस भेद मे स्द्रव्यपयीयो. नयो 
चाभेगोंके आराधित होर ८ सूञोंका विस्तार किया गयादै॥ 
दशिवादांगसूञर का-पूर्वनामक ठतीय भेद है क्यो कि-जव तीर्थकर देव ग- 
धरादि को दीनता प्रदान करते है तच चे दीत्ता ठेकर त्रिपदी मत्र के (उत्पात्‌-व्यय- 
भोग्य) पदिले चतुर्दश पूर्वो के क्षान का अनुभव करते हे । इसलिये इनकी पूर्व सल्ला 
दे ।उन पूवो के नाम निद भकार से वरन किये गप है । जेसेकि-उतपातपव-इख पूर्वमे 
सच द्रव्य श्रौर सर्व पर्यायों को श्रधिकृत्य करके सच पदार्थों का चशन किया 
गया है । ९ कयोडङ्‌ पद, दश वस्तु श्रौर चार चूलिका चस्तु इस फे श्रध्ययन वि- 
शपे! यदि इस पूर्य को लिखा जायतो पक दाथी के यमाण मपौ (स्यादी) 
लगती हे । यद अनुभवी कषान दोता है परन्तु लिखनेमे नदीं ्रासङ्ता ! इसी भकार 
श्ागे भी जानन्तना चादिष्ट । दाधथियो को सस्या आगे दुगरी दोती चली 
जायगी । २ श्य्रायसुीयपूद--इस परयै मे सयै द्रव्य तैर पयाय श्नौर जीव विप 
सध द्रव्यो का सविस्तर चशन किया गया द । (च्म परिमाणं तस्य अयन गमन 
परिच्छेद इत्यथ. तस्मै हितं श्याम्रायणीये ) अ थात्‌ सव दन्यो शौर पयीयोंका 
भेद्‌ विस्त किया टश्या है । इस पूय के ९६ सदस पद्‌ है, १४ वस्तु ध्रौर १२ 
चूलिका वस्तु टै परन्तु लिखनेमे दो दरस्तिपरिमाण मपी लग सकती है ॥ 
३ वीयेप्रवाद पूव -दइस पू में सर्वं द्रव्यो के वा सवै पयायो के तथा स्च जीवों के 
चीयै की व्यास्या की गई है छीर द वस्तु तथात दी चूलिकावस्तु है ! सतति 
सहस (७० हजार ) इसके पदों की सख्य ए है । स्याही का परिमाण श्रानेस 
दुमुखा करत चले जाना चाहिए तथा त मे सय परिमाण दिया जायगा, 
४ श्रस्तिनास्ति प्रवाद्‌ पूवै-इस पू मे सवै द्रव्यो के श्रस्ति वा नास्ति भवोका 
चणेन किया गया है, क्योकि-सवे दन्य निज गु रे की श्रपक्ता तो अस्ति भाव 
फे धारण करने बले है परन्तु पर गुरो क्पे छरपेत्ता देखा जाय तो इनमे नास्ति- 
भाव भी उदर जाता है । ्रतपए्व इख पूरय मे अस्तिभाव ध्नौर नास्तिभावका 
सविस्तर कथन किया गया है । ८ वस्तु छोर दश चूलिकावस्तु इस पूर्य के हे ! 
६० लक्त इसके पदो की सेख्या ह । ५ जलन प्रवाद पूवै-इस पूरव मे ५ ज्ञानो की 
सविस्तर व्यपप्या की गई है तथा ज्ञान वा अक्ञान के मेदो का पूर स्वरूप धत्ि- 
पादन किया गया दै । ९२ वस्तु है श्नौर एक करोड़ इस पूय के पदों की सस्या 


( १९ ) 


दी रेचक, पूरक यर ऊुभक तथा द्रव्य चनौर भाव प्राणायाम का वशेन 
किया गया दै । याचन्मात्र शरीर मे वायु है उनकी गनि वा उनका निरोध, 
साथी निरोध का शारीरिक वा श्रात्मिक फल इन सव वातोंका विस्तार. 
पैक चरन किया गया द । दस पूर्यके १३ वस्तु है श्रौर एक करोड़ ५६ लक्त इस 
के पदों की सख्या दै } १ भियाविशरुपूयं--इस प्य मे यावन्मात्र क्रियाप हे उन 
खव का सविस्तर स्वरूप वणन किया गयादै जेसे कि~करायिकी क्रियादि तथा पट- 
क्रिया, छुन्दक्रिया, सारांश इतना ही हे कि--क्रिया शब्द की व्याख्या भली 
पकारसर कीर हे श्रोर स पूव के ३० वस्तु हे तथा नव करोड़ इसके पदों की 
सख्या हे 1 ९६ रोकनिन्दुसार पृ्च--लोक मे विन्दुवत्‌ सारभूत पदार्थो के वरन 
करनेवाला यद पूरय दै क्यो कि-जिसधकार च्र्तर के मस्तक पर चिन्दु सारभूत 
होता है टीक उसी प्रकार जगत्‌ में यद पूर्य सारभूत श्रौर इस पूयै के २५ वस्तु 
हे तथा सादे वार्ह करोड़ इस के पदौ की संख्या है । इख भकार सत्तेप स 
१४ पूरवो के समास चिपय चरन किया गया दे ॥ 
सोलद दजार तीनसौो ८३ दाधथि्योके भमा मपी यद १४ पथे लिखे जाति 
टे परन्तु यद पूरवो के क्षान विपय उपमा दी गर है परंच यद विद्या लिखने मे 
नदीं श्रासक्ती ! यदह खव विद्या केव श्रञुभव के विचार पर ही प्रवलस्वित दै । 
दरस पकार दण्रिवादांग के ततीय मेद्का वरीन किया गया है । चतु मेद्‌ 
श्रुयोगरूप दे । सो वह श्रदुयोग दो प्रकार से वर्णन किया गया है । ज्ञेसकि 
मूल परथमाडुयोग, प्रौर गडिकाञुयोग-९ मृर प्रथमलयेग-मे तीर्थकरों के पूर्य 
जन्म का वृत्तान्त, जिस जन्म मे उनको सम्यक्त्व कालामद्ुश्राउसर जन्म से 
लेकर उनक सवै जन्मो का अधिकार, स्वर्गीय खुख, स्वग की श्राय का परि- 
माण, वहां स च्यवकरः माता के गभ म श्राना, फिर जन्म, देवों डढास जन्मो- 
त्सव किया जाना, फिर योग्य वस्था टोजने पर दीत्ता, विहार, तपोविंश्चप, 
केवलोत्पत्ति, जिनपद्‌ भोगः सिद्ध गमन इत्यादि विषयों का सविस्तर वशेन 
पायाजाता है । इतना दी नदीं श्रीसलध की स्थापनादि विप्योंका भी 
उल्लेख द ! २ गटिकानयेग-दइस श्रजुयोगमे कुलकरो, तीथेकसें, चल्देवों, वासुदेवो, 
गरधरों, टरियश रादि कुलो की गेडिकाश्चोका वशेन किया गया है । यद ्नु- 
योग येतिदासिक दृष्टि सर वड़े मदत का है क्योकि-सव विपयों का वदी 
चिचिच्न रीति सर वरन किया श्या दै । उक्त श्रज्ुयोग दोनेसे यह टण्टिवादांग 
करा चु भेद ह । पांचवां भद दश्िवादांग का चूलिकारूप टै च्योकि-जो 
परिक्रम खर श्रर पूत तथा श्नजुयोग मे वशन किया गया है उन सचका सारा 
चूलिका भकरण॒ मे प्रतिपादन किया हुमा दोतता दै 1 सो यद्‌ खव भसंगवश लिखा 
गया है परन्तु ११ एकाद्तांगशास्च च्नौर चतुर्दश पूर्वं यद सव मिलकर २५ दोते द ॥ 


{ १२३ ) 


सम्यमृतया गच्छुंकी रक्ता करने से निवरापद की निश्चय ही भास्षिकरलेतेहे। 
प्तप उक्र दोनों उपायिधारियों को योग्य दे कि~-चे श्पने क्तैल्य को ठीक 
तौर पर पालन कर शोर शनक भव्य श्रात्माश्रों फो धमे पथमे स्थापन करके 
कट्या के भागी यने । सो गुर पद मे च्राचार्यं श्रैर उपाध्याय का वर्णन कयि 
जने पर श्रव साधु चिपयमे कदा जाता है । ययपि साधु पद्‌ म श्राचा्य श्रौर 
उपाध्याय दोनों ही गार्भेत दै तथापि उपाधिके चिशपदोने सर इनका पृथक्‌ 
चरन किया गया ट । परन्तु साधुपद कै गुण सवमे प्क समान दी दोते दहे ॥ 
सत्तावीरस् अणगारणुणा पणत्ता तंजहा-पाणाईवायाओ्रो वेरमणं 
मुसावायाश्रो वेरमणं अदिनादाणाग्रो वेरमणं महुणा्रो वेरं परगगहा- 
श्रो येरमणं सोईदियनिग्गहे चक्िदिय निर्ग घाणिदियनिग्गहे जिन्भिदिय 
निर्ग फासिदिय निग्गदे कोहाधैवेगे माणियेगे मायाविवेगे ल्ोमाधिवेगे 
भावसचे करणसचे जोगसचे खमा विरागया मणसमाहरणया वयसमाहर- 
या कायसमाहरणया शाणसंपणणया दंसण संपण्णया चरित्त संपण्णया 
वरथण श्रहियासणया मारणंतिय श्राहियासरया ॥ 
समवायाग सूत्र स्थान २७ वे।॥ 
टीका--सप्तविगशति स्थानमपि व्यक्तमेव, केवले पद्‌ सू्ाणि स्थितेरवौच््‌, 
त्र श्ननगाराणां - साधूनां शुः चारि विशेष सूपाः अनगारणणा तत्र महा- 
तानि पञ्चिन्द्रियनिश्रदाश्च पंच क्रोधादि विविकराञ्चत्वार सत्यानि बीरि तत्र 
भावसत्यं शु द्ान्तयत्मना करणसत्यं -यत्‌प्रतिलखनाक्रियां यथोक्कां सम्यगुप- 
युक्तः कुर्ते योगसत्यं--योगानां-मनः पश्चतीनाम वितथत्वे १७ त्तमा श्ननभिन्य- 
क्क फो धमानस्वरूपस्यदेपसजितस्याप्रीतिमाजस्याभावः थवा कोध मान- 
योरुदय निरोधः कोधमान व्विकशब्दाभ्यां तदुदयप्रा्ठयोस्तयोनिंरोघः भरगि- 
वाभिदित द्रति न पुनस्क्रता । श्भ्रीविः १८ विरागता शभिष्वङ़ मात्रस्याभावः 
थवा मायालोभयोस्नुदयो माया रोम विचेकशब्दाभ्यां तूदयप्राप्तयोस्तयोरनिं- 
रोधः प्रागमिदहित-इतीदापि न पुनरुक्तेति १६ मनोवाक्ायानां समाटरणएता 
पाटान्तरतः समन्वाहरणता-कुशलानां निरो धास्वयः २२ ज्ञानादविसखपन्नतास्ति- 
स्रः २५ वेदनातिखहनता-शीतादि-अतिसखदन २६ मारणंतिकातिसटनता-- 
कल्याण बुद्धभा मारणंतिकोपस्रगसहनमिति २७ ॥ इति सप्तविश्ततिगुणा 
भिधूरं कथिता चा प्रतिपादिताः ॥ 
भावाश्व-श्री भगवानने साधुके सत्ताईस गुण भरतिपादन कथिदै 
च्योकरि-गुणों से दी साधु दाता दै नु वेष धारण करते स॒ यद्यपि मदुप्यत्व 


( १२५ ) 


स्याम करे । जव उसकी भराणीमा्र से मंत्री दोग तव उसके मन मे माल्ञिन 
भाव किस प्रकार उत्पन्न दो सकरैगे ?जव मलिन भावोंका नियोध किया 
सया तव उखको श्रशांति किख प्रकार टो सकती है श्रत्‌ कदापि नीं । फिर 
यह वात सदा मानी दुई दे फि-वैरसे चैर नदी जाता किन्तु शांतिसे वैर मारा जास 
कता हे । श्रत. जव भाणातिपात सर सर्वधा निचरत्ति करली गतव उस मदापुरुपका 
राणीमाच से वल्कल वैर नष्ट हो गया । जिसका परिणाम यदह निकला ककि 
उस महापुरुष का पवित्र श्रारमा विश्व उपकार मे प्रदत्त दोजायगा क्योक्षि-चर 
स्वयं प्रेममू्ि बनकर छ्नन्य जीवों को प्रेमसू्ति वनापगा । स्यति रटे कि- 
अदिसाचत कम पालना श्रूरवीर ्रात्मापं दी करसकती है न तु कातर श्रात्माएे। 
श्व प्रस्न यह उपस्थित दोता दै कि-दिसा कते किंस कोटे? दस 
के उत्तर म तत्वाथोधिगम शाख मे लिखा है कि~''प्रमत्तयोगात्‌ प्राण व्यपरो- 
परं हिसा? अ्रथत्‌ प्रमादकेयोगस्रे जो प्रणो का नाशकरना हैउसीका 
नाम षटिसा है । यदि साधु श्रपरमत्त भाव सरे विचर रा है तव वह हिसा 
दोप का भागी नदीं वनता है। 
इख प्रकार जिस श्रात्मा ने करना, कराना, श्रञुमोद्ना तथा मन, चचन 
ॐओर काय के ढारा पृथ्वीकाय, च्रप्काय, तेजोकाय, चायुकाय रौर वनस्पति- 
काय इन पांचस्थावरो, दो इन्द्रिय वाले जीव जसे सीप, शेख. जोक आदि है 
जिन के केवल स्पर्शन्द्िय श्रौर जिदेन्दिय दे, तीन इन्द्रिय वाजे जीव जैसे-ू, लीख, 
ढोरा. खुरसली श्रादि है उनके केवल स्पशे, जिहा श्नौर घ्रणेन्द्रिय दोती 
हे, पिर चार इंदधिय युक जीव जैसे मक्ली, मच्छर, पतंगिया, विच्छ इत्यादि ह, 
इन जीवों के केवल स्पश, जिह्वा, घ्राण शौर च्ञुरिन्द्रिय दोती द, पचेन्दिय 
चाले जीव जैसे जलचर (मत्स्यादि स्थलचर (गवादि) खेचर (पत्ती) मयुष्य, देव, 
नारकीय इन के स्पशी, जिद्धा, धार, चच्च श्रौर थरो यह पंचिन्द्रिय होती है इत्यादि 
खव जीवो की दिखा का परित्याग कर दिया है वदी साधु है इस नत की रक्ता 
करने के वास्ते श्री भगवान्‌ ने पांच भावनां प्रतिपादन कि ह क्योकि जिस प्रकार 
मदोघ बाले जल को नाया द्वारा तथा समुद्र को मानपाच द्वायाल्लोग पार कर 
लेते दै दीक उसी भकार ससार समुद्र से पार होने के लिये भावना प्रतिपादन 
कग ह । इन्हीं भावनां दष्फ आत्मा पना कल्याण करसकता है! सो पथम 
मदानत की ५ भावनाः इस पकार कथन कमीगई है जेसकि-- 


पुरिम पच्छिम गारी तित्थगराण पंच जामस्स पणर्वासं भावणामरो 
पर्णत्ता तंजहा-ईरियासमिई मणयुत्ती वयगुक्ती आलोय भायण भोयणं 
[1 [> भ [अय 
आदा भडमत्त निक्खेवणासमिई ५ 


( १२७ ) 


( = है भ क 
छार काय तथा करना, कराना शरीर श्रनुमोदना ्रथौत्‌ तीनों योग रौर तीनों 
करणें से परित्याग करना चादिण। इस चत की निस्नलिखित पांच भावना 
रक्तक है जसे कि- 

श्रुवीतिभासणया १ कोहविवेगे २ लोभविवेगे ३ भययिवेगे ४ हदास- 
\वेवेगे ५ 

१ श्रयुविचिन्त्यभापणसमिति--चिना विचार कियि कदापि भाषण न 

करना चादिए । शीघ्रता श्रौर चपलतासे भाषण करना भी वरनीयदहै। कट 
शब्दं दो का प्रयोग कदापि न करना चादिप । तभी सत्य वचन की रक्ता हो सक- 
तीरे 

२ क्रोधव्विक-क्ोध नदीं करना चादिण क्योकि-क्रोधी मचुष्य श्रसत्य, 

पिघ्युनता, कठिन वाक्य कलह, वैर इत्यादि अवगुणोको उत्पन्न कर्‌ केता है नौर 
सत्य, शील तथा विनयाद सदूगुणों का नाश कर लेता दै । कोधरूपी रमि को 
उपशान्त करन के लिये क्षमारूपी महामेध की चप दोनी चाहिए । 
लोभविवेक-पाणी लोभकफे वशीभूत होकर भी सत्यका नाश कर 
चठता दै । यावन्मात्र संसार मे मनो.ऽयुक्रल पदाथ दे उनकी भराति की जव उत्कट 
इच्छा चद्‌ जाती दै तव सत्य की रक्ता कठिन दोजाती है । श्रतप्व सन्तोष द्वास 
स्त्यकीरत्तषाकेलिए लोभ का परिहार कर देना चादिए। 

भयविवेक- सत्यवादी को किसीका भी भय नदीं रोना चाहिए क्योकि- 
भययुक्क श्ात्मा सव्य की रक्ता करने मे ्रसमथं दोजाता हे । कते हे कि~-भय- 
युक्घ श्रात्मा को दी भूत प्रेत छला करते है । भययुक्क आत्मा सत्य कमो स्र पराद्‌- 
मुख दोजाता है अतणव सत्यवादी धैय का श्रवलसम्बन करता इुश्मा सत्यतकी 
रक्ता कर सकता दे । भय के चशीभूत होकर कर वार ूट बोला जाता है ! इस 
लिये भय स्र विसु दोने की भावना उत्पन्न करनी चादि । 

६ दास्यविवेक - सत्यवादी को किसी का उपटास भी न करना चाहिण 
कारण कि-दास्य रस का पूर्वं भागतो वडा परिय दोता दै परन्तु उत्तर भाग 
परम भयानक शरोर नाना भकार के कलेषों के उत्पन्न करनेवाला दोजाता दै । 
याचन्माच्र कशं है उन के उत्पन्न करन वाला हास्यरस दी हे । अतएव सत्यनत 
की रत्ताके लिये हास्यरस का आसेवन कदापि न करना चाष्देए । इस विधि 
से दवितीय मदाचत की पालना करनी चादि । 

३ श्यदिदानविरमण - तदनन्तर चौयैकर्म स निचरत्तिरूप दतोय मटा- 
जत का यथोक्त रीति से पालन करना चादिए । जितने सूम वा स्थूल पदार्थ 
दे चाहे बह अर्प दै वा वहत, जीघ है दा च्नजीव, जिनके चे आधितहोरटे है 


( १२६ ) 


९ खीपश्ुपेडकससक्रशयणासनवजनत।--ब्रह्यचारी को खी, पथु श्नोर 
नपुखकों से जो स्थान संसक्तं दोरदा दो उसे वजेना चादहिप कारण करि-उस 
स्थान म रहने से फामोदीपन की सभावना दै जिसका परिणाम ब्यचारी के 
्िमे परम भयानक होगा । 


२ खीकथाविवज्जनता- ब्रह्मचारी पुरुप कामके जागृत फरनेदारी सरी 
फथा कदापि न करे प्रौर नांदी खियों म वैर कर उक्त प्रकार फी कथाश्नों का 
प्रयोग करे क्योंकि-वार २ स्यीकथा कहने से उसका मन किसी समय विच- 
लित शवदयमव दो जायगा श्रतः ब्रह्मचारी फो बरह्मचर्यं की रत्ताके लिये काम- 
जन्य स्यीक्रथा कदापि न करनी चादिपः। 

२ सी श्रालोकनवजनता-कामदषिसर सियों कीदद्वियोंको न देख- 
ना चारिए क्योकि सिये। की कामजन्य चे्टाश्र(को देखते हुए उसके मन 
मे कामविकार श्रवश्यमव उत्पन्न दोजायगा ' स्री के शरीर का सस्थान, उस 
का वर, उसके दाथ. पाद्‌, श्ांखं, लावण्य, रूप, यौवनाचस्थादि के देखने से 
संयम की समाधिका नादा हो जायगा ॥ 


४ पूय क्रीडा अनननुसमरणता--यदि पदि गृदस्थपय्य मे नाना प्रकार 
की काम्चे्टापंकी द्यो तो उनकी स्ति न करे पयो कि-उन चे्टाश्नो की स्मरति 
से काम श्रवश्यमेव जाग्रतावस्था म श्राजायगा तथा जो वालब्रह्मचारी दैवे 
साित्य प्रथो पृ हुप्खी चरित्र की पुन २ स्ति न करें क्योकि-श्रातमा 
विकार दृशा को आन्त दोजाना है जिस कारण फिर ब्रह्मचर्यं भ चाधा उत्पन्न 
दने की सभावन। रुदती हे । 

५ प्रणीताहारवज्ञनता--च्रह्यचारी को सिग्ध श्रादार न सेवन करना 
चादिपः ज्ेसेके--्तीर, दुग्ध, दधि, सर्पिस्‌, नवनीत, तेल, गुड़ मतस्यडी 
प्रादि । तथा जिन पदाथ के श्रासिचन करने स उन्माद वा चिकार उत्पक्न 
दाता द्य उनका भी श्रासिवन करना उचित नद । कारणाकि-माद्‌क द्रव्य शसीर 
को पुष्टि देकर श्रात्मा मै चिकार उत्पन्न कर देते हे जिसका परिणाम वह्म- 
चारी के लिये द्दितकारी नदीं रोता । श्रत्व इन पांच भावनाश्चौ दास बह्म- 
चयै चत की र्ता करनी चादिए 1 

५. परिगरहधिरमण-पेचम मावत जो श्रपरिग्रहरूप हे उसका न्तःकरण से पालन 
करना चादिण । अटप वा महत्‌, श्रणुरूप वा स्थूलरूप, चेतनायुक्5 टो अथवा 
जङ्‌ सवे मूच्छ का परित्याग करः देना चारिण । यदि कोद कटे कि-जो 
साधुके पास चख पाञादि है क्या यद पष्रेगरट नही है! इस शंका का 
समाधान दशवेकालिक सूर के छठे अध्ययन मे इस धकार किया गया हैः-- 


( १९३९ ) 


प्रकार के खुद्र रन उत्पन्न करने चाले भोज्य पदाथ चाच तच पसनन न होना 
चादिप एय यद्व मन के धतिकूल भोज्य पदप खनिको सित तवदेष न 
करना चाहिए । 

पदार्थो का जिस धकार का खभावदैचे उसी प्रकार श्रपनारस 
दिखलार्यैगे । इसलिपः उनके मिलने पर राग देप क्यों किया जाय ? 

५ स्परेन्धियसरागोपरतति-यदि मनके श्रजकूल स्पशं उपलच्ध दो व उन 
पर राग उत्पन्न न करना चाहिए एव यदि मन के प्रतिकूल स्प मिले तव 
देप भी न करना चादहिपः । इस कथन का सारांश इतना दी है कि-शय्या 
चख्रदि-मनेऽजुकरूल मिल जानि पर परसस्नता प्च मार पीर वा शरगोपांगकते 
छेदन करने चाले पर द्वैप यदह दोनों भाव उत्पन्न न करने चादिपं । जव 
श्रात्मा के श्रन्तःकरण से शब्द, रूप, गंध, रस श्र स्पश इन पांच विपयो 
पर राग श्रौर ढेषेके भाव उत्पन्न न दोगे तव बह श्रात्मा दढ़तापूर्चक उक्त 
पांचा मानतो का पालन कर सकेगा । अतपव पांच मदाबतो को २५ 
भावनाश्रौ दासा शुद्ध पालन करना चादिप । यदि रेसे कटा जाय कि-पांच 
मानतो की २५ भावनार तो कथन की गई दै किन्तु चखा सभिभोजन वचिर- 
मणव्त का करटी भी वरीन नही है रौर नां दी उसकी भावनाश्मो का कथन 
श्राया दै ॥ इस धश्च का उत्तर यद है कि-परथम तो पायः रात्रि को श्रति शी- 
तादि के पड़ने स वहत खे पदार्थो कौ सघित्त टो जले की सभावनाकी जा- 
सकती है द्वितीय-तमस (छन्धकार) के सर्वैर विस्त दो जाने से भली प्रकार 
जीषःरत्ता भी नदीं दो सकती श्रतप्व इस बत का प्रथम महानत मे खी समा- 
वेश शो जाता है श्र्थात्‌ जीवरत्ता सम्बन्धी यावन्मात्र कर्तव्यदेचे सव 
पहले मदाबत के दी न्तर्गत दोते है! 

तत्पश्चात्‌ पाचों इन्द्रियो के जो शब्दादि धिपय है सुनि उन पर राग 
श्मोर टेप से उत्पन्न होने चाल भावो का परित्याग करे जैसे कि- 

£ भ्रेतिन्धिथ निव्रह-श्रोतेन्द्रिय के तीन विषय है यथा जीव शब्द १ श्रजीच शब्द्‌ 
२ श्रोर मिधित शब्द्‌ ३1 मुखसे निकला ह्या जीव शव्द कदा जाता है । पुद्गल 
करे स्कन्धादि के सयोग या विभाग के समय जो शब्द उत्पन्न होता दे र्से 
श्रजीव शब्द्‌ कते है । जो दोनौ के मिलने से शब्दं उत्पन्न होता है उसे 
भेधरेत शब्दं कते है जैसे शखादि का वजना । 

७ चन्ुरिन्िय निग्र--चन्ञुरिन्दिय के पांच विपय द जेसोकि-श्वेतवरी \ 
रक्रवरी २ पीतवर २ नीलवरी ४ श्रौर छप्णवश ५ इन पांचो दी विपयोमे 

जो भिय दहै उनपर रागन करना चाददिएश्नौर जो श्चाभ्रेय है उनपरद्धेप न 
करना यादिष । 


( ९३२ ) 


आवश्यक म गुर श्रौर उसके गुण तथा शिष्य की भक्ति का दिग्दशन कराया 
गया है । 

४ प्रतिक्मणावश्यक-्मपने यरद किये हुप बतो म जो कोई अतिचार 
लगगया हय तो उससे पि टयनेकी चेष्ठा करना तथा पद्ध दटना-इसे 
प्रातिक्रमणावश्यक कहते है ! 

५ कायेोत्सगवश्यक-क्ञान. दशन श्योर चारित्र की शुद्धि के लिये कायो- 
त्स करना अर्थात्‌ ध्यानस्थ हो जाना । 

६ प्रत्यास्यानावश्यक-शतिचार्योकी शुद्धि चा श्रात्मयुद्धि फे लिये प्रत्या- 
स्यान ( किसी पदां का त्याग ) करना । यह छै क्रियार्प श्रवश्य करणीय 
हे श्सी लिय इन्दर पडावश्यक कहते है । व्य श्रौर भावरूप से यह छै 
प्रातिद्धिन श्रवश्यमेव करने चादिपं ! 

जव पडावश्यक शुद्धरूप स पएलन किये जाप तव फिर श्राठरदी समितिश्रौर 
गृुक्षिये ज! प्रवचनमाठ्‌ है उन्हें श्रवश्यमेव क्रियारूप मे लाना चादि श्र्थात्‌ 
आट प्रवचन माताम नित्य ही प्रचरन्ति करनी चादिप । जसेकि-५ समिति 
श्मौर तन गुशि । इनका विवरण सेक्तेप से नवि किया जाता है यथा-९ श्यो 
समिति-खम्यक्तया जिससे चारित्र की पालना की जावे उसे समिति कते 
डे) सो “ईरणं ईय काय चेषा इत्यर्थः तस्या समिति श॒भोपयोगः'' श्र्थात्‌ 
चलते हप उपयोगपूर्वक चलना चादिण जैसेकि-निज शरीर माण भूमि को 
श्मागे देखकर चलना चादि तथा च्रासन पर वैठते समय वा धर्मोपकरण पदटिरते 
समय विरेप उपयोग रोना चादिष्ट । इसी प्रकार शयन करते समय भी पाद- 
पसारणादि क्रियापं कुकटवत्‌ दोनी चापे । सारांश इतना दी है कि 
यावन्मात्र चलना आदि काय है चे सव यत्नपूवैक ही होने चाहिपे 1 २ भाषस- 
नलिति-भापण करते समय क्रोध. मान, माया श्रौर लोभ तथा दास्यादि 
के चशीभूत होकर कदापि भापण न करना चादिण । अपितु मधुर श्योर स्तोक 
क्तो से युक्त प्राणीमात्रके लिए दितकर वचनो का प्रयोग करे टवं जिस 
के भापण करने से किखी प्राणी को दानि पडचती दो थवा भाषण से कोई 
सारांश न निकलतादो पसे व्यथ श्रौर विकथारूप भाषणों का पयोगन 
करे ! एषणासमिति-णुद्ध श्रौर निरदोश श्राहार पानी की गवेष करनी चगहिषट 
छपरेच जा शन्न पानी सदोप श्रथत्‌ साधुदात्ति के श्रयुक्रूल नदी है उसे 
कदापि ग्रहण न करे 1 श्रादार पानी के शास्नकारो ने ४२ दोप प्रतिपादन किये 
हे जेसेकि-सोलद भकार के उदूगम दोप दोते दै जो साधु को दातार केद्धारा 
लगते हे श्रतप्व साधु को भित्ताचरी के समय विशेप सावधान रटना चादिष्ट 
जिससे उक्त दोषों मे से केएई दोप न लगसके जेसेकि- 


व ^ च 


( १३५ ) 


लोभे य लोभे य हवति दसएए ३ पुन्वि-पच्छा संथवं विज्जा म॑तेयच्‌- 
रण जोगे य उप्पायणा इ दोसा सोललसमे मूलकम्मेय ४ 

र्थ धार (धात्री) धाय का काम करके ्राटारादि लेवे तो दोप! 
२ दई (दूती) दुनपना जैसे गृदस्थी का सन्देशा पहुचा कर श्रादारादिलेवे तो 
दोप । ३ निमित्ते ( निमित्त) भूत, भविप्य, वसमान काल के लाभालाभ, 
सुखदुःख, जीवन मरणादि वतलाकर श्रादारादि लेवे तो दोप। ४ ्राजीव- 
( आजीविका ) श्रपना जाति कुल श्रादि प्रकाश कर श्राहारादि लेवे तो दोप) 
५ व्णमगे ( वनीपकः) रां भिखारी की तरह दीनपना सरे मांगकर श्रादा- 
रादि लेवे ते( दोप ! ६ तिगिच्चे (चिकित्स) वैद्यक-चिकित्सा करके श्रादारा- 
दित्वे तो दोप।७ कोरे (क्रोध) क्रोध करके आहारादि लेवे तो दोप 
८ मासे (मान) हकार करके लेवे तो दोप 1 <€ माया ( कपर) 
करकेलेवे तो दोप । ९० लोभे (लोभ ) लोभ करके श्रधिक श्रादारयादिलेवे 
श्थवा लोभ वतला कर लेवे तो दोप। ६६ पुल्वि पच्छा संथव (पूैपश्चात्‌- 
सस्तव) पटले या पीडे दातार की प्रशसा करके श्रादारादि लेव तो दोप । १ 
विज्जा ( विया) जिसकी प्रधिए्ठता देवी हो श्रथवा जो साधना से सिद्ध की 
ग हो रखको विया कहते है रेस विया के प्रयोग से श्रादासादि लेवे तो दोप। 
१३ मेते ( मेत्र ) जिसका ्रधिष्टाता देव दो श्रथवा विना साधना के श्रत्तर 
विन्यास मा हो उसको मेव केत है पसे मेज का प्रयोग करके श्रादारादि 
लवे ते! दोप। १६ चुरण ( चूर ) एक वस्तु के साथ दृसरी वस्तु भिलाने से 
अनेक प्रकार की सिद्धि रो पेखा दृष्ट श्रजनादि के भ्रयोग सरे श्रादारादि 
लबे तो दोप । ९५ जोगे (योग ) पाद्‌ (पग) लेपनादि सिद्धि वतलाकर 
आहारादि लेवे तथा वशीकरण मंजादि सिखलाकर वा खीपुरूप का सयोग 
मिलाकर श्रादारादि ल्लेवे तो दोप ! १६ मूल कम्मे ( मूल कम }--गमैपातादि 
श्नोपध वतलाकर श्रादारादि लेवे तो दोप अथात्‌ किसी ने साधुके पास 
अपने गुप्त दोप का कारण वतला दिया फिर यह भी चतला दिया कि-श्चव 
गस भ स्थिर रह गया है तव साघु उसको ग्भपातादि की श्रौपध वतलावि 
तो उस साधु को महत्‌ दोप लगता दे । 

इख अकार सोलद दोप उत्पाद्‌ के वरन किये गण है प्रव ९० दोप 
पपणा के कटे जाते है जो साधु श्रौर गरदस्थ दोनो के कारण लगते है । 

सकिय मक्खिय निक्खित्त पिदियसाहरियदाय युम्मीसे अपरिणय 

लित्त छंड्िय एसणा दोसादसहवंति ५। 
श्र्थ--खकिय ( शकित ) गदस्थी को तथा साधु को शेका पङ्‌ जाने 


( १३७ ) 


को व्युत्खज करना चादिपः जिससे जीवर्दिसा श्रौर घृणा उत्पन्न न दो । 

पांचा खमितियों के पश्चात्‌ तीनों गुन्तियो का भी सम्यक्नया पालन 
करना चादिपः जेसेके- 

६ मनोगुप्ति-मनमे सद्‌ श्रोर श्रसद्‌ विचार उत्पन्न ही न होने देना 
श्रथोत्‌ कुशल श्रौर श्रकुशल संकटप इन दोनो का निरोध कर केवल उपयोग 
दशाम दी रहना । २ वायागुप्ति-जिस भकार मनोगुप्ति का श्रथ किया गया 
दे ठीक उखी रकार चचनगुप्ति के वेपय म मी जानना चाहिए 1 ३ काययुप्ति- 
इसी धकार श्रसत्‌ काय-व्यापासादि से निवृत्ति करनी चाहिए । 


सो यद सव ्राठो पवचनमाता के प्रक करणसत्य गुर के अन्तशत 
हो जते है 1 शसीर, वख, पाच, परतिलेखनादि सव क्रियाएं भी उक्त दीं 
श्रक के न्तत दोती है । यही मुनि का सोलदर्वो करणसत्य नामक गुण हे । 

१७ योग मत्य--संग्रहनय के वशीभूत टोकर कथन किया गया हैः कि- 
मन वचन श्रौर काय यदह तीनों योग सत्यरूपमे परिणत दोने चादिप क्योकि- 
इन के सत्य वर्तने से श्रात्मा सत्य स्वरूप मे जा लीन होता हे । 


१८ क्षमा-- क्रोध के उत्पन्न होजाने पर भी श्रात्मस्वरूप मे री स्थित 
रहना उस का नाम क्षमा गुण है क्योकि-कोध के श्राजाने पर भायः चात्मा 
श्रपने स्वरूप से विचलित टोजाता है इस लिप सदा चमा भाव रखे । 

१६ विरागता-ससार के दुःखो को देखकर ससार चक्र के परिश्रमण 

निच्त्तदोने की चष्ट करे। 

२० मन समादरणता--श्रकु शल मनको रोक कर कुशलता मे स्थापन 
करे । यद्यपि यद गुर योग सत्य के अन्तर्गत है तदपि व्यवहार नयकेमतसे 
यह गुण पथक्‌ दिखलाया गया ह । 

२९ वामूसमाहरणता--स्वाध्यायादि के विना सन्य वागयोग का 
निरोध करे क्योकि-यावन्मात्र धर्मस सम्बन्ध रखने वाले वाग्‌ योग 
द वे सर्वं वागसमादरणता के दी प्रतिवोधक दे परन्तु इन के विना जो व्यर्थं 
वचन प्रयोग करना दै वद श्रात्मसमाधि से पृथक करने वाला दै । 

२२काय समादरणता--श्रथुभ व्यापार से शरीर को पृथक्‌ रखे ! व्यवदहा- 
रनय के वशीभूत दोकर यद सव गुण परथक्छ्रूप से टिखलाप्ट गण ह 1 

२२ ज्ञानं संपन्नता-मति, श्वत, अवधि, मनःपर्यव श्रौर केवलक्षान 
इन पाचों ज्ञानां स सपन्न दोना उसे क्षानसपन्नता कहते है 1 चारक्षान तो 
च्तयोपशम भावके कारण विश्दी भावखे पकर होते है किन्तु केवलक्षान 
केवल चतय भावके ध्योगसे दी उत्पन्न दोतादे। सो जिस प्रकार क्तायेक 


( १३६ ) 


विश्युद्धि तप की समासि कर्ते हैसो इसीका नाम परिदार विशुद्ध चारि 
दै ॥ सन्म सपराय चारिज उस का नाम है जिसमे लोभं कपाय को सदम 
करिया जाता है । यद चारित्र उपशम श्रेणि वा क्षपक थेणि मे देखा जाता हे 1 
उपशमभ्रणि १० वे गुणस्थान पर्यन्त रती दे ॥ 

श्मपरंच यथाख्यातं चारित्र उसे कते है जिससे मोहकम उपशम 
चा क्तायिक होकर ात्मगुर प्रकट दोजाते है) सो इन पांचों चारि की 
सम्यगूतया श्राराधना करना उसे दी चारिजसपन्नता कते दँ 1 

२६ वेदनाध्यासना- वेदना के सहन करने वाला जेसेकि-मचप्यरूत 
देवङूत तथा ति्यगरूत उपसगा म से किसी भी उपसर्ग के सहन करने का 
समय जव उपस्थित दोजावे तव उस उपसर्ग को सहन करे । वेदना शब्द से 
२२ परीपदट भी लिये जाते है सो उन परीपद्ो फो सहन करे! इनके अतिरिक्त 
कोर श्रन्य वेदना सहन करने का समय उपस्थित दोजावे तो उस कोभी 
सम्यगूतया शासखरोक्त सीति से सहन करे जिससे कर्म निर्जरा दोने के पश्चात्‌ 
सम्यग्‌ क्षान की प्राप्ति दो। 

( पर्न ) वे २२ परीपद कौनसे है जिन के सदन करनेसे कमो कपी 
निजे श्रौर सम्यम्‌ कान की प्रि दोजाती हे ? 

( उत्तर ) वे २२ परपद निच कथनानुखार है जिन के खम्यगतया 
सहन करने सर श्रात्मा कमो की निर्जरा करके सम्यग्‌ क्षान की प्राति करलेता 
हे जेसेकि-- 

चावस परीसदा प. तं०-दिभिच्छा परीसहे १ पिवासा परीसहे २ 
सती परीसहे ३ उसिण परीसहे ४ दंसमसग प्रीसहे ४ अचल परीसहे ६ 
अर परीसहे ७ इत्थी परीसरे = चरिया परीसहे & निसीहिया परीसहे १० 
सिज्जा परीसहे ११ अकोस परीसहे १२ वह परीसहे १२ जायणा परीसहे १४ 
्रलाम परीसहे १५ रोग परीसहे १६ तणफास परीसहे १७ जल्ल परीसहे 
१८ सक्कार पुरक्कार परीसहे १६ पण्णा परीसहे २० अण्णाण परीसहे २१ 
दंसण परीसदे २२ 

समवायाग सू्र-स्थान-२र 

घरत्ति -द्वाविंशतितम त॒ स्थान प्रसिद्धा्थमेव नवरं सूत्रा पय्‌ स्थितरवाक्‌, तत्र सायां 
च्यवन निञ्जरा्थं पराप्यन्ते इति परीपटाः--""दिगिदय'*त्ति वुयु्ठा र्व परीपह दिगिञ्छ परप 
इति सरन चास्य मयौदालुघ्हनन, एव मन्यत्रापि १ तथा पिपास्ता-तय्‌ ्ीतेष् भरतीते ३४ तथा 


3 पो 


दश्वा सशकास्व दंशमशस उभयेऽ्प्येते चतुरिन्द्िया मत्वा मरक्छतशैषा विशेषोऽथवा दशो- 


( १४१९ } 


< सख(परापदट--कामवासना से मनको दखाकर सयमरूपी श्राराम 
(बाग) म रमण करे किन्तु खियादि के विकारो मे तनक भी मन न लगाचे। 

९ चयपसपट-विहार के कष्ट के( सदन करता हुश्रा प्रामादि मे श्ननि- 
यत विदारी होकर विचरे । 

१० नैपेधिक्मी परीपह-विना कारण भ्रमण न करना पितु अपने 
सन पर हयी स्थित रहना ! इतना ही नदी किन्तु गिरि, कंदरा. चत्त के मूल, 
श्मशान वा श्ल्यागार मे ठहरकर सिह व्याघ्र सपे व्यन्तरादि देवो केकये 
इए कष्टौ को सहन करे । 

१६ शय्या परीपह- प्रिय वा अभय वसति के मिल जाने पर दर्प शोक 
न करना श्रपितु उसी वसति मे उत्पन्न दुष्ट परीपदह का सहन करना जेसेकि- 
वसति चादहिप थी शीतकाल की किन्तु मिल गर उष्णकालके खुख देने वाली 
इसी प्रकार उप्णकाल के स्थान पर शीतकाल की वसति उपलब्ध दोग 
दोचेतोरोपवा दष कद्‌ापिन करे। 

१२ चर करोश परीपट- कोई श्रनभिक् श्रात्मा साधु को देखकरक्रोध के 
्मवेश मे श्राकर गाली श्रादि वकने लग जाप तो उस समय शांति भावका 
वलम्बन करे । उसके प्रति क्रोध न करे । नांदी उसको बुरा भला कटे । 

१३ वधपरीपद-यदि कोई साधुकोयष्टेश्यादिसेताडेतो भी उस 
पर क्रोध न करे किन्तु इस चात को ञ्रजुभव से विचार करे कि यह व्यक्ति 
मेरे शेर कातो भले ही वध के परन्तु मेरे श्रात्मा कातो नाश करी 
नदीं सकता । इस धकार के विचारो से वध परीपह को सहन करे । 

१४ याचना पसपद-तथाचिध प्रयोजन के उत्पन्न हो जाने पर घर २ 
से भित्ता मांगकर लाना श्रौर मांगते समय लज्जादि उत्पन्न न करना क्यो- 
कि-शध्रमण मित्ता धार्मिक चत्ति कटी जाती है 1 श्रतप्व भिक्ताडृत्ति मे लज्जा 
करनी उचित नही दे, 

१५ श्ल्लाम परापद- मांगने पर यदि फिर भी कु नरी मिला तो शोक 
न करना किन्तु इस वात का विचार करना कि-यदि राज नही मिलातो 
अच्छा हु्ा । विना इच्छा ही श्र ज तप करम दोगया । श्चतराय के योपशम 
हो जाने पर किर श्रादार उपलन्ध हो जायगा । इस भ्रकार के विचारो से 
अलाभ परीपद सहन करे किन्तु न मिलने पर शोक वा दीनसुख तथा द्नि- 
चचनादि का उच्चारण न करे । 

१६ रोग परीपट-सेग के उत्पन्न हो जाने पर उस रोगकी वेदना को 
शांतिपूर्वक सहन करे 1 फिर इस चात का सदेव श्जुभव करता रे 1क-यद 
सर्य भेरे किये दुष्ट कर्मो के फल दै 1 मैनेदी किदे श्रौरमेने दी इनका फल 


{ १४३ ) 


न करन चारिणं क्योफि-दशन (निश्चय) के खक दोने पर ही सव क्रियार्पैः 
सफल टो सकती ह । यदि सम्यक्त्व मे निश्चलता नदी तो फिर ब्तोमेभी 
अवश्यमेव शिथिलता श्राजायगी । मुनिका२६ वां गुण यह है फ बद्‌ 
येदना को शांति पूरक सदन करर । 

२७ मारणांतिकाष्यसनता-मारणंतिक क्के श्राजने पर भी 
श्मपनी खुगरद्धीत च्रत्ति से विचलित न होना चादिएट श्रथौत्‌ यदि मरण पर्यन्त 
उपसग भी श्राजावे तो भी श्रपने नियमो को न छोड कारणाके-साधुजनो 
केसखाकण्रदयी होते है जिनके श्राजाने से शीघ्रकार्य की सिद्धि दोजाती 
है । इस लिये सुनि मारणंतिक कट को भी भली भ्रकार सहन करे। शास्र 
मे इस प्रकार मुनिके २७ गुण वर्णन किये गप है किन्तु भ्रकरण प्रथो मे 
२७ गुण शख प्रकार भी लिखे है जैसेकि-- श्रदिसा २ सत्य ३ दत्त ४ ब्रह्म- 
चर्य ५ श्रपरिग्रह बत ६ पृथ्वी ७ श्रप्काय = तेजोकाय € चायुकाय १० 
चनस्पतिकाय ११ जसकाय १२ शतेन्द्रिय निग्रह १२ चच्चुरिन्द्रिय निग्रह १४ 
घरेन्दरिय निग्रह १५ जिदिन्द्िय निग्रद १६ स्पशेन्द्रिय नित्रह १७ लोभ 
निग्रह्‌ १८ त्तमा १९६ भाव विशुद्धि २० भतिलेखना विद्धि २९ सेयम योग 
युवित २२ कुरशशल मन उदीर्णा श्रकुशल मन निरोध २२ कुशल वचन उदी- 
रणा श्रौरः श्रकुशलः यचन निरोध २४ कुशल काय उदीरण श्रौर ङ्शल काय 
निरोध २५ शीतादि की पीड़ा सहन करना २६ मारणांतिक उपसरगं॑का सहन 
करना २७ इख भकार से भी २७ गुण भकरण ग्रेथो मे लिखे गएट है परन्तु 
यह सव गुण पूर्वोक्त गुणो के श्रन्तगैत दै । 

उक्त गुणौ से युक्त होकर सुनि नाना पकार के तपोकर्मं सरे अपने 
्रन्तः करण को शुद्ध करने के योग्यो जाता है ध्रौर नाना पकार की 
श्रात्मशकितिये ( लब्धिं) उसमे प्रकट दोजाती है । यथाः--मनोवल--मन 
का परम दद्‌ श्रौर अलौकिक सास युक्त दोना वाग्बल--पतिज्ञा निर्वाह 
करने की शविःत का उत्पन्न दोजाना काथवल-लुधादि के लग जाने पर शरीर 
की कांति का वने रहना “मनसाशापानुग्रहकरणसमथ' मनसे शाप शमर अञु्रद 
करने मे समथ "वचसाशापानुप्रदकरणसम्॑” वचन सर शाप श्रौर श्रसुग्रद करने मे 
समश“ कायनशापलुग्रहकरणसमथ--काय द्वारा शापाद करने मे समर्थ- 
चेलौपथिग्रा्--मुख का मल ( निश्ीवन ) सकल रोगो के उपशम करने मे समर्थं 
"जल्लौपधिप्राप्त-श्लसीर का भरस्वेद वा शरीर मल रोगोके उपशम करनेमे 
समर्भ--“विप्रोपधिप्राप्त"--मूत्रादि के विदु तथा वि--विष्टा अ-भ्रश्रवण ( मू) 
यह सव तप के माहात्म्य से श्रौषधिरूप हो रे है ^ामर्धणौपधि" दस्तादिका 

स्पश भी श्रौपधिरूप जिनका दो रहा है ““सवौषधिप्र्त--शरीर के सर्व 


( १४५ ) 


सत्‌ तथविधलच्धिविशेपादत्नरितं तव्तन्मदानसं च-भित्तालन्धं भोजनम- 
त्षीणमदानसं तदति येषां ते तथा" श्रर्थात्‌ श्रक्तीण मानसशक्ति जिस से एक 
सामान्य भोजन दारा सदस पुरुषो की ठति की जा सकती है श्रौर, मूल 
के भोजनम घरि नहं होती ये तप के माहात्म्य से उत्पन्न होती है ! दतना- 
दी नीं किन्तु सादी वैन्य की लन्धि मी उत्पद्र टोजाती दै जिसके दारा मनो. 
कामनाुसार नेक रूपो की रचना की जा सकती दै । जसा रूप वनाने की 
इच्च दो वैसा दी रूप वनाने की शाक्ति उत्पन्न दो जाती हे 1 प्च मुनि विया 
चारण लग्धि भी उत्पन्न कर लेता है जिसके ढारा श्राकाशमे गमन करनेकी 
शक्ति उत्पन्न हो जाती है तथा जघाचारख श्रकाशगामिनी इत्यादि शाक्रयां 
जो मुनि मेँ उत्पन्न रोती दैवे सव तपःकर्म का दी माहात्म्य दै । 
तात्पर्य इतना दी दै कि-कर्म क्षय करनेके लिप दो स्थान प्रतिपादन 
कयि है खाध्याय श्रौर ध्यान । इन्हीं स्थानो से श्रात्मा निर्वाण पद की भ्रासि 
कर लेता है । 
यद्यपि सुनि धर्म के क्रियाकाराड की सदस्नां गाथाय वा शलोक पूर्वा- 
चायं ने प्रतिपए्दन कयि दहै तथापि यवे सव गद्य चा पद्य काल्य उक्त सुनि के 
२७ गुणो के ही छन्तभूत दोजाते है । = 
श्रोपपातिक सत्र म भरी श्रमण भगवान्‌ मदा्वीर स्वामी के साथ 
रदनेवाले सुनि मरडल का वरन करते हुए सोलदवे सूत्र मे लिखा है । 
तथा च पाठः-- 
तेणं कालेणं तेणं समणएणं समणस्स भगवो महार्वारिस्स अतिवासी 
बहवे थरा भगवतो जातिरपण्णा कलरपण्णा बलसंपणणा ओश्सी तेस 
वर्चसी जसंसी जियकोदहा जियमाणा नजियमाया - जियलोभा जियददिया 
जिश्रणिदा जि्पर्यसहा जीचिच्रास मरण भयविप्ययुका वयप्पहाणा गुण- 
प्पहाणा करणप्पहाणा चरणप्पहाणा णिग्गहप्पहाणा शिच्छ- 
यप्पहाणा अज्ञवप्पहाणा मद्‌ वप्पहाया साषवप्पदासा खंतिप्पहाणा युत्तिप्प- 
हाणा विज्ञाप्पदाणा मतप्पहाणा वेयप्पहाणा वंभप्पहाणा नयप्पहाणा निय- 
मप्पहाणा सचप्पहाणा सोमप्पहाणा चास्वण्णा लजातवस्सी जिईदिया सोही 
अरणियाणा अप्पुस्सुखा अवाहिन्वेसा अ्रप्पाडिलस्सा सुसामण्णरयार्दता इण 
भेव शिग्ग॑थं पावयां पुरो काडं विहरंति ॥ 
चृत्ति--“साधुव्णंक गमान्तरमेव--तज “जाई संपन्न" ति उत्तममातक- 
पक्युक्ता इत्यवसेयम्‌ । न्यथा मादकपक्तसेपन्नत्वं पुरुपमाचस्यापि स्यादेति 


( १४७ ) 


त्ति गुरुभिदेमं प्राद्देताः विनयिता दत्यथः--इदमेव नेभन्थपवचनं “पुर श्रो- 
काउ" त्ति पुरस्छृत्य-प्रमाणीरृत्य विदरंतीति, फचिदेचं च पय्यते--“्यहणं 
आपसिया" श्रधंदायकत्वात्‌ “चहं उवञ्ाया सू्रदायकत्वात्‌ , वहनां 
गरदस्थानां प्रचलितानां च दीप इव दीपो मोदतमःपटलपारनपडत्वात्‌ ढीप 
इव वा दीपः ससारसागरनिम्मानामाश्वासभूतत्वात्‌ “ताण” त्ति चाणमन- 
धेभ्यो रक्तकत्वात्‌ “साशं” त्ति शाणमर्थसम्पादकत्वात्‌ “गद” त्ति गम्यत 
इति गतिरभिगमनीया दत्यथः- पदृटृत्ति पतिष्ठन्त्यस्यामिति भपतिष्ठा 


श्राध्रय इत्यथः 
भावार्थ--यद्यपि उक्त सूत्र का श्रथ सस्त भाषा मे चृत्तिकार ने स्फुट 


कर दिया दे तथापि देशी भाषा मे उक्त सू का श्रथ सामान्यतया दिखलाया 
जाता दे । श्रापपातिक सत्र म श्रमण भगवान्‌ श्रीमदावीर स्वामी रर श्रीभ- 
गचान्‌ के सुनिसध का विस्वृत रूप से वरन किया दे जिस के उपोदूधात के 
१६ सूत्र का यदां पर उरलेख दै इस सू मे श्री भगवान्‌ के साथ रहने वाल 
सुनियों के शुरो का चरेन है जेसेकि-श्रवसप्पिणी कालके चतुथं दुपस- 
खुपम नामक काल म जव श्री श्रमण भगवान्‌ महावीर स्वामी विचरते थे तव 
भ्रमण भगवान्‌ महावीर स्वामी के वडुत से शिष्य स्थविर भगवान्‌, माता पिता 
के पत्त से निष्कलंक, वल, (उत्तमसदननयुक्त) रूप, विनय, कषान, दमन, चरि 
सम्पन्न, पाप कर्म सि लज्जा करने वलि, श्ररपोपाधि के धारणएसरवागोरवके 
परित्याग से लाघव सम्पन्न, शओ्रोजस्वी, तेजस्वी, वचन सोभाग्य से युक्त, 
इतना दी नरी किन्तु परम ख्यातः क्रोध, मान, माया, लोभ, इन्द्रिय, निद्रा तथा 
पर्फपह जीतने वाले, जीचन श्राश्ता शरोर सत्यु भय से रहित, नत तथा वतय्रधान 
शुर्,क्रियाकल्लाप, चरित्रनिव्रद.निश्चय,च्रार्जव, माद्रैवःलाघव,्तान्ति श्नोर खुक्ति 
पधान, पक्षप्ति श्रादि विया के दोने से विद्या प्रधान, दरिणगमेपि श्रादि देवो 

के श्रावाहन करने मे समर्थं होने से मत्र प्रधान, वदो ( ्रागमों ) के क्षाता, तथा 

लोकिक शास्नो के जानने चाले, बरह्मचर्यं ( कुशलायष्ठान ) मे ` प्रधान, 

नीति मे भधान, श्रभिय्रह ८ नियस विशेष ) करने मे भधान, सम्यग्‌ वाद्‌ करने 

मे पधान, द्रव्य सर शारीरिक शोच, भाव से निदप सयम क्रिया करनेवालों 

मे भधान, सत्कीर्तिं वा गोर शरैर वाले, तथा सत्पक्ञावाले, लजालु,' तपस्वी 

मोर जितेन्द्रिय, पाणीमात् फे प्रेमी, तीन योगो को शुद्ध करने वाले, ` निदान- 

कर्म रहित, श्मौत्सुक्य भाव से वर्जित, सयम छत्ति से मनको वादिर न करने 

चाले श्रौर श्तुल मनोडत्ति, धरामण्य भाव श्रञुरक्ः पिनयी, नि्रन्थ, प्रवचन 

के पठन पाटन करने वाले अतएव निपरन्थ, भवचन को भमाणमभूत करके पविच- 

रने वाले 1 ( पुरस्कुत्य-प्रमाीरृत्य विरति ) ! =, ॥ 


( ९४६ ) 


श्रथ-चे स्थविरः भगवान्‌ जेन सिद्धान्त से पूर परिचित थे, तथावे 
स्वमत श्रौर परमत के पूर्णवेत्ता थे, । उन्न पुनः पुनः भ्यास करने से 
प्मत्मवाद्‌ का परम परिचय पराप्त कराक्षिया था जिस प्रकार कोद व्यक्ति ्रपने 
नामके किखी दृशा म भी विस्त नदी करता श्ौर मत्तदस्ती श्रानन्दपूर्वक 
पक खुन्दर श्राराम (वाग वा उद्यान ) मे क्रीडा करता है, ठक उसी प्रकार 
श्रात्मवाद्‌ को ्रवगत करक वे स्थविर भगवान्‌ श्रात्मवाद मे रमण करते थे । 
उनके प्रश्नोत्तर मे किसी को तकं करने का साहस न टता था, 
क्योकि--्रश्चोत्तर युक्तियुक्क दोने से वादीको किसी प्रकार सेभी उनमें 
श्मत्तिप करने के लिये चिद्ध नदी मिलता था । जिस प्रकार एक धनाढठथ का 
रलौ का करंडिया ( उव्वा ) टता दै जिसकी सदायता से वह व्यापारादि 
करियापः कर सकता है, ठीक उसी भकार क्नान, दशेन श्रौर चरिजरुपी रत्न 
करंडियोको वे धारण करेन वालि तथा कुजिकापण (द) के समान 
थे । जिस पकार देवाधिष्टेत दृष्टस सर्वं प्रकार की वस्तु उपलन्धदो 
सकती हैः ठीक उखी प्रकार उन स्थविर भगवन्तो से सवै धकार के क्षानादि 
पद्‌पथौं की प्रास्ि दोती थी तथा सध प्रकार के प्रश्नो के उत्तर लिक्षा जनों 
को उपलब्ध दोतेथे। श्सी कारण चे परवादी का मान के मर्दन करने वाले 
तथा च्रकार्य युक्तियो से स्वसिद्धान्त को सिद्ध करने वले थे । द्ादशांग 
वाणी तथा समस्त गुणपिटक के धरन वाले, श्र्थात्‌ जिस भकार शृदस्थ 
लोगे+ का स्य बहुमूल्य पदार्थं पिरक मै रदा करता दै खक उसी भ्रकार 
समस्त श्रतक्षान -उनमें ठर इश्या दे, प्रतः वे दादशाङ्ग श्राचायै के पिरक 
समान ह । इसी लिप लिखा है कि-यद दादशाज्ञ श्त के पिटक दै। वे स्थिरः 
भगवान्‌ समस्त गुण पिटकस्य भ्रकार के श्रक्षर सन्निपात केचेत्ता थे । क्योकि- 
सै ध्रकार का श्रक्तरक्षान शब्दागम (व्याकरण) दारा ही हो सकता है इतना री 
नहं किन्तु-स्वभाषा बल से सर्वं भापाश्रो मै वातचीत करने म शक्त थे । 
द्या छनन देवभाषा इत्यादि समस्त भापाश्रो के पूण विद्धान्‌ होने सेवे 
जिन भगवान्‌ सो नदी किन्तु जिन भगवानूचत्‌ यथाथ पदार्थे `का वरन 
करेन वले थे! ेखी शाक टोने पर भी सयम श्रौर तप दारा श्यात्मा 
की शुद्धि कस्ते दप् वे स्थाविर भगवान्‌ श्री भगवान्‌ के साथ विचरते य । 

दस सत्र से यट भली भांति सिद्ध हो जाता "टै कि यावत्काल पर्यन्त 
आत्मा क्षान सपन्न नटी दता तावत्काल पयन्त कोद्र भी संयम क्ियाश्नोंमे 
रमण नदीं कर सकता । क्योके-जव कषान द्वारा पदार्थों का स्वरूप भली रकार 
जान लिया जाता है तभी देय-(त्यागने योग्य) क्षेय-( जानने योग्य ) वा 
उपादेय-(यदृण करने'योम्य) पदार्थो का यथावत्‌ क्षान दो जाने के पश्चात्‌ 


( १५९ ) 


भी उसक्यै उपेक्ता करने की चा करनी चाहिए! कारण कि-सांसारिक कर्तव्यो 
मे भागतेने से सेयम माम मे शिथिलता श्राजाती दै । इसलिए पापमय छत्यो 
के करने मे उपेक्ता करनी री योग्य है। वस इसे हयी उपेत्ता सयम कते है । 
९२ ध्रमायना सयम--जिसख स्थान पर वैठनादो वा शयन करनादो उसं 
स्थान की यत्न पूर्वक प्रमाजना करलेनी चादिप्य । कारण कि-भमा्जना करने 
से री जीवरक्ता भले भ्रकार की जा सकेगी । १४ परिष्ठापना सयम-जो वस्त॒ 
परिष्टापन कस्ने ( गिराने ) योग्य हो जैसे-मल मूत्रादि तो उन पदार्थो को शद्ध 
शौर निर्दोष भूमि भे परिष्ठापन (गिरना) करना चादिष्ट जिससे फिर अरसेयम 
न टोजाचि । १५ मनःसयम-~मन मै किसी जीव फे प्रतिकूल वा दानि 
करने चालते भाव न उत्पन्न करने चापं श्रपितु मनमे सदेव" धार्मिक 
भाव ही उत्पन्न करने चादिं । इसी का नाम मनःसयम दै ॥ १६ वाक्सं- 
यम-वचनयोग को च्व करना, तथा कुशल , वचन सुख से उच्चारण 
करना । [ज्ञनके वोलने से किसी जीव को पीड़ा उत्पन्न टोती हो, उस 
अकार के वचनो का 'निसोेध करना, इसी का नाम वाक््-सेयम हे । 
९७ काय-सयम-गमनागमनादि क्रियां फिर घिना यल न करना, इस 

का नाम काय-सयम है । जव सुनि ध्यानाचस्था मे लवलीन रदेगा 
तव मन, वचन श्यौर काय-सयम भली भकार से साधन क्ियाजा सकेगा। 
जिस के श्रन्तिम फलरूप निर्वाणद की प्राप्ति उस सयमी च्रत्मा को 

श्रव्यमेव टो जायगी क्योकि-जव उक्त प्रकार से सेयम श्राराधन क्रिया 

जायगा तव सुनि अपने ध्म मे श्रवश्य प्रविष्ट टो जायगा । † 

श्च रश्च यद्‌ उपस्थित होता दै फि-जव सुनि च्रपने धम में मविष्ट 

खोता है, तव मुनि का निज धर्मं क्या दै ? इस अश्न के उत्तर में कटा जाता दै 
कि-शाखकारोने मुनि का धर्म दश प्रकार से पतिपादन किया हे । तथाच पारः-- 

दसिहे समण धम्मे प. तं ०--खती १ छतती २ अज्जवे २ मद्वे ४ 


ज्लाघवे ५ सच्चे ६ सजमे ७ तवे ८ चियाए & वैभचरबासे १० ॥ 
समवायागसूत्र समचायस्थान १० ॥ 
+ श्रश्ष-्रस्थक व्यक्ति के कटे इष्ट दुर्वचनो का सहन करना, फिर उन पर 
भन से भी बोध के भाव उत्पन्न न करने, रौर इस वात पर सदैव विचार 
करते रहना किस भकारः शब्दो का कर्ेन्द्रिय मे भावेष्ट होने का स्वभाव है 
उसी अकार इन शब्दो के दार को सहन करने की शक्ति सु मे दोनी चाहिय 
इत्यादि भवनाश्मों द्वारा स्मा धारण करना ॥ ९ ॥ - फिर बाह्याभ्यन्तर से 
परिघ्रह का त्याग करना अर्थात्‌ लोभ का परित्याग करना ॥२॥ मन, वचन 
चर काय की कुटिलता का परित्याग करके ऋजु ( सरल ) भाव धारण 


( १५२ ) 
अथ तृतीया कलिका । 


इसके पूं देवगुर का खरूप कफिञ्िन्मात्र प्रतिपादन किया गया है 
कन्तु श्रव धम करे विषय म भी किञ्िन्माच कना उचित दे । क्योकि-देव' का 
भनिपादन कियारा ही तास्विक रूप ध्म होता द, उसी कौ सम्यक्तया 
श्राराधना करने से श्रलत्मा गुरुपद को प्राप्त कर निर्वाण पद पाता हे । 
श्ननपव म्त्येक प्राणी का कसैव्य हे कि--वद श्रात्म-कल्याण करने कै लिप 
देव-गुर श्र धर्म की सम्यग्‌ भावे( से परीक्षा करे । क्योँकि-जो सोसारेक 
पदाथ चराद्य होता हे, सर्व प्रकारसे पू्यैमे उसी की परीक्षाकी जाती देै। 
परन्तु जव श्रास्तिकर चन कर परलोक की सम्यष्ट्तया श्रारयाधना करनी 
[ उक्त पदार्थो की भी सम्यक्तया परीत्ता श्रव्यमेव करनी चादिए । इस 
समय धर्म के नाम से यावन्माज् मत खुप्रालिद्ध होसर्दे है, प्रायः वे सव सम्यम्‌ 
लान स राहित होकर केवल पारस्परिक विवाद, जथ, पराजय श्रौर पत्तापातमे 
निम्र दो रहे दे । जिनके कारण वहुतसी भद्रं श्रात्मार्पः धर्म से पराद्मुखं टोगई 
द, रीर भका सागर मे गोते खाति है। इसका मूल कारण केवल इतना दी है कि- 
लोगो ने केवल धर्म शब्द का नाम दी खना है, लेकिन उसके भद तथा स्थानो को 
नदीं समा है । इसीलिये परस्पर विवाद श्नौर जय पराजय का अंखाड़ा खुला 
गहना हे, जिसमें भरनिदिन मल्ुद्ध के भावो को लेकर प्रत्येक व्यक्ति उक्त खाद 
म उतरती दै । उनकी एेसी श्रयोम्य कीड़ा को्देख कर दशक जन उपास की 
नाल्यां वजात हे । यदी कारण दै कि-घमं श्रोर देशोश्नति श्रधोगाति मे गमन 
कर रहे है । इसमे कोई भी सन्देह नदी है कि-वाचालता की दी त्यन्त उन्नति 
चस युगमे दो रदी दहै। परन्तु जेन-शाखकारो ने धर्म शव्द की व्याख्या इस 
नीतिसि की दे कि-उसमे किसी के भी विवादे करने का चुक् उपलब्ध नदीं 
टोता । क्योकि जव धर्म शब्दे के मर्म को जान लिया जातादे तो खयं पारस्परि- 
क चिवाद्‌ तथा वैमनस्य भी अन्तःकरण से उखं जाता हे \ प्रायः देखा जाता है 
कि-वद्ुत से ्यनभिक्न वा दटग्रादी च्रात्मार्पे केवल धृञ्‌-धारणे धातु के शयथे 
को लेकर मान वेे है किं-जिसने जिस वस्तु को धारण किया है वदी उसका 
धर्म है, पेसी बुद्धि रखने वाले संजनों केमत से कोई भी संसारम श्रधरम नदी 
ह, .क्योकि-जो कृं उन्हो ने धारण किया है, उन के विचाराचक्रूल तो वद धमं 
ही हे] अच बतलाना चपहिष्ट (के-अघम क्था चीज है ट श्रौर ध्म क्या चीजदे 
उनके मताजक्रूल त पक व्याघ ( शिकारी ) जो जीवो को मारतो फिरेता हे, 
उसकी पाशविकक्रियाभी एक धमं हे, एवं चोरं चोरी कर रहा है, वह भी धर्म हे, 
श्मन्यायी ्नन्याय कर रदा है,वदह्‌ भी धमे हे, व्यभिचारी व्यभिचार कर र्ट हे, चद 


( १५५ ) 


छुरथरा ५ गणथेरा ६ संषथेरा ७ जातिथेरा = सुयथरा & परिताय- 
थरो १०। टणागसूत्र स्थान १० ( सू०७६१ ) 

चृत्ति--दसेत्यादि, स्थापयन्ति-दुर्व्यव स्थितं जनं सन्मार्गे सिरीकुर्वन्तीति 
स्थविंखः तच्र ये त्रामा नगरास्तेषु व्यवस्थाकारिणो वुद्धिमन्त श्रदियाः भ्रभ- 
विष्णवस्ते तत्र स्थविरा इति ॥ १-२-३॥ प्रशासति शित्तयन्तिये ते श्रशास्तारः 
धम्मोंपदेशकास्ते च ते स्थिरीकरणात्‌ स्थविराश्चेति प्रशास्वस्थविराः ॥ ४॥ 
ये कुलस्य गणस्य सदस्य च लोकिकस्य लोकोत्तरस्य च व्यवस्थाकारिणः 
निप्रादकास्ते तथोच्यते ।॥५-६-७। जातिस्थविराः पण्िवपपरमाणायुष्मन्तः ॥ ८ ॥ 
श्रतस्थविराः समवायाद्यङ्गधारिणः ॥६॥. पर्यांय-स्थाविराभर्वशासवपप्रमारप्रव- 
ल्यापयौययन्त इति ॥ १० ॥ 

भावा्थ-दइन दोन सूत्र का परस्पर इस प्रकार सम्बन्ध है, जिस पकार 
रूप शरोर रस क्रा परस्पर सम्बन्ध होता है क्यौकरि-जिस स्थान पर रूप दै 
उसी स्थान पर रस भी साथ दी प्रतीत टोने लगता है, इसी भकार जां पर 
रस होता है रूप भी वदां पर श्रवश्य देखा जाता हे । परन्तु इस तरद्‌ कभी 
भी देखने मँ नदीं ्राता कि-पदार्थोमेरूपतो भले प्रकार से निवास करे 
श्रौररसनकरे, श्रौररसटोतो रूप नदो । जिस पकार इन दोनों का 
श्रविनाभाव सम्बन्ध दै, ठीक उसी भकार बहुतसे धर्म श्र स्थविरो का भी 
परस्पर श्रविनाभाव सम्बन्ध दै ! क्योकि-धम से स्थविरे की उत्पत्ति है श्रौर 
स्थविर ही धस के नियमों को निश्चित करते है, तः दोनो का परस्पर 
श्मविनाभाव खम्बन्ध माना । वहुतसे धर्म इसलिये कथन किप गप दै केि- 
प्रस्थिकाय (““द्स्तिकाय धर्म”) यदह स्वाभाविक धमं पदार्थो का स्वभाव) 
प्रनादि श्रर्नत माना गया है । किन्तु फिसी भी स्थविर ने पदार्थो का धर्म नियत 
नीं किया हे । इसी प्रकार पाखंडधर्म" के स्थावर भी वास्तव मं नदी माने जति 
दे । स्थविर शब्द्‌ की व्युत्पत्तिः यद्‌ नदी दग्शौती हे कि-स्थाविर ही पाखंड धर्म 
के प्रवकः दते दै, चे तो पाखडधर्म के विध्वंसक माने जाते दै । लिखा भी दै 


न तेन थेरो सो होति, येनस्स फलितं सिरो । 
परिपको चयो तस्स, मोधानैणणोति बुचति ॥५॥ 
यमम्हि सच्चं च धम्मो च, अहिंसा सेजमो दमो । 
सचे बन्तमलो धीरो, सो थरो ति पबुचति ॥ ६॥ 


धम्मपद्‌ धम्मटूटवगा १६ वा गा-५-६ १ 


श थ--जिस के मस्तक के केश्त श्वेत होगणए है, बद स्थाधैर नदी टोता। 


( १५७ ) 


रूपी प्राम कदापि सुरक्तित नदी रह सकता 1 प्रस्युत व्याधियुक्त होकर शीघ्र 
री परलोक की यात्रा के लिये कटिवद्ध हो जाता है । सारांश यद टै कि-दोनेौ 
कार के भ्रामो की व्यवस्था को ठीक करना उसी का नाम ग्रामधर्मदहे! भाम 
जिस प्रकार उन्नति के शिखर पर ारूढ्‌ दोजाष्‌ श्रौर ्रामवासी जन श्ानेद्‌ 
पूर्वक श्रपना जीवन व्यतीत करसके इस भकारः के नियम जो स्थावरो ने 
वांथे दे{ उन्ही का नाम त्रामधर्म है । 

२ नगरधर्म--परति नगर का भिन्न २ पकार से आचार व्यवहार रोता 
हे, परन्तु जिन नियमो से नगर वासी जन शांति श्रौर श्यानन्द्‌ पूयैक अपना जीवन 
व्यतीत कर सके, पेसे नियम जो स्थाधेरो दारा वांघे टो, उन्दी का नाम नगरध्म 
है । क्योके-स्थावेरो को इस वात का भली भांति क्ञान टोता है किव 
नगर दस व्यवस्था पर श्रारहा दै, इस लिये श्रव देश या कालाजुसार इन 
नियमो की योजना की श्रावश्यकता है । जैसे कि--जव नगर व्यवहार या व्या- 
पार की उन्नति के शिखर पर पटच जाता है श्रौर जिसके कारण व्यापा वग 
ध्र के लाभके लिये सांसारिक उन्नति के शिखर पर पहंचते है, उस 
समय लेग विवाह शादि शभ क्रियाश्च मे मनमाने घन का व्यय करने लग 
जाते है । उन्दै उस समय किसी पकार की भी पीड़ा नदी होती, परन्तु जव 
व्यापार की क्रियां नेल पड़ जाप श्चौर फिर भी उसी भकार विवाहादि 
क्रियाश्रो मे धन व्यय किया जाए तो उन लोगो को श्रवश्यमेव कणौ का सुह 
देखना पडे ! परन्तु उस समय तो नगर के स्थविर उन नियमो को वांधलेते दै जे 
उच्य तेत्र काल श्रौर भाव के श्रुलार दोति है, जिनके द्वारा नगरवासी जन 
धन के न्यून दोजप्ने पर भी उक्त करियाश्ो के करते समय दु-खे का भव 
नदी करते । इसी का नाम नगर धर्मद ! नगरधम उसको भी कदते है जिसमे 
करन लगा दो । इस शब्द से निश्चित होता दै ।के-पूर्वै कालमे जव राजे लोग 
नगर वभ स्थापना करते दोग तव उस्र की चृद्धि के लिए कं समय तक कर 
नट लगति सगे । यद्‌ {नियम श्राजकल भी कतिपय मेडियों मे देखाजाता ह । 
सारांश यह निकला कि प्रति नगर का खान, पान, वेप, भाषा, कला, कौशल 
इत्यादि भायः भिन्न २ दोती है । श्रतः जो नगरः स्थविरो द्वारा खुराक्तित दोरा 
ट उसी को नगरधर्म कहते है । 

३ राष्टूधर्म-राष्ट्‌ शब्द देश का वाची हे । जिस भकार देश की विगडी हुई 
व्यवस्था ठीक दोखके उसी का नाम देशधर्म है । ययपि देश शब्दकेसाथ द्यी 
राज्य ध्म की सत्ता भी सिद्ध दोती है, तथापि राज्य ध्म को सू्न-क्ती ने 
थक्‌ नदी माना है, क्योके -राजा का सम्बन्ध देशकेदटीसाथदहैराजा द्यी 
देश का सरक्तक दोतः है, इसलिये राजा वा राज्यधिकारौी लोगो को सूज-कतौ 


{ १९५६ ) 


को राष्टेय स्थविर भली प्रकार विचारा करते हे 
४ पाखडधर्म-जिन कायो मे वाहरी श्राडस्वर तो विशेष हो, परन्तु 
श्चमे फा श्रश सर्वथा न पायाजाय उसीको प्राखडधर्मं कते है । जैसे कि-सम्य- 
गदशन सम्यगक्तान श्रौर सम्यग्‌ चरि कातो लेशमात्र भ न हो, परन्तु काय- 
क्ट तथा संन्यासी होकर दस्त की सवारी, डेरा, तम्ब , वाग, वयीचे, ्ाखाडे 
छादि की सयोना करनी तथा सदस्यो वा लाख रूपयों पर धिकार रख 
कर परिव्राजकाचार्य चा मर्हत तथा दंस परमहंस वन वैठना, ये सव 
उक्त क्रिय सुनि धर्म सर रदित करने वाली दोती है। क्यकि-ये ही उपाधियां 
तो गृदस्थाथ्म मे थी. फिर जव संन्यास धारण कर लिया तव भी अगर 
न, भूमि च्चौर स्त्रियो की उपाधि पीके लगी रदी, तो चलु्थाश्रम धारण 
करने क ्ावश्यकता ही क्या थी ? शोक से लिखना पड़ता है ! यदह श्ार्य- 
भूमि प्य काल मे ऋपि महर्ियो से उशोभित दोर्‌ थी, परन्तु श्राजकल भायः 
डस भूमि म उक्त पदौ की केवल संक्षापं मात्र रदगरई दै, श्रोर तो क्या कोर भी 
कुरूत्य पेखा नद्य जो वे नामधारी सुनि ( साघु ) नदी करते, श्रपितु सभी 
रत्य चे कर वैखते है। न्यायालयं मे उनम भगड़े विद्यमान रहते हे, राज- 
कीय दृरड वे भोगते दै, भव्य श्रभच्य पदाथ के मक्तण करने मे उनका को्भी 
विवेक नही, यावन्मात्र मादक द्रव्य है, प्रायः उनकी वे लोग श्रानन्द्‌ पूर्वक सेवन 
करते ह । फिर भी वे श्चास्तिको के शिरोमांणे बनने का साहस रखते है, धर्मात्मा 
वनने का लोगो को विक्ञापन पत्र देते रहते ह ्रथत्‌-पवं विध कृत्य करते हुए भी 
चे धर्मात्मा काते हे। श्रव वतलादये यद पाखड ध्म नदी है तो श्रौर क्या दै ? जिस 
पकार सन्यासी लोग क्रिया से पतित दोर टै, उसी पकार उदासी वैरागी निर्मले 
श्नोघडे पोप आदि लोग भी श्वा का धायः नाम दी भूल गये है! देशो मे धर्मोन्नाति 
के स्थान परचे लोग ध्म केो( श्रधोगामी वनारटे हे । क्योक्षि-उक्त नाम धांरियो क्य 
सगति से भायः धनी लोग व्याभिचार करना सीख जाते दै, जिन्टे कोई व्यसन न 
लगा वे लोग भी उक्त महात्मायो की सेगति से व्यखनसेवी वन जाते ह! 
ज्ञेति कि अगर कोई भद्र पुरुप इन के डरे शादि स्थानो मे जाता है तो उस 
भक्त को भांग चरस श्रादि का स्वभाव तो स्वाभाविकता से पड़ ही जाता दैः 
चयोकि-प्रायः शिष्य सद्‌ा गुरु का ्रलुकरण करने वाला ही होता दै 1 जव वे 
अपने गुरुश्रौ की सव्कपा से व्यसनी चन जाते है तव॒ उनको धनके स्र 
करने की अत्यन्त उर्कर इच्छा दोजाती है। परन्तु वे कोई काम करना नदी चाहते 
पजखसे उनको फिर जुष्ट रौर चौर्यै कम का सदारा लेना पड्ता दै । जव 
चे उक्त क्रियाश्रो म लगगपट तो फिर कौन सा दुष्डत्य दै जो उनको 
नि्रव न करना पदे! अतःये सव पाखड धर्म है तथा ्राजकल वडुत सी ्ात्माप्‌ः 


( शद }) 


यदि एक शुरु के शिष्यो का परिवार विस्ठत दोगया हो, तो उसे फुल कते दै 
फिर उनका जो परस्पर सम्बन्ध दहे, चा गच्छ समूदात्मक दै, उसका धर्म 
श्रधात्‌ समाचारजो हे उसी का नाम कुलधर्मं हे । उस धर्म को खीक पालन 
करनेके लिप जो नियमों को निर्माण करना दे यदी कुलस्थविरो का कर्तव्य 
द । कुलस्थविर सदेव काल इसी वात के विचार मरह, जिससे कुलधर्म 
भली प्रकार से चलता रहे। जिस प्रकार लौकिक कुलधर्ममे यदि कोर उुटि 
श्रागददेदो तो उसे फुलस्थधविर दूर कस्ते है, इसी प्रकार यदि धार्मिक फल- 
धर्म॑ मे कोई व्यक्ति स्वच्छुन्टवृत्ति दोगया हे, तो धार्मिक कुलस्थविर 
उसच्रटिको दूरकरने कीचेटाकरे साथी दस प्रकार की नियमावली 
निमौण करे. जिस से कलधम ॑श्रच्छी प्रकार चलता रदे । जेसेकि- कलः 
समाचार, परस्पर चन्दना, व्यवदारस्त्र, श्रशप्रदान, उपधान, तप, स्वाध्याय, 
ध्यान, च्युत्सर्ग इत्यादि क्रियार्पे जो कुल मे चली श्रातीद्ो वे उसी प्रकार 
चलती रहे, इस प्रकार के धर्म के प्रवर्तक कुल स्थविर ही टोते हैं । 

६ गणधर्म--श्रनेक कुलो का जो समूह है, उनका ज परस्पर सम्बन्ध 
उस सम्बन्ध की व्यवस्था ठीक प्रकार सहो र्दीदै तोउसको गण 
धमे कहते है । यद्यपि गण शब्द समूह का वाची हे तथापि रूढि से यह शब्द्‌ 
श्ननेक स्थानों मे व्यवहृत हो रहा दै । ्राचासंग सूत्र के द्वितीय श्चुतस्कन्ध 
के पाठसे निश्चित होता टै कि-पदिले समय मे गणधम का प्रति पचार था । 
क्योकि-वदां ¶जिस स्थान पर जो राजाश्रो की गणना ्राती है उस स्थान पर साथ 
ही यदह पद पढ़ा गया है कि--“गखराज" जो गण की सम्मति से राजा दुश्रा 
हो, उसे गणराज कते ह अर्थात्‌ जिस प्रकार श्राज कल शमेरीकादि देशो मे 
"गणराज" पद की स्थापना की जाती है उसी प्रकार पूर्वं काल मे दाक्तिणात्य 
भारत मे भी वहत से व्यक्ति गणराज पदारूढ्‌ दोते थे । जेसेकि-- निरया- 
चली स्र में लिखा दै कि-नवमरली जाति के राजे शरोर नवलच्खी जाति 
के राजे काशी श्रौर कोशल दश पर गणणज कर्ते थ! प्रजा की सम्मति- 
पूर्वक उन व्यक्तियों को रजसिदासनारूढ किया जाता था, फिर वे नियत 
समय तक रजा शासन करते थे. श्रौर उनकी श्चाज्ञा परजा सम्यन्छतया 
पालन करती थी । परन्तु वह श्राज्ञा नियत समय तक दही रहती थी। 
गरराज प्रजा की सम्मति से इस प्रकार दोते थे, जिस प्रकार श्राजकल मेम्बर 
चुने जाते दे ! तथा जव हम इस से छोटे पक्त मे श्रति है, तव गणराज एक छोटे 
से देश म पाते ह, जेसेकि-जो छोटे २ ऊलो का एक समूह होता है उसी 
को गण कते है, फिर सव की सम्मतिसेजो उस गणका नेता चुना जाप 
उसी का नाम गणराज पड़ता हे, जिसे अज कल लोग प्रधान (ग्रेजीडेर्ट ) कते 


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( १६२ ) 


द । सारा गण उस प्रधान की श्रान्ता पालन कर्ता रहता द। श्रीशम्‌ 
भगवान्‌ महावीर स्वामी ने जव श्रानन्द्‌ गृदस्थ को धावक के १२ नियम धा- 
रण करवा दिये, तव श्रानन्द्‌ श्रावक ने श्री भगवान्‌ से प्रार्थना की फि-इन 
गृदीत नियमो को मे चुः कारणे! के चिना यत्न पूर्यक पालन करुगा । उन्दा दुः 
कारणो मे प्क कारणए“गणभिच्रोगेणं” गणाभियोग लिखा ह रथात्‌ किसी 
करारणसे मुभे यदि 'गण' कँ वाष्गण॒ पति'कटें तो मुभे वद काय करणीय दोगा 
परन्तु मेया गृदीत नियम खंडित नदी समभा जायगा । कारण कि-उस कृत्य- 
को गण करवा रा है वा गणराज की अघ्ासरे मै वद कार्य कर रहा हं 
इत्यादि । इस कथन से यह भली भांति सिद्ध दो जाता दै-कि पूर्य काल मे 
गण वा गणराज का किस प्रकार चारु परवन्थ चलता था? वार्मिक छक्त्या 
के धारण करते समय भी गणधर्म का श्रवश्य ध्यान रक्खा जाता था ! साथी 
इस चात का भी विशेप ध्यान रक्खा जाता था कि-दमारे गणमे किसीकारण 
सरे फट न पड़ जाय जिस के कारण गणधम का फिर सन्धान करना 
किन दोजाए । कारणकि-गणधर्म मे विप्च उपस्थित करना तो खगम दै परन्तु- 
जव गण मे फुट पड़ जाती है तव गण का खुधार दोना श्रति कठिन दो जाता 
हे, श्रत गण मे परस्पर वैमनस्यभाव उत्पन्न नदी करने चादिणं । जिस भकार 
नियमो डारा गण खुरक्तित र सफर, प्रस्येक व्यक्ति को उसी विचार मे रना 
चाहिए । गण शब्दं का दी पञ्चश श्राजकल वरादरी शब्द्‌ भचलित दोरा है, 
गणस्थविर के नाम पर चोधसी शब्द व्यवहृत दोरा दे । सरतपव वही चरा- 
दसो खाक काम कर सकती है जिसके चौधरी दन्त श्रौर वराद्सये को उन्नति- 
शाली वनानि मे दत्तचित्त होकर काम करं । क्योकि-जव गण ( चराद्री ) गण 
स्थविर (चोधर) के वशम होगी वामालाके मियो के समान पकसू्न मे 
श्रोतमरोत होगी तव जे गण मँ श्रापत्तियां होगी स्वयमेव शान्त दोजायेगी । 
जिस प्रकार माला की मणियें (मके ) एक सूत्र मे श्रोतप्रोतत होकर स्मरण 
मे सदायक दोते हु देवताश्नौ का ्राद्यान कर लेती है वा परमात्म-पद्‌ की 
पात्ति करा देती है, उसी प्रकार गण का ठीक प्रकार से सगटन अनेक पकार 
के कष्टो से विमुक्त करके ख श्रौर शांति की प्राप्ति कराने लग जाता है। व्यव- 
हार पत्त मे संगठन को देखकर प्रतिक्रूल व्याक्तेयां पने श्राप वैरभाव को 
छोड कर उन से मेल करने लग जाती है । तथा जो काम राजकीय सम्बन्धी 
दो उन्हे गणस्थविर खख पूवक करा सकते हे । धामिक्‌ काय भी गण स्थविर 
चड़ शांति पूर्वक कराते हप नगर वा देश मे घर्म-उद्योत कर सकते हे । रतव 
सिद्ध श्या कि~कुल धर्म ठीक होजाने पर गण धम भी भल्लीप्रकार चलसकता 


भ 


दे, गणधम ठीक दोजाने से गण मे शांति रर परस्पर प्रेम का सर्यपकार से 


( १६५ ) 


हे वयव सुरात्ित न रह सके, परन्तु श्रांखो के सुर ्तित रहने पर उन श्रवयवो 
का भली प्रकार प्रतिकार पिया जा सकता है । ठीक इसी प्रकार सधधम के 
स्थाधिये के साथ यदि फुलधम के स्थाविर श्रौर गणधम के स्थविर भली 
प्रकार सम्मिलित हो जायं तथा परस्पर तीनो स्थविरो की सम्मति मिल जाय 
चा परस्पर नियमो मे उनका वैमनस्यभाव उत्पन्न नहो या कुल धम केस्थ- 
चिर शरैर गण धके स्थविर भली पकार श्रपना पत्त त्यागकर सघ ध्म के 
स्थविरौ कश राक्षा पालन करै, तो दिनप्रतिदिन सघधर्म श्चभ्युदय को पराप्त 
दो जाता हे । क्येपकि -"सघधर्म" शव्द की वृत्ति करने वालि लिखते है “संघधम- 
गेसमाचारा » श्रथीत्‌ सघ धर्मं उसका नाम है जिस की उन्नति के उपायौ का 
अन्वेषण ग्रामस्थविर, नगरस्थविर, साष्ट स्थविर, भरशास्तस्थविर कुलस्थविर 
श्नौर गणस्थविर प्कनर दयोकर करः तथा उक्त धमो को सुराक्तित रखने 
के लिये देशकालानुसखार नियमो की संयेोजना करैः । जिस भकार संघधमे 
के मुख्य श्रवयव कुःलस्थविर श्रौर गणस्थविर पूय लिखे जा चुके दै, ठीक 
उसरी प्रकार खघधभे के मुख्य श्रवयवरूप राष्ट्स्यविर तथा न्य स्थः 
चिर भी हे। कारणकि-यावन्मात्र धमै ऊपर कथन कयि जा खके दै, रौर याव- 
स्मात्र उनके स्थविर प्रतिपादन किये गये है, उन सवका पएक नियत समय पर 
एकच होना किर परस्पर देशकालाजुसार उक्त धर्मों के नियमो पर विचार 
करना, इतना ही नदी ्रपिलु सर्वध्मो कौ दशाश्नों का अन्तरंग दष्टेसे 
श्रवलोकन करना, उनकी चृद्धि श्रौरः हानि की श्रोर ध्यान देना, सव की 
सम्मति के श्रसार वा बहुसम्मति पूवैक भस्ताव पास करना, इत्यादि 
को भी सघधम कहते है ! जिस भरकर जनमत मे समयासरार कुलकर 
जगत्‌ की वा कर्मभूमियोकी व्यवस्था सीक वाधते आण हे, उसी प्रकार 
परमत मँ स्खतिकार भी देशकालाजुसार नियम चांधते रटे है । परन्तु 
उन स्छ्रातिकासौ ने विशेष दुरदशिता से काम नदी लिया । क्योके-यायः 
उनकी स्म्रतियो मे भक्याभच्य पर विशेष विचार नही किया गया । कडयो ने 
तो श्रतिधिसत्कार मे पश्व भी लिख डाला है, तथा अन्य कई भ्रकार से 

ट च्धच्स्य क चलर्भ्यय म लिखा है कि-पिकदेवतातिभि 
पूजाया पञ्च हिंस्यात्‌ । मधुपर्के च यज्ञे च पितृदैवतकर्मणि । ्रत्रैव च पशु हिस्यान्नाम्यत्यन्वौ- 
नमतु ॥ नात्वा प्राणिना दसा माससुत्ययते कचित्‌ ॥ न च पआशिवध" स्वम्बस्तस्मायमि 
वधोऽबध | श्वापि व्राह्मणाय चा राजन्याय वा अभ्यागताय बा महो्त वा महाज वा पचेदेवमस्या- 
तिथय दुर्वतीति ॥ 

पितर देवता श्रार तिथि इनकी पूजा मे पशु कौ दिसा केरे । कारण कि-मलु का यह वचन 
टै कि--मधुपकं मे यन मेँ पितर्‌ शर देवता्यो के निमित्त ज कम दै, उन में पशु की हिसा कर, 





( १६७ } 


से उपमा देकर श्रतंकूत किया गया है, जसे कि- 
तव संजम मयलंखण श्रकिरियराुयहदुद्धरिसनिच्चं ! जय सेधचन्द्‌ ' 
निम्मल सम्मत्त विसुद्ध जोर्हागा ॥ 


चात्ति-तपश्च सयम तपःसयमे समाहासे इनः तपःसेयममेव सग- 
लाञ्छुन-सृगरूपं चिदं यस्य तस्यामंजरं, दे तपःसयमणगलाज्छन ! तथा 
न वियेतेऽनभ्युपगमात्‌ परलोकविपया क्रिया येषां ते श्चक्रिया-नास्तिकाः त 
एव जिनप्रयचनशशाङ्ग्रसनपरायरएत्वाद्रादुः तस्य सुखमिवाक्रियराटसुखं तेन 
दुप्परधृप्यः-श्रनमिभवनीयः तस्यामंच्रणं दे धक्रियराहुसुखदुप्यधृप्य ! 
सेघश्छन्द्र इव सहचन्द्रः तस्यामब्रे दे सेद्चचन्द्र ! तथा निमल-मिथ्यात्वमल- 
रहितं यत्सम्यक्त्वं तदेव विशुद्धा ज्योत्स्ना यस्य सख तथा “शेषद्धे" ति कः 
पत्यथः, तस्या मेरे हे नि्मलसम्यक्त्वविगुद्धल्योत्स्नाक ! दीधेत्वं पागिव- 
भारतलक्तणादवसेयम्‌, “निच्च “नित्यं” स्वकालं “जय सकलपर- 
दगीनतारकेभ्योऽतिशयवान्‌ भव, ययपि भगवान्‌ सद्वचन्द्रः सदेव जयन्‌ 
चर्दते तथा-ऽपीत्थं स्तोतुरभिधाने कुशलमनोवाक्ाययच्रत्तिकारणमित्य- 
दुष्म्‌ ॥ पुनरपि सद्वस्यैव भ्रकाशकतया सयैरूपकेण स्तवमाद-- 

भावाश्च-दे तपःसयम स्रगलाज्खन बाले ! दे श्यक्रियरादुसुखदुप्प्ध्॒ष्य ! 
हे संथचन्दर्‌ ! हे निर्मल विशुद्ध ज्योत्स्ना के धारण करने वाले ! तेरी स्वेदा जय दो | 
इस गाथा का सारांश इतना दी है कि-स्त॒तिकार ने श्रीसध को चन्द्र की 
उपमा से सवोप्ित किया हे । जेसेकिःदे सधचन्द्र ! जिस प्रकार चन्द्रको खग 
का लाञ्छन टोता है, ठीक उसरी भ्रकार श्रीसेघ रूपी चन्द्र को तपसयम रूपी 
खग लाञ्ुन ह । इसी लिये इस का यह श्राम्ण किया गया दै कै-दे तपः 
सेयम रूप खग के लाल्छृन वाले ! फिर जिन की परलोक विपय क्रिया नदी रही 
रसे ज नासितिक लोग दै, वेी जिनधवचन रूप चन्द्रं के भ्रसनपरयण 
रोने सखे राहु के समान है उन से जो पराभव करने योग्य नही है । प्रतःश्री 
सेध के लिय यद चामेचण किया गया है कि-दे अक्रिय राड सुखदुष्मश्रप्य ! 
तथा जिस धकार चन्द्र नियैल होता द ठीक उसी प्रकार भेध्यात्वरूप मल 
सते राहेत जो सम्यक्त्व हे, चदी उस्र संघ रूप चन्द्र कौ विथ॒द्ध ज्योत्सा 
(चांदनी) दै! इसलिये यद श्रामेज्ण किया गया है किदे निमेल सम्यक्त्व 
विशुद्ध व्योत्सा वाले सध चन्द्‌ ! तू सदैव काल जय करने बाला दो! यद्यपि 
भगवान्‌ सेध चन्द्र सदेव जय कतौ होकर दी वतै रदा है, तथापि यहां पर 
स्तुति करने वाले के मन वचन नौर कायं कुशल अद्वात्ति रूप दोनेसे इस कथन 
से कोई स्ापत्ति रूप दोप नदी हैः ॥ 


{ १६६ ) 


करता रदता है, परन्तु इस चात को खीक स्मरण रखना चादिप् कि-जव 
तक ग्रामस्थविर, नगरस्थविर, कुलस्थविर, वा गणस्थविर राष्टरीय स्थविरो 
के साथ सहमत न दोगे, तव तक सघस्थविरों के उत्तीर किए हुप भस्ताव 
सवे कार्य-साधक नदी टो सकते । इस कथन से यद तो स्वतः दी सिद्ध दो 
जाता है कि सघधर्म श्रौर सघस्थाविरो की कितनी श्रावश्यकता हे ? इस 
लिये सघध्म की सयाजना भली अकार से दोनी चादिपएट। इसलिये सूतर- 
कतौ ने दृश स्थविरो की गणना मे एक तरह के “पसत्थारथेरया" ^प्रशात्‌- 
स्थविरा" लिखे है, उनका मुख्य करषव्य दै किये उक्त धर्मो का श्रपने मनोहर 
उपदेशो ढारा खथ अचार कसते रे । जैसे कि-“्रशासति-धिक्तयन्तिये ते भशास्तारः 
धर्मेप्दिशकास्ते च ते स्थिरीफरणात्‌ स्यविरारचेति प्रशातृस्थविरा "क्यों कि-प्रशाच्‌- 
स्थविर प्राणीमात्र के णुभाचतक दोते है ' दसीलियि चे श्रपने पवित्र उपदेशों 
ढास भाणीमात्नर को धमे पक्त मे स्थिरीभूत करते रदते है । कारण कि- 
नियम प्यक की हुई क्रियर्पे सर्य्न कायै-साधक दो जाती है, किन्तु नियम 
रदित क्रियार्प विपत्ति के लाने वाली चन जाती दै, जिस प्रकार धूमशकटी 
(रेलगाड्ी ) पने मार्ग पर टीक चलती हुई श्रभीष्ट स्थान पर निर्विश्चता पूर्ैक 
प्च जाती दै, दीक उसी भकार स्थाधेरोके निमांण कयि दप नियमो क 
पालन स प्रात्मा व्यमिचारादि दोषों स वचकर ध्म माम॑ मे प्रविष्ट दोजाता है, 

जिस का परिणाम उस आत्मा को उभय लोक मे खुखरूप उपलब्ध होता है । 

क्योकि-यद वात भली धकार से मानी गई ह कि-श्रादार की शुद्धि होने स व्य- 
चदारगुद्धि दोखकती है । सो याचत्काल पर्यन्त ्राहार की शुद्धि नदीं कीजाती 
नाचत्कालपर्यन्त व्यावहारिक श्न्य क्रियां भी द्धि को प्राप्त नदीं दोसकतीं । 

अतव इन सात स्थविरो का संक्तेप मात्र से स्वरूप कथन किया गया डे, साथ 
दी*सात दी भकार के धभ भी वतला दिये गप है, सो स्थविरो को योग्य है फि- 

चे पने ग्रहण कत्य इए पिच नियमों का पालन करते इए पाणी मात्र के हि- 

तेपी वनकर जगत्‌ के हिंतेषी वने 1 


इतिश्रो--जेननततत्वकालिफाविकासि स्वरूपवशनात्मिका तृतीया कलिका समाप्ता 1 


थ्‌ । 9 
अथ चतुर्थीं कलिका 
खुक्ञ पुरुषो ! पिच्छले परकरणो मे सात धर्मो का सक्तेपता स वरेन किया गया 
दे, जिखमे लौकिक चा लोकोत्तर दानौ प्रकार के धम श्चोर स्थविरोंकी 
सेत्तेप रूप से व्यास्या की गई है क्योकि-यदि उन धमो की विस्तार प्क 
व्याख्या (लिखी जाती तो कातिपय महत्‌ पुस्तको की सयोजना करनी 


( १७१ ) 


तो विद्वान्‌ श्नौर अञ्ुभवी पुरूपों के पास पंच कर सूत्र के अथा का श्रवण 
करे । क्योकि जिन श्रात्माश्म ने चन्तरक्षन सपादन नदीं किया हे, वे धरतके श्र्थ- 
श्रवण सर ्रपनावा पर का कल्याण कर सकते है} तथा च पारः-- 
दुविहे धम्मे प॑०तं-सुयधम्मे चेव चरित्तथम्मे चेव, सुयधम्मे दुविहे पं०तं 
सुत्तसुयम्धमे चेव अत्थसुयधम्मे चेव ॥ ध 
उणागसूत्र स्थान २ उदेश्य १॥ 
चृत्ति-दुर्भतो प्रपतंतो जीवान्‌ रुणद्धि खुगतौ च तान्‌ धारयतीति धम्म 
थतं द्ाद्तागं तदेव धम्म श्रतधर्म्मः। चयते आसेव्यते यत्‌ तेन वा चयते- 
गम्यते मोक्त इति चारितं मूलोत्तरगुणकलापस्तदेव धम्मेश्वारिजधम्मे इति । 
खुयधम्मे" श्यादि सूच्यन्ते सूच्यन्तेवाऽथी श ननेति सूजम्‌ सखस्थितत्वेन 
व्यापिच्वेन च सुष्ट्र्त्वाढा सू, खु्तमिव वा खुम्‌, अव्याख्यानेनाप्रबुद्धावस्थ- 
त्वादिति, भाप्यवचन त्वेवं 'सिश्चति खरइ जमस्थं तम्हाखुत्तं निरुत्तविदिणा वा । 
सपद सवति खुव्यद सिव्वई सररप वजणऽव्थं ॥ १ ॥ पअविवरिये खुत्तविव सुदिय 
चा वित्तश्रो सखुवुत्त' त्ति ॥ शर्यतेऽधिगम्यतेऽथ्येते वा याच्यते बुुत्छुभिरित्यथो- 
व्याख्यानमिति, श्राद चओ उत्तामिष्पाश्रो सो श्त्थो अज्ञए य जम्हत्ति' ॥ 
भावा्ध-श्री थमण भगवान्‌ मदावीर स्वामी ने धर्म दो रकार से प्रति 
पादन किया है, जेसेकि-धरतधभ ओर चारि्रधमे फिर श्रतध्म भीदो भ्रकारस 
चरन किया है, जैसेकि सूजश्रतधरम शरोर श्थेश्चतधर्म ' द्गति मे पड़ते हप 
प्राणी को जो उठाकर सुगति कौ श्रोर खींचता टे, उसी का नाम धम हे चोर दवाद्‌- 
शाङ्ग रूप श्रत का जो पठन पाटन करना चाकराना दै उत श्रतधमस कहते है तथा 
जिस के श्रोसखवन वा जिसके द्वारा मोक्त भरा किया जाए उसे चारि धम 
कते ह वदी मूलोत्तरणुणक्रियाकलापरूप घम भी दे । 
सूर शब्दं की व्युत्पत्ति इस प्रकार की जाती । जेस सत्र म माला कं मणक 
परोये दए दोति है, उसी धकार जिस मे श्रनेक भरकरार फे अथ श्रोतप्रोत 
दोतते है, उसे सूत्र कटते द तथा जिस के द्वारा अथां की सूचना की जातीदे 
चह सत्र है ! जो भली प्रकार का दुमा है, उस का नाम सङ्क दे, भ्रारूत भाषा 
मे सूक्त शब्द्‌ का रूप भी "त्तः ही वनता है । जि पकार सोया हुश्रा पुरुप 
चातलाप करेन पर विना जायत इुप् उख बात्तौ के भाव से परिचित रहताहे 
ठीक उसी प्रकार विना व्याख्या पठे जिख का वोध न दोसके उसे सूत्र कते 
१ पतते रक्तति खगतौ च धत्ते इति 
२ सिखति त्षरति यस्मादयं तस्मात्‌ सू निरुक्तविधिना वा सूचयति श्रवति भूयते सि- 
च्यते स्मरभेते वा येना 1१॥ श्वि्रत सुक्षामिव सस्थितन्यापित्वात्‌ सूङ्रमिति ॥ 
३ य सून्नाभि्रायः सोऽर्थोऽगेते च यस्मादिति । 


{( १७३ ) 


अतप्व सिद्ध ह्या कि-सम्यम्‌ श्रत का प्रभ्ययन करना ध्रतधमै कटा जाता 
द । इस धम का विस्तार पू्यक कथन दस लिये नदं किथा गया है फकि-सव 
सम्यम्‌ शास्च इसी चिपय के भरे टुए टै । सो उन शास्वों का अध्ययन करना टी 
सम्यग्‌ श्रतधमे दै ।. । 

६ चारिचध्म-जिस ध्म के दास कमो का उपचय दूर दो जाए, उसी 
को चारि्रधर्म कते है ¦ क्योंकि“ कञानफियाभ्या मेष्ष॒ » कषान श्र क्रिया 
केदारा दी मोक्त पद्‌ उपलव्ध दो सकता हे । इस कथन स्यद्‌ स्वतः ही 
सिद्ध है कि-केवल कषान डारा मोक्त उपलब्ध नदीं द्योता श्रौर नादं केवल 
क्रया ढारा मोक्तपद्‌ प्त दो सकता टै, किन्तु जव क्षानपूयैक क्रियार्पे की 
जार्येगी, तव दी श्रात्मा निर्वाण पद्‌ की पराति कर सकेगा । 

इस प्रकार जव सम्यम्‌ प्लान दोगय। तव फिर सम्यग्‌ चारिक धारण 
करने की भ्रावश्यकता दोती ह! श्री भगवान्‌ न गणंग सूरस्थान २ उदेश 
मे प्रतिपादन किया टे कि- 

चरित्तधम्मे दुवि पं० तं°-अआगारचरिचधम्मे अणगार-चस्चिधम्मे । 

चृत्ति-चरितित्यादि -श्रागार-गरहं तद्योगादागाराः-खृिणस्तेपां यश्च 
रित्रधम्मैः-सम्यक्त्वमूलारुव्तादिपालनरूपः स तथा पवामतसेऽपि नवरम- 
गारे नास्ति येषां ते श्रना गारः साधवः इति ॥ 

भावा्थ--चरिजधर्म दो प्रकार का है, जेसेकि-णदस्थों का चरि शौर 
सुनियों का चरि । सो मुनियों के चरिज्िध्म का स्वरूप तो पूय सक्तेप से 
चणेन कर चुके दै, परन्तु ग्रदस्थो का जो चरिजधभै है उसका संत्तेप स इस 
स्थान पर वणन किया जाता है । स्यो धम से दी पराणी का जीवन पवित्र दे 
सकता है । रव धमचिन्दुभ्रकरण से कुच सूत्र देकर गदस्थ ध्म का स्वरूप {लिखा 


जाता हे । र्‌ 
तत्र च गृदस्यधमेऽपि दिविध सामान्यते विशेषश्चेति \ 


( धर्मबिन्दु श्र १1 स्‌०२1) 

मावार्थ-गृदस्थ धर्म दो प्रकार से वसौन किया गया है, जेसेकि--एक 

सामान्य ृदस्थध्म शौर दूसरा विशेष ग्रदस्थध्म । श्रव शाखकार सामान्य- 
ध्म के विषयमे कहते द । 

तत्र सामान्यते! गृहस्थधर्मे कुलगऋमागतमर्निद्य विभवापपया न्यायतो .ऽनुष्ठानमिति \ 

( धर्म ० १1 सू > ) 

भावाश--कुलपरभ्परा से जो श्रनिदनीय श्रौर न्याययुङ्क आचरण चा रहा 

हो तथा न्याय पूर्यक ही विभवादि उत्पन्न किए गए है, उन्ठे सामान्यधर्म कते 

ह 1 गृहस्थ लोग का यद सव स्ते वटृकर सामान्य ध्म है वे पवित्र कुलाचार 


( १७५ ) 
तथा समानकुलशीसादिभिरमोव्रैनेववाह्मन्यत्र वहु विरुदेभ्य इति ॥ 
(धर्म° श्र १।सृ० १९) 


भावाथ-जो देश वा धमे सर धिरोधनदीं रखता तथा जिसका परस्पर वैर नदीं 
है उस व्यक्षि के खाथाधैवाद श्रादि का सम्बन्ध दो जाय तो वद व्यवहार पक्तमे हानि 
कारक नदी माना जाता । परन्तु पिवाद-सम्न्ध करते समय तीन वातो का ध्यान 
तो श्रव्यमेव कर लेना चादिण,जेस कि १ कुल श्पन समान दो,२ शीलाचार श्रपने 
समान दो श्रौर सम्बन्धी अपने से भिन्न गोरी दो । स्योंकि-श्रपने समान कुल 
मे इुश्रा सम्बन्ध वहुत से श्रकार्यौ से वचाता है, जैसेकि-जव कन्या पने से वदे 
कुल म दीजाती है तव प्राय उरा कन्या का महत्व नदी रहता। जिस भ्रकार लोग 
दास श्रौरः दासी को देखते हे, उसी प्रकार प्रायः उस कन्या के साथ श्वसुरगरद 
चालों का वर्तव दोजाता दै । इतना दी नदीं किन्तु वहुत स निदैयी पति इस 
धुन लगे रहते है फिकव इस की सत्यु दो श्रौर कव हम नूतन सम्बन्ध जोडे। 
व विचार फिया जासकता है कि-जव पति के इस परार के भाव उत्पन्न हो 
जाए, तव उस विचारी श्रयला की रक्ता किस प्रकार हो सकेगी ? यदि कन्या 
पनी रपेच्ता विभवादि से न्यून कुल मे दीजाती दै, तव वह पिवरग्ट के रभि 
मान बश होकर पतिदेवता की वक्षा करने लगजाती हं ! सदैव काल उसके 
सम्बन्धियों को धिक्रारती रहती दहै, इतना दी नदीं किन्तु श्राप सदेव काल 
रूटी रहती है, जिसके कारण पति परम दुञख मे पड़ जाता दै तथा श्वखुर 
सम्बन्धी जन परम दुःखित हो जाति हे । पति सदैव काल श्रपने जीवन को 
निरथैक समभने लग जाता दहै । भागने की थवा शरपसत्यु की इच्छा रखता है 
इत्यादि नेक दोप जन्य कार्य दोने से शास्बकार ने समानकुल का विशेषण दे 
दिया हे । जिस प्रकार कुल समान की व्याख्या की जाती दै ठीक उसी प्रकार 
शील भी सम दोना चादि । कारण कि-यदि कुल श्राचरण ठीक नदीं है तव उस 
मे कन्या भी खुख नदद पासकती । जेसेकि कल तो सम॒ टीक है परन्तु 
उस ऊुल म मद्य मांसादि का प्रचार है तथा वर ( पति) व्यभिचारी दै 
एसी दशा म किसी भकारसे भी चिवाद सुखप्रद नदीं दोखकता ! स्योकि- 
न्यभिचारी पुरुप कभी भी पत्नी के लिये ,खुखधद्‌ नदीं माना जा सकता । 
प्वं यदि विद्या भी सम नदीं है तव भी भराय परस्पर वैमनस्य भाव उत्पन्न 
होने की संभावना दोती है, क्योंकि-विया के नदोनेसया तपम होने 
परस्पराकेखी वात के विचार मे श्रव्यमेव विसोध दो जाता है । इसी वासते सूर. 
कतीने श्रादि शब्द्‌ रण किया दै) श्रायुका भी अवश्य विचार किया जा 
सकता हे, कयोकि-अनमेल विवाह कभी भी खुखथरद्‌ नदीं माने जासकते । जसे 


( ९७७ ) 


नदीं हो सकता । इसके श्रतिरिषछ स्त्री को स्वातेत्य नदीं भिखना चाष्ट 
कारण कि-स्वतंघता धायः स्वद्न्दता की पोषक दोजाती है, जिसका पी 
निरोध करना रति कठिन दोजाता दै । स्वते्रता कर लेनी तो सुगम दै परन्तु 
पीचे दूसरे की श्राप्ता मे वर्सना कठिन दोजाता दै, इस लिये श्रपरिमित स्वतं्रता 
कभी भी सखखप्रदनदीं दो सकती । साथ दीजो स्रियं कुलमेच्द्धदों श्रौर 
माता के समान हित शित्ता देने मे दत्त दों ऊुलवघू को उनकी श्रान्ञामे 
सदैव काल रहना चाहिए ! फारण कि-उक्त स्तयो के वशवर्ती रहने से योग्यता 
तथा सदाचार वेगा श्चौर पातिनत्य धर्म॑ददृता से पालन हो सकेगा । उनकी 
दितशिक्षा के प्रभाव सेवे सदैव काल कदाचार से वचती रदेगी, सो उक्त 
नियमों कौ सदायता से कुल वधूश्रों की रक्ता ठोसकनी दै । 
तथा उपप्लुतम्थानत्याम्‌ दति 
धर्मनिन्दु श्र-९ 1 ९६ ॥ 
भावा्-जिस स्थान पर उपद्रव होने की संभावना दोया जहां वार २ 
उपद्र दोते दो वदां निवास न करना चादि । जिस स्थान पर श्रपने ्रथवा 
पर राजा के कारण उपद्रव उत्पन्न दने की श्राशंका दो तथा दुर्भित्त, मारी 
दति ( श्रतिवृष्टि, श्नाच्रष्ठि, मूपक, रीड पतेगिये स्वचक्क वा परचक्र ) चा 
परस्पर जनों क साथ विसोध दो, पेते स्थानों म रटने से गृदस्थों के धर्म, श्रथ 
श्रीर काम रूप तीनों धर्मो की भटी प्रकारसे रक्ता न हो सकेगी, चित्त 
प्रशान्त रदेगा । इस लिये एेसे स्थानों का परित्याग करना दी गररस्थके लिये 
भरेयस्कर है, ताकि चित्त की समाधि भटी भ्रकार से वनी र्दे । 
स्वयेोम्यस्याध्रयणमिति - 
धमे ०र-९ सू-१७ 
दस सूत्र का यद श्चाशय दे कि-खुयोग्य पुरुप का श्राश्रय लेना चाद्दिपः । 
कारण कि-गरृदस्थावास मे रहते हु पुरप्र को नाना प्रकार के कष्टों का सामना 
करना पड्ता द, उसमे खयोग्य व्यक्त का श्राश्चय होने स वे कष्ट शांति पूवक 
भोग जासकते है । जिस प्रकार मदावायु छौर मदामेघ की भ्चंड धारासि 
खख श्रौर खुर क्तित शालार्पै पुरूपं की रक्तक टोती दै, ठीक उसी प्रकार 
सुयोग्य स्यक्तिरयां विपत्ति काल म दुःखी पुरूपों की रक्ता करने मे समथ होती 
दे! प्रतपव अ्येक ग्रदस्थ को योभ्य दै कि-मदान्‌ खयोभ्य व्यक्ति के 
श्राथित रटे ! इस से पक प्रौर भी विशेष लाभ दोता दै वद यद कि-जव 
जनता को विद्धित द्योजातवा है कि--असुक व्यक्ति श्रमुक मदान्‌ व्यक्ति फेः 
श्राधित है तव श्राने बाले श्रनेक चिन्न स्वयमेव उपशम दोजाति द । कारण 
के-सदाचारी पुख्यों का संसं दोने से श्रात्मा विना उपदेश दी सदृष्वार की 


( ९७६ ) 


निस प्रकार स्वदेशी चेप के विषय मे कटा गया दे उसी धकार श्न्य भापादि 
स्वदेशी श्रचारः( के विपय मे भी जानना चाहिप । इसी चास्ते 'ऊपर कहा 
जा चुका दै कि-प्तिद्ध श्रौर प्र्तसनीय देशाचार के पालन छरने बाला 
पुरुप सामान्यधर्म पालन करता दुध्या विशेष धर्म केयोग्य दो जाता है । 
क्यों कि-जो किसी को भौ निदा नदी करता उसका आत्मा सदेवं काल 
शांति मे रहा करता दै । यदि किसी श्धिकारी व्यक्ति की निदा की जवि 
तो उसका! फल तत्काल उपलब्ध हो जाता दे, यादि किसी सामान्य व्यक्ति 
कौ निदा की जाए तो उसका परिणाम भायः कुं समय के पश्चात्‌ उपलब्ध 
टो जायया । श्रतप्व उक्त धर्म का पालन करने वाला व्याक्ति किसी की भी सदान 
करे । प्रपितु निदादि व्यसनों को छोड कर सदैव काल सदाचारी पुरुषौ की 
सगति करनी चादिपः ! जव कुसंग का त्याग किया जायगा श्रोर खसगति म 
सदा चित्तद्त्ति लगी रहेगी, तव श्रात्मा इस क्रिया के महत्व से विशेपधम 
मे पच्रत्त दो सकेगा । प्मगि अ्रन्थकार ने लिखा दै यथा- 
“तथा मातापितृपूनेति» 
इस सूत्र का शआराशय है कि-माता पिता की पूजा करनी चादिण । करई 
लोग कद देते है कि-माता पिता को पूजा क्या पुष्पां श्रौर धेटा्मों दारा 
दोनी चादहिप ? इस प्रकार के कुदेतुश्मो के निराकरण के यास्ते उक्त सूज के 
चात्त करने वाले लिखत दे क~ 
मातापितरो जननीजनकयो पूजा व्रिसध्य प्रणामकरणादि \ यथेोकम्‌-- 
पूजन चाऽस्य विके त्रिसघ्य नमनमिया \ तस्मानवसरेऽपयुच्चेश्चैतस्यारोपितरदयं तु 1 
छस्थति-माता पिता ुलाचा्ये एतेषा ज्ञातयस्तथा । वृद्धा घमोषदेधसे गुर्वम्‌ सता मत ॥॥ 
इति श्लकोकस्य गुरूवर्भरय । 
छ्रभ्युत्थानादियोगस्य तदन्ते निभतासनम्‌ \ नामग्रहश्च नास्थनि नावरणंभ्रयरं फतन्चित्‌ ॥२९] 
भावाथ -मातापिता को पूजा से श्रंभिप्राय यदं दै कि--चिकांल पणं 
मादि करक भक्ति करनी चादिपः ! क्योकि -कंहा गया है कि-अवसर विना 
फिर ऊच भावो सें चित्त मे श्रारोपण कियां आ गुरुजन (चद्धवग ) चरै को 
चिकाल भणाम करना यही उन का पूजन हे । श्रव भश्न यद उपस्थितं होता हे 
कि-गुरुजनवर्म म किस रको गिनेना चादिष्टं ? इसके उत्तरमे कहां दैः 
कि-माता, पिता, कृलाचाथै, (शिक्तागुरु), उनके सगे सम्बन्धी, कृद श्नोर धमं 
का उपदेश करने वाले । इन्दी को सत्पुरुषो ने खर माना है । गुरुवर को किस 
भकार मान देना चादि ? व इसी विपय मे कते है-रुरु जन श्वे तो 
खडे हो जना चादि, उनके सामने जाना चादि च्रादि शब्द्‌ से सुखं साता 
पृच्धनी, उनके पास निश्चल होकर वैटना चादि, श्रस्थान म (श्घाशेत स्थान) 


( श्प ) 


शाली चनगया त्तव रोगी फे लिये उसका कितना भयानक परिणाम दोगा 
श्नौर रोग को उपशम करने के लिप कितना परिश्रम करना पदेगा ? यद कदने 
की श्रावश्यकता नदी । इसके अतिरिक्त भोजन कस्ते समय रसो मे मूर्धत 
न होना चाददिण । कारण कि-स्तोकमात् रस के वशीभूत होकर फिर परिमाण 
से अधिक भोजन किये जाने पर रोगो का मुद देखना पड़ता है । फल रूप 
फिर श्रात्मा मे श्रसमाधे भी उत्पन्न दोजाती दै। इसलिये श्रात्मा को समाधि 
मे रखने के लिये श्रौर धाभिक क्रियार्पे पालन करने के लिये भोज्य पदार्थो 
मे श्रवश्य विवेक रोना चादिष्ट । कतिपय विद्धानों का मत है कि-जव भोजन 
करने का समय माए तव उद्र ( पेट ) के तीन भाग कल्पना करलेने चादिषं 
ज्ेसेकि-पक भाग शन्न से भर लिया, फिर दूसरा भाग पानी से भरे जाने 
पर उद्र का पक भाग खाली रस्खा जाना चाप, ताकि जव किसी कारण से 
उक्त दोनो भागो म विकारः उत्पन्न दोजाए तव तीसरा भाग उस विकार 
को शान्त करल , इसलिये परिमाण से श्रथिक भोजन न करना सदैव काल 
पथ्यरूप माना गया दे । 

पत्था श्देशकाएलन्वयौपरिटर इतिः" 

शस सूत्र का मन्तव्य यद दै कि-देश शरोर काल से मतिक्ूूल दोकर 
कदापि न चलना चादिप । जैसेकि-जेो पुरुप विना समय अ थौत्‌ अकाल मे 
गमनागमन करता है, बह श्वश्यमेव लोगो की ष्टि मे शोका का पाज चन 
जाता है । क्योकि-्रषठ श्रात्मार्णे कदापि असमय गमनागमन नदी करती । 
इसी प्रकार देश विषय मे भी जानना चादिप। तथा यावन्माज शेका के स्थान 
ड, उन स्थानं पर कदापि न जाना चादिष् । जेसेकि-जिस स्थान परः वेश्याश्रो 
के गृ है, यत-स्थान मदिरास्थान, तथा मांसादि के विक्रय के स्थान । यदि 
उन स्थानो पर पुनः २ गमनागमन दोगा तच सभ्य पुरुषो की दृणि मे वह 
श्रवश्यमेव शंका का पाज चन जयिगा । श्तग्व सामान्य गहस्थधमे के 
पालन करने चाले व्यक्ति को योग्य है कि-चह अत्येक कायं सावधानता- 
पूर्वक करने की चे करे. कारण कि-जिस कार्य को करतें समय अपने वल 
शरोर निवैलता की परीत्ता नही की जाती, उस काय की सफलता भौ शंका- 
स्पद द रटती ह । अतण सिद्ध दुश्रा कि~क करते समय पने बल ओओ 
अवल का अवश्यमेव ध्यान दोना चादिष्ट च्रथात्‌ चर्म. रथं छर काम जिस 
अकार निधिन्न पालन किये जाखके, उसी धकार वत्तेना चादिष्ट । साथ दी 
इस यातका भी ध्यान रखना चादिष्ट कि-जो क्षानादिसि दद्ध दै उनकी 
सेगति ओ हि विशेषतया! समय व्यतीत किया जाए । यद्यपि कतिपय शास्ज्ञों 
का मत हे {कि-“तथा-छतिसगवभनमिति" किसी का भी स्मतिसंग न करना 


( श्र ) 


. परन्तु वह शस्त्र ( दण्डादि ) श्रौर वाहन दारा सफल की जासकती 
दै । परन्तु । 
“प्रदिरस्वेदे व्यायामकालमुशन्त्याचायौ 
यावत्‌ काल पर्यन्त शरीर पर भ्रस्वेद्‌ न श्राजावे, तावत्‌ काल्‌ पर्यन्त 
व्यायामाचा्यं उक व्यायाम नदीं कदते । सारांश यद निकला कि-जव शरीरः 
थस्वेद्‌ युक्त दोजाप तव दी उस क्रिया को व्यायाम किया कटा जासकता है । 
नथा इस क्रिया के करने का मुख्य उदेश्य क्याहै? श्रव इस विषय मे 
श्राचायं कहते हे । 
“प्यव्यायामशरेु वुते।ऽभ्निदीपनमुत्सासै देददाव्य च” 
„ विनाव्यायाम किये श्रग्नि-दीपन, उत्साद श्यौर शरीर की टदृता कदां 
से उपलब्ध टोसकत्ती है ? श्र्थीत्‌ नदीं दोसकती । उक्त तीनो कार्यं व्यायास- 
श्ल पुरूपौ को सटजमें धराप्त दोजाते है । जैसेकि-जव व्यायाम द्वारा शरेर 
भस्वेद्‌ युक्त दोगया तच जटसभ्नि प्रचंड दोजाती दै. जिस सरे भोजन के 
भस्म होने मै कोई विध्न उपस्थित नदी होता । दूसरे उख आत्मा का उत्सा 
भी श्रौरो की श्रपेत्ता श्यत्यन्त चढ़ा हुद्ा रोता दै । वह कस्मात्‌ सेको 
के श्राजाने से उत्साह-टीन नदी दोता । इस लिये व्यायामशील उत्साह युक्त 
माना गया है। तीसरे व्यायाम सक होने से शरीर का संगठन भी ठीक रहता 
श्र्थीत्‌ श्रगोपांग की स्फुरणता श्रौर शीर की पूरेतथा दढता ये सव 
चात व्यायामशील पुरुषों को सहज मे दी पास्ष दोसकती दे । पूर्वं काल में 
इस करिया का प्रचार राजो महाराजो तक था । श्रौपपातिक सूत्रम लिखा दै 
कि-जव श्रश्रमण भगवान्‌ महावीर स्वामी चंपा नगरी के चादिर पूरीभद्र 
उद्यान म पधारे तव करूणिक महाराज श्रीभगवान्‌ के दशनाथ जव जाने 
लगे तव पदिले उन्होने “च्रदणसाला” व्यायामशाला मे भवे किया फिर 
नाना भकार फी व्यायाम क्रियाश्रो सरे शसीर को धान्त किया) इस धकार 
व्यायामशाला का उस स्थान परः विशेषतया वरन किया गया है । 
द्वादश तपोमेसे वािर का कयङ्केश्च तप भी वास्तवं मे व्यायाम 
क्रियाका ही पोपकदे, क्योकि--वीरासनादि कीजो क्रियाकी जाती टै 
चह शरीर को च्ायास ( परिश्चम ) कराने वाली हुश्मा करती है । प्रतणव 
,यद निकला कि-वलवीयौन्तराय कम के प्योपशम करने का 
सख्य साघन व्यायाम क्रिया दे है । इन्द्रिय, मन श्रौर मरुत्‌ ( वायु ) का 
सष्मावस्था मे दयोजाना ही स्वाप हे । इख का तात्पयै यह दै कि-यावत्‌ 
काल परथन्त परिश्रम करने के पश्चात्‌ विधिपू्वंक शयन न किया जाये तव 
तक दंद्विय श्रौर मन स्वस्य नदीं रट सकता, नांदी फिर शरीर नीरोग रह 


( ९८५ ) 


विशेपधर्म मे श्रानन्द्पूर्वक श्रारोदण दोसकता है । जिस पकार संतान का 
उत्पन्न करना ही धर्म न है, परन्तु उसे विदान्‌ श्नौर खदाचारी वनाना भी 
मुख्य प्रयोजन हे, खीक उसी रकार सामान्यधर्म से फिर विरेपधर्म मे अवि 
दाना गृहस्थ का मुरय प्रयोजन हे! सामान्यधममे का फल प्रायः इस लोक 
मद्य उपलब्ध दाजाता दे । जेसेकि-जो गृदस्थ सामान्यधर्म को पालन 
करने वाले द, उनका शरासन सदाचारियों की पंक्ति मे च्राजाता टै, सभ्य 
पुरुष उनको ऊची रण्िसे देखते हे, नाना प्रकार की पवित्र सम्मतियोके 
समय उनका नाम लिया जाता है श्रौर संसार पक्त मे उन्हे योग्य पुरुप कटा 
जता दे | परन्तुजो चिशेषधर्म हे उसका परिणाम इस लोक श्रौर परलोक 
दना म खुखभ्रद दोजाता दै । जेसेकि-इस लोक मे वह पुरुप तो माननीय 
दातादी दे, परन्तु परलोकमे स्वर्गं मोत्त के खुखों के श्रचभव करने वाला 
दाता हे । क्योकि-जव विशेषधर्म के श्राधित दोगया तव उसका श्ात्मा 
पादलिक रख स निवृत्त होकर श्रात्मिक सखुख कीश्रोर सछुकने लगता 
दै । जिस प्रकार दीपक का प्रकाश सूर्यं के भकाश के सन्मुख कदापि 
समानता धारण नदी कर सकता, ठीक उसी भकार पौद्ध- 
लिक सुख श्रात्मिक सुखो के सामने तुलना नदीं रखते । जिस प्रकार सूर्य 
कं सन्मुख दीपक निस्तेज दोजाता दे. उसी पकार पाद्लिक खुख आत्मिक 
खुखो के सामने नाम मात्र होते हे। श्रतएव श्रात्मिक सखा के उत्पादन 
के लिये विशेष धर्मं की भ्रासि श्यत्यन्त श्रावश्यक है । जव खवर को शुद्ध 
करना चादते हो, तव सामान्य रग्नि से कार्य-सिद्धि नदी दो सकेगी, 
पितु विशेष श्रौर परचरड ग्नि से कार्थ-सिद्धि होगी । इसी प्रकार च्रात्म- 
शुद्धि के लिये चिशेप क्रियाकलाप की श्रावश्यकता होती है । जव विशेष 
क्रियाश्रौ से ्रात्म-णुद्धि दो जाती दै तव आत्मा कर्मवंधन से विसुक्कदो 
कर निर्वाण पद की प्रापि कर लेता है, जिसके सिद्ध, बुद्ध, श्रजरः, रमर, ईश्वर 
परमात्मा, पारंगत, श्नन्तशक्ति.इत्यादि श्रनेक शुभ॒नाम भ्रसिद्ध दोरहे है । 
श्रत्व सामान्यधर्म को ठीक पालन करते हुए फिर विशेपध्म कौ ओर 
क जाना चाहिए । ताकि आत्मा सादि नन्त पद कोप्राप्तदो सके ओर 
न्य च्रात्माप्ट भी उस पविच श्रात्मा का छरञुकरण करके उक्र पद्‌ पर आरूढ दो । 
इति श्रीजैनतत्वफलिफावि रासे सामान्यगरदस्थधर्मस्वरपवरन।त्मिका चतु कलिका समाप्ता । 


( १८७ ) 


माम मे स्थित र्य श्रौर प्राणी माके दित करनेमे उद्यत रह । जव दइस 
रकार कै पविच्र श्रात्मा््रो से धर्म-श्रवण करने का सोभाग्य भराप्त दोजाएगा 
तव शीघ्र कलट्य!ण॒ दोजाष्पगा 1 

जद मुनि वा उपासक के पास ध्म सुनने की जिश्नासा से श्रोता उप- 
स्थन द्यो, तव वे उसकी योग्यतायुखार ध्म कथा सुना । शास््रकारोने चार 
भकार की विकथा चरीन की है । जेखकि-स्ीकथा, भातकथा, राजकथाश्मौर 
दैशकथा । किन्तु दन कथाश्रो से श्रात्मिक लाभ नी दोसकता धमेकथा के 
कथन करने का सुर्य थयोजन यही दै कि~ध्रोताजन को धमे से प्रेम रौर 
संसार से निचि दो तथा उसके धरवण॒ करने से श्रात्मा निजस्वरूप मे भविष्ट 
दोजषव, मोहनीय कम क्षय वा त्तये(पश्तम भाव मे श्राजवि, श्रात्मा संवेग श्रौर 
वराग्य मे रंगा जावि! जव श्रात्मा वैराग्य दृशा मे श्राजाता है, तव वह पदारथ 
के तत्व के जानने की खोज लगजाता है जिस से उस को सम्यक्त्व रत्न 
की प्राप्ति दोजाती दे । ,, “^तत्वशरदयान सम्यग्‌ दशनम्‌, तत्त्वो के ठीक स्वरूप 
को जानने का ही नाम सम्यग्दशैन ह 1 उत्तराध्ययन सूज के र< वे श्रध्ययन 


मक्िखा है कि- 


ना द॑सरिस्स नाणं नारेण विणान हति चरणयुणा । 
श्रगुशिस्स नत्थि मोक्खो नत्थि अमोक्स्स निव्वारं ॥ 
भावाथ--जव तक सम्यगूदयीन नीं होता तव तक ज्ञान भौ पराप्त 
नही दोसकता । क्षान के विना चारित्र के गुण भी उत्पन्न नदी होखकते 
प्रगुणः का मो्त नदी हे श्नौर विना मोत्त से निवारपद की प्राप्ति नदी दोखकती । 
तएव सव से थथम सम्यगदशीन की मासि के लिष्ण यत्न करना चादि 
श्रमण महात्मा के भताप से सम्यक्त्व रत्न की भराति होजाने पर 
भत्येक भव्य श्रात्मा श्रावक के १२ चतो ( नियम ) के धारण करने योग्य 
होजातः है । जीव, जीव, पुरय, पाप, शआराश्चव, सस्वर निर्जरा, चंध श्रौर 
मोक्त इन नच तत्यौ के स्वरूप को ठीक जानने का नाम सम्यक्त्व हे तथा 
धरम, अधर्म, श्राकाश, काल, जीव श्रौर पुद्धल जो उक्त ६ द्रव्यो के स्वरूप 
को भली थकार जानता हे उसे सम्यगूटष्टि कदा जाता दै । अव भश्च यद 
उपस्थित होता हे कि-सम्यक्त्व रल भाघ दोनेके पीचे उख सखम्यग्टष्ि 
श्रात्मा के कोन २ लक्षण ्रतीत होते है ? जिन से जाना जाप कि दस पवित्र 
दात्मा को उक्त रत्व की धासि दो चुकी हे । इख परश्च का उत्तर यद्‌ है जव 
किसी भव्य श्रात्मा को सम्यगूद्शन की पर्ति दोजाती है तव उस के अनं- 
तालुवधि रोध, श्नन॑ताडवधि मान, अनेतादुवंष्धे माया श्नौर ्नेताद्चवन्धि 


( १८६ ) 


जव उनफे मत मे यात्मा का दी रभाव माना जाता है तव पुरय, पाप, 
श्राव, सम्बर, वेध, मोक्ष, लोक, परलोक, जगत्‌ श्रौर ईश्वर इत्यादि सव 
चातों काश्मभाव दोजाता रै, जिस कारणएवे श्रथ श्रौर कामके ही उपासक 
दोजाते दै । श्रास्तिक लोग का सुख्योदेश्य निर्वाणपद्‌ की प्राति करना ह । 
क्योकि-उनके सिद्धान्तावुक्रूल उक्त तर्त्वो का श्रस्तिभाव सदा, वना 
रदता है । वास्तव म देखा जाय तो नास्तिक मत की युक्ति श्रास्तिक पक्त 
की युक्ति को सदन नदीं कर सकती । इसी वास्ते ध्रास्तिकों के चारः पुरुषार्थं 
म्रतिपादन कयि गप है । जेसे--घर्म, थ, काम शरोर मोत्त ! जवतक चे 
ससारावस्था मे र्ते है, तव तकवे धर्म अर्थश्रौरकाम केद्वारा श्रपना 
निर्वाह करते रहते हे, परन्तु जव वे संसारावस्था से प्रथक्‌ होते हैतव वे 
धरम ध्रौर मोत्त के ही उपासक चन जाते है । जव चे ससारावस्थामे रहते 
देतव वे विशेषधर्म के श्राश्रित दोजातेदै । जेसेकि-वे सम्यक्त्वपूर्वक 
श्रावक कै १२ बतो को निरतिचार पालन कस्ते रहते दै । यदि उन श्रात्माश्नौ 
को विशप समय उपलब्ध होता है, तव फिर वे श्रावक की १९१ पडिमार्पै 
{ परतिक्षर्प) धारण करलेते टै जो किएक भ्रकार सरे जेन-वानम्रस्थ के 
नियम रूपै । सम्यक्त्व के पांच अतिचार वर्णन कयि गहे ।सो उन 
दोपो सर रदित दोकर ही सम्यक्त्व को युद्ध पालन करना चादिप, जेसेकि-- 

शकाकाक्षाविचिकित्सऽन्मदधप्रशसासस्तया सम्मगृटृधेरतिचारा इति । 
(धर्मचिन्दुश्र ३ सू ५२) 
चृत्ति-- दह शका कांत्ता विचिकेत्सा च ज्ञानादयाचारकथनमिति सूत्र- 
च्यास्या नोक्तलक्तणा पव । श्न्यदृटीनां सवैक्ञप्रणीतदशनव्यतिरिक्तानां 
शक्यकपिलकणादात्तपादाद्विमतव्षिनां पाखोडिनां धरशंसास्तवो । ततर 
पुरयभाज प्ते" खुलब्धमेपाञ्नन्म' द्यालव पते, इत्यापि प्रशसा । सेस्तवश्चेट 
सवासजनितः परिचयः वसनमोजनदानालापादिलक्तणः परिग्रद्यते न स्त- 
चरूपः । तथा च लोके भरतीत एव संपूर्वः स्तोतिः परिचये ॥ असंस्तुतेषु भ्रसभं 
भयेष्वित्यादाविचेतिं। ततः शेका च कांता च विचिकित्सा च शअन्यदाश्ेपशंसा- 
सस्तवौ चेति समासः । किमित्याद सम्यग्रटेः सम्यग्दशेनस्य श्रतिचारा 

वियधनाप्रकाराः सपद्यत शुद्धतक््वश्रद्धानवाधाचिधायित्वादेति ॥ १२॥ 

भावाशै--इस सूच मे यह कथन किया गया है कि-सम्यग्रणटि स्रात्मा 

को पांच ध्रतिचार लगते दै सो वे दुर करने चादि । जेसेकि- 
१ श्चका--जिन वाणी मे कदापि शंका उत्पन्न नदी करनी चाषटिप 


कारण कि-सधज्ञोक्त वाणी मे श्रसत्य का लेशमाच भी नदी दोता । यदि 
भूगोल, खगोल, श्रायु तथा स्वगाहन विपय आदि मे किसी प्रकार की शका 


( ६६३ ) 


दो इंद्रियो वाले जिनके केवल शयीर घ्रौर सुख दी होता है यथा ख, जोक, 
गेडोयादि । चीन्द्रिय जीव, जेसे-जू लीख, फीडी आदि । चताशिद्धिय जीव 
जेसे-मक्ली, मशक ( मच्छर ) छ्मादि । पञ्चेन्द्रिय जीव जेसे-नारकीय ९ तियेग्‌ २ 
मचुष्य श्रौर देवता; इन के स्पश, जिदा, घ्राण.चनु र रोचये पांच इन्द्रियां 
होती है! इन सव जीवों को जानकर श्रौर देख कर जो जीव निरपराध है उनके 
मारने का अवश्य त्याग दोना चादिपए, किन्तु जो सापराध है उनके सम्बन्ध 
मे कोर व्याग नदीं है । जेसेकि-कोरई दुष्ट किसी श्रावक की स्वी से व्यभिचार 
करने की चेटा करता है थवा उसका धन लूटने के ध्यानमे लगा हुश्रादे 
या मारने के लिए कड प्रकारके उपाय सोच र्हादै तो क्या बह श्रावक 
प्रपनी रन्ता के लिए उपाय न करे ? श्र्थात्‌ श्रवश्य करे, क्योकि-यदि मोन 
धारण किया जापगा तो ससार मे व्यभिचार विशेष विस्तृत हो जाण्गा। 
अतपच गृदस्थ को निरपयाध जीरयो का ही त्यागो सकता दे न कि सापराध 
काभी। यदि जेन धरम के पालन करन वाला कोई राजा श्रावक के १२ बत धारण 
कर्तो क्या वद श्रपराधियों को डित नदीं करेगा ? अवश्य करेगा । 
इस कथन से यद भली भांति सिद्ध दो रदा है कि-जेन-धरम न्याय कौ पूरी 
रिक्ता देता है । उखका मन्तव्य है कि-निरपराधी जीवो को हास्य, लोभ, 
धर्म, शथे, काम, सूता, दप, क्रोध, मोह, अज्ञानता इत्यादि कारणो सेन 
मारा जाप श्रौर जो सापराध है उनको उनके कर्माखुसार शित्तित किया जाय यद 
गृहस्थ का न्याय धर्म दे । गृदस्थ को इस भकार का नियम नदौ हो सकता हे 
किद्‌ श्रपराधी को भी शित्तितन करे 1 यदि कोई के कि-जव धरः के सव 
काम काज करने पड्ते है तथा दुकान पर श्ननेक प्रकार के पदाथों का क्रय 
चिक्य होता है तो क्या उस समय कोड निरपराधी जीव नदीं मारा जाता १ 
जव उनका मरना सिद्ध है ता फिर "निरपराधी जीव को नदी मारना यह 
नियम किस भकार पल सकता हे ? इस शका का उत्तर यह है कि~वादी ने 
जो उक्त पश्च किया हे वद अक्षर २ सत्य हे किन्तु जिस शआात्माने अरदिसानत 
धारण कर लिया हे उखको प्रत्येक काय करते समय यत्न होना चाहिए 1 
तात्पर्य यह है †कि-वद विना देखे कोई भी कार्य न करे । घरक वा दुकान के 
याचन्माज कार्य हं वद विना देखे न करने चादिष्ट श्रोर नांदी खाने योग्य पठा 
चिना देखे खनि चादिं प्व यावन्मा् गृ सम्बन्धौ कार्यं है उनको विना यल 
कभी न करना चादिपए 1 यदि फिर भी जीव्दिखा हो जाय तो श्रावक के त्यागम्‌ 
दोपनही ह । क्योकि उसने पद्िल दी इस वात की परतिज्ञा करली है कि-जान कर 
देख कर वा मास्ने का सकर्प कर निरपराधी जीव को नदीं मारूगा । शास्व मे 
लिखा दै जेखेकि-- 


( १६५ )} 


करयोकि--उनके सेकट्प उसको शिक्षित करने के दी होति ह नतु मारने के! एवं 
कोई वेय या डाक्टर किसी रोगी के श्रंगोपांग चदन करता टो तो उसके 
नत मे दोप नदीं है । फयोंकि-उसके भाव उस रोगी को रोग से चिसुक्क करने के 
द नतु मारने के । एसे श्रनेक द्टान्त विद्यमान है, जिनका सारांश भावो पर 
अवलम्बित दे। सो गृहस्थने जो जानकर, देखकर वा सकट्प कर निरपराधी 
जीव के मारने का परित्याग किया हुश्च है, वह श्रपने नियम को विवेक तथा 
सावधानता पूरक सुख से पालन कर सकता हे । दां यह वात श्रवश्य मान- 
नी पदेगी कि-उक्त नियम वाले गृहस्थ को पत्येक कार्य करते समय विवेक 
श्नौर यत्न रखना दोगा 1 

इस नियम को शुद्ध पालन करने के लिये श्रीभगवान्‌ ने इस चत के 
पांच श्रतिचार प्रतिपादन फिट है । जैतेकि- 

तथाणन्तरं चणं ूलगस्स पाणाइवाय वेरमणस्स समणोवासए णं पञ्च 
यारा पेयाला जाणियव्वा न समायारियव्वा तंजहा-वंधे वहे दविच्छेए अद्‌- 
भारे भत्तपाणबोखए ।। १॥ 

( उपासकदशद्घसूत्र श्र° १॥ ) 

भावाश--जव श्रमणोपासक सम्यक्त्व रत्न के पांच सुख्य शअरतिचासे 
को सम्यक्छ्तयः दूर करदे तव उसको चादिप कि-स्थूल भाणतिपात वेरमणए जो 
भयम श्रनुत धारण किया हुश्मा है, उसके भी पांच अतिचार समभे किन्तु 
उन पर ्राचरण न करे क्योक-आआचरण करने से उक्त नियम भग 
दोजाता हे । चे श्रतिचार निम्न प्रकार वर्सन कयि गये है । जेसे-- 

चन्धश्रतिचार--पशथु चा मचुप्यादि को निर्दयता से वांधने को वन्धश्मति- 
चारकटते दह । उस का श्राचरण करने से पश एदि के परम दुःख पूर्वक समय 
व्यतीत करना पडता है शरोर वान्धने वाले का प्रथम त भग दो जाता दै । छतः 
यदि किसी कारण से किसी जीव को वांधना भी पड़ जाय तो उसको कठिन वंधनों 
से न वांधना चाद्ये । जसे कि-व्यवदार पत्त मे गो, पभ, श्चश्व, गज श्यादि 
पथु यांधने पडते हे, परन्तु वंधन करते समय कठिन चंधन का च्वश्यमेव 
ध्यान रखना चाषिये । ताकि्देखा न हो दस श्ननाथ पशु श्चादि के प्राण ही 








१ इह सलु आणदाई्‌ समे भगव महावीरे ्राणदं समणोवासग एव वयास्ती-एव सलु 
प्राणदा ¡ समशोवासएु ण ध्रभिगयर्जावाजौवेण जावग्रणड्कमणिज्जय़ नम्मत्तस्स पच श्रइयारा 
पेया जाणियन्वा न समायास्यव्वा तंजदा- सङा कड्खा विद्गिच्छा परपासडपसमा परपाच्डस्रथवे ॥ 
यह प।ठ उपासकदशास्गसूत्र के प्रथम अध्ययन मे च्राना हे इसके श्रागे व्रतो के श्रतिचारो का 
वरान ियागया हे । इस सूत्र का रथ प्राग्वत्‌ दी है ॥ 


( १६७ ) 


उनकी यथोचित रक्ता न करनाये क्रियापदे इन से प्रथम चत म दोप लगता 
दै । श्रतपव उष पांच प्रधान दोषों सरे रहित भरथम श्चद्वत का पालन 
करना चाहिपः) 


धुला्ो युस्रावाञ्माच्रो बेरमणं 
ठउाणागपु-स्थान ५ उदश ॥१॥ 


जव प्रथम श्रुत का पालन किया जाष्ट फिर द्वितीय अवत को 
शद्धतापूर्यक पालनं करना चादिष्टः । कारएकि-सल्यवरत सवे बत मे परम 
धान ह, श्रात्मविग्युद्धि का परमोच्छृष्ट मागं दै, लोक भे भ्रलेक गुण का भाजन 
दै 1 परन्तु खत्य्त के भी दो भेद्‌ दै, जेसोके- द्रव्यस्य श्मौर भावसत्य चट्‌ 
भतिक्षा का ही नाम द्रव्य सत्य दै, श्चौर जो पट्‌ द्रव्यो के गुण पयत्यो को भली 
भांति जानना है तथा उन्दी पयायो के श्रुसार सत्य भाषण करना है उसे 
भावसत्य कटाजाता है 1 श्रतप्व भव सतय के लिप क्षानाभ्यास वा 
शाखथवण का श्भ्यास शरवश्यमेव करना चादिष्ट । सो श्रावक के सम्यक्त्व 
जतत कै टोजानि से भावस्य तो होता ही है, परन्तु दरव्यसत्य के लिये शाख- 
कार ने स्थूल शब्द दे दिया है । क्योकि गहस्थावास मे रहते इट गृदस्थ स 
सर्वथा स्पावाद्‌ का व्याग तो दो ही नदीं सकता । अतएव वह स्थूल मृषाः 
वाद्‌ कातो त्याग श्रवश्य कर दे ! जेसेकि-- 

१ कन्यालीक--कन्याश्मो के लिये श्रसत्य भाषण न कर । 

२ गवालीक--गौ श्रादि पथ वरग के लिये असत्य न योले । 

३ भूम्यलीक- भमि के लिये शरस्य का भषण न करे । 

४ न्यासरापदार--किसी ने विश्वास-पात् पुरुप जान कर विना सास्तियो 
के वा चिना लिखत किये वस्तु को धरोदर रख दिया जव उसने बह वस्त मांगी 
तो कट देना कि सुभः तो उक्र पदाथ की खवर ही नहीं हे, न मेने उस पदाथ 
को देखा द इत्यादि वाते करना । 

५ करटसाक्ती--श्रसत्य सक्ती देना इत्यादि श्रनेक भेद स्थूल मृषावाद 
केदै।सो दूसरे श्रलु्त के पालन करने वाला उक प्रकार के ्रसत्य भाषणो का 
परित्याग कर दे ! फिर इख वत कौ शुद्धि के पांच ्तिचारो (कोषो) काभी 
परिहार करदे । जैसेकि-- 

तयारन्तरं चरं थूलगस्स युसावायबेरमणस्स पश्च अहयारा जाणियन्वा 


न समायरियव्वा तंजदा-सहसाअन्भक्खाणे रहसायन्भक्साणे सदारमत- 
भेए मोसोवएसे कूडलेद करणे । 
उपासक्दश्ागस्‌ च. ॥१॥ 


भावा्थ--जवः भथम अनत को खरूप अवगत दो जवे तव दि्तीय 


{ १६६ ) 


दिखाया । सो भाव चोरी उसका नाम दहै जो निज गुण से वादिर के पुद् 
लादि पदार्थं है उनके परित्याग होने के परिणाम होने है । इसके श्रतिरि- 
क्त शाखकारने द्रव्य चोरी की रत्ताके वास्ते पांच अतिचार प्रतिपादन 
क्यिदहैजो गदस्थधरम के पालने वाले व्यक्ति को कदापि श्रासेवन न करने 
चादिपं । जेसेकि- 

तयाणन्तरं चणं धूलगस्स अदिर्णादाण वेरमणस्स पंच अइयारा 
जाशियव्या न समायरियव्वा तंजदा--तेणाहडे तकरप्पोगे विरुद्ररजादकमे 


रूडतुलकूडमाणे तप्पडिरूवगववहारे ॥२॥ 

भावाश्-- द्वितीय श्रुत के पश्चात्‌ ठतीय श्रुत का वरन किया 
जाता दहै! जो कि-स्थूल अदत्तादानत्यागरूप चत है । उसके भी पांच रति- 
चार वर्मन किये गप है जो फि--जानने योग्य तो है परन्तु श्रासेवन करने 
योग्य नदी है । जैसेकि- 

१ स्तेनाहत- लालच कै वश दोते हए चोरी का बहुमूल्य पदार्थं श्रलप 
मूल्य मे लेना । परन्तु जव बहुमूल्य वाले पदाथ को श्रल्प मूल्य मे लिया 
जायगा तो श्वश्यमेव संदेह दोसकताः है कि- यद पदार्थं चोरी का है जिससे 
चोरो कीजो दशा दोती है जिसे लोग भली भांति जानते है, वदी उसकी 
होती हे । क्योकि--चोरी का माल लेने वाला भी प्क प्रकार का चोर है। 

२ तस्करपयोगातिचार--चोरो को प्रेरित करना 1के- तुम आजकल 
व्यथं कालक्तेप क्यौ कर स्टे दो ? चोरी करो, वुम्दारी चोरी कामाल हम 
विक्रय कर देंगे । इस भकार करने से ठृतीय रुत मे दोप लगता दे । 

३ विरुद्धराज्यातिक्रम--राजा की आक्षा का पालन न करना ! जैसे 
कि-राजा की राज्ञा हुई के-असुक राजा के देश से व्यापार मत करो, 
परन्तु उसकी श्राज्ञा पर न रह कर उस देश से व्यापार करते रहना । सो जो 
राजा न्याय से राज्य शासन कर रहा है उसकी श्माज्ञा का उल्लघन कर देना 
यद भी उक्त बत मे दोप का कारण है । 

 क्रूटतुलाक्रुटमानातिचार--तोलने रौर मापने मे न्यूनाधिक करना। 
च्योकि-दइस धकार करने से व्यापार का नाश दोजाता है । यदि यद विचार 
किया जाप्य कि--इस प्रकार से लच्मी की च्ृद्धि दोजाएगी तो यदह विचार 
अतिनिरृषट हे, क्योकि लच्मी की स्थिति न्याय से होती है नतु प्नन्याय से । 
परतपव धर्म श्रौर व्यापार कमी शुद्धि रखने के लिये व्यापारी वभे को उक्त 
दोप पर श्रवश्य विचार करना चादिण । 

५--तत्परतिरूपकव्यवदार--शुद्ध वस्तु मे उसके सदश वा उसके 

सद वस्तु मिला कर वेचना । जेसेकि-डुग्ध मे जल, केशर मे कुवा, घत 


( २०९ ) 


‰ इत्वरकालपरिगृखीतागमन-कामवुद्धि के वशीभूत दयोकर श्रगरः इस 
भकार विचार कसे करि-मेया तो केवल्ल पर खी के गमन करने क! दी व्यागदै 
इसलिये किसी खी को विशेष लोभ देकर कु समय के लिये पनी स्जी 
वनाकरस्यनलू तो कयाद्रोपदे? तो उसका यह विचार सर्वथा युक्त दे 
ऋ्योकि-दस प्रकार करने से वद खदारासतोपव्रतश्चतिचाररूपदोप से 
कलकित दौजाता दै । कतिपय श्राचायं इस सूत्र कार्थं इख परकारसे भी करतेरै 
कि-यरि लघु अवस्था में ह विवाद संस्कार दोगया दो तो यावत्काल पर्यन्त 
उस खी की श्रवस्या उपयुक्त न दोग दो तावत्कालपयेन्त उसके साथ समागम 
नहीं करना चादिप, नदी तो बत कलंकित दोजाता दै । 

२ श्रपरिग्रहीतागमन--जिसर का विवाह संस्कार नीं दुश्रा दै जैसे 
चेष्या, कुमारी कन्या, तथा सनाथ कन्या इत्यादि । उनके साथ गमन करते समय 
अगर चिचार किया जाय कि-मेरा तो केवल परी के सग करने का नियम 
दै, परन्तु ये तो किसी की भी ली. नद्धं है । इसलिपः इनके साथ गमन करने से 
दोप नरह; तो उसका यद विचार श्युक्त दै । क्यों कि-इस भकार के कुतकं से 
उक्त बत को कलंकित किया जाता है । कातिपय आचार्य इस प्रकार से भी उक्त 
सूत्र का श्रथ कस्ते है कि--यदि किसी कन्या के साथ मेगनी डोगर टो परन्तु 
विवाद सस्कार नदं टु्रा दे, नौर उसी कन्या का किसी एकान्त स्थान मे 
मिलना दोगया दो तो भावी स्त्री जान कर यदि सग किया जापगा तव भी 
उक्र नियम संग हो जाता है । 

३ छरनेगक्रीडा--काम की वासना के वशीभूत होकर परख के साथ 
कामजन्य उपदहास्यादि क्रियार्पे करनी तथा काम जागृत करने की श्चाशा 
पर परस्त्री के शसीर को स्पश करना चा प्न्य प्रकार स कुवेषः करनी ये सव 
क्रियाः उक्त बत को मलीमस करने वाली मानी जाती दहै। श्चतः इनका 
सर्यथा परित्याग कर देना चाहिए । 

छ परविवादकरण-श्रपने सम्बन्धियो को छोड कर पुण्य प्रकृति जान 
कर वा लोभ के वशत्भूत होकर परविवादह करने के लिपट सदैव उदयत रहना 
यदह भी उक्त त के लिये अतिचार रूप दोप दे । क्यो कि--मेथुन भचति करना 
पुण्य रूप नदी हु्या करता। इत्तिमे भी लिखा ह --"परविनादकरणे' त्ति-परेषाम्‌ 
श्मात्मन श्रात्मीयापत्यसम्यश्च व्यतिरिक्ताना विवाहफस्ण परविवाहररणम्‌ 1 अयमसिभ्राय -्वदार- 
सतोपिणो दि न युक्त परेषा विवादादिकरणेन भेधुननियोगोऽनय॑को विशिष्टविरतियुक्ततवादित्येव- 
मनाफलयतः परा्थकरणोयततया श्रतिचयोऽयमिति”- इसका श्रथ भराग्वत्‌ दे । तथा 

कोई २ श्माचार्यं इस सूर का श्रथ यह भी करते है कि-यदि किसी केन्या का 
सम्बन्ध विवाद्‌ सेस्कार से पूर्व टी किसी न्य पुरूपं के साथं टोगया है, 


( २०३ ) 


र्न उपलन्ध दोजाता है जिस के कारण से वर डखपूर्यक अपना जीवन 
व्यतीत करसकता दे । सो धन, धान्य, तेज,वादन, गद, दास, दासी श्रादि का 
यावन्मात्र परिमास किया गया दो उस को फिर उसी भरकार पालन करना 
चारिण । क्योकि दस श्रयुवत के भी पांच ही श्रतिचार रूप दोप चरन 
कयि गप है जेसेकि-- 

तयाणन्तरं चणं इच्छापरिमाणस्स समणोवासणएणं पश्च अदयारा जाणि- 
यच्चा न समायरियव्वा तंजक्- सत्तवत्थु पमाणाइकषमे हिरण सवर्ण पमा- 
शाके दुपयचउप्पय पमाणादइकमे धरणधान्नपमाणाङ्कमे इवियपमाणा- 


इकमे ॥ 

भावा चतुर्थ श्चुत के पश्चात्‌ रमणोपासक को इच्छा परिमाण 
श्रवत के पांच प्रतिचार जानने चिप किन्तु उन पर ्राचरण न करना 
चादिप जसेकि-- 

९ क्ेवयास्तुकथमाणातिक्रम-क्तेत्र ( भूमि) चा गृादि का यावन्मात्र 
पस्माण॒ किया गया हो जेसेकि--दयान्मात्र दलो की भूमि का मै प्ररिमाण 
करता हं तथ! श्रारामादि का परिमाण करता हं । इसी प्रकार ष्ट दवेली श्रादि 
का पाश्माण॒ करता हं सो यावन्माज परिमाण किया दुरा दो उसे अरतिक्रमन 
करना चादिष्ट 1 यि वह परिमाण उल्लेघन किथा जायगा तव उक्त अरणुत्रत मे 
रतिचार रूप दोप लग जायगा अत्व परिमाण करते समय सै प्रकार 
से विचार लेना चादिष्ट जिस से फिर चत मँ दोप न लग जावे | 

२ हिरण्य खवर्सभ्रमा एातिक्रम-घटित श्र अघटित चोदी छोर खुवणी 
करा यावन्मात्र परिमाण किया गयाहो उस परिमाण को अतिक्रम न करना 
चादि । जव उक्र पदाथ परिमाण से श्रधिक वदृ जारे तव लोभ.के वशीभूत 
दोकर दस धकार का विचार उत्पन्न नहीं करना चादिपः कियद पदाथ पुत्र की 
निश्राय दै, यह पदार्थं धर्मपत्नी की निश्राय किया गया है तथा यद्‌ पदाथ 
जव पुत्र उत्पन्न दोगा उसके जन्मोत्सव मे लगा दिया जायगा । इन संकटपो 
से उक्त त दूपित दोजाता द 1 श्रतप्व जिस भकार उक्त पदार्थौ का परिमाण 
किया दृश्या है उस परिमाण को उसी प्रकारः पालन करना चादि यदि उङ्क 
कार पालन नयी किया जायेगा तो उक्त चत मलिन दोजएयगा । 

३ धनधान्य अमःणातिकम--यावन्माच धन श्रौर धान्यादि (अनाज) 
का परिमाण किया गया हे उखको श्र्तिंकरम कर देना उक्त व्रत मे दोपका 
कारण हे । ्रतप्व उक्र परिमाण विधिपूर्वकं पालन करना चादिए । धन 
च्चादि की द्द्धिहोजानि पर तको द्ारात को मलिन न करना चादिप । 
जेसेकि- परिमाण मे ने किया है इसलिये पदाथ को मे श्रपनी स्वाधीनता मे 


( २० ) 


भ्या तेजहा-उदकदिसिपमाणाइ्कमे अहोदिसिपमाणङइकमे तिरिय दिसि 


पमाणाईकमे खत्तबुडदी सडअन्तरद्धा ॥ 

भावाथ पंचम अणुवत फे पश्चात्‌ छे दिग्बत के पाच अतिचार 
जानने चादविए परन्तु श्राचर्ण न करना चाप । जेसेकि-- 

१ उभ्वदिशापरिमाणातिक्रमात्तिचार-याचन्मान्न ऊर्ध्वं दिशामे जाने 
का पटिमा क्रिया गय टो उसको श्रतिक्रम करना प्रथम ्रतिचार दै 1 

२ श्रधोदिग्‌ पारिमाणातिकरम श्रतिचार-नीची दिशा मे यावन्माच जाने का 
परिमाण फिया गया दो, उस्र परिमाण को श्रतिक्रम करना इस बत का 
दसरा च तिचार है । 

३ तिर्थक््‌ दिग्‌ पण्माणातिक्रम श्रतिचार-यावन्मति तिग्‌ दिशा मे 
गमन करने का परिमाण किया दो । जैसकि-श्यपने नगर सि चायो श्चोर दजार 
२योजन वा क्तोस तक जनिका परिमाण कर लिया दो परन्तु.फिर उस परिः 
माण का श्रतिक्रम कर जाना इस बत का तीसरा श्रतिचार हे । 

४ तेघ 'ृद्धि-यावन्मात्र परिमाण किया गया दो उस परिमाण मे परः 
स्पर न्यूनाधिक कर लेना । जैसेकि-पूवैदिशामे जाने का सौ योजन का परिमाण 
-किया गया दो श्रौर सौ ही योजन पश्चिम दिशा मे जाने का परिमाण हो 
परन्तु पूर्य दिश्ामे विशेष काम जानकर उस के डथोढे योजन कर लेने रौर 

-पथ्धिम मै पच्चास ही योजन रख जने । इस भ्रकार करने से उक्त चत म दोप 
-लगता ह । क्याौकि-यद पक प्रकार का तक दै । 

५ सति अन्तधन रतिचार-यदि गमन करते , समय स्षेति विस्घ्रत 
लो चाप श्नौर उख शंका मे श्रागे चला जवे तव भी उक्त चत मे दोप लगता 
हे । कयोकिस्षटेति के विस्त दोजाने पर भी रागे चलते जाना बत को 
मलिन करता हे । तप्य उक्त पांचो दोपो के परिदरः. पूवक इस शुण- 
जत को शुद्धतापूवैक पालन करना चादिए। 

उपभोगपस्भिगयुणवत-दसशुणएवत मे खान पान श्मौर व्यापारारि का 
चश्न किया गया ह । जदा तक वन पडे गृहस्थ को योग्य हे कि-वह्‌ इस भकारका 
भाजनं न वर जो सचन्त श्रौर वहु दिसास्पद दो । क्यौकि-भोजन करने का 
चास्तव भ.यद उदेष् दै कि-शरीर रटे । सो शरीर को भाटक देना तो एक 
अकार का सुयोग्य कसैव्य हे किन्त शरीर का सेवक वन जाना घौर उसके लिए 
नाना प्रकार के पापोपासन करने तथा स्वादु पदार्थोका ही अन्वेपण करते 
रहना यद कदापि भरैसनीय नदी, दे । प्रतप्य प्रथम मय शोर मांस का स्य 

था परित्याग कर देना चाददिए क्योकि-मदय श्योर मांस के सेवन से पायः 


=. 


२ दव्यनियम--श्रपने मुख म श्रपनी श्रंगुली के धेना यावन्मात्र 
पदाथ खाने श्मातते है, उनकी द्वव्य संक्षा है, सो इस वातका नित्यप्रति 
परिमाण फर लेना चादिष्ट कि-श्राज मे इतने द्रव्य श्रासेवन करूंगा । जेस 
कि-मूग की दाल-पक द्रव्य, गेहं की रोरी-दो द्रव्य, पानी-तीन द्रव्य] इसी 
भकार अनेक द्रव्यो की कल्पना कर लेनी चादि । परन्तु इस विषयमे दो 
यकार से परिमाण किया जाता ह जैसे कि-प्क तो सामान्यतया श्रौर दूसेर 
विशेषतया । यदि सामान्यतया परिमाण करना दो तो भूग की दाल, उङ्द 
कौ दाल, हरर की दाल इत्यादि सै प्रकार की दाल एकद्रव्य मे. गिनी 
जायगी श्चौर विगरेपतया परिमर करना दो तो दालों के जितने नामरैता- 
चन्माच्न ही ल्य निने जार्यमे । इसी प्रकार प्रत्येक द्रव्या के विषय जानना । सो 
दव्यपरेमाण वाधते समय सामान्य चिश्चेप का छ्रवश्य ध्यान रखना चाहिपः । 
इस नियम से तृष्णा क{ निरोध श्रौर सतोाषचत्ति की प्राप्तिदोतीदै। साथी 
“परिणामान्ताप द्रव्यमुनयते दस वाक्य का श्रथ जान लेना चादिप श्रत्‌ द्रव्य 
उसको कहते है जो श्रपने परिणाम से न्य परिणाम मे परिणत होगया हो । 

३ विगयनियम-जो पदार्थं वित रूप से उत्पन्न श्रा टै वद 
विगय कदलाता हे । वह विगय नव हे जैसे मय ९ मांस २मदिसा ३ नवनीत 
८ दुग्ध ५ ददी ६ घृत ७ तेल = गुड़ ६ । जिनमे गृहस्थ के लिये मद्य श्रौर 
मांसकातो सखधैथा त्याग होता है है, परन्तु शेष विगयो का परिमाण श्रव- 
ग्यमेच दोना चादि । श्रत्व गृहस्थ फा उचित है कि-शेप विगयो का नित्ये- 
यति परिमाण करता रटे । 

४ उपानटनियम-जे(ङा पगस्ख--बृट श्रादि पदाथ जो पाश्रौके वेष्टन 
के काम शयाते है उनका परिमाण करना चादिए । यदि शक्तिदोतो सर्वथा 
ही धारण न करने का नियम करदे क्योकि ये सव श्राडम्बर जीवषिसा के 
कारणभूत है परन्तु यदि संसार मे रहते हण उक्त क्रियाञ्मो का परित्यागन 
टोसके तो उनका पररेमाण अवश्यमेव होना चादिए । 

५ तांवूलपरिमाण-जो पदार्थं सुख शद्ध के लिये ग्रदण कयि जाते दै । 
सेकि--पान, खुपासी, लवंग, इलायची रादि । उनका परिमाण करना चादिण। 

६ वस्बविधिपरिमाण-वस्नो के धारण करने की संख्या नियत करनी 
चादिप। जेसेकि-श्माज शओमौर इतनी संख्या मे पटनूंगा ! श्रमुक २ वस्व पटरूगा 
२ स्वदेशी चा विदेशी वस्र तथा कपीस के इख प्रकार वस्विधि मे स्च जाति 
के घस्रो का परिमाण दोना चादिष्ट । साथ दी इस वात काभी ध्यान रहे कि 
निस चस मे दिखादि त्यो की विशेष संभावना दो वह चख त्याग देना चादि । 

७ पुष्पविधि परिमाण-श्पने भोगने क लिये पुष्पो का परिमाण करना 


१ 


अ, 


मास॒करने की अत्यन्त श्रावश्यकता हे । क्यकिपरिमाण करने के पश्चात्‌ 
चात्मा सेतो चत्तिभे ाजातादै। 
यदि उक्त पदाथ का सविस्तार स्वरूप देखना हो तो उपास्रकदशाङ्ग 
सूत्र के भथमाध्याय शरैर श्रावश्यक सूत्र का चतुर्थाध्याय को देखना चाहिए । 
उक्त दोनो सू मे ““देतखविदि” सूत्र से लेकर २६ श्रंकवर्णन कपि गप ् 
श्रथात्‌ दांतून करने का परिमाण करे । जेसेक्रि-शरसुक दृष्ठ की दांतून करूंगा ! 
उक्त सूत्र के पठन करने सरे यट भली भांति सिद्ध दोजाता दै कि- 
श्राचकचर्म को भत्यक चस्तु करा परिमाण करना चादिए । किन्तु जो मांस श्रौर 
मद्य इत्यादि अरभक्य पद्‌ाश्च॒ है उनका सर्यथा ही त्याग किया जाता है 
भोजन चिष्धे का परिमाणं करने के प्रश्चात्‌ फिर १५ पंचदश कमी- 
दान~-"पाप कमो का परित्याग कर देना चादिण जेसेकि 
कम्मय्र य समणेवासणएणं पणदसकम्मादाणाईं जाशियव्वाईं 
न समायरियव्वाह तंजहा इङ्गालकम्मे वणकम्मे साडीकम्मे भाडीकम्मे फोडी- 
कम्मे दंतवाणिजे लक्खवाणिजे रसवाणिजे विसवाशिज्जे केसवाशिज्ञे 
जतपीलणकम्मे निल्लज्छणकम्मे दवग्गिदावणया सरदहवलावसोसणया 
शसरईजणएपोसणया । । 
उपासकदशाङ्गसून्न य. १॥ 


भावा्थ-शास्जकारने १५ व्यापार इस भ्रकार के वरन किये है, जिनके 
करने से हिसा तिशेप होती दे'। इसी वास्ति उन कमे के उत्पत्ति कारणको 
ज्ञानना तो योग्य है, परन्तु चे कर्म यरदण न करने चादिं ! क्योके-जो धाचक 
श्रास्तिकः श्रौर निवीरागमन की अभिलाषा रखता है उसको वह्दिखक 
व्यापारा स्त पृथक्‌ टी रहना चादिप मौर जर्टो तक चन पड़ श्राय व्यापारो 
स दी श्रपने निव करने का उपाय सोचना चादिए यद्वि किसी कारण 
वश श्राय व्यापार उपलब्ध न होतेदो तव बद दाखकर्म आदि रृत्योसे तो 
श्मपना निवीद करल परन्तु मदय श्रौर मांसादि अनार्यं व्यापार कदाएपिन करे 

श्व पचदृश् कर्मादानो का नीचे संत्ेप से स्वरूप दिखलाते हे । जेसेकि- 

१ छगारक्म-याचन्माच श्रधचिके प्रयोग से व्यापार कि जते हैँ 
चे खव श्गारकस म दी भ्रदण किये जातेदे । जेसे-कोयतले का व्यापार, टोका 
पकाना, लुद्धार का काम , दलवाई का काम, घातु का काम इत्यादि। जा 
पने चास्ते श्रावक को श्रि करा भयोग करना पड़ता है उसका उस को परित्याग 
नही है जेसेक्रि-सोजनादि के वास्ते श्रनि का श्रारंभ करना पड्तादहतथा 


( २९१९ ) 


की जाती है प्रतएव श्रावक को उक्त भकार का वाशिज्य न करना चाहिए । 

पांच प्रकार के सामान्य कर्म प्रतिपादन किये गप दै जेसेकि- 

११ यजपीडनकर्म - यंत्र (मशीन) डारा तिल्ल श्रौर इचु रादि का पीडनां 
यद भी हिसा का निमित्त कारण दे। 

१२ निलांञ्छनक्म-चपभ श्रादि का नपुंसक (खस्सी) करना । 
` १३ दाचाभेदानकर्म--वन को श्राग लगा देना जैसेकि-कोई व्यक्ति जो 
धमे स्ते प्रनभिक्ष दो उसके मन मे यद सकट्प उत्पन्न हो जाता है कि-यदिमे 
चन कोश्चभि लगा दंगा तव दरस वन मे नूतन घास उत्पन्न टोजायगी जिससे 
प्रायः पश्युवर्म को वड़ा सुख प्राप्त दोजायगा अतण्व वन को श्रञ्चि लगाना एक 
भकार का धर्मकृत्य दै । परन्तु जो उस श्चि द्वारा श्रसख्य जीवो का नाश दोना है 
उस क्रा उस को सर्वथा वोध गी हे । श्रतपव यह क्म भी न करना चाहिए 


१ सयोहदतडागपरिशोपणताकर्म- स्वभाव सरे जो जल भूमि से 
उत्पन्न दोजायि उसे सर कहते है । नयादि का निस्तर जो भदेश दाता दै. उस 
कानाम हद्‌ दै तथा जे जल भूमि-खननसे उत्पन्न किया गया दो उसका नाम 
तडाग दै । उपलक्षण से यावन्माच कूपादि जलाशय है उन कों श्रपने गोधूमा- 
दिखता को वपने के चास्ते खुखा देवे तथा श्रन्य किसी कारण को सुख्य रख कर 
जलाशयं को शुष्क कण्देवे तो महासा होने की संभावना की जाती है । जैसेकि 
पक तो पानी के रहने वाले जीवों का विनाश दूसखेर जो जल के श्राश्रय निर्वाह 
करने वाले जीव है उनका नाश्च । श्रतष्एव यह क्म भी य॒दस्थो को परित्याग 
करने योग्य दै । 

१५ श्र खतीजनपोपणताक्म--दहिसा के भाव रख कर दैसक जीवो की 
पालना करनी । जैसेकि-शिकार के लिये कुत्ते पालने, मूपको के मारने के लिये 
माजार की पालना तथा किसी श्रनाथ कन्या की वेश्या चृतति के लिये पालना 
करनी इत्यादि । इसी पकार ईिसक जीवो के साथ व्यापार करना, क्योकि-- 
उनके साथ व्यापार करने से हिसक कमो की विशेष वृद्धि दोजाती है । इस क्ममे 
व्यापार सम्बन्धी उक्त क्रियाश्रो के करने का निपेध किया गया है, लुका के 
चास्ते नदी । सो विवेकशील गरदस्थो को योग्य है कि-वे उक्त पेचदेश कमा 
दाना का पषरेत्याग करद । फिर उपभोग परिभोग गुणनत के पांच च्रतिचार भी 
छोडदे । जो निख्नलिखिताचसार है । 

तत्थणं मोयण्ो समणावासएणं पंच्मइयारा जाणियव्वा न 


समाथरियव्या तंजहा-सचित्ताहारे सचित्तपदिवद्धहरि अष्पउलित्रो 


{ २९३ ) 


स्वच्छ श्र खुखथद्‌ है, उसी माम के समीप वनस्पति तथा घास से युक्त 
दूसरा उपमाम हो तो प्फिर बद गृहस्थ क्यो उस रयाजमाग को छोड़ कर उप- 
मागे मै चलने लग पडे ? कदापि नद । वस इसी कानाम नर्धदंड दे, क्योकि 
उपमार्म परः चलने से जो चनस्पतिकाय श्रादि जीवो की हिसा दुई है 
चह हिसा श्रन्थ रूप दी हैः । इसी भकार श्नन्य विषयों के सम्बन्ध मे भी जन 
लेना चादि | 

शशाखकार महर्पियो ने प्रन्थदंड के सुस्यतया चार भेद धतिपादन 
किये दै, जैसेक्ि--धरपध्यान ९ पापोपटेश २ दसाय्रदान २ प्रमादाचरित ४ 

१ श्रपध्यान श्नर्थदंड--श्ार्तध्यान श्रौर सोद्रध्यान न करना चाहिय 
कयोकिं--जव सुख वा दुख क्मांधीन माना जाता हैतो फिर फलकी 
असिद्धि मे ता चा शोक क्यों ? क्योफि-जो कर्म वाधा गया है उस कमेने 

१८ 
अवश्यमेव उदय सोकर फल देना दै से इस प्रकार की भावना्रों से चिता 
चा रोद्रध्यान दुर कर देना चादिए। 

२ पापोपदेश-श्रपने से भिन्न श्रन्य पाशियो को पापकम का उपदेश 
करना । जसे कि--तुम श्रसुक दिखक कर्म श्रञुक सीति स करो । 

२ दिखाधदान अनथदरड-जिन पदार्थो के देने से दिसक क्रियां 
की निष्पात्ति होवे उन पदाथः का दान करना, यद्‌ श्रनर्थदरुड टै । जेसेकि-- 
शस श्रौर अस्म का दान करना तथा मूशल चा वादन अश्वा यानादि 
पदाथा का दानं करना 1 

& धमादाचर्ण अनर्थदरड--धरम किया के करने मे तो आलस्य 
किया जाता है, परन्तु उत्यकलादि के देखने मे श्रालस्य का नाम मात्र भी नदी 
इस का नाम प्रमादाचरण श्मनर्थं दरुड दै तथा याचन्मा् धमे से परतिङकृल 
्रियाप है जिन से सार चक्र मे विशेष परिश्रमण दोतादो उसी कानाम 
यमादत्वरण हे । शब्द, रूप, भध, रस, शरोर स्पश इन के भोगने की अत्यन्त 
दच्च शरोर उन के (भोगने के) लिये टी पुरूपाथे करते रदना उसे भमादा- 
चर्ण दृरड कते है । 

इस गुण चत की रच्ता के लिये शास्जकारो ने पांच अतिचार अत्तिपा- 
दन कयि टह जेसेकि- 

तयाणान्तरं चं अणट्ादण्ड वेरमणस्स समणोवासणएणं पंचञ्र- 

इयारा जाशियव्वा न समाययियन्वा तंजहा-कंदप्ये इकदए मोहरिए संखत्ता- 
गरणे उवभोग परिभोगाइरित्ते ॥८॥ 

भावाश-सातवे उपभोग शरोर परिभोग ग़णएत के प्यात्त्‌ आख 


( २६९५ ) 


"सम" भाव रखते से ्रार्मा को क्षान दीन श्चौर चारित्र का सम्यगतया श्रायः 
लाभ दोजायगा। जिस समय श्रात्मा सम्यगक्षानदश्चेन श्रौर चारिज सर कर्‌ 
पक रूप टोकर उदरेगाए उस्र समय को विद्धान्‌ 'सामाविकः काल कटते हँ । 
सो जवतक श्रात्मा के सामाथिक के समय की भाप्षि परतया नही होती तव 
तक श्रात्मा निजानन्दं का श्रुभव भी नदो कर सकता । सो निजानन्द्‌ का 
भकट करने के लिये, समतारस का पान करने के लिये, ्ात्मविशुद्धि के लिये, 
दैनिक च्या के निसक्तण के लिये, श्रात्मविकाश (स) के लिये भत्येक श्रावक 
के। दोनो समय सामाथिक शरवश्यमेव करनी चादिष्ट । सामायिक त करने के 
चास्ति चार विशुद्धियो का करना श्रत्यन्त श्रावश्यक है । जेसेकि-- 

९ दरव्यथ॒द्ध--सामायिक द्रव्य (उपकरण) जसे आसन, रजेदरणी, मुख 
यिका तथा च्रन्य शीर वख शुद्ध शरोर पवित्र होने चादिं । जटां तक 
चन पडे सामायिक का उपकरण सांसारिक क्रियाश्नो मे नदी वसैना चादिए। 

२ज्तेत्रशुद्धि-सामए्यिक करने का स्थान स्वच्छ शौर शांतिश्रदान करने 
चाला दो । खी पशु चा नपुंसक से युक्त तथा मन के भावो को विरत करने 
चाला न होना चाहिए । जिस स्थान पर कोलाहल होता दो श्मौर चडुतसे 
लोगो का गमनागमन होता दो उख स्थान पर समाधि के योग स्थिर नदी रह 
सकते । श्रतप्व सामयिक करने वालो के लियि क्तेत्रशुद्धि को अत्यन्त 
आवश्यकता है । ॥ ४ 1 

३ कालशद्धि-ययपि सामएयिक वरत भरलेक समय केया जा सकता ह 
तथापि शाखकारा तथा पूर्वाचायो ने दो समय ्ावश्यकीय प्रतिपादनक्ियेदे 
जेवेकि-प्रातःकाल श्रौर सायंकाल । सो दोनो समय कम सेकमदो दो घारेका 
परमाणु सामापिक बत अवश्यमेव करना चादि । क्योकि-जोा क्रियार्पे नियत 
समय पर की जाती ह, वे वहुत फलदं दोती दे । 0 

£ भावश॒द्धि-सामाथिक करने के भाव श्रत्यन्त अद्ध दन चादि । 
इस कथन का सारांश इतना है है कि-लज्ा चा भय स सामाचिक बत धारण 
किया इुश्रा विशेष फलप्रद्‌ नी ह्या करता । रतः यद्धं भवा से घेरित दौकर 
सामाधिक चत धारण करना चाहिए । ॥ 

उपस्त सामाथिक चत के भी पांच शरतिचार द, 

आवश्यकः हे किन्तु उन पर ्माचरण नदी करना चादिष् यथा ` 

तयाणन्तरं चं सासाइयस्स समखोचासएणं पश्च्हयारा जाशियव्वा 

न समायरियव्वा तंजदहा-मदुप्पिषाणे बयदुप्पणिषहाणि कायदुप्पणिहासे 
सामाइयस्स सद्‌ अकरणया सामाईयस्स अरवद्ियस्स करणया ॥ € ॥ 


जिनका जाननातो 


भ 


( २९७ ) 


वतका मुख्योदेश्य इच्छा का निसोध करना ही है । क्यों कि-दच्छाघ्रो के निरोध 
से ही श्रात्मिक शति उपलब्ध दो सकती दै । 

देशावकाशिक त धारण कर लेने के पश्चात्‌ श्रावक को इस बत के 
भी पांच ध्रतिचार छोड़ने चादिषं जैसेके- 

तयाणन्तं चणं देसावमासियस्स समणोवासएणं पञ्चग्रयारा 
जाशियव्वा न समायरियव्वा-तंजहा-अआणवणप्यव्मोगे पेसवणप्पञमोगे सदा- 
शुवाए स्वाुवाए बहियापोग्गलपक्खेवे ॥ १०॥ 
उपासफदशाद्र सत्न र ° 1 

१ श्रानयनप्रयोग--अवश्यकीय काम पड़ जाने पर परिमाण से वाहिर 
भूमि से किसी पदाथ का किसी के द्वारा मंगवाना, यह देशावकाशिक चत 
का पथम श्रतिचार है । क्योकि-तते्र का परिमाण टो जाने पर पिर परिमाण 
ने वादिर तते से वस्तु का मेगवाना योग्य नदी हे । 

२ गरेप्यप्रयोग-- जिच धकार वार के त्त्र से वस्तु मेगवाने का ति 
चार भरतिपादन किया गया है । उसी श्रकार वस्तु के म्रेपण॒ करने का भी शरति- 
चार जानना चादि । 

३ शब्दानु पात--परिमाण की भरमि से वाद्िर कोई न्य पुरुप जा रहा 
दो उस समय श्रावरयकीय काय कराने के निमित्त सुख के शब्द से श्र्थात्‌ 
श्राचाज्ञ देकर उस पुरुप को अपना वोध करा देना । क्योकि वह पुरुप जानलेगा 
कियद्‌ शब्द्‌ खरसुक पुख्प का द । इस प्रकार कने से भौ अतिचार लगता दे । 

£ रूपालुपात--जिस समय देशावकाशिक चत मैवा दो उस्र समय 
किसी व्यक्ि से को काम कराना स्षटति श्रागया तव अपना रूप्‌ दिखला 
कर उस को योधित करना उस का नाम रूपदुपात घ्मातिचार दै 1 जैसे कि-- 
गवाक्लादि मे बैखकर श्रपना रूप दिखला देना । 

५८ पुद्धल्लेप श्रतिचार--परिमाण कौ हुई भूमि से वादिर कोई वस्तु गिरा- 
कर पते मन के भावौ को श्रो के भरति भका करना यद भौ ्तिचारः टे 1 

तदनन्तर एकादशवां पौषधोपवास बत हे । उपवास करके श्राठ पटर 
विसेप धर्मध्यान मे व्यतीत करना, 'पोपधघः कटलाता हे । पय के दिनो मेः जसे 
कि-दितीया, पचमी, टमी. पादश, चतु चनौर च्रमावस्या चा पौर्णमासी 
आदि तिधयो मै शुद्ध चसति पोपधशशालादि स्थान मे सांसारिक कायो 
को छोडकर पौपधोपवास करना चादिष्ट । जदां तक वन पड़े वह पवित्र समय 
ध्यानचृत्ति मे दी लगाना चाद्दिण क्योकि-विना ध्यान समाध नही लग सक 
ती हे) साथ दौ. पौपधोपवास मे सांसारिक क्यं वा स्नानादि क्रियापं त्याग 


( २१६ ) 


प्रकार के खान पान सम्बन्धी संकल्प विकट्प उत्पन्न करना । इन पांच शरति- 
चार रूप दोप फो छोडकर शुद्ध पौपधोपवास धारण करना चादिए । 
पौपधोपचास त के पश्चात्‌ द्धादशवों श्रतिथिसंविभाग बत विधि 
पूवैक पालन करना चादिष्ट ' क्यो कि-साधु का नाम वास्तव में ध्रतिथि है । 
उस ने सर्य धकार की सांसारिक तिथियों को छोड कर केवल श्रात्म-ध्यान में 
दी चित्त स्थिर करलिया है । श्रत्व जव वे भित्ताकेलियि गद्य मे प्रविष् 
होते ह तव फिसी तिथि के श्राधित होकर धरो मे नदी जति। नेहीवे 
भथम्‌ गृहपति को खनित करते ह कि-श्ममुक दिन दम श्रापके गृ मे भिक्त 
के लिये श्रवभ्य श्रे । श्रतः येसे भिन्लुजो श्रपनी उत्ति मे पूण दृता 
रसते हए मधुकरी भिक्ता टृत्ति से श्रपने जीवन को व्यतीत करते दै, जव 
बेह मे पधार जा तव ॒श्रानन्द पूर्वक प्रसन्न चित्त होकर उन की ठृत्ति के 
श्रजुसार शुद्ध श्रौर निदप पदार्थो की भिक्ता देकर लाभ उठाना चादिष्ट 
कारणकि-सुपात्र दान कामदाफल्ल इस लोक श्रौर परलोक दोनो मे भ्रास्र दोता 
दै। इस लिये सुपा दान कर के चित्त परम भ्रसन्न करना चादि । जो 
स्वधमं भाई साधु सुनिराज। के दीनो के वास्ते श्राते द, च भी उक्त बत मे 
ही गमित किये जाते ह । प्रतः उन की भी यथायोग्य धरतिपत्ति करने से ्रतिथि 
सेविभागकी हीं ्राराधना दोती है । साथ द्यी इस वात काभीक्षानरदे कि- 
जो दव्य न्यायपू्ैक उत्पादन करिया गया दै उसी को विद्धान्‌ चमे ने अतिथि- 
सेविभाग जत के उपयोगी परतिपादन किया है । सारांश केवल इतना ही दै 
कि-चतुर्विध सश्र की यथायोग्य प्रतिपत्ति करनी श्रावक वर्म का मुख्य क्तेव्य 
है । सो जव मुनि महाराज निज गृह मे भिन्ता के लिये पधार ज तच द्ध 
चित्त से उन की यथायोग्य श्रादारादि ढारा सेवा करनी चादिष्ट 1 
तयाणन्तरं चणं अहासविभागस्स समणोवासएणं पञ्च अयारा 
जाणियव्वा न समायरियव्वा त॑जहा-सचित्तनिक्खेवणया सचित्तपिहणिया 
कालाईकमे पखवदे से मच्छरिया ॥ 
उपासक्दश्पसूत्न श्र° ॥१॥ 
भआवाश्व-पकादशवे बत के पश्चात्‌ वारव श्मतिथिसविभाग तके 
भी पांच रतिचार जानने चादिण, परन्तु श्रासेवन न करने तादिप । जेसेकि- 
९ सयित्तनिक्तेपण अतिचार-साघु को नदेनेकी बुद्धि से निदे 
पदार्थो को सचित्त पद्थौ पर रखदेना श्रथात्‌ जल पर वा अन्न पर तथा 
.वनस्पति शादि पर निर्दोष पदार्थं रख दे, ताफक्रे साधु अपनी चत्ति के विप- 
रीत होने सेउसर पदार्थफोन ले सके। 


( २२१ ) 


सुडे भवित्ता यागारातो अशगारितं पव्वहस्सामि २ कया णं यहं यपच्छिम- 
मारणंतिय संलेहणा सूसणा स््सिते भत्तपाणपडियातिक्खते पाद्योवगते 
काल श्रणवकंखमाणे पिहरस्सामि ३ एवं समणसा सवयसा सकायसा 


पागडेमाणे जागरेमाणे समरोवासते महानिजरे महापज्जवसारे भवति ॥ 
यणायसूत्रस्थान ३ उदे स्‌ ॥ २१०॥ 
भावार्ध-तीन पकार क्य शुभ भावनाश्रो से श्रावक कर्मो की परम 
निजैरा प्रर संसार का श्रन्त कर देता है, परन्तु चे मन, वचन श्रौर काय द्वारा 
दोनी चादिष्ट । क्योकि-श्नन्त.करणए की शुभ भावना कर्मो की प्ररूतियो की 
जड को निूल करने मे सामर्थ्यं रखती दहै, जिस कारण श्रात्मा विकास मार्गमे 
श्राजाता है । जेसेकि-- 

श्रमणोपासक सदैव काल श्रपने छन्तःकरण मे इस वात की भावना 
उत्पादन करता रहे कि-कव मै श्रटप वा बहुत परिग्रहका परित्याग ( दान) 
करगा । फयोकि दस्यो का मुख्य धम दान करना ही हे । धार्मिकः रियाश्रो 
मं धन का सदुपयोग करना उन का मुख्य कतैव्य है । 

२कव म ससार पत्तकोदधोडकर अर्थात्‌ गृदस्थावास को छोङ्करः 
साधुद्त्ति धारण कर्हैगा । सयो कि-ससार मे शति का मागे भ्रास्तकरना सहज 
काम नही है । सुनिदृत्ति मै णोति की परासि शीघ्र दो सकती ह । शतः सुनिदृत्ति 
धारण करने के भाव सदेव काल रहने चादिं । यदह वात भली प्रकार से मानी 
हर हे कि--जव राणी मात्र से वैर जाता रहा तो फिर शांति की माति सहज 
म दी उपलब्ध दोजाती है । 

२ कव ञे शुद्ध श्रन्तःकरण के साथ सव जीवो से मेनीभाव धारण 
करके भ्त पानी को द्धोड्‌ कर पादोपगमन अनशनवत को धारण कर काल 
कीडच्छान करता इुश्ा विचरूगा च्र्थात्‌ शद्ध भावो से समाध पूवक 
पादोपगमन शनन त धारण करूगए । यद्यपि यद वात नि्विवाद सिद्ध हे 
कि-शत्यु ्रवश्यमेव दोनी है परन्तु जो पादोपगमन के साथ समापधयुक्त 
सत्यु है वट ससार समुद्ध से जीवो को पार कर देती है । श्त्टव जव सत्यु 
का समय निकट श्य जावे तव सव जीवो से वैरभाव छोडकर पने पू्वरूत 
पापो का पश्चात्ताप करते हषः गुर के पाख णुद्ध आलोचना करके फिर यथा- 
शक्ति भमाण॒ चरन्न यत धारण कर लेना चादि । . 

दस अनशन यत के शाखकत्ती ने पांच तिचार वणेन कयि है उन्दे 
छोड़ देना चादिए जेसे कि-- 

तयाणन्तरं चं अपच्छिम मारणंतिय सलेदणा भूसणा रादणाए पंच 


{ ३ ) 


मानतः हे, परन्तु पय्धक नय के मत से भरदयेक द्रव्य श्रपनी वर्तमान की 
पयाय त्तणभगुर मे रखता दै । क्योकि “नव दरव्यलक्तणम्‌" द्रव्य का लक्षण 
सत्‌ भरतिपाद्न किया गया हे, किन्तु "उपाद्‌ व्ययधरौन्यदुक्त सत्‌” जो उत्पन्न 
व्ययं शौर श्रोव्य इन तीनो दारो से युक्त दो उसी कौ द्रव्य सला दे। जैसे 
किच्च का (मिद्धो) का पिंड कभी तो घटाकारः रोजाता दै, कभी इंटाकार 
शरोर कभी न्य रूप म परिणत दोजाता दै । उसफे श्रकायोमे तो परिवसैन 
हाता दी रहता दे, परन्तु यदि निय नय के मत के प्राधित दोकर चिचार 
किया जाय तच सत्तिका द्वव्य भव्य भाव मे निचित होगा 1 क्योकि--चादे 
उस द्रव्य मे किसी पदारथ की भी निष्पत्ति होजापः परन्तु प्रत्येक पयौय मे 
मृत्तिका द्रव्य सदूरूप से वि्यमान रदता दै । ठीक दसी भकार जेनमत भी 
अत्येक द्वव्य की यदी दशा चन कर्ता हे । द्रव्य के समूह का नाम दी जगत्‌ 
वा लोक है । छतप्व यह स्वतः टी सिद्ध दोजाता हे कि--जव द्रव्य अनादि 
ञरनन्त है ते भला फिर जगत्‌ सादि सान्त केसे सिद्ध दोगा ? कदापि नदी । 
इसलिये द्रव्याधिक नय के मत से यद्ट जगत्‌ श्मनादि श्ननन्त है । परन्तु 
किसी पयय के श्राशथित दोकर उस च्णस्थायी पयौय के श्वलम्बन से उस 
दव्य को कणविनश्वर कट. सकते दै जेसे-मनुष्य की पर्याय को लेकर मचुष्य ` 
की श्रसिथिरतः कां पतिपाद्न करना 1 फ्योकि-- मद्य पयय की श्रस्थिरता 
का युन किया जा सकता दे, नत जीव कौ छ्स्थरता वा जीव की छननित्यता का। 
तप्य निष्कपे यद निकला कि--श्स जगत्‌ मे मूल तत्व दो ही टै, प्क 
जीव शोर दूसरा जङ्‌ । सो दोनो क विस्तार का नाम जगत्‌ दै । दोनो ख्यो 
का जो अनादि स्वभाव (धमै) दै उसी को श्रस्तिकाय धम कदते हे । 
ज्ेनमत मे चः दरव्यात्मक जगत्‌ माना गया हे, जसे कि--धमं द्रव्य ९ 
श्रधनदरव्य २ पराकाश द्रव्य २ कालद्रव्य ४ पुदधलद्रनय ५ शरोर जीव द्रव्य दन 
चः द्रव्यो म केवल पक द्रम्य जो काल संशक है, उसको श्यमदेशी ठव्य माना 
गया हे, शष पांच द्रव्य सभ्रदेशी कथन किये गप है । फयोकि--काल ठव्य के 
यदेश नरी दते द । केवल किसी छपेक्ता पूथक उसके भूत, भविष्यत्‌ श्मौर 
चसैमान यद तीन विभाग दो जति ह । श्रपितु जो धमौदि ठरव्य हे चे सप्रदेशी 
रोने से उनकी “पंचास्तिकाय” सक्षा कथन कती गर्दै! इन ६ दवव्यो के लक्तण 
शाखकार ने निन्न प्रकारः से कथन किये दे-जेसे कि- 


गुणाणमास्ो दव्वं रागदन्वस्सिया गुणा 


लक्खण पञवाणं त॒ उभयो अस्सिया सेवे ॥ 
उत्तराध्ययन सूल देत गा० ६1 


{ २२५ ) 


जाय तव एक पक्त नित्य वश्यमेव सिद्ध दो जायगा । कन्तु इस प्रकार देखा नीं 
जाता } श्रत्व द्रव्य को गुण पयय युक्त मानना दी युक्षिथुक्क है । जैसे दन्य 
पुल है उस के चरै, भेधःरस श्नोर स्पश शु हे । नाना प्रकार की ्रारुतियां 
तथा नव पुरातनादि व्यवस्था उस फी पयय होती हे । स लिये द्रव्य उक्त 
णण युक्त मानना युक्ि-सेगत रैः । यद्यपि द्रव्य का लक्तणए सत्‌ प्रतिपादन किया 
गया दै, तथापि “उत्पादव्ययपध्रभ्ययुक्त सत्‌" उत्पन्न व्यय शौर धभोन्य लक्तण 
चाला दी द्रव्य सत्‌ माना गया द ! जिस भकार एक सखुवश द्रव्य नाना पकार 
क श्राभूपणो फी श्रारृतियां धारण करता है चौर फिर वे श्रारुतियां उत्पाद 
व्यय युक्त होने पर भी खवर द्रव्य के भोव्यतासरेधारणकरतीदहे। सो दसी 
का नाम द्रव्य दहै । 

यदि पेसे कदा जाय फि-प्यक द्रव्य उत्पाद श्रः व्यय यह दोनो विरोधी 
गुण कस प्रकार धारण कर सकता दै? तो इसके उत्तरम कटा जा सकता 
दे के-पर्याय त्षण विनश्वर माना गया है । पूर्वं त्तण से उत्तर कण विल- 
एता सिद्ध करता है । जिस प्रकार कंकण से मुद्धिका की आरति मे सखुचसं 
चला गया दै, परन्तु सखुवरी दोनो रूपों मै विद्यमान रदता है । हौ पूर्वं पर्याय 
उत्तर पर्याय की श्रारूति को देख नदी सकता दै । कयोकि-जिख पकार 
श्रघकारः श्रौर प्रकाश एक समय कत्व मे नदीं रट सकते है उसी प्रकारः पूय 
पयय श्रौर उत्तर पर्याय भी एक समय कट नदी हो सकते ह । 

जसे युचावस्था च्द्धावस्था की श्रारूति को नदी देख सकती, उसी 
पकार पूर्य पयाय उत्तर पर्याय का दशन नदी कर सकती; परन्तु शरीरः दोनो 
श्रवस्थाश्रो को धारण करता है, उसी अकार द्व्य उत्पाद्‌ श्रौर न्यय दोनो 
पयायो के धारण करने चाला होता हे । 

जिस पकार दम राति श्रौर दिवस दोनो का भली भांति ्रवलोकन 
करते दुष धारण करते ह, परन्तु राति शरोर दिवस वे दोनो युगपत्‌ ( इकडे 
दप ) नदी देखे जाति, टीक उसी प्रकार द्रव्य दोनो पयय को धारण करता 
हा पनी सत्ता सिद्ध करता है । 
पव रश्च यद्‌ उपस्थित दोता है कि-द्रव्यो की सेख्या किननी मानी 

इसके उत्तर मै सूजकार वर्णन कस्ते ह । जेसेक्रि- 

धम्मो अहम्मो आगासं कालो पुग्गलजंतवो । 


एस लोगोत्ति पर्णएत्तो जिशेिं यरद सिर्हि॥ 


उत्तराध्ययनसूतच्र य रर गा०॥७ा 
गत्ति--धम्प इति-वमीरित रायः १ अधम्मं इति-जधमास्तिकायः २ ्काशामेति आ 


कागस्ति कायः ३ काल. समयदििरूप.-४ पुर्गलत्ति-पुटलास्तिफय ५ जन्तव इति जीवा ३ 


ॐ 
[अं 


{ २२७ ) 


दस प्रकार लोक मे श्रपनी सत्ता रखते दै जैसेकि-धर्मद्रव्य ९ श्रधर्मद्रव्यरश्रौर 
श्रकरद्रन्य ये य तीन द्भ्य श्रसख्यातप्रदेशपमाण लोक मे एक एक संख्या 
ऊ धारण करने चाले प्रतिपादन करये गप है । यद्यपि श्राकाश द्रव्य भी अनंत 
दे परन्तु लोक मे चह श्रसेख्यात अदेश को धारण कयि इणः दी रहता द । 
भ्याकि--लोक श्रसंस्यात योजनो के श्रायाम श्रौर विष्केभ के धारण 
करने वाला टै । श्रत्व शाखकार ने धर्म, शअ्रधर्म तथा ध्राकाश ये तीनों द्रव्य 
लोकम पक २ दी प्रतिपादन किये दै । ययपि धर्मृद्रन्य के स्कन्ध, देश श्रौर 
भदेश रूप तीन भेद्‌ प्रतिपाद्रन कयि गप है तथापि भेद केवल जिक्ञाखुश्मो के 
बोधक लिये दी दिखलापः गप है, किन्तु वास्तव मे धर्मद्रव्य श्रविदिन्न भाव 
से पक रूप टोकर दय लोक म स्थित है । इसी भकार श्रध द्रव्य श्रौर श्ाकाश- 
ट्व्य के चिषय मे जानना चादि । जस भकार धमद्रन्य श्रविचिन्न भावस 
लोकम स्थित है, ठीक उसरी धकार श्रधर्मं श्रौर श्राकाश द्रव्य भीलोकमे 
स्थत ह । किन्तु कालद्रव्य २, पुद्धलद्रन्य २ श्र जीचद्रव्य ३ ये तीनो 
लोक मे श्रनैत परतिपाद्न किये गप ह । क्यो कि-तीनों काल की अपे्ता काल- 
दन्य श्रनेत प्रतिपादन किया गया है । जेसेकि-जव द्रव्याथिक नय की ्पेत्ता 
स ससार ्ननादि श्चनेत दै तव भूतकाल वा भविष्यत्‌ काल भी श्रनत सिद्ध 
दा जता हे । श्रतपएव कालद्रव्य तीनो काल की ्रपेत्ता से ्रनेत पतिपादन 
किया गया हैः । ठीक उसी अकार पुद्रलद्रव्य भी प्रनत कथन किया गया दे । 
क्याक्रि-एक परमाणु पुद्धल से लेकर अ्ननेत परदेशी स्कन्ध पयन्त पुद्धलद्रव्य 
विद्यमान देः । वट श्चनैत वर्मणाश्यो के समृ का उत्पादक भी दै। इस लिय यद 
ठव्य भी लोक मे श्रपने द्रव्य की श्रनत सख्या रखता है । जिस भ्रकार पुद्धल- 
रव्य श्यनेत दै, ठीक उसी भकार जीव द्रव्य भी श्रेत हैः अर्थात्‌ लोक मे ्रनेत 
श्रात्मा्पः निवास करती हे । 
कतिपय वादियों ने एक श्रात्मा ही स्वीकार किया है । उनका मन्तव्य 
यह है कि-एक त्मा का ही अतिविम्ब रूप अनेक ्रात्मा् हे । वास्तव मे 
शद्ध श्रात्मद्व्य एक दी दे । तथा किसी वादी ने आत्मद्रव्य भिन्न रमानाद्। 
पक ्रात्मा के मानने वालो का सिद्धान्त युक्तियो से वाध्य कर दिया द । 
परन्तु जेन-सिद्धान्तकासे ने श्रात्मद्वव्य द्रन्यरूप से प्रनत स्वाकार क्या दहं 
परन्तु क्ञानात्माके मत से श्रात्मद्वव्य एक भी दे । जिस प्रकार सदस द्‌।पक 
दरव्यसूप से सहस्र रूप दी दे परन्तु सदस दीपको का परकाशश शण एक यद 
ईक उसी पकार आत्मद्भव्य अनंत होने पर भी क्षानटणि र ण के सम 
होने पर प्क दी ह । परन्तु व्यवहार पन्त मे आत्मद्रन्य शनत हे । अतएव काल- 
द्रव्य पुद्धलद्रव्य शरोर जीवद्रव्य नत प्रतिपादन करिये गए दहं । 


( २२६ ) 


किरः सवंद्र्व्यो का भाजनरूप ्राकाश्ढन्य जो प्रत्तिपाटन किया गया 
ह, उख क! श्रवकाशरूप लक्तण कथन किया है. कयोकि--श्राकाश का 
लक्षण वास्तव मे श्रयकाशरूप दयी है जिस रकार दुग्धसे भरे दए कलशमे 
शक्षरादि पदाथ समवतर दो जाते है यक उसी भकार अत्येक "पदाथ को 
श्रवकाश देने के लिपि श्राक्तशद्रव्य भाजनरूप माना गया है 1 तथा जिस 
यकार सहस दीपको का प्रकाश परस्पर सम्मिलित दोकरः ठर जाता रै 
यक उखी प्रकार प्रत्येक द्रव्य श्राकाशमे सम्मिलित होकर उहरे इषः है\ 
श्रतप्प्व श्राकाश्च का ्यवकाशरूप लक्तण षी मानना युयक्त दे 1 यद्यपि 
कतिपय वादियो ने (्व्दगुणक्माकाराम्‌"' इस धकार से पाठ माना दे. परन्तु 
उन का यद लक्षण युक्तियुक्त नही हे स्यकि--यह्‌ वातत स्वतः सिद्ध हे कि- 
गुरि पत्यत श्रौर गुण परोक्त होता दै परन्तु इस स्थान पर शब्दरूप गुण त्तो 
उन्द्रिय-ग्राह्य द श्रौर श्राकाश इन्द्रिय-ग्राह्य पदाथ नदी मानारगयादे तथाच- 
काणाद शन्दसव चेन्नमे्षणेषऽतीन्दरिय स्यात्‌ परिमाएयक्तयम्‌ १ 
सरषषपि चेतति तदाश्रये च द्रन्यऽगृदीति किमु गृतेऽसेः १ \ 
युक्तिक श्लेक॥ २२ ॥ 
रखीका-थ शाब्दस्य गुणत्वं निषेधयति । काणाद-दे काणाद्‌ ! तव मेत चें- 
भोगुणएः शब्दोऽस्ति तदा-ऽतीन्दरिय इन्दियाऽद्रद्यः कथं न स्यात्‌ परिमरणवत्‌ ? 
अधिकायद्‌ मगनपरिमाएमिव यथ गगनपरिमपणं तद्गुणत्वेनाऽतीन्दरियं तथा 
ए भवेदिति तस्मात्‌ न गगनरण' शब्दः । नड शब्दस्य गगनयुणत्वं माऽस्तु 
तथाऽपि कस्यग्वद्‌ दव्यास्तरस्य गुेऽय भव्वप्यतयत चस्ापककद्गशरा नरा- 
करोति चेत्‌ शब्दो शणस्तर्दि तदाशय द्र्येऽखदीतेऽसो कथं शाते १ तस्मान्नगयं 
रणोऽपीति चत्ता्थः- 
आवा्थ--दइस कारिका का मन्तव्य यह दे कि-जव आकाश इन्दिय 
श्रमाह्य पदर हे तो भला उस का गुण जो शब्द माना गया हे वह इन्द्रिय अराय 
कैसे न देम १ अपितु श्रवश्यमेव दोन चादिष्ट ! परन्तु शब्द अोबेन्द्रिय 
ग्राह्य माना गय है अत पव शब्द्‌ आ्राकाश का ण युक्रिपूवक प्लिद्ध नदे होता 
यद्वि फेस कडा जाय कि-खकाशमे जो दव्य स्स्थित दै उन दव्यो मे जच 
परस्पर सर्पण रोता दै तव शब्द्‌ उत्पन्न दज द, अतपव श्ाकास्तस्थ 
दस्य होने स वह शब्द्‌ ाक्मयाशसा का दर मनना चा्दण इसथकका यहसमा- 
घान किय जाता है कि-जव दन्यो के सेध से शब्द उत्पत्ति मान ली जाष्ट 
तच श्राकाश् का सुख शब्द तो सर्वथा तनिमूल शद्ध होगया । कयोकि-श्राकाश- 
प्क श्मरूपी पदाश्च संघर्ष करता सी नद हे 4 रूपी पदाथ एक रसमय हाता 
हे \ यदि श्राकाश मे स्थित परस्पर व्य स्प करते हे उन के कारणस शब्द 


२ 


( २३९ ) 


उपलन्ध नद टोता । ययपि पुद्धलद्रव्य के कतिपय स्कन्ध क्रिया करते इष 
दाषटगोचर होते है. परन्तु उन क्रियार््रो मे विचार-शक्ति तथा सुख दुभ्लो का 
अटुभव करना सिद्ध नटीं दोता । जिस भकार प्ननेक शाको के भाजनोमे द्वौ 
(कडद्ी ) रमण तो करती दै परन्तु उन पदार्थौ फे रस के क्षान सर वह येचित 
ह रदत रे, कारण फि-वह स्वयं जड़ दै । इसी प्रकार घड़ी जनता को 
प्रत्यक समय का विभाग करके तो द्विखलाती है, परन्तु स्वयं उख क्षान से चंचित 
हाती ह्‌ 1 श्रत्व जीच की सिद्धि जो सूत्रकार ने चार लक्षणो द्वारा पतिपा- 
दन की है चह युक्तियुक्त होने से सर्वथा उपादेय है। जेसेकि-जेस को अत्येक 
पदाथ काक्षान दै, जेस की शद्धा खढतर दै, फिर जो खुख वा दुःख का श्रञु- 
भव करता रष्िगोचर होता दै, उसी की जीव सपा है । इस से निप्करय यद 
नेकला फि-उपयोगलक्छण युक्त जीव धतिपादित है । 
अव सूत्रकार जीवद्रव्य के लत्तणान्तरविपय मे कहते है 1 
नाणं च दसं चव ॒चरित्तं च तचो तहा । 
वौरियं उव्योगो य एमं जीवस्स लक्खं ॥११॥ 
उत्तराव्ययनसत्र श रेन गा, ॥३१॥ 
खत्ति-जानं ज्ञायतेऽनेनेति लाने च पुनदश्यतेनेनेति दशने च पुनश्चरिते 
किया चे्टादिकं तथा तपो डादशविधं तथा वीर्य वीर्यान्तराय क्योपशमात्‌ 
उत्पन्नं सामथ्यं पुनरूपयोगो नानादिषु एकाग्रत्व एतत्‌ सर्वे जीवस्य लक्तणम्‌ ॥ 
भावाश्च-जिख प्रकार ९० यी गाथा मे जीव दव्य के लक्षण प्रतिपादन 
किये गप है, उसी प्रकार १९१ वी गाथा मे भी जीव द्रव्य के ही लक्खं प्रत्तिपादित 
द । जेसेकि-जिखके द्वारा पदाथः का स्वरूप जाना जाय उस का नाम क्षान दै 
तथा [जिसके द्वारा पदार्थो के स्वरूप को सम्यय्‌तया देखा जाय उस का नाम 
देशने है ! सो जीव कषान, दशन तथा काय की चेष्ठादि कीजो सक्ञा चारिजदे 
उस स तथा द्वादशचिध तप से युक्तं है । इतना दी नही किन्तु चीयान्तराय कम 
फे योपशम भाव से जेए अत्मिक सामर्थ्य उत्पन्न ह्या है उस वीयं से युक्त 
तथा ज्ञानादि मे एकाय श्च्थांत्‌ ज्ञानादि मे उपयोग युक्त दै । ये सव जीच 
व्य के लक्तण हे । श्रथीत्‌ इन लक्षणौ द्वारा ही जीव दव्य की सिद्धि दोती 
दे क्योकि-लक्तणे द्धाय द्य पदार्थो का सक २ वोध दो सकता दहे! परन्तु इस 
यात का वश्य ध्यान कर लना चादिण कि-एक रात्मभ्रूत लक्षणदोता हे 
दसा छ्रनात्मभूत ल्तण दोता है । जिस प्रकार अग्नि को उष्णता आत्मभूत 
लक्तण दहै, ठीक उसी प्रकार दराड पुरुष का श्रनात्मभूत लक्तण दै । सेए कषान. 
, वीर्यं॑श्रर उपयोग इत्यादि यर सव श्राच्मभूत जीव व्य, के लक्षण 
मतिपादन क्रिये गए हे । 


( २२३ ) 


उष्ण यह सव पुद्धलास्तिकाय के लक्षण जानने चारिप। 
सारो स का वना दी है कि--उक्त लत्तणा द्वारा पुद्धल द्रव्य की सिद्धि 
क्री जाती दे) 
यद्यपि कतिपय वादियों ने पुद्धल द्वव्य के लक्तणोँ को किसी शर्य द्रव्य 
के लक्षण यणेन फर दिये ई, परन्तु यथाश मे वट लक्षण नोने से युक्ति को 
सहन नहीं कर सकते । जेसे कि-तमर्‌ को फतिपय चादयो ने श्रभाव पदाथ 
न्वीकार फर लिया है, किन्तु वह युक्तियुक्त फथन नदी है 1 श्रतएव पुद्लद्रव्य 
के ही उक्तं ल्तण स्वीकार करने युक्तियुक्त टे 1 
यावन्मात्र पदा दष्टिगोचर होते दै, चे सवै पौद्लिक है । क्योकि- 
श्ररूपी पदार्थो को तो छद्मस्थ श्रात्मा चजुश्रो दारा देख ही नदीं सकता । ्रत- 
प इन्द्रिय प्ाह्य पदार्थ रूपचान्‌ हैँ । रूपवान्‌ ही दोने से वे पौद्ालिक दै 
इस प्रकार पट्‌ द्रव्यं के लक्षण वरन करने के श्ननन्तर अव सूत्रक्रार 
पर्याय विपय कते दै । जेसेके- । 
एगत्तं च पुहत्तं च संखा संटाणुमेव य । 
संजोगाय बिभागा य पज्जवाणं तु लक्खणं ॥ 
उत्तराध्ययनसत्र श्च, देरगा ॥१३॥ 
चत्ति--एतत्पर्यायाणं लक्तणं एतत्‌ किम्‌-प्कत्वं भिन्नेष्वपि परमारवा- 
दिषु यत्‌ एकोऽयं इति बुद्धया घटोय इति भरतीतिदेतुः च पुनः परथक्त्वं श्रयं 
श्रस्मात्‌ प्रथक्‌ घः पटाद्‌ भिन्नः पटो घटाद्धिन्नः इनि भतीतिदेुः, सख्या 
पको द्धौ चदव इत्यादि प्रतीतिदेचुः च पुनः सस्थान एव वस्तूनां सस्थानं श्ा- 
कारश्चतुरखवङुलतिखादि पतीतिदेतुः, च पुनः सयोग अयं गुल्यः सयोग 
घत्यादि व्युपदेशदेतयो, विभागा श्रयं अतो विभक्तं इति इुद्धिदेतवः, पतत्‌ 
पययाणां लकते क्ञेयं, सयोग! विभागा बहुवचनात्‌ नवपुरारएत्यादवस्था ज्ञेया. 
लक्षणत्वं साधारणरूपं गुणानां लक्तणं रूपादि भरतीतत्वान्नोक्तम्‌ ॥ 
भावाश--पदले का जा चुका दे कि-द्व्य गुण रौर पयीय युक्त दोता 
। श्रत, इस गाथा मे पयाय का लच्तण प्रतिपादन, किया गया दे । नंत पर- 
माणुश्रौ का खमूह जव एक घटादि पदाथा के रूप म श्राजाता दे तव व्यवहारवद्धि 
से कटा जाता हे फि-यद्ट एक घट दे । यपि वह घट र्नत परमायुच्रोः का 
समूह रूप द तथापि भिन्न २ परमाखुश्रो के होने पर, भी व्यवदारवाद्ध 
घट पक पदार्थ माना गया हे । इसी धकार यद इख से पथक्‌ हे अथात्‌ यद घट से 
पटर पृथक्‌ हे वा यद वस्तु सुक चस्तु से एथक्‌ हे इस पकार की जो अतीति 
उसी का नाम पृथक्त्व ह क्यााक-पुद्धल दव्य पक दाने पर भी यह इस पदार्थं 
से भिन्न पदाथ दै दस प्रकार की जो प्रतीति दोती है यदी पर्यय का लक्षण है । 


{ २३५ )} 


भेद उक्त विषय में सेक्तेप रप से समवतार दोजाते है जेसकि-- 

१ दव्य सरे धमौस्तिकाय एक द्रव्य हैर, क्ते से लोकपरिमाण हे, 
काल से श्रनादि श्चनन्त है २, भावस श्ररूपी है ४, गण स गति इस का लक्तण 
हे ५1 एटन्त जसे पानी मे मस्स्य । 

२ द्रव्य से श्रधर्मारस्तिकायपकद्रेन्य दै ९, क्त्र से लोकपारिमाण २, फाल 
से श्रनादि श्रनेत २, भावस श्ररूपी ४, गुण से स्थिति इस का लक्तए दैः ५। 
दष्टं जसे पथिक फो दृत का श्राधार । 

„ द्व्य से श्राकाशास्तिकाय प्क १, त्ते से लोकालोक पर्टेमाण र,काल 
से श्ननादि श्रनेत ३, भाव से श्ररूपी ४, णण से श्राकाणश का श्रवकाशदेने फा 
स्वभाव ५। दृष्टान्त जैसे दुग्ध भ शकरा ( मिषा ) 1 

४ द्रव्य से कालद्रव्य श्रत १, क्ते्र से श्चदार दीप परिमाण २, काल सि 
श्रनादि नेत ३, भाव सते श्ररूपी ४, गुण से वत्तेनालक्तण ४1 दण्टान्त-जसे नूतन 
पदाथ को कालद्रव्य पुराना करता द । । 

५ दव्य से जीवद्रव्य जीवास्तिकाय श्ननन्त ९, त्त से चतुद्शरज्जु परि- 
माण २ काल स श्रनाद्धि नन्त २, भाव से श्ररूपी ४, यण से चेतनालक्तए । 

द्रव्य से पुद्धलाद्तिकाय श्ननेत १, पित्र से लोक पारमाणऽकाल से श्चनादि 
श्ननेत्त ३, भाव से रूपी ४, गुण से सदना, पड्ना, मिलना, गलन, विध्वेसन 


दोना द इस का लक्तण ह ५1 6 
दस प्रकार उक्त द्रव्यो फे स्वरूप को जाना जाता हे । क्याकि-प्रत्येक 


दन्य श्रपनी २, पर्ययो का कत्त टे । 
„ ६ भ्रव दस स्थान पर श्रागमसारत्रैथ के अुरमार षद्‌ द्रव्यो के सिपय 
म कदा जाता है । जेसेकि-प्‌ श्रना दँ । उनमें पांच अजीव शरीर चेतनालद्तण 
बाला जीव है । परन्तु षट्‌ द्रव्यो के गुर निर्न भकार खे दै जेखाकि--धमोस्ति- 
काय के चार गुण है, यथा--श्ररूपी १, चेतन २, अक्रिय ३ शौर गतिलक्तण 
८) च्रधमस्तिकाय के भी चार गुण है-जेसेकि-शअरूपी १, प्रचेतन २, अक्रिय 
३ श्रोर स््थितलक्तण ४। शआ्ाकाशास्तिकाय के चार शुण-जसेक्षि-श्ररूपी १, 
अचेतन २, श्चक्रिय ३ शरोर श्रचगादनगुर्‌ ४1 कालद्रव्य के चार गुण-अरूपी १. 
अचेतन २, शक्य > श्रौर नव पुराणादि वत्त॑नालच्तण ४ । पुद्धल द्व्य के चार 
भेद रूपौ १, अचेतन २, सक्रिय ३, मिलना श्नौर विद्ुड्ना स्वभाव ४1 जीव दव्य 
के ४ गुख श्रनेतन्नान १, अनतदशन २४ शछसतचारिन्न ३, शरोर श्रनेतवीर्यं ४। 

येचः दवव्यौ के गुण नित्य श्चोर धच द! ध 

किन्तु षट्दव्यो के पर्याय निशठ ्रकारसि हेः ज्ेसेकि--धर्मास्तिकाय 
के चार परयौय ह--स्कन्ध १, देश २, पदेश ३, श्मौर गुरु लघु 21 च्रधमौ- 


( २३७ ) 


ध: निष्त्वय नय केमत से पद्‌ ही द्रव्य सक्रिय है, किन्तु व्यवहार नय 
के मत से जीचद्रव्य श्चोर पुद्धलद्रव्यये ' दोनों दी द्रव्य सक्रिय है, शष चारः 
रव्य प्मक्रिय है। 

= निश्चय नय के मत से पद द्व्य सित्य भी हे श्रौ नित्य भी टे, किन्त 
ञ्यवद्यारनय के मत से जव श्योर पुद्रल की शरपेक्ता से ये दोना द्रव्य, श्मनित्य 
रे. शेष चार द्रव्य नित्य हें । 

६; दी द्रव्यो मे केवल पक जीच द्रव्य कारण द,शोप पांच द्रव्य अकारण हे। 

६० निश्चय नय के मत स चुः ही व्य कर्ता है किन्तु व्यवदार नय के 
मत से केवल प्क जीव द्रव्य कन्त हे, शेष पांच द्रव्य कन्त हे । 

१९ छः री द्रव्यो मे केवल पक श्राकाशद्रव्य सर्वव्यापी टे, शेष पांच 
द्र्य लोक मात्र व्यापी हे । - 

६२ एक क्व म पदुदरन्य कत्व होकर उदरे प दै, किन्त गए सव का 
एक्‌ २ ह श्रथौत्‌ गुण का. परस्पर संक्रमण नदीं रोखकता । 

यव पक २ मे राड २ पक्त कहते दै । जेसेकि-- 

| नित्य ९ श्रनित्य २ प्क २, नेक ४, सत्य ५, श्रसत्य ६, वक्तव्य ७? 

अर श्रवक्तव्य ८।, 

श्रव नित्य श्ननित्य पचत नरिप कदते दे \ 
धमौरस्तिकाय के चार गुण नित्य हे । पयौय मे धमौस्तिकाय-स्कन्ध नित्य 
३ । देश, परदेश, अरयुरुलघु श्ननित्य है. इख पकार कना चादिणए। अधमोस्तिकाय 
के चार गुर-स्कंध लोक श्माण नित्य है, देश यदेश अणखुलघु प्मनित्य द, 
शराकाशास्तिकापय के चार गुण-स्कन्ध लोकालोक माण नित्य चे । देश, भदे 
अगुरुलघु श्रनित्य है । कालद्रव्य के चार यण नित्ये चार पयय अनित्य हे 
पुद्रलद्रव्य के चार शण नित्य है, चर पयौय नित्य हे, किन्तु जीव द्व्य के 
चार शण मौर पर्याय नित्य है किन्तु ्गुरुलघु अनित्य हँ । 

श्रय एक श्रौर श्रनेक पक्त विस्तार से कदा जाता दै जेसेकि -- 

धस ९ जरर अधर्म २ द्वव्य इन का स्कन्ध लोक प्रमाण एक टः किन्त 
ग॒ण, पयाय शौर परदेश श्रनेक दै ।जैसेकि- गुण श्रौर पयौय तो च्ननैत हे, किन्त 
मदे असंख्यात ह । श्राकाश द्वव्य का स्कन्ध लोकालोक माण प्क है, गण 
पयय श्योर पदे अनेक है । जेसेकि-णण शरोर पर्यय तो अनैत दति दी है 
किन्तु ्ाकशद्रव्य लोकालतेक माण होने से उस के धदेश भी नंत दे । 
काल द्रव्य का वत्तेनारूप ग॒ण तो एक ह, किन्त युण. पयीय श्रौर समय श्नेक 
हे । जेसेकि- गण अनत श्रौर पयय अनन्त तथा समय अनत । यथा--भृत काल 
के श्रेत समय व्यतीत हो चुके छर च्रनागत ` काल के श्रनत समय व्यतीत 


( २३६ ) 


गुण पयौय सदैव काल वियमान रहता दै । जैसेकि-धम द्रव्य मे स्वद्रव्य स्व- 
ज्र स्वकाल शौर स्वभाव विदयनान तो रदता है, किन्तु शेष पांच द्रव्यो का 
गुण पयय उस म नदं रद सक्रता इसी भकार अधमे द्रव्य मे स्वद्रन्यादि 
चास भाव विद्यमान रहते दै, किन्तु शेष पांच द्रव्यो के शण पयाय नदीं र 
सकते! जिख प्रकार दन का वसन किया गया दै ठीक उसी रकार श्राकाश द्रव्य 
मे द्रव्यए्ि भाव रदृते है, किन्तु शेष पांच द्रव्यो फे शण पयाय नही रते 
काल के भाव काल म रहते है पुद्धल के.भाव पुद्धल मे रते द । जीव के स्वद्रव्य 
स्वने स्वकाल श्रौर स्वभाव जीव मे रहते दे शेष पांच द्रव्यो के स्वभाव जीव 
दव्य मे नदी रह सकते । दसी प्रकार पद्‌ द्रव्य स्वगुण की शपेत्ता से सत्‌ रूप 
पतिपाद्न किये गए है । 

श्रय वक्तव्य श्रौर श्रवक्तव्य प्त कटते है । 

षर्‌ द्व्य म श्ननेत शुख पयय वक्तव्य है श्रथीत्‌ वचन से कदा जास 
कता श्नौर श्रनैत ही गुर पयय श्यवक्घव्य रूप है । जो वचन द्वारा नदीं कदय जास 
कता, किन्तु श्री केवली भगवान्‌ ने सवै भाव देखे हः हे, परन्तु दष्ट भावो से 
भी वे ्रनेतवे भाग माघ कड्‌ सकते दै । शी लिये घृव्यत्व शरोर श्रवक्तव्यत्व 
य दोन भाव षट्‌ द्वव्य मै पडते हे । किन्तु जव नित्य श्योर श्रनित्य प्त 
माना जाता है तव इख पक्त के मान ने से चलुर्मेग उत्पन्न दोजाते टे । जैसेकि- 

९ शरनादि श्रनेैत--जिख कीन तो च्रादिदै नादी श्रत हे । 

२ श्रनादि सान्त--श्रादि तो नही है किन्तु श्वन्त दीखता हे। (मानाजा 
सकता हे) 

२ सादि भ्रनत--जिसकी श्रादि तो मानी जाती हे परन्तु ्रन्त नरी 
माना जासकता । 

४ सादिसान्त-जिख की श्रादि श्रन्त दोन मनि जा सके,उसी का 
नामसादिदै। । 

परन्तुये चासो सग उदारे द्य इस भकार भतिपाद्न कि गदे 
जसेकि--जीव भें क्षानादि यण श्चनादि श्रनेत दै ९, भव्य श्रात्माच्ना के. साथ 
कमे का सम्बन्ध श्रनादि सान्त है २, जिस समय जीव कर्म च्य करके मोत्तपद 
थाप्त करता है, तव उसमे खाद्‌ श्रनत भग माना जाता डे । कंयोकि-कमे्य 
करने के समय की श्रादि ते दोग, परन्त युक्त पुनयदृति वाली नटी हे । श्रत्व 
सादि श्रत भग सिद्ध दोगया । चारों गतियो मे जो जीव पुनः २ जन्म मरण 
कररहा ड, उख की शप्ता ससारी जीवो मे खादि सान्त भेग सिद्धो जातादं 
जेसेकि.मनुप्य मरकर देवयोनि मे चलागय तव देवयोनि की श्रपेत्ना मञप्य भाव 
सादिखान्त पद्‌ वाला यनगया इसी भ्रकार भ्स्येक द्रव्य के विषय जानना चादिए। 


{ २४१ ) 


गुण श्रगुरुलघु परनादि श्रनेत हे । श्रतीतकाल अनादि सान्त श्रौर व्चमान 
कालसादि सान्तदै, किन्नु श्चनागत काल सादि ्नेतहै। पुद्धलदरव्यमे द्रव्यत्व 
भाव स गलन मिलन धम श्रनादि नेत हे! क्ते से परमारु पुद्धल सादि- 
सान्त दे । काल से छ्रगुरुलघु गुण श्रनादि नत हे, किन्तु पुद्धल दव्य मे उत्पाद 
श्ररव्यय धम सादि सान्त दे । स्वभाव गुण ४ श्ननादि घनन्तं हं 1 स्कन्धदेश 
भदेश श्रवगादना मान सादि सान्त द । किन्तु वणौदि पयाय ४ सादि सान्त प्रति- 
पदेन की गई है] इस प्रकार द्रव्यादि पदार्थो के चार भग वरन किये गप हे। 
छव पट्‌ द्वव्य सम्बन्धी चार भग दिखलाये जाते ह 1 
. ए दम शराकाश द्रव्य पर विचार करते दै तव यद भली भांति सिद 
होजाता दहै कि-जो श्रलोकाकाश है उसमे श्राकाश व्य के विना अन्य कोर 
आर द्रव्य नर्टीहे, किन्ते जो लोक का श्माकाश दउसम पट्‌ द्रव्यदीसदेव 
वेद्यमान स्दते है ! वे कदापि श्राकाश द्रव्यसे प्रथक्‌ नदींदोते । अतः 
श्ननाद नत दे 1 श्राकाश् त्ते म जीवद्धव्य अनादि अनत ह, परन्तु ससायां 
जीव कर्म सदित लोक के श्राक्राश-प्देश्तो के साथ उनका जो सम्बन्ध दै वह 
सादि सान्त े। 
जे सिद्ध श्रात्माश्नो के साथ श्राकाश पदेशो का सम्बन्ध हो रहा ह 
द भी सादि प्रनत है, श्रपितु लोक के श्राकाशके साथ जो पुद्धल द्रव्य का 
सम्बन्ध है वद्‌ श्रनादि श्रनत है, किन्तु जो श्राकाश प्रदेश के साथ परमाणु 
पद्रल का सम्बन्ध है, वट सादि सान्त है 1 
इसी प्रकार धम्पस्तिकाय का सम्बन्ध सर्वं जीवो के साथ जानना 
चादिष्ट! श्रपितु श्रभन्य श्रात्माश्रो के साथ पुद्गल द्व्य का सम्बन्ध श्नाद् 
श्रनन्त हे । क्योकि--श्रभव्यात्मा कदापि कमक्तय नदा कर सकता ट श्रापेतु 
भव्य श्रात्मा कम त्य कर जव मोत्तपद प्राप्त करेगा तच उसके साथ कम्मां 
का सम्बन्ध अनादि सान्त कडा जाता है । तथः निश्चय नय के मत सरे पय्‌ 
ल्य स्वभाव परिणामसे परिणतं । इस करके य पास्णामा ह अतः चे 
परिणाम सदा नित्य ह 1 श्स लिये पट्‌ द्वव्य अनादि अनत ह । अपर च जीव 
दन्य रोर पुद्धलद्रव्य का जो मिलने का परस्पर सम्बन्ध ट, यह्‌ सम्बन्ध पारः 
णमी है । सो वह परिणामिक भाव अभव्य जीव का ञ्नादि नत दै । भव्य 
जोव का श्ननादि सान्त ह । किन्तु पुद्धलद्रव्य की परेणामिक सत्ता नाद्‌ 
अरनेत ह । ्रपितु जो परस्पर मिलना श्योर 1धैचुडना भाव हं वह खाद्‌ सान्त ह । 
्रतएच जव जीव श्रर पुदृल का परस्पर सस्वन्ध दे तव दय जाव म साक्रयना 
दाती हे, परन्तु जिस समय जीव कमो से रदित दो जाता हं, तव वह अन्य 
दो जाता द 1 परन्तु पुद्धलद्रव्य सदैव काल सक्रियत्व भाव मर्ता ह । 


( खरे ) 


थे पाच पर्याय सर्यद्रव्यमे दोते है किन्तु ६ विभावपर्याय जीव श्रौर 
प्लमे दी होती दै-जैसे विभावपर्याय के वशीभूत दोकर जीव चां 
ति म नाना भकार के रूप धारण करता है श्रौर पुद्धल द्रव्ये विभाव 
पर्याय स्कन्ध रूप होनी हे । पस्य पदपर्याय निख्न पकार से श्रौर भी 
स्थन कयि गप है| ज्ञेसे कि- 

 श्रनादिनित्य पर्याय-जेखे मेर प्त प्रमुख । 

२ सादिनित्य पयाय--सिद्धभाव 1 

२ श्चनित्य पर्याय--समय २ पर्‌ द्रव्य उत्पाद्‌ श्चौर व्यय धम युक्त दै । 

४ छरशुद्धनित्यपयीय-जेसे जीव के जन्म मरण । 

५ उपाधिप्याय-जेसे जीव के साथ कमो का सम्बन्ध । 
. ६ शुद्ध परयाय-जो द्रव्यो का मूल पयाय हेः । वद सव पक समान दही 
दोता हे । इतत प्रकार पर्याय का वर्खुन किया गया दै । 
॥ सो पंचास्तिकाय रूप ध्म मे स्वं द्रव्य श्रौर गुण पयाय का वणन 
या गया हे । साथ ही क्ञेय ( जानने योग्य ) रूप पदार्थो का सविस्तर रूप 
वरन किया गया हे ! श्रतपएव यह जगत्‌ पर्‌ द्रव्यात्मिकरूप स्वतः सिद्ध हे । 

दश धकार के धर्म का स्वरूप संप से इस स्थान पर वणन किया हे 
परन्तु उक्त धमो का सविस्तर स्वरूप यद्वि श्रवलोकन करना हो तो ज्ेन- 
ग्रागम तथा ज्ञेन-अन्थे। म देखना चादिपः । वहां पर वड़ी भरवल युक्तयो से 
उक्त धर्म का स्वरूप भतिपादन किया हे, परन्तु इस स्थान पर तो केवल 
दिष्दशैन माच कथन किया हे । श्राणा है भव्य जन जैन~्रागमो द्वारा उक्त 
धों का स्वरूप देख कर फिर ठेय ( त्यागने योग्य ) क्षेय ( जानने योग्य ) 
श्रौर उपादेय ( ग्रहण करने योग्य ) पदार्थो को भली भांति समक तथा 
धारण कर निब पद्‌ फे ्रधिकारी चनेगे । 

इति श्रीजन-ततत्वकलिकाविकामे यस्ति य एव दश्विधधमंवणीनात्मिका 
पष्ठी कलि समाप्षा । 





[91 


अथ सपमी कडिका । 


„ पूयं कलिकर्रो म दश थकारः के धर्म का सन्नेपता से चरन किया गया 
दे । इस कलिका मे जञैन-शासराजुसार लोक (जगत्‌) के विषय मे कदा जाता 
ट्‌ कयाक्रि-वडुतसे भव्य आतमा को इस वात की शंका रहा करती हेकि- 
भेन-मत बाले जगदुत्पत्ति पिस भकार से मानते ह ? तथा कतिपय तोशास्रीय 


{( २८५ ) 


सणविनश्वर वाद दोनेा चार दी युक्तयो के सहन करने मे अशक्त द । 
द्रव इसी चात को शाखरकार चरीन करते है जैतेकि- 
एएहि दों ठे बवहारो ए विज्ञ 
एए दोहं उर्दि अणायारं तु जाणए 
सू्रकृतागस् दितीयधुतस्कन्ध य. ५ गा. ॥३॥ 
द्यीपिका-८ एएहिति ) एताभ्या एफान्त नित्यं एकान्तमनित्यं चेति द्वाभ्या स्थानाभ्यरा 
प्यवहारो न षिते । एङन्तनित्थे एकान्तानित्ये च वस्तुनि व्यवद्ारे। व्यवस्था न घटत इत्यथे. । 
तस्मादेताय्या स्थानाभ्या स्वौरुताभ्यामनाचार जनीयत्त्‌ ॥३॥ 
भावाथ-उक्त दोनो पक्ता के प््कान्त मानने से व्यवहार क्रिया्यो का 
सवथा उच्चद्‌ रो जाता है क्योकि जव स्वै पदाथ एकान्त नित्यरूप स्वीकार 
किये जाये तव जो नूतन वा पुरातन पदार्थो का पर्याय देखने मे घ्राता दै 
चद सवधा उच्छेद दो जायगा। तथा किसी भी पदाथ को व्यचदार पन्त मे उत्पाद 
शरोर व्यय धर्म वाला नद्यं कदा जासकेगा । जव पदार्थौ का उत्पाद्‌ चर व्यय 
ध्म सर्वथा न रहा तव पदार्थ केवल चच्युताज्पन्नस्थिरेक स्वभाव वाले सिद्ध 
दो जर्यैगे। परन्तु देखने मे से श्राति नहीं दै । श्रतप्व एकान्त ननत्य मानने 
पर व्यवहार प्न का उच्ेद्‌ दाजाता दै । 
यदि एकान्त श्रनित्यता दण की जाट तव भी वह पत्त युक्ियुक्क नदी 
। कयि जव पदार्थं एकान्त नित्यता दी धारण किये हुए दे, तव भवि 
प्यत्‌ काल के लिये जो घट, पट, धन धान्यादि का ल्लोग संग्रह करते दैवे 
श्ननर्थक सिद्ध होगे । यदि पदाथ त्तणविनश्वर धमे वाले है तच चद किंस 
कार सगरृदीत किये दु स्थिर रह सकेगे ? परन्तु व्यवहार पत्त मेदेखाजातादे 
पके-लोग व्यवहार पत्त के श्माधित होकर उक्र पदाथो का सह मवश््यमेव 
करते दै, श्रतपव प्एकान्त श्रनित्यता स्वीकार करने पर भी व्यवहार मे विरोध 
्रातादहे) 
इसलिये सैन-दशन ने एकान्त पत्त के मानने का बनेषेध क्या दं 1 
परन्तं जव इम स्याद्धाद के श्ाधित होकर नेत्य खार आाच्त्य पर विचार 
करते है तव दोन पत्त युक्तियुक्त सिद्ध हयो जाते टै जस एक जव द्म पदाचा 
क सामान्य धर्मके आधित होकर विचार करते ह तव पदाथ पनत्यरूपस्व 
धारण करलेते ह अथीत्‌ पदार्थो के नित्य ध्म मानने मे कोद च्रापत्ति 
उपस्थित नीं दोती । क्यो सामान्य धमे पदार्थो मे नित्यरूप से रदत 
टै तथा जव इम पदार्थौ के विशेष रूप धमे पर विचार करते ह तव म्त्येक 
पदाथ की अनित्यता देखी जाती दे क्यो कि वेशेप अश्क अरहण करय से 


( २७ ) 


सदयं कबाय० एवै बयासी-से नृणं तमं सदया ! साचत्थीए नयरीए पिंगल- 
एणं शिय॑टेणं वेसालिय सावएणं इणएमक्सेवं पुच्छिए मागहा । किं सेत 
लोए अते ्ोए एवं तं जरेव मम अतिए तेरेव हव्वमागए, से नूणं सं 
दया । यमह समे १ हंता अत्थि ञे वियते खदया । अयमेयास्वे अन्भत्थिए 
वित्तिए पात्थए मणोगणए संकप्पे सरष्पन्जित्था-फिं स अते लोए अरंते 
लोए १ तस्स वियणं अयमहे-एवंखल मए सदया ! चरव्विहे लोए पन्नत्ते 
तेनहा-दव्वस्नो खेचरो कालब्रो भावत्रो ! दव्व्रोणं एगे लोए स अते? 
सत्तश्रोणं लोए अंसखेज्जाञ्रो जोयण कोडाकोडीञओ्ो आयाम विक्संभेणं 
असेखेज्जायो जायण कोडा कोडीञ्रो परिक्सेवेणं पञ्मत्थिपुणसे अतर काल- 
ओ शं ज्ोएण कयाविश आसी न कयानि न भवति न कयावि न भविस्सति 
भर्वसु य भवति य भाेस्सड य धवे शित्तिय सासए अक्खणए अव्वए अवदिए 
शिषे ण्थिपुणसे थते ॥३॥ भावच्नो शं लोए अता बर्ण पज्जना गष 
रस० फास पञ्जवा अता संटाणपज्जवा अणंता गुरुयलहुय पञ्जवा 
अरंता श्रगुरुयलहय पञ्जवा नत्थिपुण से अते ४ सेतं खदगा ! दव्वद्मो 
सोए स॒ शते सत्तमो सोए स अते कालो लोए अंते भावनो लोए 
अशत । 


व्याख्याप्रज्प्तिसूत्र शत्तक २ उददेश ॥१॥ स्थंककचरित । 

भावाश्च -ज्ञस समय स्कन्धक पारि्राजक श्रमण भगवान्‌ महावीर 
स्वामी के समीप प्रश्चो का समाधान करने के चास्ते आए, उस समय शरश्च 
मरण भगवान्‌ महावर स्वामी नित्य भोजन करने चाल थ मथौत्‌ अनशनादि 
जतो से युक्त नदी ये । रतः उस समय श्रमण भगवान्‌ महाचार स्वाम एत्य 
आदार करने वालो का शखर प्रधान जैसे श्टगारित होता है अतः -टगारित 
कल्याण रूप. शिवरूप. धन्यकारी मंगलरूप शरीर की लद्मी स युक्त विना 
अलकारो से विभूपित लक्षण शरोर व्यजनो से उपेत ल्मी द्वारा अतीव 
सोदयैत्ता पराप्त कर रहा था श्र्थात्‌ सौदर्यता को माक्ष हो रहा था 1 तदनन्तर 
चह कात्यायन भोज्य स्कन्धक श्रमण भगवान्‌ नित्य श्राहार करने चालां के 
भधान यावत्‌ श्रतीव उप्तोभायमान शरीर को देख कर दपंचित्त वा सतु 











भ्वियष्ट भोदात्त' ग्यादृते २ सधं भुङ्क्ते चयेररं शाले व्याव्रतभोजी प्रतिदिनभोजीत्यभे 3 


श्रभयदेवोया वरृूनि ५ 


{ २४६ ) 


सो उक्त सृत्रपाट फे देखने से यद वात स्वतः सिद्ध दो जाती है कि- 
फाल की श्रपेच्ता से यद लोक उत्पत्ति श्रौर नाश से रदित है क्योकि 
प्रागभाव के मानने से प्रध्वंसाभाव रवश्यमेव माना जा सकेगा । जिसका 
पाभगाव ही सिद्ध नदी दता है उस का पध्वंसाभाव किस पकार माना 
जाए ? द, यट वात भली भोति मानी जासकलती है कि-म्त्येक पर्याय उत्पत्ति 
श्रार विनाश धर्म वाली है किन्तु पर्यायो ( दशान ) के उत्पन्न श्रौर विनाश 
काल का देखकर द्रव्य पदार्थं उन्पात्त श्रौर नाश धर्म ॑वाला नदी मानाजा 
सकता । जञेसे कि-जीव द्रव्य नित्य रूप से सदैव काल विद्यमान र्ता दै 
किन्तु जन्म श्रौर मरण रूप पर्यायो की पेना से एक योनि मे नित्यता नदी 
स्ख सक्ता । इसी प्रकार प्रस्येक पदाथ के 1धेपय म जानना चाहिए । 

यदि पेसे कदा जाय फे-सर्यं पदार्थं उत्पत्ति धर्म वलि है तो फिर भला 
करता के विना जगत्‌ उत्पन्न कैसे दोगया ? दस के उत्तर मे का जा'सकता 
टे कि-स्या प्रकृति परमात्मा श्रौर जीव पदाथ भी कती की श्रावश्यकता 
रमते ह श्रर्ात्‌ इनक) भी उत्पत्ति माननी चादिष्ट ? 

यदि पेसे कहा जाए कि-ये तीयी पदार्थं श्नादि है, प्रतः इन की 
उत्पत्ति नर्दः मानी जा सकती, तो इस के उत्तर मे कदा जा सकत। है कि-इसी 
भकार काल से जगत्‌ भी श्रनादि दै, क्योफ--जगत्‌ भी ` प्र्‌द्रव्या का समूह 
रुपी दै 1 श्रपितु जो पर्याय है बद सादि सान्त हे । इसलिये जगत्‌ मे नाना 
भ्रकार को रचना दणिगोचरदो रदी हे। # 

जेन-शास( ने पक लोक के तीन विभाग कर पेष हे, जेसे कि--ऊध्- 
लोक १, मध्य लोक २ श्रोर श्रधोलोक ३ । ऊध्व लोक मे २६ देवलोक दै, जिन 
का सविस्तर स्वरूप जैन स्रौ से जानना चादि । वरदो परदेवो के परम 


र्मणय विमान रहे। 

तिर्यकलेक मे श्रसंख्यात दाप समुद्र हे,जोणएकसर दूलरा आयाम 
विष्कभे दुगुणा २ विस्तार वाला दे । उनमे प्रायः पशु रोर ( वानन्यन्तर ) 
बानमेतर देवौ के स्थान ह, किन्तु तिर्यक्‌ लोक के द्द दवीप मे भायः तिर्यञ्च 
श्रोर मनुप्य की रित रे । इसी लिय दृन्दे मलप्यन्ने् तथा समयच्तेव भी कटने 
टे। क्यों क्ि-समय-विभाग इरन्ट( क्ये से करिया जाता ह मङष्य श्रार तियच, 

काडस म चिशेप निवास दे । ४ 

इन त्तेन मे दो रकार से मचुप्यो की वस्ति मानी जाती दे । जसे कि- 
कमभूमिक मलुप्य शरोर अकर्मेभूमिक मदप्य । जे; अकमभूमिक मयुप्य दाते 
द्वे तो केवल कल्प चन्त के सहारे पर दी पनी श्रायु पूरो करते द्‌ । 
दन की' खय अकार से खाय पदार्थो की इच्छा कल्पन्त टी पूरी करदेते दै, 


( २५१९ ) 


भावार्थ-कर्मो से ब्राह्मण दोता। दे जैसेकि--“्प्यापनं, याजनं मरतिमरलो 
नद्यतानमेव" शध्यापनच्रत्ति, याजनकरम श्मौर परतिव्रद क्म॑श्र्थात्‌ पदाना, 
प्र करना, दान लेना, श्त्यादि कर्म ब्राह्यणो के दोते है । इस का सारोश इतना 
हदे कि-पूजा के लिये शान्ति के उपायो का चिन्तन करना तथा संतोष चृतति 
दाय शान्त रहना. यही कमे ब्राह्यणो के प्रतिपादन कयि गये है, किन्तु 
भरणं शस्त्राजौवनं मस्पुरुपोपरारो दीनोद्धर्ण रणेऽपलायन चेति त्त्रियाणाम्‌"” 
प्राश्य की रक्ता, शस्त्रद्धारा श्राजीवन व्यतीत करना, सत्पुरूपों पर 
उपकार करना, द्नि¡ का उद्धार करना शरथात्‌ उनके निवौद के लिये कार्यते 
नियत कर देना सत्राम से नभागना इत्यादि काथ त्तत्रियोकेदोते है। 
-वातिजीवनमविदिकपूजनं सत्र्रपापुरयारामदयादानादिनिर्मापणं च विशाम्‌” कषिक्म 
शरोर पशचुश्यों फा पालना, श्राव भाव रखना, पुर्यादिके वास्ते शन्न 
दानादि यथा शक्ति करना श्यारामादि की रचना इत्यादि ये सव कर्म वैश्यो के 
होते दै । “निवणोपजीवनं कारुकुशाटव रम पुरुयपुटवादन शद्राणाम्‌" तीनो वर्णो 
करी सेवा करनी, नसकादि कम, भिचुश्रो का उपसेवन इत्यादि कार्य 
श्र करहेातदे। 

जाति परिवसनशील नदी दोती, किन्तु कर्मो के प्राध्रित दोन से वशं 
परिवरसनशील माना जा सकता दै । क्यों कि-जाति की प्रधानता जन्म से 
मानी जाती हे श्रौर वर की प्रधानता कमस मानी जाती है जेसे क- 
पकेद्वियादि चतुरिन्द्िय जाति चाले जीव मोक्त गमन नदी कर सफते । केवल 
पचेन्द्िय मजुप्यजाएति दी मक्त पराप्त करेन के योम्य दे । 

अपर वरी की के व्यवस्था नदी वांधी गहै । जेखे कि-शजुक वर 
बाला दी मोक्ञ जा सकता द ञ्नन्य नही । क्योकि-मो्त तो केवल (सम्यमूदर्शन- 
जनवारित्रासि म्म » खम्यम्‌ दशन, सम्यग्‌ क्ञान श्रौर सस्यग्‌ चारिन के ही 
श्राधितदह, नतु चस व्यवस्था ॐ आआश्रेत । यदे कोई कटे कि-शाखो मे 
५ जाद्मपन्ते कुलसपन्ने » इत्यादि पाठ शाते दै जिन का यद रथे हे कि जाति- 
संपन्न श्चथोत्‌ माता का पक्त निमेल शरोर पिता का पत्त ल संपन्न । तव इनका 
क्या श्रथ माना जवयिगा ? इस का उत्तर यद है कि-ये सव कथन व्यवदार्नय 
ॐ आधित टोकर ही थतिपाद्न किये गये है । किन्तु निश्चय नय के मत मे 
जो जीव सम्यमदशनादि धारण कर लेता है वदी मोक्त गमन केयोग्य 
होजाता हे । 

छागे सम्यग्दशन मे नव तच्च का 


= ५ 


१ये सव सूच, ७--६ रौर १० वे! नोतिवाकयात क यी मसुदेश के दै ॥ 


सस्यम्‌ पकार से विचार किया 














( २५३ ) 


२ श्रजीवनच्य-जिस म जीवतच्च के लत्तण न पाप जार्यै, उसी का नाम 
जीवत्व दवै रथात्‌ वीर्यं तो हो परन्तु उपयोग शाक्ते जिसमे नदो उसी का नाम 
भ्रजीवतत्व दे । जीवतस्व के गुणो से विवर्जित केवल जडता गुण सम्पन्न 
श्रजीवतच्व माना जाता दै । कयं(कि-यदयपि घटिकादि पदा समय का ठीक 
यान भो कणते है. परन्तु स्वथं वे उपयोग शल्य होत टै । श्रतणव धर्मे, द्ध्म, 
श्राक्राश, काल, पुल य सव श्र जीवतच मे प्रतिपादन किय गण दे, किन्तु धमै, 
श्रधम, श्राकाश, क्रालये सव श्ररूपी श्रजीव कथन कयि गये । श्रपितु जो 
पुद्रलद्रव्य दे वद वर, गध, रसश्रर स्पश युक्तहोनेसे रूपी द्रव्य माना 
गया है । दस ल्य यावन्माच्न पदराश्र रण्िगोचर दाति दै वे सव पुद्धलात्मक टै । 
पुल व्यक टी स्कध, दश, प्रदेश श्रौर परमारगुपुद्धल संसारी क्रिया करते 
दे। इन्दी कासव धरपंच दोरा दै फयोकि- पुद्धल दव्य का स्वभाव मिलना दौर 
वद्ुदना माना गया दै, इस लिये प्रायः पुद्धल द्रव्य दी उत्पद्‌, व्यय श्रार धोव्य 
सुण युक्त रत्यक्त देखने मे अआतादे'सोइसी को रूपी जीव द्रव्य कथन †केया 
गयाहे॥ 

३ पुएयतच्च-जेा संसारी जीवो को ससार मे पवित्र शरोर निर्मल करता 
रहता द उसी को पुरयतच्च कते है । प्योक्रि - युम क्रियाम छारा शुभ कमं 
धरहृतियो का सचय किया जाता दे । फिर जव वे श्रकृतियां उद्य मेश्राती दहै 


कि 


तवे जीवको सव प्रकारसरिखुखोका श्रलुभव करना पड़ता! सो उसी को 
पुरयततत्व कते दै । किन्तु च पुर्यप्ररृतियां नव प्रकार स्र चाधौ जाती दे 
जेसेाके-- 
श्रन्नपुरय - अन्न के दान करने से । १। 
पानपुरय--पानी (जल ) के दानसे 1 | 
लयनपुणय-पर्वतादि मे जा शिलादि के गद वन हण होते दे तथा-पवंत 
म छृचिम गुदादि के दान से।३। 
शयनपुण्य-शय्या वसति के दान से ।४। 
चस्त्रपुरय--चस्त्र के दान से । ५। 
मनोपुरय--शुभमनोयोग भरवत्तने स । ६। 
चचनपुरय--शुभ वचन के भाषण से । ७। 
कायपुर्य-काम के वश करने से । ८1 
नमस्कारपुखय- नमस्कार करन स,। € । श 
सो उक्त नव प्रकार से जीव पुय भररृतियो का संचय करता द्‌ जिस 
परिणाम मै वद्‌ नाना कार के सुखो का श्रजुभव करने लग जाता है शौर 
ससार पक्त मे वह सर्व प्रकार से प्रायः प्रतिष्ठित माना जता ह । 


( २५५ ) 


पादन किये गये दै तथापि दस के सुख्य दो ठी फारण माने जा सकते है एक 
योगसेकमण श्रौग दुसरा कपाय । फयोकि -जव मनोयोग, वचनयोग श्रौर 
काययोग का संक्रमण होगा तथा क्रोध, मान, माया श्रौर लोभ का उद्य दोगा 
तव श्वश्यमेव कर्म प्ररूतियो का ध्रातम्देश्ते के साथ परस्पर लोलीभाव 
हो जायगा । श्रपितु जव चे परततियां उदय भाव मे श्चाजार्पैगी तव वे अवश्यमेव 
फल प्रदान करगति । इसी श्राश्रवतस्व मे पुरय रौर पापये दोनो तरव समव- 
तार दो जाते द । श्रतप्व पुरय प्रछृतियौ को शुभ श्राश्रवतत्त्व कहते दै श्रौरः 
पाप प्ररृतियो को श्रश्युभ श्राश्रवतच्व । से दोनो ्रतियां अपने २ समय पर 
जय उदय भावम श्राती है तव शआ्रात्मा फो उनका श्रवश्यमेच श्रचुभव करना 
पदता है । सो इसी का नाम श्याश्रवतच्च है । 

६ संवरतत्व-जिन २ माग से श्राथव श्रता दो उनका निरोध करना 
श्रथौत्‌ कमो का जिस से श्चात्मा के साथ सम्बन्धन दा सकेः उन क्रियाश्रो 
रो संवरततत्व कते दै । पूर्य लिखा जा चुका दै फि-पुरय श्रौर पाप दोनो 
दी श्राश्रवदहैः से दन दोना के परमाणुश्रो का निषेध करना जिस से श्रात्मा 
फे साथ लोलीभाव न दो सके, वदी सवरतच्व कदा जाता हे । 

यद्यपि नवतस्वपकरणादि भरन्थो म इस तच्च के अनेक भेदं प्रतिपादन 
क्वि गप हे। तथापि सुख्य ५ ही वर्णन किये गप हे जञेसे कि-- 

१ सम्यकलस्वर--श्ननादि काल से जीव मिथ्या दशन से युक्त है इसी 
कारण सेखार चक्र म परिश्रमण कर रहा है । जिस समय इस जौव को 
सम्यक्त्व रत्न की भाष्ति दोती है उसी समय संसारचक्र का चक्रदेशोन- 
अरैपुद्लपरावस्चैन शेप रह जाता है । सम्यगदशैन द्वारा पादार्थ के स्व- 
रूप को ठीक जानकर श्रात्मा श्रपने निज-स्वरूप की शरोर कने लग जाता 
दे। मिथ्या दृनके दुरो जाने से सम्यग्‌ क्लान प्राप्तो फर अक्षान नष्ट हो 
जाता है । जव सम्यक्त्व रत्न जीव को उपलब्ध होता दै तव उस की दशा 
ससार से निचृत्तिभाव श्रौर विषयो से श्रन्तःकरण मे उदासीनता श्राजाती 
है । पदार्थौ के सत्यस्वरूप को जान कर तव वह श्यात्मा मोक्त पद की प्रा्ि 
के लिये उत्छुकता धारण करने लग जाता द 1 तप्टव जिस भ्रकार श्रीजिनिन््र 
भगवानने पदार्थौ का स्वरूप प्रतिपादन किया हे उस . भावको शरन्तः- 
करण से सत्य जानना यदी सम्यक्त्व का वास्तविक स्वरूप टं तथा पदाचा 

सोक २ भाव को स्वमति वा गुर श्रादि के उपदेश से जान लना दी सम्यग्‌ 
दशन कटा जाता हे । सो यावत्काल पर्यन्त श्रात्मा को सम्यम्‌ दृशन भासत नही 
दता, ताचत्काल पर्न्त मेक्तपद की परासि से चेचित दी रहता ६ । सत्‌ 
पाप होने फे पश्चात्‌ उसी समय जीव को सम्यक्व संवर की प्राप्ति दो जत्तीदे 


॥ 


कायक्रेश तप-केश लुचन चा योग श्रासनादि लगाने ॥ ५॥ 
प्रति संलीनता तप-दद्ियां चा कपायादि को वशीभूत करना ॥ ६॥ 
अभ्यन्तर्‌ं तप 
प्रायश्चित्ततपक्भ--जय कोर पाप कर्म लग गया हो तव पने 

गुरु के पास जाकर शुद्ध भावो से उस पाप की विशुद्धि के लिये भरायश्ित्त 
धारण करना ॥ १॥ 

विनय तप--गुर श्चादि को यथायोग्य विनय भक्ति करना ॥ २ 

वैयावृत्य- गुर घ्ादि की यथायोग्य सेवा भक्ति करना ॥ ३॥ 

स्वाध्यायतप--शास्रे( का विधिपूवक पठन पाटन करना ॥ ४॥ 

ध्यानतप--श्रार्ध्यान श्रौर सौद ध्यान को छोड कर केवल धम 
भ्यान वा शङ्क ध्यान के श्रासेवन का भ्यास करना ॥ ५॥ 

कायोत्समैतप-काय का परित्याग कर समाधेस्थ दो जाना ॥६॥ 

दन तप कमो का सविस्तर स्वरूप उववाई चादि शास्रं से जानना 
चादिण 1 सो इन तपो हारा क्म की निर्जय की जा सकती दहे । प्रतणएव 
इसी का नाम निर्जरातच्व है । 

= वंधतत्व~- {ज्ञस समय श्रात्मा के पदेशो के साथ कमो की भ्रकूतियो 
का सम्बन्ध होता दहै उसी को ्वधतत्व कते है । सो उस वंधतस्व के सुख्य 
चार भद्‌ है ज्ञेसे कि- 

धरुतिवैध--श्राड क्म की २४ थरूतियां है उनका श्रात्मम्रदेशों के 
साथ्चेधदोजाना॥ ९॥ 

स्थतिवध-- पिर उक्त भ्रकूतियो की स्थिति का दोना वही स्थाति 
वेध टोता दै ॥२॥ । 

श्जभागवेध- श्ाठे( कर्मो की जो श्ररृतियां दे 
अभव करना ॥ २॥ 

भदेशवेध--्ाढ कर्मो के श्रनेत पदेश दै तथा जीव के असंख्यात 
परेशो पर कमो के नेत प्रदेश ठरे इष्ट दं कीरनारवत्‌ तथां अ्रष्न 
लादापेण्डवत्‌ ॥ ४ ॥ 

£ मोक्ततच्च-जच ्रात्मा के सर्च कमे त्य टाजाते दे तव द्य 1चवण॒पद्‌ 
की प्राप्ति दोती ह । परन्तु साति रटे कि-सखम्यय्‌ दशन सस्यरून्ञान च्रार सम्यय्‌ चाः 
रित द्वा दी सर्व क क्षय किये जा सकते हे । कमच्तय दाने कं अनन्तरः यद च्रात्मा 
युद्ध, बुद्ध, जर, अमर, पारङ्गतः, परम्परागतः निरंजन; सचज्ञ शरीर सय 
दर्शा तथा श्रनेत शष्छि युक्क दोकर निज स्वरूप म नम दता छा शाश्वत 
खख भे सदैव विराजमान दोजाता है । श्रत्व भरत्येक प्राणौ को ससार के 


( २५७ 


च, 


उनके रसो का 


( २५६ ) 


श्रव यरद परः यद प्रश्च उपस्थित टोता दै कि-जेनशास््र कर्म के फल 

मे मोत्त मानता है वा कर्म-क्तय से ? टसके उत्तर भ कटा जा सकता दहै कि- 
भनमत क्म-फल से मेत्त नर्दः मानता क्रतु कर्मत्तय से मोत्त मानता दै 
क्यकि-मोत्त पद्‌ सादि ध्रनेत पद माना गया । यदिकर्मोके फलस 
म्तपद्‌ माना जाता तव तो मोत्तपद्‌ सादि सातो जाता क्योंकि--पेसा 
कद्‌ भी कर्म नही दै जिस का फल सादि प्रनत दयो 1 जव कर्म सादि सान्त 
नच उनका फल सादि श्रनंत किस धकार माना जा सकता दै ? श्रतएव यद 
स्वतः सिद्ध होगया है कि-कर्म त्तय का दी रपर नाम मेत टे। 

ध यदि फेस कदा जाय कि-जव श्रात्मा किसी समय भी श्चक्रिय नदी 
हो सकना तो भला फिर श्रकर्मक किस प्रकार वन जायगा ? शसशका का 
उत्तर यह टै कि-जिख प्रकार गीले दधन के जलाने की श्रपेत्ता सूखा (शुष्क) 
दधन शीघ्र भस्म रोजाता दै खक उसी प्रकार जव प्रथम चार घ्रातियें संज्ञक 
कमन्य टो जाते दै फिर चार श्रधातिकं संक कम सूखे दधन के समान र्ट 
जात हे फिर उनके जलय करन म विशेष परिश्चम नदी करना पडता । जस 
धकार जीर वस्त्र के फटने म विशेष परिश्रमं नटीं करना पड़ता टीक उसी 
भकार चार श्रघातिक संन्नक कर्मो के क्य करने म विलम्ब नदी दाता | क्याकि 
उस समय ध्यान श्रनि इतनी प्रचरड दोतीः है फि-जिसके छारा महान्‌ कम 
की निर्जरा की जा सकती दे । किन्तु वे करम तो जीर काष्ट के समान श्यत्यन्त 
निषैल श्रौर नाम मादी शेप दोते हे । श्रतप्व शने २ योगो का निरोध करते 
हष जव श्रात्मा श्रक्रिय होता है तव उसी समय वे चारो कम क्षय होजातेष 
याद्‌ कोड कटे कि-जव क्रियाश्च दयाय कम किया गया तव फर उन कमा का 
घातिक सना रौर श्रघातिक सना क्यो वांधी जाती है तथा कर्मो की मूल 
८ ग्रतियां तो उन्तर १४५ परङूतिया कथो मानी गर है ? इस शकरा का समाधान 
दस प्रकार करिया जाता है कि-वास्तव म कम शब्दप्कदयं हं, परन्तु पुण्य 
ग्र पापकी धरङृतियो के देखने से शभ श्चोर अशुभ शुख्य ठो कमे प्रतिपा 
देने कये गप टे । 

फिर जिज्ाखुश्र(के बोधकं लिये कमो के यनक भद्‌ वरन कथे गष 
द । परन्तु मूल भेद उनके श्माट ही द श्थौत्‌ जव कद्‌ कम एकया जाता ह तत्र 
उस कर्म के परमाणु श्राट स्थानों पर विभक्त दो जाते दं । जख रकार एक 
ग्रास मुख मे डाला हञआ्ा शरीरम रहने वाले सक्त धाठुद्ा म पास्सत दोजाता 
दे ठीक उसी प्रकार पक कर्म क्रिया श्रा मूल भरकृतियो चा उत्तर रकतया 
फ रूप मे परिणत दो जाता दै! उन श्राठ मूल भररूतियां कौ (घबातिक चर 

अरघातिक' सना द्यी गष है । जिन कर्मो के करने से श्रात्मा क्ते ष्निज. गुणो पर 


( २६१ ) 


छक उसी भकार सवय समना चादिप। 

भरश्च--श्रायुप्कम किसे कहते द ? 

उत्तर--जिसके द्धाय श्रात्मा चार्यो यतियो मे स्थिति करता है जेसेकि- 
नरक गति के श्रायु ९, तिथैम्‌ गति की श्रा २. मजुप्य गति की शाय ३ ओर 
देवगति की श्रायुः ४। 

प्रश्च-नाम कम किसे कते द ? 

उत्तर-लजिस कर के दारा शसर की स्वना दोती है उसे नाम करम 
कटते दे । श्रागे शुभ श्यौर श्रथुभ श्रादि इसके श्रनेक भेद रै । 

पश्ष--मोत्र क्म फिसे कते है ? 

उत्तर-- जिस कर्म के ढा जाति शादि की उच्चता श्रौर नीचता दख 
पद्ती दै, उसे गोत्र कते दै श्र्थात्‌ इस कर्म के दारा द्यत्मा संसार मे उच 
श्रीर नीच माना जानादे। 

प्र्च--श्रंतसाय कर्मं किसे कते टे ? 

उत्तर--लिख कय के द्वारा नाना भकार के विश्न उपस्थित होते 
तथाजो पदाथ पास हवे चिच्र भिन्न दो जप श्रौर जिन पदार्थो के मिलने 
कीश्राशा दो.वे न मिल खके तव जानना चादिष्ट किं अव श्रेतसय कमे 
का विशेष उद्य द्यो रटादैः। 

ग्रस्य श्राय ही कमै किस समय वधि जाते द ? 

उत्तर--धतिक्तस ( समय २) श्राठो ही कमे वधि जाते है. परन्तु 
शरायुप्कर्म पायः निज श्रायु के तीय भाग मे जीव वाधते है चरतः श्ायुप्कम 
क कोड्‌ कर खतो री कथ परतिखमय निरन्तर वधि जतिदे। देव श्रौर 
नारकीय पनी छं मास श्रायु शेष रहजाने पर परलोक का श्ायुप्कमं ्वोधते 
े। मनुष्य शौर ति्॑चौ के सोपकमै वा निरूप कमे तदि शछ्नेकभेद है 

¢ 


परन्तु यट वपत निर्विवाद्‌ सिद्ध है एके-विना श्ायुप्कमे के वधि कोर भी जोव 


परलोक करी यात्रा के लिपट थद्त्त नदी दोता । 

प्र्--क्मो के परमाण कितने र्दोतेदै? 

उत्तर. श्रत्येक क्म के शरनेत २ परमाण होते दै 1 इतना दी न्दी 
किन्तु जीव क असख्यएत धरदरेश्तो पर कमो के अनत > परमखुञओओ का समूद 
जमा दुध्या ह, उन्हे कमे की वरणाये भी कते द । परन्व॒ स्थिति युक्त होने से 
श्रपने २ समथ पर उन कमो के रस का श्रञभव किया जाना द) 

परश्च --श्राड कम किस प्रकार जीच ्ोधते दे 

उत्तर-- 

कटड्णं भ॑ ते जीवा अठ्कम्प पगदी्ो वंधहं १ गोयमा ' नाणवरणि- 


॥ 1 


{ र्दे ) 


शिज्जकस्मा ससीरप्पयोगनामाए कम्मस्स' उदएणं णणाचराणेजकम्मा 


परीरप्पये.ग्ेधे ॥ 
भगवतीनूचचशतक = उदेश € । 


खीक(--कम्पासरीरेव्यादिः प्णारपरिणीययाए” त्ति क्ानस्य-- शृतदेस्तदभेदात्‌ 
(वता वा या पल्नीकता - सामान्येन प्रतिकूलता सा तथा तया, “शाणनिरहवणयाए"' त्ति 
नस्य--श्रतयुहणा वा या निहता -श्रपलपनं खा तथा तया न्नारतेराएण' त्ति क्ञनस्य-- 
निस्यान्तराय --तयूय्रल्खादौ चिप्र य. मत्तथा तेन “"नारपप्रोस्रण''त्ति ज्ञनि--धरतादौ ञ्ानवत्सु 


य. रेप --श्रप्रीति स तव तेन 'नाणऽचा रायणाए! त्ति--ज्ञानस्य जानिना वा॒याऽत्यास- 
ना--रेटनः सा तथा 'नाणदिमवायणाजेगिण” त्ति नानस्य निना चा विसंबादनयोगो-- 
यभिचारदश्चनाय व्यापरो य स तथा तेन एतानि च बाह्यानि कारणानि जानाकर्णाय कारण 
रोरयन्धे श्रथाऽनन्तर कारणम।ह--“णाणावर णि) भिप्यादि जानावरणीय देतुत्वेन ्ञानावर~ 
एयरत्तणो यतकाम्मणशरोरध्रयोग नाम तत्तथा तस्य कर्म्मण उदेथेनेति"' 

 भावार्थ-श्री गौतम स्वामी श्रीध्रमण भगवान मदाचीर प्रभु से पूत 
६ किदे भगवन्‌ ! मानावरणीय कामेश शसीरभयोगचंध किस कमे के उदय 
मे होता है ? इस अच्च के उन्तर भ भरी भगवान परतिपाटन करते दै किदे 


वाधते & 8 
गोतम ! छः कारणो से श्ात्मा क्षानावरणीय क्मको वाधते है शरोर क्षानावर- 
कार्मण शरीर योग 


गीय माण शसीरध्रयोग नाम कर्म के उद्य से क्षानावरणषय का 
करा चथ कथन किया गय है । किन्तु जो म्नानावरणीय कर्म कार्वध कुः धकार 
* (द [> जैसे [५१ 

स प्रतिपादन क्रिया गया ह वद निच प्रकार से जानना चादेण जसि 


९ श्चान शरोर कषानवान्‌ श्रात्मा की भतिकूलता करने से। 


१3 9 
२.श्चुतश्ञान वा श्चतगुरू उन का नाम दिपाने से अथोत्‌ ज्ञान क। छिपाना 
व्यक्ति को श्चुत ज्ञान सिखला 


गरोर मन मे यद्‌ भाव रखना कि-यदि श्रमुक ठ 
दिया तव उस का मत्व वद्‌ जाप्पगा तथा जिस से मे पद ह उसका नाम वतला 
दिया तो मेस श्रवेच्ता से उख की कीरिं वद्‌ जापी चा अन्य व्यक्ति जाकर 
उस से पट्‌ लेगे इत्यादि कुविचारो से कषान को वात खर के नामको ल्िपाते 
रहना । 
३ श्रुतक्षान के पद्ने वालो को सदैव काल 
िवेपदृन सके! मनमें इस चातका विचार करते रना 
गपए्तो मेरी कीति न्यून दो जायगी । 

. ४क्षान वा क्षानवालों से द्वेष करना अथात्‌ 
जो क्ञानवान्‌ है उन के साथ देप । इस धकार 
ऋ चध किया जातः दै ष 


ल विश्च करते रहना जिसस 
कि-पददेये पद्‌ 


= भ, भ (व 
त्‌ जो मूढ दं उनसर भ्रम ओर्‌ 
के भावो से क्ञानावरणीय क्म 


त. 


यतिप्पणयाए अपिहणयाए अपरियावयाए एवं खलु गोयमा ! जीवां 

साया पेयशिज्ञा कम्मा करति ॥ 
भगवती सूत्र तक्र ८ उदे ६ । 

हि भावार्थ-( प्रश्न) दे भगवन्‌ ! सातावेदनीय का्मणशरीरप्रयोग चंध 
।कस कमे के उद्य से दोता है १ ( उत्तर ) दे गौतम ! भाणियो कौ, भूतो 
को, जीवां की, सत्वो की श्रलुकंपा करने से, वहत से प्राणी यावत्‌ सत्वो 

प्यनदेने स, दैन्य भाव उत्पन्न न करने से, शोक उत्पन्न न कसरनेसे, 
श्र्वपात न कराने स, यण्रयादि के न ताडने स, शरीर को परितापन देनेसे। 
इस प्रकार दे गोतम ! जीव साता वेदनीय कर्म को वांधते है । इस सूघ का यद 
मन्तव्य है कफि-सातयविदनीय क॑ भ्राणी मात्र को साता देनेसे वांधा जाता 
जस्त क्रा पारेणाम जीव सुखरूप अनुभव करते दं । 
भ्र--श्रसाता वेदनीय कर्म किसर कारणस वाधा जातादे? 

„ उत्तर--जीवों को प्रलाता उत्पन्न करने से क्योकि-जिस भकार जीवो 
कोदुः्सो सरे पीड़ित फिया जाता है, ठीक उसी प्रकार साता ( दुम्ख) 
वेदनीय कर्म कारस श्चनुभव कस्ते मे श्राता दै । तथा च पाटः 

्रस्साया वेयणिज्ञपुच्छा, गेयमा ! परदुक्खरयाए परसोयणयाए 

परजूरणएयाए प्रतिप्पणयाए परपिहणयाए परपरियावणयाए बहूणं 
पाणाशं जाच सत्ताणं दुक्डणयाए सोयणयाए जाव परियावणयाए एवं 
` सलु गोग्रमा ! जीवा ्रस्साया बेयणिज्ञा जावप्पयोगवंधे ॥ 

४ भगवती सू शतक = उदृश € । 

भावा जिस प्रकार जीवो को खख देने से साता वेदनीय कमे वाधा 
जाता दै ठीक उसी प्रकार दुःख देने से, सोच कराने से, शरीर के अपचय 
( पीड़ा ) करन से, श्रष्यपात कराने स, दंडादि डारा ताडने से, शरीर को 
परितापनदेने सरे असाता वेदनीय कम वाघाजाता हे । जस का पास्णाम 
नावको दुख रूप भोगना पडता दे. । 
प्रक्ष--मोदनीय कर्म किस प्रकार सर वाधा जाता ड च्रार मानाय 

फं विसे कहते दे ? 

, उत्तर--जिख कम के करने स श्रात्मा धर्ममागे से पराड्सुख रदे ओर 
सदैव काल पौद्धलिक खख की अभिलापा करता रहे उसे ही मोहनीय कर्म 
कते दै । जिस धकार मदिरापान करने वाला जीव तत्व विचार स पतित 
दो जाता है डीकर उखी धकार मोदटनीय कमैवाला जोव रायः धम क्रयाश्रो स 


( २६७ } 


तिरिक्खि जोणियाउयकम्मासररिप्पयोग पुच्छा, गोयमा ! मादलि- 
पाए नियिल्लयाए यलियवयशेणं कूडतुलकूडमाशेणं तिरिक्वजोणिया 
उयकेम्मास्रीर जावप्पयोगरंधे | 
भग० श = उदेश्च ६। 
भावा्थ-दे भगवन्‌ ! तिर्यगूयोनिकायुप्कार्मण शरीर प्रयोग का 
वेध किस कारण सरे किया जाता हे ? इसके उत्तर मे श्री भगवान्‌ कते दै कि- 
द गोत्तम ! परके वंचन (खुलने ) की युद्धि से, वैचन के लिये जो चेष है उन 
म्‌ माया का प्रच्छादन करने से ्र्थात्‌ छलमे छल करने से, श्रसखत्य भापस 
धरर कूट तोलना शौर कृट दी मापना इस पकार की क्रियाश्रो के करने से जीव 
प योनि की रायु वंध लेता दै । जिसका परिणाम यह दोता फि-वद मर कर 
कर्‌ पशु चन जाता है 1 
यश्च-मङप्य की श्रायु जीव किन २ कारणो से वाधते है? 
„  उत्तर--भद्रादिक्किया्रो के करने स जीव मवुष्य की श्राय को वाध 
लता दैः जेसेकि- 
„ मणुस्सश्राउयकस्मा सरीर पुच्छा, गोयमा { प्गमदयाएं पग 
ब्रेणीययाए साणुकोसयाए अरमच्छरयाए मणस्साउयकम्माजावप्पयोगवंे । 
भग० श०म उ० £| 
भावाद भगवन्‌ ! मप्य कौ च्रायु जीव किन र कारण से वांधने 
दे१दे रििष्य ! स्वभाव की भद्रता से, स्वभाव से दी विनयवान्‌ टेन से, श्र 
क्पाकेकरनेसेश्रौर परगुणौँ मे श्रसखूया न करने से श्रथौत्‌ किसी पर ईषया 
ने करने से। इन करणो से मलुप्यायुष्कार्मण शरीर का वध कियाजाता हे। 
थश्च -देव की श्रायु किन २ कारणे से वांधी जाती दे? ५ 
, . ` उत्तर--सराग सयमादि क्रियाश्नो से देवभव कौ श्राय वांधी जाती ह 
जेसाके- 
देवाउयकम्मासरीर पुच्छा, गोयमा ! सरागसंजमेणं संजमासंजमें 
पालतयोकम्मेणं अकामनिज्जराए देवाउयकम्मा सरीरजावप्पयोगर्वधे ॥ 
भगवती, सू शतक = उदेशा ॥९॥ 
भावार्थ--हे भगवन्‌ ! देवायुप्कामेण शरीर किन कारणो से वाधा 
५ है? दे श्थिष्य ! देवभव की श्रायु चार्‌ कारणे स वांधी जाती दे । 
नेसक्वि--राग भाव पूर्वक साधु इत्ति पालन से दस्य घम्‌ पालन करन स, 
श्रनानता पूर्वक कणर सहने से, श्रकामनिर्जरा (वस्तु केन मिलने से} 


{ २६६ ) 


परश्च-सचनोन्र नाम कामण शीर प्रयोगवध किस प्रकार से 
कियाजाताद्े 

उत्तर--किसी भी प्रकार से श्रहेकार न कया जाए चअ्वत्‌ किसी 
पदार्थं के मिलने पर यदि गयं न किया जाप तव श्रात्मा ऊचगोत्र कम काडपाः 
जना करलेता है ' जस कि- 

उच्चागोयकम्मासरीरपुच्छा, गोयमा ! जातिंत्रमदणं कुलग्रमदेखं 
वलग्रमदेणं स्वग्रमेदर तव्रमदेणं स॒यग्रमदेणं लभियमर्दणं ₹स्तः 
रि ग्रमदेणं उच्चागोयकम्मा सर।र जावप्पयागवधः, | 
मृग० शरत =उ० ६ ॥ 

भावाश्च दे भगवन्‌ ! उंचगोच्र नाम कामण शरोर अया का वथ 
किस प्रकार से किया जाता दै ? दे शिप्य ! जात्ति, कुल, वल, रूप, तप, चतः 
लाभ, श्नौर द्वयं कामद्‌ न करने से ऊंचगोज नाम कामं शरार आयाग कग 
वेध {किया जाता हः यथात्‌ किसी भी पद्‌ाथैका गव न करन स ऊचगोत कमे 
की उपार्जनाकी जाती दहे, 


प्रश्च नीचगो क्म किस प्रकारस्र वाधा जाता 1 
उत्तर--जिन २ करण स ऊच्च शे कम का वध माना गया हे सक 


उसके चिपरात नीच गोत्र क्म का वेध प्रतिपादन एकया गया हे 1 जैसेके-- 
नीया गोयकम्मासरीर पुच्छा, गोयमा 1 जातिमदेणं कलमदेख चल 
मदेणं जाव इस्सरियमदेणं ीयागोयकम्मासरीर जावप्पयोगवंधे । 
भगग्स्‌न्यतक उध्श ६1 
भावाथे-दे भयवन्‌ ! नीच गन क जोघ किन २ कारणो से वांधते 
द १ हे शिष्य ! जाति, कल, बल. याचत्‌ येश्व्यै का मद्‌ कर न स जव नीच 
गोत्र क की. उपासना कर लेते द, इस सूज का श्याश्य चह दं कि--जिस 
पदाथ कामद किया जाता हे वास्तवमे वदी पदाथ उस आत्मा को फिर 
कठिनता से उपलन्ध होता है क्योकि--वास्तव मे जीव की ऊच श्मरोर नाच 
संघा नही है. शुभ ओर शरणम पदाथा क पिलने से ही ऊच चोर नीच क 
जा सकता है ! सोः शाढ कारण स्फुट रूप से ऊपर वरन 1 जाके ह । 


प्रश्च--श्रतरायकम किते कहते दे _ 
उत्तर--जिख कम॑ के उदय से काया की सिद्धिम विश्च उपस्थित दहा 

| = „2 र क 

जवे. उसका नाम शअंतराय करम द । ्यो1क--मन ने काय की सिद्धि के तिये 


अनेक ध्रकार के संकल्प उत्पन्न किये गण थे परन्तु सफलत किसी काये कभी न 
होखकी । तव जान लना चादिण कि--अतराय कस का उदय दोरटा हे 1 


{ २७१ ) 


स्वभाव भी दोना चाद्दिए, प्योक्षि-यदि वीज दग्धदं चा श्मन्य भ्रकारसे 
उसका स्वभाव ंङुरदेनेकानहीरहा दै तव चह वेज फलब्रद्‌ नहा दाग । 
अतः वीज का शुद्ध स्वभाव होना चादि. फिर स्वभावाञ्सार 'नेयात 
(दोनहार ) दोनी चाददिप जेते कि- खेती कौ रत्तादि । फिर लाभप्रद कम 
रोना चाप जिससे चेती धान्या से नर्विश्चता पूर्वक पूणं दो जावे। जव ये के 
भ्रचुक्रूल दे तव फिर उस देती कौ सफलता सवथा पुरुपा परी निभररे 
क्याकरि--उक् चारो कारणो की सफलता केचल पुरुपा परल छ्रवलम्वित हे। 
कटपना करो किं--समय, स्वभाव, नियति ( भवितन्यता ) चछर कम ये 
चार शुकुल भी द्य जर्ष, परन्तु चाया का पसाद्धम पुरुषायै नदी किया 
गयातव चारो दी निष्फल सिद्ध दागे । सद्ध्‌ द्श्या क पत्यक कार्यम 
पर्चाक्त पच समवार्ये[ कै त्यन्त श्रावश्यकता दे । सो जेस समय जाच कम 
फ फल को भ(गने लगता द तव उस फल काभ(गन क लिये पेच हयी समवाय 
एकच दो जाते है! यदि रेस का जाय कि--कमतोजड़ हेः व ज का 
फल किस पकार दे सकते है ? इसके उत्तरमे कटा जा सक्ता 'के-ऋत्‌ 
(काल) तो जड़ दै यद पुष्पो वा छृक्ता को प्रफुट्लित किस प्रकार कर सकती है 
तथा मदिराभीतो जड्देयर पीने चाले को ्नचेत किंस प्रकार करठ्तदद् १ 
दसी प्रकार क्म जड होने पर भी पचो समवायो के मिल जान पर च्रात्मा का 
ख॒भाुभ फलों से युक्त कर्देते टे । जिस समय जच कर्म करता दे उसे समय 
उसके उद्य वा उपशामादि निमित्तो को भी वाध लेता हे । जस भकार जव 
फिसी व्यक्ति को किसी सेय का चक्र ( दौरा ) प्राने लगता ह तव उसे रोकने 
केलिये वैय लोग श्नेक धकार की श्रौपाधेयो का उपचारः करत दै. ओर 
करमशः चेषाद्रो स सफल मनोरथ दे जते है । षजस रकार साग चक चग 
उद्य श्नोर उपशम दोना निश्चित हे ठक उसां प्रकार ज कर्म क्यिजा खुके 
हे उन कर्म का उदय चा उपशम दोना भी प्रायः वाधा च्श्रादोतादह। साथ 
दी सून भी उपक्रम श्यात्मा निज भावो स उत्पन्न कर लत है कारणकि- 
श्रा्मा वीयैयुक्त माना गयादै, वद ध्मपने वीयं डारा नूतन नमित्ताषदे 
भी उत्पन्न कर सकला हे! सो आत्मा निज कर्मो के अडुसार दा सुख दुःख 


का श्जुभव करता है 1 कर्मा का ठाक २ चिज्ञान होने पर दा आत्मा 1पएर उनसर 


विसुक्क ठोने की चेष्टा करेगा । क्योकि-यदि षान द ना तो भला फिर उनसे 


चरू का उदयोग किस भ्रकार किया जा सकता है ? सस्यसाक्ञान दान सरह 
जीच चारिनारूढ दो सकता छ । श्री भगवान्‌ ने भगवती सू मं निन्न प्रकार 
से जनता को दृत देकर समश्राया हं । जसप्क 7 


अस्थि णं भते ! जीवाणं पावाकम्मा पावफलविवागरजत्ता कर्जत ! 


( २७३ ) 


वप पथम तो कोर हानि उत्पन्न नसी करता, किन्तु जव चिप परित दोजाता 
ह तव शरीर की देशा को विगाड्‌ फर सत्यु तक परुचाता है, उसी प्रकार 
पापकम जव किया जाना है तव नो प्रिय लगता दहे परन्तु करने के पश्चात्‌ 
बहत दुःसोत्पाद्रक दोजाता द । प्रत. जिस प्रकार विप ने काम किया टीकः 


मकारे पापकम फल देता) 


से श्रव कालोदाया धी भगवान्‌ स शभ कम चप्य फर भ्रश्च क्रतं ह । 
५ कः--~ 


श्रत्थिणं भते ! जीवाणं कल्लाणाकम्मा कल्लाणफलयपिवाग संञ्चत्ता 
फति ! हंता ्रस्थि,कहणं मंते ! जीवाणं कल्लाणाकम्मा जाव क्ति १ कालो- 
दाई ! से जहा नामए केड पुरिसे मणुन्नं थाललीपागसुद्ं अ्ठारस बंनणाङुलं 
भोयण अजेज्ञा ! तस्स भोयणस्स आषाणए नो मदए भवदृःतश्रो 
पच्छा परिशममाणे २ स॒रुवत्ताए सुवनत्ताए जाव सुहत्ताए नो दुक्खत्ताए 
येज्जो २ परिणमति, एवामेव कालोदायी { जीवाणं पाणाइवाय वेरमणे जाव 
पारगगह पेरमणे कोह विचेगे जाव भिच्छार्दंसणसल्न बिवेगे तस्सणं श्रावाए नो 
भेदए भवई्‌ त्रो पच्छा परिणममाणे २ सुस्वत्ताए जाव नो दुक्खत्ताए येज्जो 
२ परिणमर एवं खलु कालोदाई ! जीवाणं कल्नाणा कम्मा जाव कज्ञंति ॥ 
भगग्शतक ७ उदे १० ॥ 
भावाश्र- कालोदायी श्री श्रमण भगवान्‌ मदाकीर प्रथु से प्रते है कि- 
द भगवन्‌ ! क्या जीवो को कल्याणकारी कर्मं कल्याण फल विपाक से युक 
करते है ? स रश्च के उत्तर मे श्प भगवान ने धतिपादन किया कि-दे कालो- 
दायिन्‌ ! टो, कल्याणकारी कर्म जीवो को कल्याण फल से युक्त करते हैँ । 
नेव फिर उदायिन ने परश्च किया किदे भगवन्‌! किंस प्रकार उक्त कम 
कल्याण फल स युक्त करते है ? उत्तर मे श्री भगवान्‌ ने कथन क्याकिटे 
कालोदायिन्‌ ! जैसे किसी पुरुप ने स्थालीपाक शुद्ध अष्टादश व्यंजनों से युक्त 
शद्ध चर पवित्र भोजन श्रौपध स्र मिधित खा लिया 1 तव खाते समय वद्‌ 
भोजन उस पुरुप को श्रिय नदी लगता हे क्योकि-श्रोषध के कारण उस का 
ग्स कटकादि दहोगया दै । किन्तु जव उस भाजन का परेणमन होता है तव 
उस पुरूप के रोग दुर दोजाने खे उस की खुरूपत! श्रर सुवख॑ता तथा सुखरूप 
भाव म॑ वह्‌ भोजन परिणत दोजएता है, खक उसी भकार हे कालोदायिन्‌ ! जव 
ज्व हसादि श्र पाप कर्मो को छोडता हे तव उस समय तोरउस जीवको 
क्ट सा प्रतीत होता टै क्योकि -दुष्ट कर्मो का जच परित्याग करना पडता है तव 
मन श्राह सकृपो का निरोध करना प्रति कठिन सा प्रतीत होने लगता 


( २७५ ) 


सम्गन्ध होने पर शोक करना 1 (३) पीडाचिन्तवन--पौडा रोग दने पर दुखी 
होना । (8) निदान -द्ागामी भोगों की चाद से जलना । 
सौद्रध्यान-चार तरह का दोता हे । (१) हिमनन्द-हदसा क्रमे करनेम 
व दिसा हुई सुनकर श्रानन्द्‌ मानना । (२) यृपानन्द--श्रसत्य वोलकर, चुला- 
कर घ योला दुश्रा जान करश्यानन्द मानना । (३) चैयोनन्द-चोरौ करके, करके 
च चोरी हुई सुनकर श्रानन्द्‌ मानना । ८४) परिषदनन्द--परिद्रहे चड्ाकरः, वदृ 
वाक्रर च बदृती दुर देखकर दष मानना) 
धर्मध्यान--चार भकार का हे। (१) ्राहञाविचय--जिनेन्द्रं की श्राक्ञा- 
खुसार श्रागम के द्वारा त्वो का विचार करना 1 (र) भ्रपायविचय-- 
पने चश्चन्य जीव(केश्रक्षन च कर्मके नाशका उपाय विचार करना 
(२) परपाऊकिविथ--च्रापको च श्रन्य जीवो को खुखी या दुःखी देखकर कर्मो के 
फल का स्वरूप विचारना । (४) मस्थानविचय-इस लोक का तथा श्रात्मा का 
श्राकार चा स्वरूप का विचार कसना 1 इसके चार भेद टैः 
(९) पिडस्थ (२) पदस्थ (३) रूपस्थ (४) रूपतत्त । 
पिंडस्थध्यान 
ध्यान करने बाला मन, वचन, काय शुद्धकर कान्त स्थान मे जाकर पद्मा- 
सन या खड शरासन च श्रन्य फिसी सिद्धादि रासन से तिष्ठकर अपने पड या 
शसर मे विरज्त श्चात्मा का ध्यान करे1 सो पिडस्थ ध्यान हं । इसका पच 
धारणाः 
२ पाशिवीधारणा--इसख मध्यलोक फो क्षीर समुद के समान निर्मल देख 
कर उसके मध्य मे एक लाख योजन व्यास वाला जम्बृट्धीप के समान ताप 
दुष्ट खुवर के रंग का प्क दकार पखड्ी का एक कमल चचार । इस कमल 
के सुमेर पर्थत खमन पीत रग का ॐच एकराणकता विचारे । फिर इस पवेत के 
उपर परुडुक वन २५ पएएडुत्त शिल पर पक स्फटिक मणि क। सासन विचारे 
शरोर यदटदेखे किमेदसी पर श्रपने कमा को( नाश करने के ्ियेवेखाहं) 
इतना ध्यान चार वार करके जमति श्रौर श्मभ्यास करे । जव च्भ्यास दोजावे 
तव दृखरी धारणा का मनन करे । 
२ अधिधारणा-उसी सिदासन परः वेडा दुश्चा ध्यान करने वाला यट 
सोचे किमेरे नाभि के स्थानमेभीतर ऊपर सुख किये सिला हुवा पक ९६ 
पे{ख्े का श्वेत कमलल दै 1 उसके हरएक पत्तेपरश्रश्माददउऊकऋऋदखलण 
२े.शरेः श्रौ श्चं अः से ९६ स्वर कमस पीले लिखे दे च वीचमें हं पीला (लिखा है । 
इसी कमल के डपरः हृदय स्थान मे एक कमल श्रोधा खिला हुता आर पत्ते 
का उड्ते हु काले रगं को विचारे जो क्षानावरण, दशनावरण, वेदनीय, 
मोहनीय, प्रायु. नाम, गोत्र, अन्तराय, णेसे आड कर्म रूप है मेसा सोचे । 


~ 


श म 
& 
‰ 


{ २७७ ) 


२ परवनधारणा-दूखसी धारणा का श्रभ्यास होने फे पठं यद सोचे किभेरे 
चागो श्योर पवन मडल घूमकर राग को उदा रहाट । उसमेडल मेँ सव शरोर 
स्वाय स्वाय लिखा है .। 

(6 ४ जलधास्या--तीसरसः धारणा फा ्भ्यासदहोने पर फिर यह सोचे 
क मेरे ऊपर कालि मेघ श्रागये श्रौर रूव पानी यरसने लगाए । यद पानी लगे 
इ कम मेल को घोकर श्यात्मा को स्वच्छ कररहाहै] पपपप जल मंडल 
प स्वश्योर त्लिखा दे †1 

„ ५ तत्वरूपयती धारणा-चौथी का श्रभ्यास दो जावे तव श्रपने को सर्व 
कम च शरीर रहित शुद्ध सिद्ध समान श्रमूर्तिक रस्फटिकवत्‌ निर्मल आकार 
उमा रेः यह पिडस्थ यात्मा का ध्यान हे \ 

५ पद स्थन्यान 

पदस्यध्यान भी णक भिन्न मार्ग हे । साधक इच्छायसार इस का भौ 
अभ्यास कर खकता दै । इसमे {भिन्न पदार्थे को विराजमान करः ध्यान करना 
चाद्िगय । जसे हृद्य स्थान मे श्राठ पांखङ्ी का सखुफेद्‌ कमल सोचकर उसके 
भाट पत्तो पर प्रम स्त श्राट पद्‌ पीले लिखे! (९) एमो शरदंताखं (२) एमो सिद्धा- 
शं (३) मो आययासं (४) णमे उवज्मायारं (५) णमो ल्येणसन्वसाह्रं (द) 
सभ्यण्दशनाय नमः ७ सम्यग्ध्ानाय नमः = सम्यच्ट्वरित्राय नमः शौर एकं 
प्क पद पर सकता हुमा उस का श्रथ विचारता रदे । थवा श्रपने दय पर 
चा मस्तक पर या दोने( भोदों के मध्यमया नाभिमे ई याको चमकतता सर्य 
सखम देखे च श्ररटंत सिद्ध का स्वरूप विचारे इत्यादि । 

स्पसध्याव 
भ्याता पने चित्त मे यदह सोचे कि मै समवशरण म सान्तात्‌ तीधैकरः 
भगवान्‌ को अन्तरिक्त ध्यानमय परम वीतराग छज चामरादि आर भरातिदा्यं 
सदत दैव रहा हं । १२ समा हे जिनमे व. देवी, मजप्य, पट, सुनि शमादि 
चेठे हे, भगवान्‌ का उपदेश दोरहा ह , 


-&- 


स्वाय 3 



















† (--) 4 पपपयपप 
स्वाय | च्यान्त्धारं | स्वाय पपपपपयप 
श्रि पपपपपप 

पपपपपपं 





सस्याय 


( ७६ ) 


क श्रन्तःकरण म॑ नाना प्रकार की भाषा के वर्णो की श्राङृतियां परस्पर एक 
रुप होकर टद्रती हे उसी प्रकार मु्छातमार्णे भी परस्पर श्रात्मप्रदेशो ढारा 
सम्मिलित दोकर विराजमान दै । यदि कोई शका करे कि-जिस प्रकार 
पक पुरुप के न्तः करण अओ भापा्श्रों के वर्णो की श्ारूतियां प्त्थित है, उसी 
धकार णक यवर के रूप में ्रनेक मुक्तात्मा भी विराजमान कट सकते 
दस के उत्तर भँ फा जासकता टै कि--जव सिद्ध पद्‌ श्मनादि स्वीकार 
केया गया नव सर्व सिद्ध परस्पर एक रूप दोकर ठदरते है; क्योकि- 
सेद्धात्मा पुद्धल से रहित स्वगुण म विराजमान दे । कर्मक्षय का नाम री 
पचेपद है कमफल का नाम मोत्तपद नदी हे ! इसी लिये किसी एक जीव की 
पपेक्त से सिखपद्‌ सादि श्रन॑त मानागया ट श्रौर वहत से सिद्धौ की शपेक्ता 
सिद्धपद्‌ श्रनादि श्रनन्त धतिपादन किया गया दहै । श्रत. सिद्ध 
गवान्‌ श्रपुनसाचृत्ति वाल्ते दोते है-कारण कि--वद्ध श्यात्मार्णे स्थिति युक्त 
ति दै, न तु मुक्तात्मा । लौकिक पर्ठमे भी देखा जाता है कि-जो श्चात्मार्प 
एकमा के प्रभावसि कारागृह मे जाती दहै उनकी तो 1स्थात्ते वाधौ जती 
, परन्तु जव वह काराग्रह का दंड भोग कर मुक्त दोती दै तव राजकीय पन्न 
दि (गजट ) मे फिरयर नरी लिखा जाता कि--च्ञ्ुक श्रात्मा शसक दिन 
याग से मुक्त की गरई श्रथवा श्रस्ुक समय पर फिर काराग्रह म श्राणगी । 
तणव सिद्ध हुश्रा कि - मुक्तात्मा का फिर संसार मे श्रागमन युक्तियुक्त 
ही देः" यदि कोर कटे कि--यदि सुस्तात्मापेः फिर संसार म नहा च्प्गीं 
1 संसारचक्र मे जीवौ का श्रस्तित्व भाव नही र्देगा। कारण कि जिस 
दाथ का समय मपर व्यय हीषो रहा दैडउस की समाप्ति अवश्य मानी 
येगी ? दस शोका के उत्तर मे कदा जास्रकता दै कि-- मात्मा ( जीच ,) नत 
श्रोर जो श्रनत पदार्थं हे उसका कदापि चेत नदी दोसकताः क्योकि - 
दर छरनेतकाभी श्रत माना जायगा त्व उस पदाथ का अत खाजानसः 
नेत न कना चादिष । यदि तकं किया जाय कि-काल द्रव्य भी नो नेत 
कयोकि-श्रनेत काल श्रनेत पदाथ को लेलेगा ? इसके उत्तर म कटा जास 
ता दै फि-दए्वरकर्तत्ववादियो ने माना हु टं के-खनतचार इश्वर 
मान्मा ने खृष्टि उत्पादन की श्योर शनत दही चार द्द का प्रलय कया 


® नेट--जो जग मेन्त से पुनराद्ति मानते ट, वीस्तव म उन ठगो नेस्व्यको दी 
त समा है | कय कि-स्वमायात्मा पुनराृतति करता रश्ता ह शचोर उन लागे कौ मेत्तावभि 
मानी हुई € उन श्यवधि से जेनसून्रकारो ने स्वग कौ वाध कः यषा धिक प्रति- 


नकीदै। 


( स्न ) । 


मन्न क्ररने द किदे भगवन्‌ ! कया श्यकर्मक जीवों की मी गति स्वीकार की 
जती दै ? दरस पर श्वी भगवान्‌ उत्तर भदान करते द कि -द, गौतम ! श्रक- 
मक़जीघोकी भी गति स्वीफिार क, जाती दे । जव श्री भगवान्‌ ने दस पकार 
से उत्तर प्रतिपादन करिया तच र गौतम स्वामी ने फिर प्रश्न करिया कि- 
ह भगवन्‌ ! परिस प्रकार श्कर्मक उर्वो की गाति मानी जातीदै ?तव श्री 
भगव्रान ने प्रत्तिपाद्न किया कि दवे गौतम } कर्ममल फे दूर दोने से, मोद 
दूर करने सर, गति स्वभाव से, वेधनदेदन से, कर्मेन्धन के 'वेमोचन से, 
पूवे पयोगस, दन कारौ से श्रक्मक जीवो की गत्ति जानी जाती है) 
अ्रवरक्त कारणो से दणन्तों ढासा स्फुट करते दुणए शाखकार वरन करते है । 

से जदानामए--केद पुरिसे खक॑ तं निष्ठि निर्वहयंति आयुणुव्यीए 
परिकम्भमाशे २ दन्भेहिय कुसि य वेदद्‌ २ श्दहिं मषियालेवेहिं लिपद 
२ उणर्टे दलयति भूतिं २ सुकं समां अत्थाह मतारमपोरसिय॑सि उदगंसि 
पकिसिवेज्जा, से नृणं मोयमा ! से ठे तेसि अद्रण्द मद्ियालेेणं 
गुरुपत्ताए भाियत्ताए युरुपंभारियत्ताए सलिलतलमतिवइत्ता अ्रहे- 
धरणितल पडषटाणे भई ?, हंता मवई, अहेणं से तबे अट्टं मद्धियालेवेणं 


पारिक्खएर धररितलमतिवइत्ता उपपि ससिलतलपडष्ाणे भवद्‌ ? 


हता भवद्‌, एवं खलु मोयमा ! निस्सगयाए निरंगणयाए गई परिणामेशं 


अकम्मस्स गई पन्नायति । 

भावाथ - श्रीभगवान्‌ गोतमस्वामी को उक्त विपय पर दष्ान्त देकर 
शिद्ित कस्ते दै. जैसे कि-दे गोतम ! के पुरूप थुप्क [खुक्ा] तुवा जो चिद 
से रहित, वातादि से श्रञुपदत उसको शुक्रम से परिक्रम करता हुश्ा दर्भ 
कुशासेचेटन करता है फिर आड वार मिद्ध केल्तेपसेउसेलेपनदेता हे, फिर 
उसे वारस्बार धूप मे खुखाता दैः । जव लवा सक भकार से सूल गया फिर 
अथाह रौर नकैरने योग्य जल मे उस तुवे को पत्तेप करता है, फिरदे गौतम ! 
चया वह तुवाजो उन राड थक्रारके मिद्धी केलेप सर गुरुत्वभाव को प्राप्त 
होगया दे श्रौर भारी दोगया दै, रतः गुरुत्वके भार सरे पानीकेतल को 
अतिक्रम करके नीचे धरती के तलमे तिष्ठान नदी करता है ? भगवान्‌ 
गौतम जी कहते है फि-दा. भगवन्‌ ! करता दै अ्थौत्‌ पानी के नीचे चला 
जाता द । पुन भगवान्‌ चोल करि-दे गोतम ! क्या वह जुवा श्मार मिद्ध के 
लेप को परिक्तय करके धरती के तलको छतिक्रम करके जल के ऊपर नहीं 
्राजाताटे ? इसके उतर म गोतम स्वमी जी कते है प्वि-द भगवन्‌! 


द 


( २८ ) 


भावाश्-े भगवन्‌ ! पूर्व भरयोग के द्धाय श्रकर्मक जीव की गति किस 
भकार खीकार क्री जाती है रहे गौतम ! जिस प्रकार धडुपसे तीर दछूटकर 
फर लव्य(भिसुख दोफर गति करता दै छक उसी प्रकार-निसंगता से 
प्वस्गता स्र यावत्‌ पूर्वं पधरदोग से श्रकर्मेक जीव की गति रोती टे क्योकि- 
यधन्मात्र धुष्‌ चार्‌ के चलाने चालोका वल रोता दे तावन्मात्र री वह 
नेर ल्य की शरोर यकर गत्ति की श्रोर प्रवृत्त दो जातादरहे, इसी प्रकार जव 
अत्मा तीनो योगो का सर्वधा निरोध कर शरीर सरे पृथष्ट्‌ छोता दै तव वह 
स्राभाविक दही गति करता दे, ्रतण्व सिद्ध दुश्चरा कि-श्रकर्मक जीव लोकाय 
पयन्त गति कर फिर वा पर सादि नेत पद्‌ चाला होकर विराजमान दो 
जाता दं | प्रव यदि सं स्थान पर यदह शका दो कि-पदिले कर्म या पौ 
जाव हुश्रा, ता इसका समाधान इस प्रकार ह कि-कर्मं कर्ता के अधीन दोता 
द कयोक्रि-कत( कीजो क्रिया है उसका फलरूप कर्मद) सरोजव कतमे 
क्रिया दी उत्पन्न नरह हुश्तो भला कमै क्ती से पिले किस पकार वन 
सकता दहै, रत्व यद पत्त किसी धकार भी सिद्ध नदी दो सकता कि कर्त 
के पिले क्म उत्पच्च हो गया । यदि देसे कहा जाय कि-पद्िले जीव मान 
लिया जाप फिर क्म मान लेने चादिये, सो यद पत्त भी युक्ति क्षम नर्द है 
ऋयोकि-फिर पिले जीव को कमो से सर्वथा रादित मानना पडेगा जव 
जीय सर्वथा कमो सर रहित सिद्ध दोगा तो फिर इस श्त्माको क्मलगे ही 
ऋय ? यदि स माना जाय किं-विना किट दी कमं जीव को लग गये, तव 
यह शका उपस्थित रोती दहै कि-जव चिना कयि कमं लग सकतेहैतो फिर 
जो सिद्धात्मा सर्वथा कर्मों से रदित दै उन फो क्यो नदी कम लगते । रतपव 
यह्‌ पत्त भी ठीक नहीं दे । 
यदि रेते माना जाय कि-कर्म छ्नौर आत्मा युगपत्‌ समय उत्पन्न दोगये 
तव इसमे यदह यका उत्पन्न होती है कि-जव कर्म ओर जीव की उत्पत्ति 
मानी जपयेगी तव जीव श्रौर कम॑ दोनो सादि सन्त हो जयेगे 
तथा फिर दोनो के कारण कौन कौन से माने जार्येगे ? कयाफ-जव जीय श्चौर 
कम कार्यं मानलिये गये तो फिर इन दोनो के कारण कौन रसे ह्ये 1 अतः 
यदह पत्त भी स्वीरूत नदी दो सकता । यदि रेखे माना जाय कि-जीव कमो 
सरे सद्रैव काल ही रष्धित है, तो इसमे यद शका उपस्थित दती है कि फिर शस 
ससार मे यद जीव जन्म मरण दु.ख चा ख कयो उरा रहा है ए क्ये कि--चिना 
कर्मो के उक्त कायै नही दो सकते । क्यो कि-यदि कर्मो के विना भी दुःखवा 
खुख भ्रात हो खकता रे तो फिर सिद्धात्मा भी खख वा दुःख के भोगने वाले 
सिद्ध टौ जार्भेगे 1 श्रत्व यद्‌ मानना भी युक्ति संगत सिख नही होता इहै । 


( २५ ) 


४६ ( पृद्टल कर्मो का) सम्बन्ध है तव तक दी श्रात्मा मे क्म श्राते जाते 
रहते दे । पयो -पुटृल मे परस्पर प्रकर्षण शाक्ते विमान दै । पुद्धल को पद्वल 
पाकपे करता ह । श्रतणब सिद्ध दुद्रा कि-दोनो नयो का मानना युक्तियुक्त हे 
चयोकि-यदि शस प्रकारसे न माना जायगा तव श्रत्मा के साथ कर्मो का 
तादात्म्य सम्बन्ध सिद्ध दय जायया जिसे फिर इस श्रात्मा का निबौणपद 
प्त करना श्रसमय सिद्ध होगा । इसलिये सेवर ारा चूतन कमं के ्राश्रव 
का निरोध कर भ्राचीन कमो का ध्यानतप दारा क्षय करना चादिष्ट) 
ययपि ज्ञेनमू्ो तथा कर्मय्रथो मे श्रनक स्थलों पर कर्मो की विस्तृत 
व्याख्या फी गर हे तथापि इस स्थान पर केवल दिग्दर्शन के लिये श्राटो मूल 
थरृतियो के नामोदध्लख किये गण ह ताकि जिक्षाख जनो को इस विपय मे 
श्रधिक शचि उत्पन्न दो । यत्‌ किचित्‌ माच उस्र स्थान पर लिखने का 
धयोजन इतना ही था कि-वद्ध को मोक्तपद रोसकता है नतु सुक्क को । संसारी 
जीव उक्त श्राठो धकार के करमो से लि हं । जव वे उक्तं कर्मो के यंधनो 
से विक्त दोजायैगे तव ही मोक्तपद भाघ्च कर सके । -रतपव भरत्येक ्रार्तिक 
निक्ासु मात्म को योग्य द कि-- वद सम्यगूदश्ेन, सम्यगूकलान श्नौर सम्यम्‌ 
चारि दाया कर्मों से रदित दोकर शनत कषान, प्रनत दशन, ्रनंतर्डेख प्रौर 
अनत बलवीर्यं को निज श्ात्मा म विकास कर उसमे फिर रमण करे । 
निचौण पद्‌ पाच होने पर निश्चय नय के अलुसलार श्त्मादटी देव, श्रात्मादी 


> 41 ह 
शर श्रौर श्यात्मा ही धरम है । 
हति श्रोनतत्व कीट ऋाविकामे मोखर्पव्णनात्मिरा शटी कलिका समप्ता ॥ 


~~~ ~~~ 


नवमी कलिका 


( जीव परिणाम विषय ) 

२ इस द्रव्यात्सक जगत्‌ म मुख्यतया दौ दी तच्च ग्रति पादन किये गः 
हे! जा श्रौर ज्जजीव । इन्दी दोनो तत्त्वो क अनत भदरो जने से जगत्‌ मे 
नाना भकार की वित्वि्ता दिखाई पड़ती दै। कारण कि-उत्पाद्न्यय --- 
भोव्यसत्‌” द्वव्य का ल्त जेनशास्नो ने उत्पाद व्यय चार भ्य स्प स 
कार किया 1 इस कथन से द्वन्यएस्तिक नय अरर पयायास्तिक नय भी 
सिद्ध किये गण द । द्व्यास्तिक नय के श्चाश्रितसवं द्रव्य भ्रल्य पदम रदता 
है परन्तु उत्पाद श्रौर व्यय के देखने से सये द्रव्य पर्थायास्तिक 


स्तिक नय के आाश्चेत 
दख पडता है 1' साथरीदसवातका मी पकाशच कर देना उचित भरतीत 


{ २८७ ) 


कतिविधेणं ते परिणामे पन्नते १ गोयमा ! दुविहे पर्णिमे पन्ते 


तमहा जीव पारेणामे य यजीव परिणामे य ॥ १॥ 
श्रधै--घी श्रमण भगवान्‌ मदावीर खामी से भगवान्‌ गौतम सवामी 
जा ग्रञ्च करते हे फि-टे भगवन ! परिणाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया 
द्‌ { इस प्रश्न के उत्तर मेँ श्र भगवान्‌ वर्णन करते हँ कि-हे गैपतम ! परिणाम 
दा प्रकार से प्रनिपादनाश्िया गया है जसे कि--जीव परिणाम श्रौर श्रजीव 
परिणाम । जीच परिणाम सप्रायोगेक श्रौर श्रजीव सवैश्रसिक दोता है । 
मन, चन, रौर काय दासा जव श्रात्मा पुद्धलो का कपण करता है तव 
उसमे स्वयम्‌ परिणत दोजाता दै । उसको प्रायोगिक परिणाम कते है कन्त 
जा पुद्ल स्वयमेव स्कन्धाद्धि मे परिणत दोता रहता है उसको श्रजीव 
परिणाम कटत है । शस पद्‌ मे सर्य वर्णन स्यााद के श्राश्रित होकर किया 
गया दै इस लिये पाठकों को स्याद काभी सदजमे दी वोध दो सकेगा । 
श्रव जीच परिणाम के मुख्य २ भेदा के एवेपय पृक्ते दे) 
जीव परिणामं सते कतिविपे प. गोयमा ! दसापिधे पत्ते, तजदा- 
गतिपरिणमि ईदियपरिणामे कसायपरिणामे लेसापरिणामे जोगपरिणामे 
उवश्मोगपरिणामे णाणपरिणामे दंसणपरिणामे चरित्तपरिणामे वेदपरि- 
णमे ॥ 
्मथ-दे भगवन्‌ ! जीव परिणाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया 
ह? दे गौतम ! जीव परिणाम दस प्रकार से प्रतिपादन किया गया हे जसेके- 
गति १ इद्दिय २ कपाय २ लेश्या ४ योग ५ उपयोग ६ क्ञान ७ दशन ठ चारि 
< श्रौर वेद्‌परिणाम १० । श्र्थात्‌ जव अत्मा अपने कर्मो द्वारा नरकादि 
गत्तियो मै जाता है तव जीव गतिपरिणामयुक्त दो जाता है 1 अतष्ट सर्वं 
भावो का प्रधिगम गतिपररेणाम के प्राक्त हप चिना प्राप्त चटी दयो सकता। 
उस लिपट शाखक्रतग ने गतिपरिणाम सर्वं परिणामो से पथम उपन्यस्त किया 
है । जव ' गत्तिपरिणाम से युक्क टोगया तो फिर “दनादिन्ट, मात्मा जानलक्तण 
परमैशर्ययेःयात्‌ तस्थदमिन्दियभिति ` कषान लस्तण श्रात्मा इन्द्रियो मे परिखत रोने 
स इन्द्रिय परिणाम कथन किया गया दे । इन्द्रियो डारा इष्टानि्ट विषयो का 
सम्बन्ध रोने स साग श्रौर देप के परिणाम उत्पन्नो जते दहे] फिर कषाय 
परिणाम कथन किया गया है 1 सो कपाय परिणाम युक्क श्रात्मः लेश्या परि- 
खम चाला दोता दी हे श्रतः कषपायानेतर लश्या परिणाम कथन किया गया | 
कारण कि--कपनाम ससारकादैसोजो ससार चक्रमे आत्मा को परि 
मण करवे उसे दी कपाय कते हे । 


( २८६ ) 


द्धि (कठिन जल ) फिर उसके ऊपर एवौ । सो पृथ्वी के ऊपर जख दयौर स्था- 
चर जीव रदते हे, नरको का पूर सविस्तर स्वरूप देखना हो ते धीजीवाषभे- 
मादि सो से जानना चाप । 
सो जव जीव नरको म जाता दे तव उस यात्मा का नरक गति परिणाम 
कटा जाता है ] जव तिग्‌ गति मे जीव गमन करना है तव चद तिग्‌ गति 
परिणामी फटा जाता ह परन्तु पृथ्वीकायिक, श्चपूक्यिक, तेजोकायिक, वायु 
कायक, चनस्पतिकायिक ये पांच स्थावर तिथग्गाति मे गिने जाति है । 
1 दो न्य वाल्ञ जीव जैसे खीप शंखादि, तीनो इन्द्रियो वाले जीव जसे 
. जः लिक्ता, सुरसली, कड श्रादि, चतुरिन्द्रिय जीव जसे मक्खी मच्छर चिच्च 
भ्रादि, पांच द्द्ियो वाल जीव जसे गौ, शश्व हस्ती मूपकदि तथा जल मे 
रहन वाले म्स्याद्वि जीव स्थल मे रहने वाले जैसे-गौ अश्वादि, श्राकाश मे 
उद्ने बाले जसे थक, ख कागादि यद सर्वं जीव तिर्थरागति मे गिने जति हे । 
इनका पूर विवरण देखना द तो भक्षापनादि सजनो से जानना चादिण ।,सो 
जव जीव मर कर तिर्धग गति मे जाता है तव उस समय उस जीव 
फा तियग्गति परिणाम कटा जातादहै । इस वात का भौ ध्यान रखना 
चादिष कि तिर्यग्‌ गति मे ही अनैत श्रात्मा निवास करते रहते है श्मौर नेत 
काल पन्त दसी गति मँ कायस्थिति कस्ते ह । यदि पाप कर्मो के रभाव 
से जीव इत गति मै चला मया तो फिर उस का को$ ठिकाना नदी दे कि-- 
बद श्रात्मा कव तक उस गति मे निवास करेगा करयोपकरि-श्यनेत काल परयन्त 
जीव उक्त गति मे निवास कर सकता है । यदि मेन्तारूढ़न इन्रा तो उक्त 
गति मे श्रवश्य गमन करना दोगा अतपच मोक्तारूढ दोने का प्रयल ्रवश्य 
करना चाद्दिए। 
जव पत्म शभाञ्यभ कर्मो ढारा मञप्य गति मे प्रविष्ट दोता दै तव 
उस का मदुप्यगति पर्णाम कटा जाता ह । मुख्यतया मञप्यो के दो भेद दे 
जेसेकफि-कर्मभूमिज श्रौर श्रकरमैमूमिज ।' असि ( खदगविधि ) मपि 
(लेखन विधि ) कसि ( रुपीविधि ) त्यादि शिल्पो दवाय जो पना निर्वाह 
करते है उन्दः कर्मभूमिक मद्य कते दै । उनके फिर मुख्य दो भेद है आर्यं 
रौर म्लेच्छं ( श्ननार्यं ) । फिर उक्त दोनो के वहुतसरे उपभेद दो जाते है । 
डितीय श्रकर्मभूमिक मजुप्य हे जो पना निवौद केवल कल्पदृत्तो ढाराद्ी 
करते है श्रपितु कोई क्म न करते 1 उनके भी वहुतसे केच भतिपादन क्ये 
गप हे । ठतीय सम्मूचििम जाति के मण्य भौ दते हे जो केवल मजुप्यो के 
मल मू्रादि भ दी सुन्म रूप से उत्पन्न होते रते दै । मजुप्य के मलसू्रादि 
मेनि ष्टी उनकी भौ मयुप्य सं्ादो जाती दै। इस प्रकार मचुप्यो के 


( २६१ ) 


जाता है तव उस जीव का द्रेवगति परिणाम कदा जाता दे । इस कथन करने 
कास्तायाश इतनाद्यी दं फि--उक्त चारो गतियो म जीव का परिणत दोना 
श्रतिपादन करिया गया है । 
श्रव इसके ्मनन्तर सूत्रकार शन्द्रिय परिणाम विपय कहते है जेसेकि- 
इदियपारणामेणं सति फतिविये प. ? गोयमा ! पंचापि पत. सोति- 
दिवपरणामे चक्पुंदियपरिणमे घाशिदियपरिणासमे जिध्भिदियपरिणामे 


फासिदियपरिणामे। 
भावाथ-हे भगवन्‌ ! इन्द्रिय परिणाम कितने भकार से प्रतिपादन 
क्या गया ह ? हे गोतम ! इन्द्रिय परिणाम पांच ध्रकार से वशन कियागया 
दे जेसेकि-धतेन्टिय प्रारेणाम, चच्ुरिन्द्रिय परिणाम, घरेन्द्रिय परिणाम 
रसनंन्द्रय पर्णिम श्चोर स्पर्शन्दरिय परिणाम । उक्र पांच। इन्द्रियो मे जीव 
का ह॑ परिरणमन दोना है ! इसील्यि ष्पिर जीव उक्र पांच इन्द्िय( दारा पदार्थो 
के बोध से वोधित दे जाता दै। यदि पेसे कदा जाप क्रि--जव शतेन्द्रिय शब्दो 
क( नद्‌॥ सुन सकता अर्थात्‌ वधिर दो जाता दे ता क्या उस्र समय उस इन्द्रिय 
म जीव का परिणमन नहीं होता । इसके उत्तर मे कटा जाता है कि-जीव का 
परेणमन ते श्रवश्यमेव द्योता दे, परन्तु श्चोत्रावेक्ञानावरंण विशेष उदय मे 
चजतिादेः इसी कारण वह वधिर होता दे । स्याकि-यदि जीव का परिशण्‌- 
मनन मानाजायतो क्या चह शादि द्वार छदन किये जाने पर दुःख नही 
भयुभव करता दैः श्यवश्यमव श्रयुभव करता हे । अतपव सिद्ध हुश्चा कि-इसी 
करार पचो इन्दिये( मे जभ्व परिणते रहा दे, श्रात्मा श्रसंख्यात परदेशी 
देने पर सर्च शरीर मे व्यापक दो रहा है इसलिये उसका परिणत दोना स्वा- 
भाष्वक चात्त दै 1 सार्सेश्च इतना दी है कि-जे पचो इद्धिय) द्वारा ज्ञान होता 
९ चह। जच परिणाम कटा जाता ह कयो क्रि-जीव के परिणत हण वना क्नान 
"कस थकार प्रगट्दो? श्रतएव जीव परिणाम पाचों इघ्ियो छाय किया 
जाता दे। 
च्व सूच्रकार इद्धिय परिणामक पर्चात्‌ कषाय पटिणिम विपय कते हैः- 
केसाय परिणमियं भते कतिधिषे प. ? गोयमा ! चउविहे प. तं.कोह- 
कसायपरिणामे माणकसायपरिणमे मायाकसायपारेणमे सोहकस्ाय 


पारेणमि | 
भावाथ-हे भगवन्‌ 1 कपाय पारणाम 1क्तन पकार स्वणन पए्क्या 
भय ह णाततम 1 कपाय परिणाम खार भकार स भ्रातपन्नि ्या.ययादह्‌ 


स 


जसे कि--क्रोध कयाय प्ररिणाम, मानकपाय परिरए्स., सायाकष्यय परिणाम 


( २९३ }) 


शौर छन्यन्त विशुद्ध परिणाम वाले जौच का शुक्गलेश्या मे परिणमन माना 
गया ह! सो उक्त पर्‌ लेष्याश्रो का पूर विचरण प्रतापन सूर के १७ जेग्या 
पद्‌ म चड़ विस्तारः से कथन किया गया है वहां से देखना चादिप्‌ 1 
जीव पर्‌ लेश्या्रोम दी परिणतदटोना है! इसी कारणसे कमोकावंघ 
जीव के प्रदेशो फे साथ होजाता है। जव चतुर्दशवे गुण स्थानारूढ जीव टोत्ता है 
तवं श्रलेए्यी होकर दी मोत्त गमन करता ह, पहली तीन शुम लेश्याषं दे 
रार तीन युभ। श्रतण्व शुभ लेश्याश्र से यन्तःकरण को शुद्ध कर शभ- 
लग्याश्रोम दी परिणत दोना चादिष्पताक्रे जीवको धमकी पाप्ति दो। 
जस प्रकार लिग्ध प्रदा से वस्तुका वंध दोना निधित दै, उसी प्रकार 
लण्याश्च! दवाय कर्मा का वंध दोना स्वाभाविक वात दें! 
श्व सूत्रकार लेश्या के पश्चात्त्‌ योगपरिणाम विषय कते है जेसे कि ~ 
जोग परिणमेणं भते कतिथिपे प॑. १ मोयमा ! तिविधे प. त. मणजोग- 
परिणामे वयजोगपरिणामे कायजोगपरिणामे । 
भावा हे भगवन्‌ ! योगपरिणाम कितने धकार से चरणेन किया 
गया है ? हे गौतम ! योग परिणाम तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जसे 
पक~मनोये(गपरिणाम, चचनये(ग परिणाम श्र काययोग परिणाम । इसका 
सारणश यदह है कि-जव मन के दास पदाथा का निरय किया जाता हतम 
अत्मा का परिणाम मने दाता टै क्यौ किि-श्रात्मा के परिणाम ( परिणत) 
उाजनेसेद्ी मनकी स्फुरणा सिद्धदटोतीदे । इसी कारण च्रात्मा के भावे 
दयमान, वर्दमान तथा श्रचास्थित माने जाते दे शास्या मं मनकी करण 
स्रा मानी गर है! कर्ण चटी दता है जो कत्ता की क्रियाम सहायक वन 
सके । जव आत्मा मनोयोग मे धत्त दोता है तव मन के सुख्यतया चार भद्‌ 
माने जाते ह । जसेकि--सत्यमनेःयोग, श्र सत्यमनेोयोगः मिधितमनोयोग शोर 
भ्यवहारिक मनोयोग । श्मात्मा का लक्षण वीय श्रौर उपयोग माना गया द] 
सो जव श्रात्मा का बल वीर्य मनोयोग भ जाता दै तव मनोयोग की निष्पत्ति 
मानी जात ह] पितु पंडित वी्यै वाल वीयं श्रौर बाल-पंडितवौ#य, दस प्रकार 
क वीर्यो के कारण सर मनोयोग के श्रसख्यात संकल्प (स्थान) कथन एकेण्‌ गये 
हे। वे सेकल्प शुभ श्रौर श्रशुभ दोनो प्रकार से प्रतिपादन कयि ग हें । , मन 
पक धकार स खूद्म चतुः्रदेशिक परमाणुश्चो का पिंड ह । आत्मा के पारेणत 
दा जने खे दी मनोयोग कटा जाता दै । जिस प्रकार मनोयोग का वणन किया 
गया है खक दसी धकार वचनयोग श्चोर काययोग के विषय म भी जानन 
वादिप । सारांश इतना दी है कि-तीन योयो मे आत्मा का परिणाम प्रतिपादन 


{ २६५ ) 


प्रोधिकशान परिणाम युफ्त कटा जाता टै 1 यद्यपि श्रात्मा परानरूप ही ह 
तथापि क्षानावरणीय कर्म फे प्रभाव से पांच शानो मे परिणत दोजाताद। 
ह्न धाना का पूर स्वरूप नदी सिद्धान्त सर जानना चादिण। संक्तेप सर यहां 
चरन करिया जाना दै । 
„ १ मतित्तान--तुद्धिपूर्वक पदाथ काश्रनुभव करना श्रर्थात्‌ मतिक्ान 
न पदार्थो का छान पाञ्च करना। ८ 

२ सुनकर पदाथ का मतिपूर्वक विचार करना । 

२ श्पने क्षानद्ारा रूपी पदार्थौ को जानना ! इस कषान को श्रवधि 
जान कते हे । दस पान के श्नेक भद्‌ प्रतिपादन किये गए हे, । 

‰ मनःपर्यवन्नान संमी ( मन वले) जीवोके जोमन के पर्यीयदै 
उनको जानलेना है । 
, भ केवलक्षान उसका नाम दै जिसके द्वारा सव द्रन्य श्रौर पयायो 
का दस्तामलकवत्‌ देखा जाणः । दसा सान वाले को सर्वक्त श्रोर सर्द्र्शी 
कदा जाता हे 1 इन्दा प्रानो म जीव का परिणत दोना माना गया दै । प्रथम 
चार स्नान छुदस्थ के रौर पंचम क्षान सर्स् का कटा जाता दे । 

श्रव ज्ञान के परतिपन्त श्रक्षान परिणाम विपय कते दै, 

, अणाणपरिणमेणं मते कतिविधे प. ? गोयमा ! तिविंहे प. तजहा मह्‌- 


अणणपरिणामे सुय्मणाणपरिणमे विभगणाणपरिणमे । 

भावाथ- दे भगवन्‌ ! श्रक्षन परिणाम कितने प्रकार सरे प्रतिपादन 
किया गया हे ? हे गोतम ! श्चज्ञान परिणाम तीन प्रकार से वरन किया गया 
दे । जेसे कि-मतिद्यक्लानपरिणाम, शुतश्चक्नानपरिणम, विभंगक्ञनपरि- 
म । सदून्नान से रित पदार्थौ का स्वरूप चितन करना थीत्‌ जिस प्रकार 
ठरव्यौका स्वरूप श्री भगवान्‌ ने प्रतिपादन किया है उससे विपरीत पदार्थो 
का स्वरूप मति ढारा च्रलुभव करना उसी का नाम मति श्क्ञान परिणाम हे । 
ययपि व्यवहार पक्त मे मति क्षान श्मौर मति अज्ञान का विशेप भद्‌ प्रतीत 
नदीं होता, परन्तु द्वव्य के भेदौ के विषय मे कषान श्नौर श्रज्ञान की परीक्ता 
पूतया सहज मे दी दो जाती है! जिस प्रकार मति अक्ान पदार्थो के सद्‌- 
रूप को सद्‌ रूप से अनुभव करता है ठीक उसी भरकारष्टत अक्षान के 
विषय म जानना चादिए । मिथ्या शत ढासदही लोकमे अज्ञान अपना 
मरधकार विस्त करता, है जिससे भाणी उन्मागंगामी चनते हैः दतीय 
श्रवधिज्ञान का अतिपन्न विभंगक्षानं है, जिस का यह मन्तव्य हे .कि- जो 
निज उपयोगछासा ( योग दाया ) पदाथ का स्वरूप श्जुमव करना हे यदि 
चद स्वरूप यथार्थता से श्मजुभव करने मे अवे उस को विरभेग क्ञान करते टे। 


{( २६७ ) 


भावाथ--हे भगवम्‌ ! चरिच्रपरिणाम कितने प्रकार से प्रतिपादन 
किया गया दै ? हे मतम ! चारित्र. परिणाम पांच प्रकार से वशन करिया गया 
जेेकि--सामायिक चरित्र परिणाम, चेदोपस्थापनीय चरित्र परिणाम 
परदार विश्रुद्धिक चरित्रपरिणाम, सखच्प सांपरायिक चारित्रपरिणाम श्चोर 
थाख्यात च(रित्र परिणाम । शाख म चारित्र शब्द की व्युत्पात्ति इस प्रकार 
कीहे कि-जिस स श्रात्मा के ऊपर से शचय' कर्मों काउपचय दृर्टोा जावे 
उसका नाम चारे ह । यद्यपि शासा मउ चारित्र की विस्तार पूवक 
व्यारया लिखी दुई दे तथापि उक्त चारि्ो के नामों का मूलाशे इस भकार 
चरन किया गया है जेततकि- 

९ सामायिक चारि्न--जिखके करेन स्र श्रात्मामे समता भावकी 
भराति दो श्रौर सम्यक्तया योगे। का निरोध क्रिथा जवि उतत का नाम सामा- 
प्येक चारि है । 

छेदोपस्श्रापनीयचारिज-पूर्व पयय को द्‌ कर फिर पाच.महानते 
रूप पयाय को धारण करना उस का न(म देदोपस्थापनीय चारि दे। 

३ परिटारविश्ुद्धिक चारिघ्र--जिसके करने से पूवं प्रायाध्चत्ता स 
्रात्म-चिगुद्धि कर श्ात्म-करयाण किया जाय उस कानाम परिदार विथुद्धिक 
चारि हे । सम्प्रदायमे यद वात चली श्माती है कि--नव साधु इस चारित्र 
क। धारण कर गच्छु सर वा्िरद्धो कर ध्य मास पयन्ततप करते डे जेसेकि - 
पथम चार साधु छः मास पर्यन्त तप करने लग जाते द रीर चार साधु उन्‌ क 
सेयाव्रत्यादि करते द । पक धु व्याख्यानादि, क्रियास्म मे लगा रदता दे । 
जय च तपकर्म कर चुके तव सेवा करने वाले चारा साधु तप करन लग जत 
है श्नर वे चारो उनकी स्वा कस्ते रहते दै. परन्त व्याख्यानादि क्रियार्पे वदी 
साधु करता रहता दे । जव वे चारो साधु षर मास पयन्त तप कर चुकं तव 
चद्‌ व्याख्यानादि क्रियार्पै करेन वाला साघु पर्‌ मास पयन्त तप करतां श्र 
उन श्राठा साधुर मे प्क साधु व्याख्यानादि क्रियाच्रा म शदृत्त दा जाताद 
शेप सात साश्व उसकी सवा करने लगते है । इस कम से ये नव साधु ९८ मास 
पयन्त उक्र चारि क्री श्राराधना कर फिर गच्छं म अजात ह । 
सूदमसां परायचारि्र-- जिस चारित्र मे खल्म लोभ का अश रदजाच । 


६ 


1 


यह चारिच दश्शव॑ गुणस्थानवत्ती जीवो का हाता ] 1 

यथाख्यातचारि्--जिसख प्रकार क्रियादयो का वणन कर उसा भकार 
किया का करने वाला यथाख्यातचारिज्र कडा जाता ह 1 चह चारन 
सरागी श्रार कीतरागीं दोना प्रकारक साधुश्रोको दोता हं अथात्‌ शच 
र १३ चे, प्नौर ९७ वे युणस्थानवर्तौ जीवो को यथाख्यातं चपर 


{ २६६ ) 


१ नस्कगतिपरिणाम की श्रपेत्ता से नरफगति परिणाम मे वे जीव 
प्ररिरतदो रदे दै। 

 द्द्वियपरिणाम फी श्रपेक्ता से वे जीव पेचद्धिय परिणाम से परिणत दे। 

कप्रायपरिणाम फी श्रपे्ा से वे जीव क्रोध, मान, माया च्रौर लोभ 
मैभी परिणतटोर्टेदै। 

४ लेद्यएपरिणाम की वेता से वे जीव छरृष्ण लगया, नाललश्या श्रर 
कपोत्ेश्यामे दी परिणत दो रटेदै 

, योगपरिणाम फी श्रपेत्ता से चे जीव मन, वचन श्रौर काय कयाग 
सभी परिणत दो रटे द। 

६ उपयोग परिणाम की छपेक्ता से-वे जीव साकारोपयुक्त श्चार अनाः 
ारोपयुक्त दोनो उपयोगो से उपयुक्त हो र्दे दै । 

७ क्षानपरिणाम कधी श्रपेत्ता से प्राभिनिवोधिक क्ञान, धेतक्लान चअचष्व 
भान से परिणत हे । श्रपान परिणाम की श्रपेत्ता से मति श्यक्ञान धत ज्ञान 
तेथा विभेग कलान्‌ से परिणत दो र्दे दं 

„ उ देशनपरिणाम की श्रपेत्तासरेवे जाव सम्यगदष्टे भी द, 
खटभीदहे शरीर सम्यग्‌ श्रौरमिध्यारषिभीदे 

ध, चारित्र परिणाम की श्रपेत्ता 
नही चे गृदस्थ धर्म के पालन करने वाले दी है } किन्त 
पयमाद्दे से रदितदीदटै। । 

१९ वेद्परिणाम की छयेत्ता से वे जीव खीविदी नही दे 
पुरुपवेढी ही है किन्तु वे तो केवल नपुंसक वेद वले दी हे । 

„ इस प्रकार नरक मे रहने वाले जीवो के दश यकार कं परिणाम रोते 
है । साथमे यद्‌ भी सिद्ध किया गया है कि जीव सदैव काल परिणत दाता 
रहता है । श्रतप्पव जीव को परिणामी माना गया है किन्तु द्रव्य का खच 
नाश नही माना जाता, केवल द्वव्य का द्रव्यान्तर दोजाना हा पर्साम माना 
गयादे। 
„ ` श्रव दृश धकार के भवनपति देवो के परिणाम ए्वपय म 
दे । जेसेकि- 
असुर कमारावि एवं चेव नवरं देवगतिया कणलेसावि जाव तेउलेसावि 


वेदपरिशामें इस्थिवेदगावि पुरिस वेदगावि नो नपुंसक वेदा सेस तं चेव 


एवं थशिय मारा । क 
भावार्थ--जिस प्रकार नरक मे रहने चाले जीवौ का वणेन किया गया 


मिध्या- 


५ 
0 


च साधुदत्ति वले नदी है । 
1 वे श्रचरि्ी च्रथीत्‌ 


नही वे जीव 


स्दूचक्रर कदत 


( ३०१ ) 


, भावाध-दीन्द्रिय जौवगति परिणाम की श्रपेक्ता से तिथग्‌ गति परिणामं 
स परिणत द । इद्वियपरिणाम से जीव दीन्दिय है क्योकि सुख श्रौर श्यीर दी 
इनकम श्रेया ह । किन्तु शेप चव्ण॑न नारकीयवत्‌ है । केवल योगपरिणाम की 
श्रपत्ता सर वचनयोग श्रौर काययोग दी होता है । कान परिणाम की च्रपेक्षासे 
प्ाभिनिबोधिक पान श्रौर श्रतश्षान भी दै तथा श्रक्षान परिणाम की श्रपेत्तासे 
मातेच्र्नान परार श्त श्मान भी दे । श्रपितु विभगस्ान नदी दे । दशन परिणाम 
की श्रपे्तामे सम्पगदष्टि श्रौरमिथ्यादणि है फिन्तु सम्यगूमिध्या रषि नदी 
हं । शेपवरणन पर्यवत्‌ दै । दसी प्रकार चतुरिन्द्रिय पर्यन्त जानना चादिषट । भेद 
केवल इतना ही है ककि -दृन्द्ि्यो की चृद्धि कर लेनी चादिष्ट जैसेकि-बीन्द्रिय 
जवा की तीनद्ी द्द्वियां दोती है प्रर चतुररिन्दरिय जीवो की चार इद्धियां दोती 
हे । परन्तु शेप परिणामो का वर्णन श्राग्बत्‌ जानना चादिये । 
श्व इनके श्रनन्नर खूचकार पचेन्द्रिय ति्यग्‌विपय मे कते दैः- 
पैचेदिय तिरिक्ख जोशिया, गतिपरिणमिणं तिरियगतिया,' सेसं जहा 
नेरदयाणं शवरं॑ल्ेसापरिणमिं जाव सुकलेसावि चरित्तपरिणामेश णो 
चरित्ती यचरित्तिति चरित्ताचरित्तिवि पेदपरिणमेणं इत्थिवेद गावि पुरिसवेद- 
गावि खपुंसक्येदगायि ॥ 
भावार्थ पंचैद्धिय तिैगूयोनिक जीव गतिपरिणाम की श्रपेन्षा से 
ति्येगगति मे परिणत हे । किन्तु शेप वणन जैसे नारकियौ का किया गया था उसी 
प्रकार जानना चादिये। मेद॒ इतना दी है फे-लेश्यापरिणाम की अपेत्तासे 
पेचेद्रिय ति्ेगयोनिको म रुष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या, , तेजोलेश्या, 
पद्मलेश्या प्नौर शुक्कलेश्या इन कः ही लेश्याश्रो मे उक्त जीवों के परिणाम दो 
जति है । यदि चासि्रिपरिणाम की श्रपेत्ता से उनको देखते है तवचे जोव 
सर्वथा चारि नी नद्ध सोते फिन्व॒ श्रचरिजी श्चौर चारिाचरिजी दौजाते है, 
प्च वेद्‌ परिणाम की पेच्ता से वे जीव स्वीयेद, पुरुपवेद शरोर नपुंसक्वेद 
इख प्रकार तनो वेदौ म परिणतो र्दे दै { । 
हसक्रे नंतर मुप्य परिणाम पिपय कंहते है - 
सशससाणं गतिपारेणामेणं मणुयगतिया' इईंदियपरिणमेणं पंचिदिया 
अशिदियावि कसायपरिणमेणं कोहकसायीषि जाव , यकसाईवि लेसा 
परिणामेणं कर्टलेसावि जाव अल्लेसावि जोगपारेणामेणं ,. मणजोगीवि 
जाव अजोगीवि उवञ्रोगपारेणमेणं जहा नरदया णणपरिणिमेणं आभिरि- 
बोहियणाणीषि जाव केवलनाणीषि अणणयरिणमेणं ` तिरिण ' बिश्रणाणा, 


( >न्दे ) 


तथा शये (छ्रविकासे) भी 1 प प्रफार मखप्यगत्ति फ जीवा फ यु 
ि रन पिया सयाद । ५.०१. 
१ त व्यन्नर्‌ देव ज्योनिपी तथा वैमानिकः देयो चः 
परिणाम विषय कदे ईै-- ५ चोर 
वाणमेता गतिपरिणमेणं देवगतिया जहा असुर मारा एल सेद 
सियापि नवं जेसापरिणमिरं तेउलेसा, बेमाणियायि प्ं चेव नवर लेस 
परिणमेणं तेरतेसावि पम्दलेसावरि सुकतेसावि रेतं लीवपरिणामे । 
भवाय --ज्यन्तर देव गतिपरिणाम फी श्येता स देवगति परिणाम से 
परिरित दे रह है । जिस प्ररार श्रुर, कुमार देवो का चरन पूर कियाजा 
चुका दै दीक उसी मकार व्यन्तर श्योर ज्योतिषी देवो के चिपय भ भी जानना 
नादहियि. भेद केवल तना ही है फि-लेद्यापरिसाम केः विपय केचल्ल तेज 
लग्था जाननी चाद्धिये । 
दसी यकार वैमानिक दरवो के विषय मे भी जानना चादिये किन्तु वेष 
ऽतना दी दै कि--ेष्यापरिणाम कगे क्ता से नेज्या, पदल्ा श्र 
शक्घरेष्यासिचे देव परिणत शो र्दे ह । सारांश इतना दी दै फि--चमानिक 
देच उक्र तीन लेश्याश्चो के परिणाम से परिणतदो रहे है । शेप परिणामा 
का बरन प्रागचत्‌ द । ५ 
दख भ्रमर देश पकार के परिणामो मे जीव परिणत सोर्हादे। श्रतण्व 
जीव को परिणामी कटा गया दै! द्रव्य से द्रव्यान्नर हो जाना पर्णिम 
का पधरथम लक्तण वरन कर चुके है 1 पर्याय नय उसको उत्पाद श्रौर व्ययरूप 
सरे मानता ह किन्तु द्रव्य को भौव्य रूप स स्वीकार करता हे । किन्तु द्रव्यार्थक 
नय केवल द्रव्यकेो द्रव्यान्तर दोना दी स्वीकार करता दै) 
सो इस प्रकार जीव परिणाम कथन करने के श्नन्तर श्रय सूत्रकार 
अजीव परिणामं चिपय मे कटति र नेसेकि- 
अजीचपरिणमें भते कतिषिधे प. १ गोयमा ! दसाय पण्णतते तजटदा- 
यधरएपरिणामे गारीपर्णिमे सेडाणपरिणमे भेद परिणामे श्णपरिणामे 
मेभपरिणमि रसपरिणामे फासपरिणामे अरगुरुयलहुयपरिणामे सदपरिणम । 
, भावाथ-दे भगवन्‌ ! श्रजीव परिणाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया 
गया है १ दे गोतम ! श्रजीवपरिणाम दश भकार से वन किया गया है जसेकि- 
चधनप्रिएम, मतिपरिणम. सेस्थानपरिणाम, भदपरिराम, चरपरिणाम, 
गंघपरिणाम, रसपरिणाम, स्पशपरिणाम, अशरुकलघुकपरिखाम, शब्दपरि 


( ३०५ ) 


त्वस्य ख्तत्वस्य च विपममात्रा भवति तदा वधः स्ऊन्धानासुपजायते । इयमत्र भावना-समगुण- 
लिग्धस्य परमारवदि" समयुण सिग्धेन परमाएवादिना सद सम्बन्धो न भवति तथा समयुणस्त्त- 
स्यापि प्ररमारवदिः समयुणर्क्ेण परम।एवादिना सह संवेधो न भवति, किन्तु यदि लिरध लिग्धेन 
रुका केण सह विषमगुखो भवति तदा विपममात्रत्वात्‌ भवति तेषा परस्परं सम्बध | विपममात्रया 
चधो भवतील्युक्तम्‌ , तते विपमसात्रनिरूपणा्माह- "निरस्स णिद्धेण दुहियाशेत्यादि' यदि लिग्धस्य 
परमारवदेः सिग्धय॒रोमैव सद॒ परम।रवादिना बंधो भवितुमर्हति तदा नियमात्‌ दषाधिका- 
भिश्युरेनैव परम एवादिनेति भाव । रुत्तगुणस्यामि परमारवदिः सुक्तयुणोन परमारबादिना 
सह॒ यदि वधो भवेति तदा तस्यापि तेन दयाथधियुरनैव, नान्यथा । यदा पुन. 
निग्धर्कतयोवंधस्तदा कथमिति चदत श्राह-“निद्स्स लुक्येरेत्यादि' ।किगधस्य रूक्तेण सह ब॑धसुपेति 
उपपद्यते जघन्यवज्यो विषम समो वा तरसुक्क भवति--एकगण्तिरध एक गुणरूकं च॒ सुक्त्वा 
शेषस्य द्वियुणसिग्धदेद्धिुएसरुत्तादिना सर्वेण चधो भवतीति उक्तो वंधनपरिणामः। 
इसका श्रथ पूर्वं लिखा जा चुका है ' सर्वो कथन कां सारांश इतना 
दधी दै कि--जव स्कंधौ का परस्पर वंधन होता है तव उन स्कधों के स्निग्धादि 
सुण वैमानिक होते द । तवर दी उनका वधन टो सकता है। 
ञव वधन परिणाम के श्ननन्तर गतिपरिणाम विपय कहते हैः-- 
गतिपरिणमेणं भते कतिविहे प. १ गोयमा ! दुषिंहे पर्णते तंजहा- 
फुसमाणगतिपरिणामे शअफुसमाणगतिपरिणामे अहवादीहगतिपरिणामे 
रहस्सगतिपरिणमिय । 
-. भवाथ-दे भगवन्‌ { गतिपरिणाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया 
गया है ? हे गौतम ! गति परिणाम दो रकार से वर्यन किया गया है जेसेकि- 
स्पशैमान गति परिणाम शओमौर श्चस्पश्वैमानगत्तेपरिणस तथा वीधैगतिपरिणम 
चा हस्वगतिपरिणाम ! इस कथन का सारांश इतना दी है कि~जव पुद्धल गति 
परिणाम म परिणत सोता है तव वहदो प्रकार सरे गत्तिकरतादहै। एकतो 
स्पर्शमानगति परिणाम । जेस जो-पुद्रल गति मे परित हमा तव वद श्पने 
तते मे श्रनि वाले आकाश पदेशो को तथा खक्तेन से प्रथ्‌ ्राकाशप्रदेशो 
को स्पश करके ही गति करता हे । जिस प्रकार एक शकरः (कांकरी) जल पर 
किसी द्वारा भरक्ति्त की हुई जल को स्पयै करः वा विना स्पशे कर गति करता 
है धीक उसी भकार पुद्गल भी राका भदेश श्रपने से जो प्रथक्‌ दै उनको भी 
स्पशं करके गति करता है। दुसरे भेद मे जिस भकार पष्ठी भूमि को न स्पशे 
करता हुश्मा गति करता हे उसी प्रकार पुद्धल भौ श्रपने केजरी मदेशो को छोड़ 
कर्‌ अन्य देश को न स्पश करता हुश्मा गति करता द । सतो इन्दी को 
स्पण्मान श्मौर अस्पशंमान गतिपार्णम कदते द! पव दर्धिगति 


( ३०७ ) 


णाम श्रोर शुक्कवसं परिणाम, र्थात्‌ याचन्मात पुद्रल दै चे सच रुष्ण, नील, 
पीत, रक्त श्रौर श्वेत वर्ण मे ही परिणत दोर द । स्येकि पेखा के(दे मी पुद्धल 
न्हीहैजो वर्णते रदित दो श्रतः सर्वं पुद्रल्तपंचवणी टे । 
चरी युक होने के कारण पुद्ल गंध धमे वालाभी है । प्रतएव सूत्रकार 
गंध विषय कते है-- 
मष पारेणतिरौ भते कतिविध प. १ गोयमा ! दुविहे प, तंजहा सुभ्मि- 
गष परिणामे दुभ्मिगंध परिणामे य । 
भावाश्च दे भगवन्‌ ! गंध परिणाम कितने भ्रकार से वणेन करिया गया 
है ? दे गोतम ! दो प्रकार से, जेतेकि-खुभध परिणाम शौर दुभेन्ध परिणाम 
क्योकि यावन्मान पुद्भन दै वद सच दोनो रकार के मेधो मै परिणत दोरा है 
तथा शधो मे परिणत दोना यद पुद्धल का स्वभाव दी दे । 
श्रव सु्रकार रस परिणाम विपय कटने दँ । जैसकि-- 
रसपरिणमिणं अते कातिषिरे प. ? गोयमा ! पंच विं पर्एत्ते तंजहा 


तित्तरसपरिणामे जाव महुररस परिणामे । 
ध. भावार्थ-हे भगवन्‌ } रसपरिणाम कितने रकार सि चरन क्रिया गया हे? 
हे गोतम ! रस परिणाम पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया जैसेकि-तिक्ठ 
रस परिणाम, कटुक रख पारेणाम, कसायला रस परिणाम, खटा रस परिणाम 
शरोर मधुर रस पारेणाम श्र्थात्‌ यावन्मात्र पुद्धल हे वद सव पाचोादीरसोमे 
परिणत दोरदा द । ययपि चछढा लोगो ने लवणरस भी कटपन किया ईजा हे किल 
चह रस सेयेगजन्य हे । इस क्तिये शास्बकता ने पांचो दी रसो का विधान 
किया हे । पुद्धल का यद स्वभाव दी हे किवहसर्सौमे परिणत देता रहता 
क्योकि-पुद्रल द्रन्य मूष्िमान्‌. दै । सो जो द्रव्य मूर्तिमान्‌ दोता हे वह वरै गेध 
रस श्रर स्पश्चे वाला होता दे । शरतपच सूजकार इसके नन्तर स्पशे विषय 
कदत है तथा रस धभ श्रजीव का प्रतिपादन क्या गया है नतु जीव का। क्योकि 
जीवतो पक श्ररूपी पदाथ हे । 

श्मव सूञ्रकार स्पशविपय कदटते दः- ४ । 

फासपरिणमेणं अते कतिविधे प. ? गोयमा ! अहविधे प. तजहा 
कक्यडफासपरिणमि जाव लुक्खफासपरिणमि य ॥ _ . 

भावाथ --दे भगवन्‌ ! स्पशे परिणाम कितने भकार से वशेन किया गया 

है १ हे गोतम ! स्प परिणाम शाट भकार से प्रतिपगद्न प्रिया गया हे । जेसेकि- 
ककशस्पशैपरिणएम, सृदुर्पशपारिणामः गरुस्पशं परिणाम, लघुस्पशपरि णाम,